Monday, May 11, 2020

समता में जो मन टिक जाये

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इन पांच कोशों के भीतर हमारा वास है. जब चेतना अन्नमय कोष से जुड़ी होती है उसे जरा-मरण का भय लगता है, प्राणमय कोष में रहकर भूख-प्यास का अनुभव होता है. मनोमय कोष के कारण हम शोक-मोह का अनुभव करते हैं, विज्ञानमय कोष ही हमारे सुख-दुःख के अनुभव का कारण है. आनंदमय कोष आत्मा का निकटस्थ है, इसमें ब्रह्म का आनन्द है किन्तु यह सदा उपलब्ध नहीं होता. जब साधक साधना के द्वारा अन्य चार कोशों के पार चला जाता है तब इसका अनुभव करता है. यहाँ असीमता का अनुभव होता है तथा विषाद और भय का लोप हो जाता है. ध्यान और समाधि के द्वारा इसमें टिकने का सामर्थ्य बढ़ता है, तब सुख-दुःख में समता प्राप्त होती है, जिसे कृष्ण योग में स्थित होना कहते हैं. मानव जीवन में ही इस समता को प्राप्त करना सम्भव है. 

Sunday, May 10, 2020

ममता की जो मूरत है


धरती को हम माँ कहकर बुलाते हैं. नदियों को भी माँ का दर्जा  देते हैं. बच्चा जो भाषा सर्वप्रथम सीखता है, उसे भी मातृ भाषा कहा जाता है. भारत की महान संस्कृति में माँ को बहुत सम्मान दिया गया है. गौरी-शंकर, सीता-राम हो या राधा-श्याम - पहले माँ का नाम आया है. ज्ञान की देवी सरस्वती माँ, धन की देवी लक्ष्मी माँ और शक्ति की देवी पार्वती माँ की पूजा देवता भी करते हैं. सृष्टि के सृजन में तथा उसके पालन में माँ के योगदान को कौन नकार सकता है. माँ का प्रेम उस आकाश की तरह विशाल होता है जो सबको आधार देता है और उस सागर की तरह गहरा होता है जिसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता. माँ संतान से कुछ नहीं चाहती, वह केवल उसे प्रसन्न देखना चाहती है. संतान कितना भी नाम, धन कमा ले पर माँ उसकी आवाज सुनकर ही जान जाती है कि वह सुखी है या किसी बात से चिंतित. अवश्य ही परमात्मा ने उसके हृदय में कोई सूक्ष्म यंत्र लगाया है जिससे वह बच्चे की आँखों को पढ़ लेती है, दूर होने पर उसकी आवाज को पढ़ लेती है और दुआओं का एक दरिया उसके अंतर से सहज ही बहने लगता है. मातृ दिवस पर माँ होने के उस अहसास को नमन जो हर कोई अपने दिल में जगा सकता है. प्रेम का वह स्रोत यदि भीतर जाग जाये तो उसकी झलक पा सकता है. 

Thursday, May 7, 2020

स्वयं को जिसने जान लिया है


आज बुद्ध पूर्णिमा है. भारत के इतिहास में बुद्ध का आगमन एक अभूतपूर्व घटना है. अपने जीवन और उपदेशों से उन्होंने लाखों लोगों को जीवन का मार्ग दिखाया और आज भी दिखा रहे हैं. वह अपने साधकों से कहते थे, स्वयं को जानो, देह किन तत्वों से बनी है उन्हें भी जानो. मनसा, वाचा और कर्मणा अपने कर्मों के प्रति सजग रहो, अर्थात मन, वाणी अथवा शरीर से जो भी कार्य उनसे दिन भर में होते हैं, वे करने योग्य थे या नहीं, इसकी परीक्षा करते रहो. अपने हृदय को क्रोध, राग-द्वेष और आसक्ति से दूर रखो. नेत्र, नासिका, कर्ण, त्वचा जिह्वा तथा मन को व्यर्थ शक्ति का अपव्यय न करने दो. ज्ञान की शक्ति के द्वारा उन्हें नियंत्रित करके अपने साथियों को भी प्रेरित करो. धन, यश और इन्द्रियों के सुख के पीछे मत भागो. ध्यान के अभ्यास द्वारा उस आंतरिक सुख और शांति का अनुभव करो जो तुम्हारा स्वभाव है. 

Tuesday, May 5, 2020

ज्योति जलेगी जिस पल मन में

जब हम अध्यात्म के क्षेत्र में कदम रखते हैं, जब हम वास्तव में स्वयं के अनंत रूप से परिचित होना चाहते हैं, सारा जगत हमारा घर बन जाता है. हमारे मन में जब किसी बात के प्रति संदेह उत्पन्न होता है तो हमें जानना चाहिए की यह जहाँ से आया है वहाँ गहरा विश्वास है. मन उसी के आधार पर तर्क करता है जो वह जानता है. यदि हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारी छोटी सी बुद्धि जितना जानती है अस्तित्त्व उससे कहीं अधिक है तो हृदय के द्वार खुलने लगते हैं. जब हम किसी भी स्थिति का सामना सहज रूप से कर सकते हैं, मन का संतुलन बना रहता है, तो मानना चाहिए कि उस गहराई से हम जुड़े हैं. जीवन में हम गतिमयता का वरण तभी करते हैं जब जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अति विशाल होता है. हमारे भीतर एक ऐसी चेतना का जन्म होता है जो साक्षी रहकर जो भी आवश्यक हो उसे करने की प्रेरणा देती है. हमारी खोज यदि सच्ची है तो प्रकृति हमारा मार्गदर्शन करती है. 

