Tuesday, May 17, 2022

जीवन का आधार वही है

जीवन अमूल्य है, परमात्मा का उपहार है, वही इसका आधार भी है. हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति जलाकर बैठा है. यह जगत शरीर को चलाने और परमात्मा का ज्ञान पाने के लिए एक साधन है. परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते हैं. कृपा का अनुभव होते ही साधक का जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह यह अनुभव अंतर को रस से भर देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट हो जाता है, कहीं कोई संशय नहीं रहता. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब-जब परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह साधक की सुप्त चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर होते ही सत्य का साक्षात्कार होता है. 

Sunday, May 15, 2022

जीवन एक यात्रा सुंदर


 जैसे जमीन की गहराई में पानी तथा तेल छिपा होता है, गहरी खुदाई करके निकला जाता है, वैसे ही शरीर की गहराई में आत्मा की अनंत शक्ति छिपी है जिसे उजागर करने पर स्वास्थ्य सहज ही मिलता है.  खिडकियों पर भारी पर्दे लगे हों तो कमरे में प्रकाश मद्धिम सा ही दीख पड़ता है वैसे ही यदि मन पर प्रमाद छा जाये तो आत्मा की शक्ति ढक जाती है व तन अस्वस्थ हो जाता है. किसी संस्थान को सुचारू रूप से चलाने के लिये अनुशासन बहुत जरूरी है वैसे ही शरीर रूपी संस्थान ठीक रहे इसके लिये सोने, जगने व्यायाम, भोजन का अनुशासन बहुत जरूरी है. प्रकृति में एक गति है, लय है, रात-दिन तथा ऋतु परिवर्तन उसी लय के अनुसार होते हैं वैसे ही तन, श्वास तथा मन में भी एक लय है रिदम है जिसके बिगड़ने पर रोग हो सकते हैं. कार के भीतर ड्राइवर स्टीयरिंग पर से कंट्रोल छोड़ दे तो दुर्घटना होगी ही वैसे ही तन रूपी रथ की सारथी बुद्धि, मन रूपी घोड़े को खुला छोड़ दे, भोजन, नींद, व्यायाम में संयम, तथा सही मात्रा व सही समय का ध्यान न रखे तो हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं.शरीर के भीतर स्वयं को स्वस्थ रखने का पूरा प्रबंध है बस उसे हमारा सहयोग चाहिए जरूरत से ज्यादा उसे थकाएं भी नहीं और आराम भी न दें.नम वातावरण में, गीले मौसम में ठंडी चीजें नुकसान करती हैं, इनसे दूर ही रहें.जैसे हम रेल यात्रा करने जाएँ तो हमारी सीट, कूपा तथा सहयात्री सभी पहले से तय होते हैं वैसे ही जीवन यात्रा में हमें जहाँ-जहाँ जो मिलेगा वह पूर्व निर्धारित है, जैसे हम रेल यात्रा को सुखद बनाना जानते हैं, वैसे ही सही दृष्टिकोण रखकर हम जीवन यात्रा को सुखद बना सकते हैं.

Monday, May 2, 2022

समाधान जो चाहे पाना

मानव को यदि अपनी उलझनों का समाधान चाहिए तो भीतर मिलेगा। मन की गहराई में जो शुद्ध चैतन्य है, जो सत् है, आनंद है, उसके सान्निध्य में मिलेगा। बाहर जगत में उलझाव है, प्रतिस्पर्धा है, तनाव है, बाहर सब कुछ निरंतर बदल रहा है। सागर में उठी लहरों की तरह जग निरंतर विनाश को प्राप्त हो रहा है। भीतर एक अवस्था ऐसी है जो सदा एकरस है, उसमें टिके बिना पूर्ण विश्रांति नहीं मिलती। वहाँ जाने में बाधा क्या है ? स्वयं के और दूसरों के बारे में हमारी धारणाएँ, मान्यताएँ और विचार ही सबसे बड़ी बाधा हैं। वह निर्विकल्प अवस्था है, मन कल्पनाओं का घर है। वहाँ प्रेम का साम्राज्य है, मन जगत में दोष देखता है। जब हम जगत को जैसा वह है पूर्ण रूप से वैसा ही स्वीकार करके मन को कुछ समय के लिए ख़ाली कर देते हैं तब उस शांति का अनुभव अपने भीतर करते हैं। 


Wednesday, April 27, 2022

कण-कण में जो देखे उसको

हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Monday, April 25, 2022

जीवन में जब रंग भरेगा


हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं. 


