Monday, March 11, 2013

रस का कोई स्रोत बह रहा


मई २००४ 
मन जितना-जितना समता में स्थिर होता जाता है, अस्तित्त्व के हम उतने ही निकट जाते हैं. जीवन में सन्यास घटित होता है, सत्य का संकल्प ही सन्यास है. यह एक छलांग है, जिसे लगाने पर भीतर एक मोद का अहसास होता है, ईश्वर को निकट पा जाने की कला आ जाती है, वह रसमय है, माधुर्यपूर्ण है, जिसे शब्दों में कहना आसान नहीं है, उसमें स्वयं को मिटाने की कला ही सन्यास है. हम कुछ भी नहीं हैं, यह भाव सिद्ध हो, अहं को नष्ट करना आ जाये तो हम उसके रस को पीने की कला सीख जाते हैं, वह रस हमारे भीतर से ही प्रकट होने लगता है, हम हैं क्या ? वही तो है, एक वही तो अनेक रूपों में दिखाई दे रहा है. वही स्वयं ही हमारे भीतर प्रकट होता है, और स्वयं ही अपने आनंद को पाता है. ‘स्व’ में स्थित होकर ‘स्वकीय’ में विश्रांति पानी है, ‘स्व’ ‘स्वकीय’ का अंश है, प्रकृति से जुड़कर ‘स्व’ अहम बन जाता है. मन, ‘स्व’ के सागर पर उठने वाली लहरें हैं, जब मन शांत हो जाता है तब ‘स्व’ में समाहित हो जाता है, मन का होना अहम् के कारण है. समता की साधना करने पर साधक को अपने भीतर बहुत कुछ घटता हुआ दीखता है, कुछ मधुर जिसे नाम नहीं दे सकते, जो अनिर्वचनीय है.

Sunday, March 10, 2013

चेतन अमल सहज सुख राशि


मई २००४ 
नन्हा बच्चा अपने भीतर की मस्ती से आनन्दित है, वह किसी भौतिक कारण के कारण सुखी नहीं है, पर दुखी वह किसी कारण से ही होता है.  मानव जब बड़ा होता है तो किसी कारण से ही सुखी होता है और दुखी बिना किसी कारण के ही होता है. कल्पनाओं के महल बनाकर वह स्वयं ही उन्हें गिराता है फिर आकुल होता है. प्रतिस्पर्धा की अग्नि में स्वयं को झुलसाता है, दिखावे की पीड़ा से गुजरता है. हम अकारण ही भयभीत होते हैं. और अपने भीतर के आनंद को ढक देते हैं. सहज उल्लास जो छह महीने के बच्चे में प्रकट होता है भीतर से, वही उस इंसान में भी प्रकट हो सकता है जिसने सारी तृष्णाओं का त्याग कर दिया है, जो पूर्णकाम है, उसके जीवन की बागडोर अब अस्तित्त्व के हाथों में है. वह सहज रूप से जीता है, तभी उस अकारण करुणानिधि उस परमात्मा की अहैतुकी कृपा का अनुभव उसे होता है. 

Wednesday, March 6, 2013

जो तुझ भावे सो भली


मई २००४ 
विद्या माया से अविद्या माया तो नष्ट हो जाती है, पर सत्वगुण विद्या माया में ही छिपा है, उसे नष्ट करने के लिए ज्ञान पर्याप्त नहीं है, वह केवल ईश्वर की शरण में जाकर ही नष्ट हो सकती है, उसकी कृपा हम पर हर क्षण बरस रही है. हमारे मन में न जाने कितने-कितने संस्कार दबे हैं, जो वक्त आने पर प्रकट होते हैं यदि हम शरणागत हैं तो प्रारब्ध को हँसते-हँसते स्वीकार करते हैं. स्वीकार करते ही उसका अहैतुक, निस्वार्थ प्रेम हमें छू जाता है. धर्म के अनुभव का एक ही अर्थ है कि परमात्मा है और हमसे बहुत प्रेम करता है, यह अस्तित्त्व हमारा अपना है, सदा हमें प्रसन्न देखना चाहता है. प्रतिपल जीवन उत्सव तभी बन सकता है, जब यह सारा जगत अपना लगता है. 

Tuesday, March 5, 2013

कुछ न करे जब पल भर को मन


मई २००४ 
ध्यान में हमें कुछ न करने का सुझाव दिया जाता है, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत मानव सदा कुछ न कुछ करता ही रहता है. सदा बाहर की ओर ही उसकी इन्द्रियाँ दौड़ती हैं, सदा कुछ न कुछ पाने की चाह, कोई न कोई इच्छा उसे निरंतर दौड़ते रहने पर मजबूर करती है, पर जब यह मन समझ जाता है कि उसकी यह दौड़ कोल्हू के बैल की तरह है जो उसे कहीं नहीं पहुंचाती, तो वह ध्यान में उत्सुक होता है. अभ्यास से मन टिकने लगता है, भूत की चिंता व भविष्य की आशंका से मुक्त हो वर्तमान के उस छोटे से द्वार में प्रवेश करना सीख लेता है जो अनंत में खुलता है.

