Thursday, April 27, 2017

तेरा तुझको अर्पण

२८ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों में दान की महिमा यूँ ही नहीं गाई गयी है. देने का भाव जिसके मन में जगता है वह देवत्व की और कदम बढ़ाने लगता है. प्रकृति इतनी प्रिय क्यों लगती है क्यों कि वह निरंतर लुटा रही है. नन्हे बच्चे सहज ही मुस्कान बांटते रहते हैं. पालतू पशु निस्वार्थ प्रेम लुटाते रहते हैं. संत जो समाज को सिर्फ देते ही देते हैं, सबके आदर के पात्र बन जाते हैं. तन, मन धन किसी भी प्रकार से हमें इस जगत  में कुछ देने का भाव रखना है. हाथों से सेवा न भी कर सकें तो वाणी से अथवा सद्विचारों के रूप  में मानसिक सेवा भी कर सकते हैं. ऐसा करने से सबसे बड़ा लाभ हमारा होता है, वस्तुओं के प्रति आसक्ति घटती है, मन खाली होता है और परमात्मा की कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है. जो खाली है, वही तो भरा जायेगा. हरेक के पास जगत को देने के लिए बहुत कुछ है, बल्कि जो कुछ हमारे पास है वह जगत से ही मिला है तो उसी की वस्तु उसी को लौटा देनी है और मुक्त भाव से इस जगत में विहार करना है.  

भरा हुआ है जो खाली

२७ अप्रैल २०१७ 
हम स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं , अपना आप इतना छोटा लगता है कि कुछ करके उसे भरना चाहते हैं. हमारे कृत्य उस खालीपन को भरने के लिए हैं न कि इस जगत को समृद्ध बनाने के लिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम स्वयं को जानते नहीं, अपने भीतर के उस खालीपन को भी नहीं जानते, जिसमें अपार सम्भावनाएं छिपी हैं . एक बार जो स्वयं को न कुछ होना स्वीकार लेता है जो वास्तव में सत्य है, तत्क्षण उसके जीवन में पूर्णता का अनुभव होने लगता है, कुछ नहीं को कुछ नहीं से ही भरा जा सकता है. इस ब्रहमांड  में जो दिखाई देता है वह अदृश्य की तुलना में बहुत थोड़ा है. सूक्ष्म स्थूल से ज्यादा बलशाली है. हमारा खालीपन ही वास्तव में हमारी संपदा है और उसी से हम भागते हैं, यही तो माया है. 

Tuesday, April 25, 2017

बहता जाये मन नदिया सा

२६ अप्रैल २०१७ 
प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों को हम आसानी से स्वीकार लेते हैं. उसके अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं. सर्दी और गर्मी से बचने के कितने ही साधन मानव ने खोज निकाले हैं. देह भी प्रकृति का ही अंश है और मन भी, देह भी सदा एक सी नहीं रहने वाली और मन तो पल-पल में बदलता है. जैसे स्वयं का मन बदलता है वैसे ही अन्यों का भी. किसी के प्रति कोई धारणा बनाकर उसी के अनुसार उससे व्यवहार करना वैसा ही है जैसे ग्रीष्म ऋतु के चले जाने पर भी सूती वस्त्र ही पहनने का आग्रह रखना. जैसे रुका हुआ पानी पीने लायक नहीं रहता वैसे ही रुका हुआ मन यानि की पूर्वाग्रहों से युक्त मन भी मैत्री,  करुणा व मुदिता के मार्ग पर नहीं चल सकता. जगत के प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव हमें जड़ता से मुक्त रखता है. अंतर में जगी करुणा ह्रदय को कोमल बनाये रखती है और मुदिता तो वह आभूषण है जो हर हाल में हमें सौन्दर्य प्रदान करता है. 

Monday, April 24, 2017

स्रोत ऊर्जा का हो विकसित

 २५ अप्रैल २०१७ 
जीवन हमें नित नई चुनौतियाँ देता है, नये अवसर देता है, वह हर पल नये नये मार्ग सुझाता है, यदि हम नये को स्वीकारने में झिझकते हैं और उसी पुराने रास्तों  पर चलते रहते हैं तो जीवन वैसा ही बना रहता है. उसमें कोई सकारात्मक परिवर्तन आ ही नहीं सकता. प्रकृति शाश्वत होते भी नित नूतन है क्योंकि वह विरोध से घबराती नहीं, वह हर पल को वैसा ही स्वीकारती है और अपनी ऊर्जा को विरोध में नहीं विकास में खर्च करती है. हमारी ऊर्जा नकार में व्यर्थ ही जाती है और कई बार तो हम केवल अहंकार के कारण ही अपनी बात को गलत जानते हुए भी उस पर अड़े रहते हैं. कोई भी नकारात्मक भाव हमारी ऊर्जा के स्रोत को झुलसाने का काम करता है और सहजता व स्वीकार उसे पनपने का अवसर देता है. परमात्मा सहज भाव से हमें स्वीकार रहा है हर पल वह हमारे साथ है और यदि उसकी तरह हम भी जीवन को सहज ही खिलने का अवसर दें तो आनंद हमारा स्वभाव बन जायेगा.

