Thursday, May 31, 2012

अद्भुत खेल रचाया किसने


अप्रैल २००३  

विस्मय अथवा कृतज्ञता ही हमें ध्यान में ले जाते हैं. हमारी मुस्कान को स्थिर रखते हैं. तब ही एक मुक्ति का आभास हमें होता है जब भीतर एक स्थिरता छा जाती है. इस मुक्ति से ही भीतर प्रेम का भी जागरण होता है. प्रेम से मन शक्तिशाली अनुभव करता है, शक्ति से ही समाधान मिलता है यानि द्वंद्व से पार हुआ जा सकता है. तो प्रथम हुई कृतज्ञता की भावना और उस सृष्टि कर्ता की लीला को देखकर विस्मित होना. द्वंद्व से पार हुआ मन ही स्वयं के पार जाकर उसकी गहराई में जाना चाहता है, जहाँ उसे आनंद का अनुभव होता है. एक ऐसा भाव हमारे भीतर उतरता है कि देह का कण-कण एक धागे में पिरोया हुआ है, वह धागा प्राण ऊर्जा ही है. ध्यान का ही परिणाम है कि हम अपने भीतर स्थित देव तत्व से जुड़ जाते हैं. जीवन में जो पात्र निभाना है वह आनंद पूर्वक निभाते हैं फिर लौट आते हैं अपने आप में, वैसे के वैसे, कबीर ने ऐसे ही भाव में आकर लिखा होगा “ज्यों की त्यों रख दीनी चदरिया” !

Tuesday, May 29, 2012

अमन हुआ जब प्रेम जगा


अप्रैल २००३ 
कृष्ण ने गीता में जो वचन दिए हैं वह उन्हें पूरी तरह निभाते हैं. वह हरेक के हृदय में प्रकट होते है, उसे अपनी उपस्थिति का अहसास बहुत तरह से कराते हैं. उन्हें जो प्रेम करता है उसे वह हर एक के भीतर दिखने लगते हैं और सारी सृष्टि उन्हीं के भीतर भासती है. वह इतने प्रिय हैं इतने आनन्ददायक हैं और उन्होंने हमें भी अपने सा बनाया है, हम ईश्वर का अंश हैं पर अज्ञान के कारण कृपण का सा जीवन जीते हैं. जब सदगुरु जीवन में आते हैं तब हमें अपनी वास्तविक स्थिति का कुछ-कुछ भास होता है. उर में प्रेम का उदय होता है, प्रेम के लिये प्रेम, फिर भक्ति का उदय होता है इस सुंदर सृष्टि को बनाने वाला कितना सुंदर होगा, उसके प्रति कृतज्ञता उमडती है, उससे मिलने की इच्छा बलवती होती जाती है तो वह स्वयं को प्रकट करता है. एक झलक पाकर प्यास और बढ़ जाती है, हास्य व अश्रु का खेल भीतर ही भीतर शुरू हो जाता है तब संसार के खेल तुच्छ प्रतीत होते हैं. मन आत्मा में ही रमण करने लगता है. आत्मा स्नेहिल है, वह शांति देती है, मन तब धीरे-धीरे अपनी सत्ता खोने लगता है वह भी प्रेममय होकर आत्मा में ही विलीन हो जाता है. हम मुक्ति का अहसास करते हैं. संसार हमें दे ही क्या सकता है, तब हम दूसरी दृष्टि से देखते हैं कि हम उसे क्या दे सकते हैं. तब अंतर में सेवा का भाव जगता है. बिना किसी प्रयोजन के हम तब कार्य करते हैं, निष्काम जीवन तब शुरू होता है.

Sunday, May 27, 2012

साधना क्यों करें


हमारी संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने-पढ़ाने के लिये या विचारों तक ही सीमित रखने के लिए नहीं है. उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं. धार्मिक होना एक संकीर्ण अर्थ में लोग जब लेते हैं तभी विवाद होता है. धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार इसी जीवन में, अपने इन्हीं नेत्रों से...उसको जानना और उस से बल पाकर सबको अपनाने का भाव जगाना. साधक के जीवन का यही लक्ष्य है.