Thursday, April 21, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

 अहंकार स्वयं को बचाए रखने के लिए तर्क का आश्रय लेता है। प्रेम हर तर्क से ऊपर है, वह आत्मा का सहज गुण है। प्रेम को मरने का भय नहीं होता, वह शाश्वत है। जहाँ प्रेम है वहाँ अभय है। अहंकार आहत  होता है तो प्रतिशोध लेना चाहता है, प्रेम पिघल जाता है, वह दीनता का अनुभव करता है। प्रेम में भी विरह की पीड़ा है पर वह पीड़ा मन को शुद्ध करती है। अहंकार से उत्पन्न पीड़ा दुःख का कारण होती है। संत कहते हैं जब भी भीतर दुःख हो शरण में आ जाना चाहिए। अहंकार में व्यक्ति स्वयं प्रमुख होता है, प्रेम में सामने वाला मुख्य होता है, उसकी प्रसन्नता में ही प्रेमी अपनी ख़ुशी देखता है।   

Monday, April 18, 2022

प्राण ऊर्जा बहे अबाध जब


आयुर्वेद के अनुसार शरीर के सभी अंगों में प्राण-ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीस घण्टे होता है,पर हर समय एक सा प्रवाह नहीं होता. प्रायः जिस समय जो अंग सर्वाधिक सक्रिय हो उस समय उससे सम्बन्धित कार्य करने से हम उसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. प्रातः तीन बजे से पांच बजे तक फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक रहता है, इसी कारण ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने अथवा  प्राणायाम आदि करने से शरीर स्वस्थ बनेगा. सुबह पांच बजे से सात बजे तक ऊर्जा बड़ी आंत में जाती है, जो व्यक्ति इस समय सोये रहते हैं व शौच क्रिया नहीं करते उन्हें कोई न कोई पेट का रोग हो सकता है. इस समय योगासन व व्यायाम करना चाहिए. सात से नौ बजे तक सर्वाधिक ऊर्जा आमाशय में रहती है इसलिए सुबह का नाश्ता जल्दी कर लेना चाहिए. नौ से ग्यारह बजे तक तिल्ली और पैंक्रियाज की सक्रियता का समय है, यदि दोपहर का भोजन ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद कर लें तो पाचन अच्छा हो सकता है. दिन में ग्यारह से एक बजे तक हृदय में विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है. हृदय हमारी संवेदनाओं, दया, करुणा तथा प्रेम का प्रतीक है, इस समय लेखन या रूचि का कोई काम अच्छा हो सकता है. दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक छोटी आंत में पोषण का कार्य होता है, इसलिए दोपहर का भोजन देर से नहीं करना चाहिए. शाम को पांच से सात बजे तक किडनी में ऊर्जा का प्रवाह होता है. शाम का भोजन सात बजे तक कर लेना चाहिए. सात से नौ बजे तक ऊर्जा मस्तिष्क में जाती है, यह समय अध्ययन के लिए उत्तम है. नौ से ग्यारह बजे तक रीढ़ की हड्डी में सर्वाधिक ऊर्जा होती है, यह समय सोने के लिए उत्तम है. रात्रि ग्यारह से एक बजे तक पित्ताशय में ऊर्जा प्रवाहित होने से मानसिक गति विधियों पर नियंत्रण होता है, इस समय जगे रहने से पित्त तथा नेत्र के रोग हो सकते हैं. रात्रि एक से तीन बजे तक लिवर में ऊर्जा का परवाह सर्वाधिक होता है, इस समय गहरी नींद आवश्यक है. लिवर से पुनः ऊर्जा फेफड़ों में चली जाती है और एक नए दिन का आरम्भ होता है. 

(गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण में प्रकाशित एक लेख से साभार )