पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ और मन ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियां हैं. श्रवण करते समय कान, शब्द तथा मन ये तीन उपस्थित होते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा विषय अनुभव करते समय विषय, मन और इन्द्रिय तीन की उपस्थिति रहती है. शब्द का आधार कान है और कान का आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है. इसी प्रकार त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, स्वाद, रूप और गंध का आश्रय तथा अपने आधार पवन, अग्नि, पृथ्वी और जल के स्वरूप हैं. इन सबका अधिष्ठान है मन. इसलिए सबके सब मन स्वरूप हैं. इनमें मन कर्ता है, विषय कर्म है और इन्द्रिय करण है. ये कर्ता, कर्म और करण रूपी तीन प्रकार के भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं. इनमें से एक-एक के सात्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं. अनुभव भी तीन प्रकार के ही हैं. हर्ष, प्रीति, आनंद, सुख और चित्त की शांति का होना सात्विक गुण का लक्षण है. असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ तथा अमर्ष -ये किसी कारण से हों या अकारण, रजोगुण के चिह्न हैं. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य -ये किसी भी तरह क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं. प्रत्येक साधना का लक्ष्य सत्वगुण को बढ़ाते जाना है और रजोगुण व तमोगुण को कम करना है.
Thursday, July 9, 2020
Tuesday, July 7, 2020
श्वासों पर जो ध्यान टिकाये
हमारे जीवन में कुछ बातें बार-बार होती हैं, जिन बातों से हम बचना चाहते हैं वे ही नया-नया रूप लेकर आती हैं. यहाँ तक कि कभी-कभी हम स्वयं ही चौंक जाते हैं, ये वार्तालाप तो ऐसा का ऐसा पहले भी हुआ है. हमने सामने वाले की बात पर जिस तरह पहले प्रतिक्रिया की थी वैसी ही फिर करते हैं. जिस आदत को छोड़ने का मन बना लिया था वह पुनः पकड़ लेती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पहुँच अचेतन मन तक नहीं है, चेतन मन से हम कोई प्रण लेते हैं पर उसकी खबर भीतर वाले मन को होती ही नहीं, वह तो अपने पुराने कार्यक्रम के अनुसार ही चलता रहता है. जीवन गोल-गोल एक चक्र में घूमता रहता है. यदि इस चक्र को तोड़ना है तो ध्यान ही सरल उपाय है. ध्यान में ही पुराने संस्कारों का दर्शन होता है और उनसे छुटकारा पाया जा सकता है. भगवान बुद्ध ने विपासना ध्यान की सरल विधि दी जिसमें स्वतः चलने वाली श्वासों के प्रति साधक को सजग रहना है.
Sunday, July 5, 2020
दुःख से जो भी मुक्ति चाहे
बुद्ध ने कहा है, जीवन में दुःख है. इस दुःख का कारण है. कारण का निवारण है. वह पथ है जिस पर चलकर एक दुखविहीन अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. जीवन में जन्म, मरण, बुढ़ापा, मृत्यु, ये चार दुःख हरेक को भोगने पड़ते हैं. उदासी, क्रोध, ईर्ष्या, चिंता, भय, अवसाद सभी दुःख हैं. प्रियजनों से विछोह दुःख है, अप्रिय से मिलन दुःख है. इच्छा, आसक्ति, देह, मन, बुद्धि आदि से चिपकाव दुःख है. अज्ञान ही इन दुखों का कारण है. जीवन के मर्म को न समझकर हम इन दुखों से ग्रस्त होते हैं. इन दुखों से बचा जा सकता है. जीवन के सत्य को समझकर ही कोई दुःख से मुक्त हो सकता है. बुद्ध ने एक मार्ग भी दिया जिस पर चल कर एक ऐसी अवस्था भी आती है जहाँ कोई दुःख नहीं है. इस पथ का राही सजग होकर सदा वर्तमान में रहता है. सजगतापूर्वक जीने का मार्ग ही अष्टांगिक मार्ग है. सम्यक समझ, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक ध्यान, सम्यक एकाग्रता जिसके अंग हैं.
गुरुर्ब्रह्मा: गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरु पूर्णिमा प्रत्येक साधक के लिए एक विशेष दिन है. अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन ! माता शिशु की पहली गुरू होती है. जीविका अर्जन हेतु शिक्षा प्राप्त करने तक शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं, लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल गुरुजन ही दे सकते हैं. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है ? जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी गुरू का सत्संग ही देता है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही वह पात्रता प्रदान करती है कि साधक उनके ज्ञान के अधिकारी बनें.