चाह मिटी चिंता गयी

बुद्ध कहते हैं, तृष्णा दुष्पूर है, अर्थात मन में उठी इच्छा को तृप्त करना असम्भव है. एक इच्छा यदि पूर्ण हो गयी तो तत्क्षण दूसरी सिर उठा लेती है. यह इच्छा किसी भी तरह की हो. धन, यश, संतान, सुख, सुविधा प्राप्ति की अथवा भ्रमण करने, ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा कभी भी तृप्त नहीं की जा सकती. जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, अतृप्त रहना इच्छा का स्वभाव है. मानव इस सत्य को भूल जाता है और इस असंभव कार्य को पूरा करने में अपना सारा जीवन लगा देता है. हमारे भीतर जानने की शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा करने की शक्ति तीनों हैं, हम शेष दो शक्तियों को इस तीसरी के लिए ही लगा देते हैं. जानने की शक्ति से हम सृष्टि का सत्य भी जान सकते हैं, जिसे कृष्ण ज्ञान योग कहते हैं और क्रिया शक्ति को कर्मयोग में बदल सकते हैं. 

Monday, May 4, 2020

पंचम वेद कहाता है जो


टीवी पर आजकल 'महाभारत' दिखाया जा रहा है. पहले भी देखा है पर रामायण की तरह यह कथा भी इतनी अनोखी है कि बार-बार देखने पर भी नई जैसी लगती है. कहते हैं जो महाभारत में नहीं है वह कहीं नहीं है अर्थात इस दुनिया में जो कुछ भी है उसका जिक्र कहीं न कहीं महाभारत में हो चुका है. एक लाख से अधिक श्लोकों के द्वारा चन्द्रवंशी राजाओं की यह कथा भारत के भव्य इतिहास को भी बताती है और विश्व का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव भी रखती है. इसे पंचम वेद भी कहते हैं और पुराण भी कहा जाता है. वेद व्यास ने इस अद्भुत ग्रन्थ को लिखवाने का कार्य गणपति को सौंपा था. भगवद्गीता महाभारत का ही एक भाग है, जो भारत का प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ है. वर्तमान पीढ़ी को इसे मूल रूप में पढ़ने का अवसर तो नहीं मिलेगा पर धारावाहिक के रूप में ही वे इससे परिचित हो रहे हैं और अपनी प्राचीन गौरवशाली परंपरा पर गर्व कर रहे हैं. इसके विभिन्न पात्रों पर कितने ही नाटकों व उपन्यासों की रचना हो चुकी है. भारत के कण-कण में इन प्राचीन गाथाओं की गन्ध बसी है. मानव मन की कितनी ही गाँठों को खोलती हैं इसकी कथाएं. कोरोना के कारण घरों में रहने को विवश नागरिकों के लिए अपने अतीत से परिचित होने का यह एक सुअवसर भी है. 

Sunday, May 3, 2020

विपदा में जो हाथ बढ़ेगा

विश्व के अन्य कई देशों की तरह भारत में भी लॉक डाउन अभी  खत्म नहीं हुआ है, कोरोना ने पूरी दुनिया में मजबूती से अपने पैर पसार लिए हैं और वह जल्दी विदा लेने के मूड में नजर आता नहीं दिख रहा है. वैज्ञानिक अभी तक कोई वैक्सीन नहीं खोज पाए हैं, हमें ही इससे बचाव करते हुए जीना सीखना होगा. अनावश्यक घर से बाहर न निकलना पहला नियम है. भीड़भाड़ से बचाव इससे स्वतः ही हो जायेगा. सरकार ने जिन्हें छूट दी है वे दुकानें तथा प्रतिष्ठान खुल रहे हैं किन्तु उनमें जाने से पहले हरेक को सजगता बरतनी है. मास्क का उपयोग तथा सेनिटाइजर का बार-बार प्रयोग स्वभाव में ही शामिल कर  लेना होगा. जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक है, उन्हें बेशर्त दूसरों की सहायता के लिए आगे आना होगा. इतिहास में ऐसे अवसर कभी-कभी ही आते हैं जब पूरी मानवता का अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ जाता है, तब दुनिया समर्थ और सक्षम का आश्रय लेती है. जिस तरह से भी हो सके हमें मदद के लिए हाथ बढ़ाना है. हर धर्म में दान धर्म का बहुत महत्व बताया गया है. सरकार ने अपने भंडार असमर्थों के लिए खोल दिए हैं, हमें भी उसकी सहायता के लिए तत्पर रहना होगा.