Monday, March 31, 2014

रस की खान को लें पहचान

नवम्बर २००५ 
भगवद प्राप्ति की प्यास जब जिधर भी जगी, वहीं से माया का लोप होने लगता है. यह प्यास भीतर से आती है, बुद्धि की पहुंच आत्मा तक नहीं है. आत्मा शाश्वत सुख का स्रोत है. जैसे शक्कर को मिठास खोजनी नहीं पडती वैसे ही आत्मारामी को सुख की खोज नहीं करनी है. जब ऐसी मंगलमय घड़ी साधक के जीवन में आती है, वहाँ कोई द्वैत नहीं रहता, कोई भेदभाव नहीं बचता. सब शुभ होता है. यह जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है. किन्तु यह प्यास भीतर जगे इसके लिए पुरुषार्थ हमें ही करना है. इसे भाग्य के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता. एक बार साधक के भीतर की सुप्त शक्ति जाग्रत हो जाये तो उसकी दिशा स्वयंमेव बदल जाती है. संसार की सत्यता स्पष्ट हो जाती है और दिव्यता की मांग भीतर से उठने लगती है.  

आपे आप सुरंजन सोई

नवम्बर २००५ 
नानक के अनुसार, “कीता न होई थापया न जाई, आपे आप सुरंजन सोई” ! ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव करना है. कहीं से लाना नहीं है वह, कुछ करने से नहीं, कुछ भी न करने से वह प्रकट होता है, ध्यान साधना से जब पल भर के लिए मन खाली हो जाता है तो एक अनोखी पुलक से भर जाता है. जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. हमारे भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, हम चाहें तो तत्क्ष्ण उन्हें पा सकते हैं. हमारे मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोये रहते हैं और जो निधियां हम सहज ही पा सकते हैं, जन्म भर उनसे वंचित ही रह जाते हैं. परम के प्रति मन में श्रद्धा का भरना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है. हम सुख स्वरूप परमात्मा को कुछ-कुछ पहचानने लगते हैं.     

Friday, March 28, 2014

भेद-अभेद का खेल अनूठा

नवम्बर २००५ 
स्वरूप में अभेद है पर संबंध में भेद होगा ही. भक्ति में भेद का अर्थ है मर्यादा, भक्त और भगवान के मध्य भी द्वैत का अर्थ एक मर्यादा है, एक सुव्यवस्था है. जब हम पूजा करते हैं तो भी एक दूरी रहती है. जब हम प्रभु के साथ कोई संबंध बनाते हैं तो भी एक भेद रह जाता है. वह हमारी माँ, पिता, सखा, गुरू कुछ भी हो सकता है, एक भेद तब भी रहता है. गुरु शिष्य के बीच में भी एक भेद रहता है, तभी भक्ति रहती है. जिसकी भक्ति करें वहाँ विश्वास है और भक्त में श्रद्धा है. जिस श्रेष्ठ का हम वरण करें तो उसमें विश्वास हो तथा हममें श्रद्धा हो, यह भी भेद है. वह अंशी है तथा हम अंश हैं, वह गगन सदृश है हम जड़ पृथ्वी हैं. यह जगत ब्रह्म है हम सेवक हैं, यह भेद है. पर जो इस भेद का राज जानता है वह अभेद को पार करके ही आता है.

Thursday, March 27, 2014

कर्म का विज्ञान सिखाता

अक्तूबर २००५ 
हम जो भी स्थूल कर्म करते हैं, वास्तव में वे सभी पूर्व कर्मों के परिणाम हैं, हम उनके कर्ता नहीं हैं. जो सूक्ष्म कर्म हैं, दिखाई नहीं देते, वही बंधन का कारण होते हैं, अतः उन्हें रोकना ही कर्म त्याग है, इस बात का ज्ञान ही समस्त दुखों से एक साथ छुटकारा पाने का उपाय है. कर्ता होकर जब तक हम इस जगत में रहते हैं तब तक हम भोक्ता भी बने रहेंगे. तब हम जगत में रहकर जो भी कर्म करते हैं वह अभिनय मात्र है, उस कर्म का फल वहीं का वहीं समाप्त हो जाता है.  