Sunday, April 23, 2017

सुख भी जब बाधा बन जाये

२४ अप्रैल २०१७ 
हर व्यक्ति की आंतरिक पुकार एक ही है. सभी सुख और शांति का जीवन जीना चाहते हैं. सभी स्वस्थ रहना और सम्पन्न रहना भी चाहते हैं. सभी समाज में अपना सम्मान हुआ देखना चाहते हैं. इन्हीं को शास्त्रों में वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा और यशेष्णा के नाम से कहा गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि इन तीन एषनाओं के रहते कोई पूर्ण रूप से दुखों से मुक्त हो ही नहीं सकता. इसका अर्थ हुआ सुख की इच्छा ही दुःख का कारण बनती है, किसी भी तरह का अभाव भी दुःख है, सम्मान की आकांक्षा ही अपमान का बीज बो देती है. जब तक यह कटु सत्य हमें स्वीकार नहीं है तब तक हम सुख-दुःख के डोले में झूलते ही रहेंगे और हर सुख अपने पीछे एक दुःख की एक लंबी कहानी छिपाए होगा अथवा तो भविष्य में लायेगा. जब मन खाली हो, जीवन अपने असली रूप में सामने आता है. जब कोई चाह मन को नहीं सताती तब यह अपने मूल से जुड़ा रहने में ही आनंद का अनुभव करता है.

Saturday, April 22, 2017

मुक्त यहाँ स्वयं से ही होना

२३ अप्रैल २०१७ 
अपने ही संस्कारों में बंधे-बंधे हम जीवन को एक संघर्ष बना लेते हैं. हमें अच्छी तरह ज्ञात है, हमारे लिए कैसा भोजन उचित है, किस मात्रा में उचित है पर संस्कार वश उसी भोजन को हम ग्रहण करते हैं जो आज तक करते आ रहे हैं और जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. क्रोध करने से सदा ही हानि उठायी है पर संस्कार वश उन्हीं  बातों पर पुनः-पुनः झुंझला जाते हैं. यही तो बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है जिसे साधना के द्वारा हमें खोलना है. अपने ही मन के बनाये जाल को तोडकर भीतर एक ऐसी शुद्ध सत्ता को जन्म देना है जो किसी भी तरह के आग्रह से मुक्त हो, जो सहज ही अपना हित चाहने वाली हो, जिससे अहित होने का कोई डर ही न रहे, अन्यथा हम स्वयं ही अपने शत्रु बन जायेंगे और दोष भाग्य अथवा परिस्थिति पर ड़ाल देंगे. स्वयं के हर भाव, विचार और कर्म की जिम्मेदारी लिए बिना हम मनुष्य होने के अधिकारी नहीं हो सकते. 

Thursday, April 20, 2017

मुक्त हुआ मन कब डोले

२१ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों के अनुसार अनंत जन्मों के हमारे संचित कर्मों में से थोड़ा सा प्रारब्ध कर्म लेकर हम इस दुनिया में आते हैं. जिनके अनुसार जन्म, आयु, सुख-दुःख आदि हमें मिलते हैं. जब तक यह ज्ञान नहीं होता कि मनसा, वाचा, कर्मणा हर कर्म का फल मिलने ही वाला है, हम नये-नये कर्म बांधते चले जाते हैं, जिनका हिसाब चुकाना ही होगा. एक बार यह ज्ञान हो जाने के बाद हमें केवल पुराने कर्मों का हिसाब पूरा करना है. स्वयं को सदा मुक्त अनुभव करने के लिए कर्मों के जाल से छूटना ही एक मात्र उपाय है. जीवन में कैसी भी परिस्थिति आये मन को समता भाव में रहकर उससे पार हो जाना ही कर्मों से छूटना है, अन्यथा भविष्य के लिए एक नया बीज बो दिया जायेगा. जिस किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के साथ राग अथवा द्वेष का भाव मन में रहता है, उसका सही मूल्यांकन हम कभी नहीं कर सकते. राग अथवा द्वेष बुद्धि को धूमिल कर देते हैं और हम अनजाने ही नई रस्सियों में जकड़े जाते हैं.