Saturday, May 26, 2012

बीज रूप है प्रेम अभी


अप्रैल २००३ 
स्वयं में जो प्रेम छिपा है उसे जागृत करने का नाम ही भक्ति है. उसके ऊपर एक आवरण छा गया है, एक दीवार खड़ी हो गयी है उसके और हमारे बीच, उसे गिराना है, छोटी-छोटी बातों से जो खिन्न न हो, भावनाओं के आवेग व आवेश जिस पर हावी न हों, सुख में जो अभिमान न करे, दुःख में जो विचलित न हो ऐसा मन उस प्रेम को शीघ्र जगा सकता है. वह प्रेम रसमय है, आनंद मय है, हमारी देह, मन बुद्धि, चित्त व अहंकार हैं तो सब उसी के आश्रय से लेकिन उससे बेखबर हैं, जैसे किसी की आँख पर चश्मा चढ़ा हो और वह उसे ही ढूंढ रहा हो.

Friday, May 25, 2012

छिपा है सागर इक कतरे में


मार्च २००३ 
कभी कतरे को दरिया समझ कर डूब जाते थे
मगर अब निर्मल दरिया को भी कतरा समझते हैं....
सत्य हमें प्रेम और बल से भर देता है. उसका खजाना तो सदा है पर चाबी हमारे हाथ नहीं आती, उस चाबी का पता हमें साधना के रूप में मिलता है. इस खजाने की हिफाजत भी आवश्यक है, कहीं इसे पाकर सूक्ष्म अहंकार पुनः न दबोच ले. स्वयं को निरंतर कसौटी पर कसना है, स्वयं को बख्शना नहीं है और अन्यों की गलतियों पर ध्यान भी नहीं देना है. जो कर्म में सजग है वही ध्यान में भी सजग रहेगा.

Thursday, May 24, 2012

भीतर सूरज चमक रहा है


मार्च २००३ 
आत्मनिर्माण करना है तो मन पर चौकीदार रखना होगा और उसके नाम से अच्छी चौकीदारी कौन कर सकता है. परमात्मा का नाम अंतर को शुद्ध करता है और कितनी ही विघ्न-बाधाओं को पलक झपकते हटा देता है. आत्मनिर्माण का अर्थ है आत्मा में रस का अनुभव करना, आत्म साक्षात्कार इस पथ की मंजिल है. ज्ञान, ध्यान और अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे इसको अनावृत करते जाना है और एक दिन वह सूर्य की तरह अपनी पूरी दिव्यता के साथ चमकती है. उसके प्रकाश की झलक तो यात्रा के आरम्भ से ही मिलने लगती है. जीवन में उजाला छा जाता है कार्य में रूचि बढ़ जाती है, परहित का ख्याल आने लगता है, परिवार में सुख-शांति छाने लगती है और सब काम अपने आप सही समय पर होने लगते हैं. उसके इतने सारे उपकार हैं हम पर, अंधकार में रास्ता खोजते व्यक्ति का हाथ पकड़ कर जैसे कोई प्रकाश में ले आये, ज्ञान जीवन में हो वही जीवन जीवन है. हमें मुक्त करता है ज्ञान, फूल सा हल्का बना देता है, सारी जंजीरें काट कर उसके समक्ष पहुँचा देता है.

Wednesday, May 23, 2012

धर्म और विज्ञान


धर्म व्यक्ति का परिमार्जन करता है और विज्ञान वस्तु का परिमार्जन करता है. धर्म अंतर में ले जाता है, विज्ञान बाहर की ओर ले जाता है. अंतःकरण का परिमार्जन करने के बाद उसका उपयोग विज्ञान के लिये भी किया जा सकता है परहित के लिये. ऐसा विज्ञान दोषों के प्रति सजग होगा. और जो भी कार्य उसके द्वारा होगा, उसका कर्ताधर्ता एक ‘वही’ होगा, करने वाला निमित्त मात्र होगा. करने वाले का एक मात्र लक्ष्य तो अंतःकरण का परिमार्जन है सो वह निंदा का पात्र होने पर भी कभी अपमानित नहीं होगा, सुख-दुःख आदि में सम भाव में रहकर वह अपने अंतर आकाश को प्राप्त कर लेता है, जिस पर संसार रूपी बादल आते-जाते रहते हैं. पर वह सदा एक सा ही है.