Monday, March 4, 2013

जरा सामने तो आओ...


मई २००४ 
यह जो एक नामालूम सी कसक भीतर छायी है, यह जो अनजानी सी पीड़ा ने मन को व्यथित किया है, यह विरह की पीड़ा है. चैन नहीं लेने देती यह, मन को पल-पल जलाती है, तड़पाती है, इसे नाम नहीं दिया जा सकता पर यह है वही, वह नहीं मिलता जब, तभी यह अभाव मन को खटकता है, पर वह तो नित हमारे साथ है, फिर यह दर्द क्यों , वह है पर मन पर पर्दा पड़ा है, वह छिप गया है. वह  मिला तो गर्व हो गया अब उस गर्व को मिटाने के लिए यह पीड़ा रूपी औषधि लेनी है. जो भी हो रहा है, उसे साक्षी भाव से देखना है, भोक्ता नहीं बनना है, यह सोचते ही मन हल्का होने लगता है. जो कुछ भी हो रहा है वह मन के बाहर की बात है, जैसे सड़क के किनारे खड़े होके देखें तो अनगिनत लोग गुजर जाते हैं, हम अलिप्त रहते हैं, वैसे ही मन को देखते जाना है, मन में तरंगे उठती हैं, गिरती हैं, हम उसके द्रष्टा हैं, द्रष्टा भाव दिया है उसी परमात्मा की शक्ति ने, इसके पार वही तो है. 

Friday, March 1, 2013

मन अनंत अनंत ही चाहे


मई २००४ 
हम यदि विकारों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते तो कहीं न कहीं सीमाकरण तो करना ही होगा, धीरे-धीरे इस सीमा को बढ़ाते जाना है. हम सुख-दुःख से परे उस परम आनंद को यदि अपना आश्रय स्थल बनाना चाहते हैं तो संयम और अनुशासन पहला कदम है. उन्मुक्त जीवन में मन भी उडा-उड़ा सा ही रहेगा. ऐसे मन में बुद्धि स्थिर नहीं रहेगी, स्थिर बुद्धि में ही आत्मा प्रतिबिंबित होती है. ईश्वर स्वयं हमें अपना आनंद प्रदान करना चाहते हैं, उसकी शक्ति ही हमें जीवित रखे हुए है, पर इस बात को हम नहीं मानते, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे भीतर नहीं उमड़ते. इतने पर भी वह हमें प्रेम करता है, हमारी सोयी हुई शक्तियों को जगाना चाहता है, हमारे माध्यम से प्रकट होना चाहता है, हमारे धैर्य समाप्त होने की अनंत काल से प्रतीक्षा कर रहा है, कि कितने वर्षों तक हम उससे दूर रह सकते हैं, हम कितने निस्वार्थी हैं कि ईश्वर का सान्निध्य भी नहीं चाहते, लेकिन जगत जो सीमित है वह असीम मन को आनन्दित कैसे कर सकता है.

एक उसी की खोज सभी को


अप्रैल २००४ 
अस्तित्त्व आनंद स्वरूप है, वह प्रेम तथा ज्ञान स्वरूप है, वह आनन्दित होकर प्रतिक्षण अपना प्रसाद बांट रहा है. पर मानव के पास समय नहीं है कि उस आनंद को पाने के लिए जरा सा प्रयत्न भी करे. जब हम पर विपत्ति के बादल मंडराते हैं तो हम ईश्वर के निकट जाते हैं, हमारा लक्ष्य तब विपत्ति से छुटकारा मात्र होता है न कि उसके आनंद को पाना. वह अकारण दयालु है, वह हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करता है कि हम उसके निकट आयें. यदि इतने पर भी हम नहीं समझते तो मृत्यु का झटका लगता है, पुनः जन्म होता है और पुनः मरण...अंततः हम स्वयं ही कह उठते हैं, कभी इसका अंत भी होगा...क्यों हम व्यर्थ ही दुःख उठा रहे हैं, अरे, इस जीवन का कोई प्रयोजन भी है या फिर यूँही यह आना-जाना लगा हुआ है. तब अस्तित्त्व जान लेता है कि यह वक्त उचित है कि इसे अपना आनंद प्रदान किया जाये. वह भीतर से सद्प्रेरणायें भेजने लगता है, जीवन के रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है. तब भीतर प्रेम जगता है, आनंद मिलता है. सद्गुरु का इसमें बड़ा हाथ है उनके प्रेम का आश्रय लेकर साधक ईश्वर की ओर चल पड़ता है.