Monday, June 8, 2015

मुक्त सदा ही रहता है वह

सितम्बर २००९ 
परमात्मा सृजन तो करता है, सृष्टा तो है पर कर्ता नहीं. शास्त्र कहते हैं परमात्मा नर्त्तक है, वह है और नृत्य भी हो रहा है, नृत्य उसके बिना नहीं हो सकता पर वह नृत्य के बिना भी हो सकता है. परमात्मा प्रकृति के साथ एक भी है और भिन्न भी. सारी प्रकृति वर्तती है उसकी उपस्थिति में ही, पर परमात्मा स्वयं नहीं वर्तता ! उसकी मौजूदगी ही काफी है. जो इस मौलिक तत्व को समझ लेता है वह कर्तापन के भाव से मुक्त होकर जीता है. प्रकृति बड़ी शांति से अपना काम करती है यह जानकर हमारी पकड़ छूट जाती है.

है अपेक्षा कारण दुःख का

सितम्बर २००९
अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है. लाओत्से ने कहा है कि कोई मुझे हरा ही नहीं सका, कोई मेरा शत्रु भी न बना, कोई मुझे दुःख भी न दे सका क्योंकि मैंने न जीत की, न मित्रता की न सुख की अपेक्षा ही संसार से की. जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा है.

Saturday, June 6, 2015

बनें साक्षी हम पल पल के

अगस्त २००९ 
हमारे जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें कि अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि हमारा जीवन सुख व आनंद की एक अनवरत श्रंखला है, अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से हम बने हुए हैं. परमात्मा की भांति हम भी अनादि हैं, उसकी भांति हम साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनंद लेने वाले, हर श्वास एक आनंद की लहर का खबर देती है. जो स्वयं ही आनंद है उसे भी अपने आनंद का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनंद लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्न विशिष्ट चेतना में ! हम स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न, जिसमें हमने एक नया पात्र धरा है, शरीर मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है, स्वप्न से जागकर ही पता चलता है कि इसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे, वैसे ही मृत्यु के वक्त पता चलता है, सब कुछ छूट रहा है, यह एक स्वप्न का अंत हो रहा है. हमारा ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला आये तो जीवन एक उत्सव ही प्रतीत होता है. 

Friday, June 5, 2015

जिस क्षण एक हुआ यह मन

जुलाई २००९ 
धर्म की साधना है मन रूपी दाल को फिर बीज बनाना, बीज में ही अंकुर फूटता है. एक क्षण में तब अंकुर वृक्ष बनने लगता है. बीज के लिए धरती है शब्द, सत्संग, गुरू के वचन, मनन. जिस वक्त संध्या काल हो अर्थात मन एक अवस्था से दूसरी में जा रहा हो तब यह बीज बोना चाहिये, जैसे निद्रा और जागरण के मध्य या जागरण और निद्रा के मध्य ! जुड़ा हुआ मन ही गहराई में जा सकता है. 

Wednesday, June 3, 2015

शक्ति की आराधना हो

जून २००९ 
उद्यमो भैरवः’ पुरुषार्थ करना ही मानव का कर्त्तव्य है. सत्य की खोज के लिए भी पुरुषार्थ करना पड़ता है और जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी. मानव रोज-रोज अपनी शारीरिक व मानसिक शक्ति को खो रहा है पर आत्मिक शक्ति सदा एक सी है और जो अपने निकट है, भीतर गया है, वही इस शक्ति का अनुभव कर सकता है. जीवन में कोई सचेतन लक्ष्य न हो तो जीवन एक सूखे पत्ते की तरह इधर-उधर डोलता रहता है. साधक वही है जो चिंतन के द्वारा स्वयं को सजग करता है. 

Tuesday, June 2, 2015

गुरू के द्वारे जो पहुँचा है

मई २००९ 
मंजिल पर पहुंच सकें इसलिए वाहन मिला है, जीवन की लालसा हमें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. जिसे मंजिल का पता चल गया है उसे मृत्यु से भय नहीं लगता, असली जीवन इसके बाद ही आरम्भ होता है. मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहकर ही सारा जीवन गुजार देता है. मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अज्ञान और अशिक्षा सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा जो अध्यात्म देता है. लेकिन हम गुरू द्वार तक पहुंच ही नहीं पाते परमात्मा जिस शांति का घर है गुरू उसका द्वार है, लेकिन उस शांति का अनुभव विरले ही कर पाते हैं. 

Monday, June 1, 2015

उसका सुमिरन जब होगा

अप्रैल २००९ 
दुनिया का कोई ऐसा सुख नहीं है जो अपने पीछे दुःख को न छिपाए हो. परमात्मा का सुख ही ऐसा है जो विपरीत से जुड़ा नहीं है. ज्ञान है तो परमात्मा है. ज्ञान के कारण कोई परमात्मा के मार्ग पर नहीं चलता, दुःख के कारण चलता है. दुखों में सबसे बड़ा दुःख तो मरण का है. मरण को याद रखके ही कोई परमात्मा को याद करता है. बेअंत की याद उसी को आएगी जो अपने अंत को याद करता है. अकाल को वही पा सकता है जो काल को याद करता है. तन का घट मिट्टी का है, प्रकृति एक दिन उसे अपने तत्वों से जोड़ देती है. मन का घट परमात्मा का है. मन ज्योति स्वरूप है. तन को प्रकृति अपने घर पहुंचा देती है, मन को अपने घर खुद जाना है. संसार हर समय याद आता है पर हजार प्रयत्न करने पर भी परमात्मा याद नहीं आता. जिसे याद आता है, वह महा आनंद को पाता है, उसे भूल जाना ही दुःख है.