Wednesday, March 26, 2014

प्रज्ञा का इक दीप जला हो

अक्तूबर २००५ 
भारत की संस्कृति अद्भुत है, यह कहती है जब हम अपने स्वभाव में नहीं होते तब खंड-खंड होते हैं और जब कोई वस्तु या घटना हमें अपने स्वभाव में लौटा लती है तो वह हमें प्रिय हो जाती है. शास्त्र हमें वह कुंजी देते हैं जिनसे हम अपने आप में लौटते हैं. जब हम विकार ग्रस्त होते हैं तो स्वयं से दूर हो जाते हैं. कामनाओं की पूर्ति के अभाव में हम क्रोध का शिकार होते हैं, जब तक प्रज्ञा के द्वारा हमारा समाधान नहीं होता तब तक क्रोध नहीं जाता. जब तक अपेक्षाएं हैं तब तक हम क्रोध से मुक्त नहीं हो सकते, जब हम तृप्त हो जाते हैं तब इस जगत में पूर्ण शांति के साथ रह सकते हैं. तप, जप, स्मरण, वन्दन, अर्चन सारी साधनाओं का एक ही हेतु है कि अंत करण शुद्ध हो, पवित्र हो ताकि स्वभाव में टिकना सहज हो जाये.

Tuesday, March 25, 2014

सागर में उठती लहरें जब

अक्तूबर २००५ 
हम इस जगत में सुख-दुःख के झूले में झूलने नहीं आये हैं बल्कि अखंड आनंद से मिलने वाली शांति प्राप्त करने आए हैं, ऐसी शांति जो जगत की हलचल से समाप्त होने वाली नहीं होती है. यह शांति उस ज्ञान से प्राप्त होती है जो हमें भक्ति करने के लिए प्रेरित करता है, ज्ञान का अंत भक्ति में ही है. भक्ति का अर्थ है अपने आप में रहना, कोई कामना नहीं, कोई उद्वेग नहीं, कोई विक्षेप नहीं, मन की वह अवस्था ही ईश्वर की निकटता की अवस्था है. वह निर्लेप, निसंग अवस्था ही अखंड शांति की अवस्था है, यही हमारी सच्ची अवस्था है, वही हमारा स्वरूप है. उसी में स्थित होकर भक्त कवियों ने ईश्वर की आराधना की है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो आत्मा रूपी सागर में उठने वाली लहरे हैं, जब यह लहरें न रहें तो शांत सागर अपने स्वरूप में स्थित रहता है. एक बार उस अवस्था का अनुभव हो जाने के बाद यदि लहरें उठती-गिरती रहें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, फर्क तभी पड़ता है जब हम उनके साथ संबंध बना लेते हैं. जब तक हमारा संबंध दृश्य के साथ नहीं है, हम द्रष्टा भी नहीं हैं, साक्षी भाव में आ जाते हैं. आत्मा में स्थित हुआ जीव सुख-दुःख का भागी नहीं होता, वह तो सम अवस्था में ही रहता है. 

Monday, March 24, 2014

कृपा बरसती हर पल उसकी


जब हमारे जीवन में कोई ऐसा दुःख आता है जिसका प्रतिकार हमारे हाथ में नहीं होता, हम असहाय हो जाते हैं तो एक तरह से वह ईश्वर का वरदान ही होता है. हम निरहंकारी होकर उसके सम्मुख आत्मसमपर्ण कर देते हैं. उसकी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी मानते हैं, हम ईश्वर के प्रति धनभागी होते हैं, कृतज्ञ होते हैं कि उसके निकट आने का कैसा सुअवसर उसने दिया. सुखों में खोकर तो हम उसे भुला ही देते हैं और समर्थता हममें अहंकार को भर देती है. हमें अपने स्वस्थ, सबल होने का जब अहंकार हो जाता है जब रोगी व्यक्ति हमारी सहानुभूति का पात्र नहीं हो पाते तो ईश्वर हमें भी उनके समकक्ष लाकर बिठा देते हैं ताकि हम अहंकार वश अपना ही नुकसान न करें. यदि हमारा लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है तो इस मार्ग में आने वाली सारी रुकावटों को दूर करने का काम प्रभु स्वयं करते हैं. वह सर्व समर्थ हैं, उनसे हमारा अटूट संबंध है. हम मानव होने के नाते उनकी सन्तान हैं, उनका अंश हैं, उन्हीं की तरह आनन्द स्वरूप हैं. यदि हम स्वयं को देह ही मानते रहे तो दुखी रहेंगे, मन या बुद्धि मानते रहें तो भी हमारे दुखों का अंत नहीं. जैसे ही हम स्वयं को आत्मा मानते हैं, हमारे सारे दुखों का अंत हो जाता है. यह देह तथा मन अस्थायी हैं, पल-पल बदल रहे हैं, न जाने कितनी बार हमने देह छोड़कर नई देह धारण की है. एक दिन इस देह को भी छोड़ना है, उसकी तैयारी अभी से हमें करनी है.