Wednesday, March 8, 2017

भीतर जब एकांत बढ़े

९ मार्च २०१७ 
शास्त्र व संत कहते हैं हमारे अस्तित्त्व  के सात स्तर हैं, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, संस्कार, अहंकार तथा आत्मा. एक-एक कर इन सोपानों पर चढ़ते हुए हमें परमात्मा तक पहुँचना है. समान ही समान से मिल सकता है इस नियम के अनुसार केवल आत्मा ही परमात्मा से मिल सकता है. इसका अर्थ हुआ पहले हमें आत्मा तक पहुँचना है, योग साधना के द्वारा पहले देह को स्वस्थ करना है, व्याधिग्रस्त देह के द्वारा समाधि का अभ्यास नहीं किया जा सकता. प्राणायाम के द्वारा प्राणों को बलिष्ठ बनाना है. स्वाध्याय तथा ज्ञान  के द्वारा मन व बुद्धि को निर्मल करना है, ध्यान के द्वारा संस्कारों को शुद्ध करना है. उस अहंकार को समर्पित कर देना है जो परमात्मा से दूर किये रहता है. इस तरह धीरे-धीरे भीतर एकांत बढ़ता जाता है जहाँ पहले पहल आत्मा स्वयं से परिचित होती है, और फिर जब वह अपने पार देखती है परमात्मा ही परमात्मा उसे चारों ओर से घेरे है. 

Tuesday, March 7, 2017

निज अनुभव जब उसे बना लें

८ मार्च २०१७ 
घोर अंधकार में जब हाथ को हाथ नहीं सूझता हो, अचानक तेज बिजली चमक जाये तो पल भर को सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है. जीवन यात्रा में चलते समय भी जब कभी ऐसा समय आता है कि कुछ नहीं सूझता, तब अचानक किसी हृदय की गहराई से निकला हुआ कोई सूत्र  वस्तुओं को स्पष्ट दिखा देता है. सत्य ऐसा ही होता है, वह राह दिखाता है, समाधान करता है, सत्य का अभ्यास नहीं करना होता, सत्य को अनुभव करना होता है और वह तब तक नहीं होता जब तक अनुकूल परिस्थिति न आ गयी हो. उसके पहले हम बौद्धिक रूप से कितना ही दोहराते रहें पर जब तक कोई सत्य हमने स्वयं अनुभव नहीं किया हमारे लिए वह सार्थक नहीं हो पाता. हम सभी कहते हैं जीवन क्षणिक है, यहाँ सब कुछ पल-पल बदल रहा है, पर ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदा के लिए यहाँ रहना हो, संग्रह करने की प्रवृत्ति हमें देने के अतुलनीय सुख से वंचित रखती है. देह मिटने वाली है यह कहते हुए भी सुबह से शाम तक हम देह का ही ध्यान रखते हैं, जैसे कोई व्यक्ति कार का ही ध्यान रखे पर ड्राइवर को उपेक्षित  रखे, ऐसे ही हम देह को तो पूरा आराम देते हैं पर मन को विश्राम नहीं देते. ज्ञान का सम्मान करने से ही जीवन उस ज्ञान का साक्षी बनता है. 

Monday, March 6, 2017

बनें साक्षी हर द्वंद्व के

७ मार्च २०१७ 
जीवन द्वंद्वों से गुंथा है, दिन-रात, सुबह-शाम, धरा-आकाश, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख, अपना-पराया कितने सारे जोड़े हैं जिनसे हम प्रतिदिन दो-चार होते हैं. हमारी कठिनाई यही है कि हम सुख चाहते हैं, दुःख नहीं, स्वर्ग के गीत गाते हैं नर्क से मुँह फेरते हैं, अपनों के लिए आँखें  बिछाते हैं, पराये से कोई मतलब नहीं, पर जीवन ऐसा होने नहीं देता, वह सदा जोड़ों में ही मिलता है. हर सुख की कीमत दुःख के रूप में देर-सवेर चुकानी ही है. स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर ही गुजरता है. कोई अपना कब पराया बन जायेगा पता ही नहीं चलता. क्या  इसका अर्थ हुआ कि जीवन हमें छल रहा है ? नहीं, जीवन हमें द्वन्द्व से पार जाने का  एक अवसर दे रहा है, क्योंकि  उसके पार ही ही है वह महाजीवन जिसे कोई परमात्मा कहता है कोई, खुदा ! जब तक हम सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी के साक्षी बनकर उनसे प्रभावित होना त्याग नहीं देते, सहज आनंद की धारा में, जो अनवरत अस्तित्त्व बहा रहा है भीगने से हम वंचित ही रह जाते हैं.

Sunday, March 5, 2017

योग सधेगा जब जीवन में

६ मार्च २०१७ 
योग के साधक का अंतिम लक्ष्य होता है सदा के लिए भीतर समाधान को प्राप्त होना, अर्थात बाहर की परिस्थिति कैसी भी हो मन के भीतर समता बनी रहे, समता ही नहीं समरसता भी.  इस लक्ष्य को पाने के लिए वह अपनी रूचि के अनुसार एक पथ का निर्धारण करता है. यदि उसमें तर्कबुद्धि है तो ज्ञानयोग, भावनाबुद्धि है तो भक्ति योग और दोनों का सम्मिलन तो कर्मयोग के द्वारा वह अपने पथ पर आगे बढ़ता है. सत्य के प्रति निष्ठा और श्रद्धा तीनों के लिए प्रथम आवश्यकता है. योग का साधक वही तो हो सकता है जिसके भीतर स्वयं के पार जाने की आकांक्षा जगी हो, जो स्वयं से ही संतुष्ट नहीं हो गया है, जो जानता है कि उसके पास उन सवालों के जवाब नहीं है जो इस जगत को देखकर उसके मन में उठते हैं. जो अपने मन में निरंतर उठने-गिरने वाली लहरों के जाल से स्वयं को बचा नहीं सकता. वह देखता है जो व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति आज सुखद है वही कल दुःख का कारण हो जाती है. जीवन को गहराई से देखने वाला हर व्यक्ति एक न एक दिन अपने पार जाने की कला सीखना चाहेगा. निज बुद्धि के पार उस विवेक को पा लेगा जो हर कठिनाई को एक अवसर बना देता है.