Friday, July 3, 2020
चैतन्य: आत्मा -शिव सूत्र
शिव कहते हैं जिस आत्मा को तुम ढूंढ रहे हो वह चैतन्य है. यह संसार जड़-चेतन दोनों से बना है, इसमें जहाँ-जहाँ चेतना हो वहाँ मुझे खोज लेना. एक धूल के कण और एक जीवाणु में कौन चेतन है ? एक जगे हुए और एक सोये हुए व्यक्ति में कौन ज्यादा चेतन है ? हमारा मन जब निद्रा और तन्द्रा से भरा हो या किसी खतरे को देखकर सौ प्रतिशत सचेत हो तो दोनों में से कौन ज्यादा चेतन है ? यह चेतना जब किसी बुद्ध पुरुष में उस तरह खिल जाती है जैसे कोई कमल का फूल तो वहीं शिव प्रकट हो जाते हैं. मन जब अतीत के कारण पश्चाताप से भरा हो, भविष्य की चिंता से भरा हो या वर्तमान में तुलना से भरा हो तो चेतना पर एक आवरण छा जाता है. इसी को अहंकार कहते हैं जो शिव से जुदा रखता है. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, शिव आदि गुरु हैं.
Thursday, July 2, 2020
खोने को जो होगा राजी
जब हम उसे ढूँढते हैं तो वह हमें नहीं मिलता. पर जब उसे ढूँढते-ढूँढते खो जाते हैं तो वह हमें ढूँढता है. परमात्मा के मार्ग की रीत बिल्कुल उलटी है यहाँ मिलता उसी को है जो छोड़ने को तैयार हो. हमें तो बस उसे याद करते जाना है. हमारी हर श्वास पर उसका अधिकार है, क्योंकि हमारा अस्तित्त्व ही उसपर टिका है. हमारे पास अभिमान करने जैसा कुछ है तो यही कि हमने मानव जन्म पाया है और सत्संग के द्वारा सत्य के प्रति आस्था मन में जगी है. अब इस आस्था को पोषित करना है या छोटी-छोटी बातों में उड़ा देना है इसका निर्णय हमें करना है. इस काल को सार्थक करना या इसे व्यर्थ बिता देना हमारे अपने हाथ में है.
Wednesday, July 1, 2020
जीवन की कीमत जो जाने
अभी तक दूर था कोरोना, कल ही पता चला हमारी कालोनी में भी चेन्नई से लौटे एक व्यक्ति को संक्रमण हुआ, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी उसे ले गए, परिवार को क्वारन्टाइन कर दिया गया है. पूरी बिल्डिंग को ही बंद कर दिया है. यह इमारत हमारे घर से आधा किमी दूर है. सुबह-शाम अभी तक बिना किसी भय के टहलने जाते थे, शायद अब संभव न हो. आज सुबह पहली बार बाहर जाते समय इसका अहसास हुआ. पूरे विश्व में लाखों लोग इसी और इससे कहीं ज्यादा आशंका में जी रहे हैं. ऐसे में आवश्यक है कि मन यदि एक क्षण के लिए भी विक्षेपित हो तो तत्क्षण उसे सचेत कर दिया जाये. जीवन क्षण-क्षण में मिलता है, यदि एक पल गया तो उसका अगला पल भी वैसा ही फल लाने वाला है. सचेत रहना होगा और नजर खुले विस्तीर्ण आकाश पर रखनी होगी, जिसके नीचे न जाने कितनी महामारियाँ जन्मी, पनपीं और नष्ट हो गयीं. कोरोना भी अपना असर कुछ काल तक और डालेगा, कुछ महीने, एक साल, दो साल या उससे भी ज्यादा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. जीवन कितना बहुमूल्य है यह सबक सीखने का सुनहरा अवसर है आज, धन की सही कीमत क्या है और रिश्तों की अहमियत क्या है, यह सीखने का वक्त भी है आज. परमात्मा ही संचालक है मानव की अल्पबुद्धि सदा काम नहीं आती, यह पाठ भी तो हमें सीखना है. कोरोना ने सारे विश्व की पाठशाला खोल दी है, सभी देशों के वासी उसके विद्यार्थी हैं.
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