Thursday, March 2, 2017

देह बने देवालय जब

३ मार्च २०१७
पंच तत्वों से बना है हमारा शरीर, तो जाहिर है पंच तत्वों के सारे गुण उसमें भी होंगे. पृथ्वी का सा अपार धैर्य और उसकी जैसी शक्ति भी, जिसे अनुभव करना चाहें तो धावकों अथवा खिलाडियों को देख सकते हैं, जो अकल्पनीय कारनामें कर लेते हैं. प्राणमय देह वायु तत्व से बनी है, गति उसका स्वभाव है प्राण के ही कारण सारी गतियाँ देह में होती हैं. प्राणायाम के द्वारा हम इसे पुष्ट कर सकते हैं. प्राण ऊर्जा यदि कम हो तो देह व्याधियों से जल्दी ग्रस्त हो जाती है और प्राण ऊर्जा यदि बढ़ी हुई हो तो देह में स्फूर्ति बनी रहती है. मन विचारों, भावनाओं, कामनाओं, आकांक्षाओं का केंद्र है. स्वाध्याय और ध्यान इसे सही दिशा देते हैं. मन यदि बहते जल सा प्रवाहमान रहता है तो ताजा रहता है. काम, क्रोध, लोभ मन को बांधते हैं तथा अंततः दैहिक व मनोरोगों के कारण होते हैं. भावमय देह हमारे आदर्शों पर आधारित होती है, यदि जीवन में हम किन्हीं मूल्यों को महत्व देते हैं, सहानुभति, सद्भावना और सेवा के भाव भीतर पल्लवित होने लगते हैं. अग्नि की भांति हम आगे-आगे बढ़ना चाहते हैं. यह सब जिस आकाश तत्व में होता है वैसा ही है आत्मा का वास्तविक स्वरूप, जो होकर भी नहीं सा लगता है किन्तु जो सब कारणों का कारण है.

Wednesday, March 1, 2017

स्वयं से जुदा रहे न कोई

 २ मार्च २०१७ 
एक व्यक्ति ने किसी संत से पूछा, सत्य क्या है ? उन्होंने कहा, नेत्र बंद करो और अपने भीतर कुछ ऐसा खोजो जो सदा एक सा है, जो आजतक नहीं बदला, न ही जिसके बदलने की सम्भावना है. वह व्यक्ति कुछ देर बाद नेत्र खोल कर बोला, ऐसा तो भीतर कुछ भी नहीं मिला, शरीर का अनुभव हुआ, पर वह तो कितना बदल गया है,  विचार निरंतर बदल रहे हैं, भावना भी बदल रही है. संत ने कहा, जो यह परिवर्तन देख रहा है वह तुम कौन हो ?  हमारे भीतर हम स्वयं ही अपरिवर्तित रह जाते हैं, किन्तु स्वयं से अपरिचित होने के कारण हम इसे देख ही नहीं पाते. दर्पण में देखने पर हम स्वयं को देह मानकर उसके साथ एकत्व का अनुभव करते हैं, सिर पर श्वेत केशों के झलकते ही उदास हो जाते हैं. नाटक देखते समय मन के साथ एकत्व कर लेते हैं और पल-पल सुखी-दुखी होते रहते हैं. किसी ने हमारे प्रतिकूल कुछ कह दिया तो भावनाओं के साथ एक हो जाते हैं और व्यर्थ ही स्वयं को आहत कर लेते हैं. ध्यान में जब हमे स्वयं के साथ जुड़ते हैं तो ही सहजता का अनुभव करते हैं, सहजता आत्मा का स्वाभाविक गुण है, जो आज का व्यक्ति खोता जा रहा है. 

खिले सदा मुस्कान लबों पर

१ मार्च २०१७ 
संत कहते हैं सदा प्रसन्न रहना भगवान की सबसे बड़ी पूजा है. प्रसन्न रहने का अर्थ है एक ऐसी मुस्कुराहट का मालिक बनना जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति मिटा न सके, ऐसी प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहती, वह स्वाभाविक सहजता से उत्पन्न होती है. प्रतिपल यदि हम सजग रहते हैं और अस्तित्त्व से निरंतर झरती हुई ऊर्जा से एकत्व का अनुभव करते हैं तब ही इसका अनुभव किया जा सकता है. अतीत जो जा चुका, पश्चाताप या क्रोध के रूप में हमारी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दे और भविष्य जो अभी आया नहीं हमें आशंकित न करे तो जीवन को उसके समग्र सौन्दर्य के साथ जीने का अनुभव प्राप्त होता है. हमारे चारोंओर जो सृष्टि का इतना बड़ा आयोजन चल रहा है, उसके पीछे छिपे अज्ञात हाथों का स्पर्श हम भी महसूस करने लगते हैं. आकाश हमारा मित्र बन जाता है और हवाएँ सहयोगी.