Sunday, May 27, 2012

साधना क्यों करें


हमारी संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने-पढ़ाने के लिये या विचारों तक ही सीमित रखने के लिए नहीं है. उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं. धार्मिक होना एक संकीर्ण अर्थ में लोग जब लेते हैं तभी विवाद होता है. धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार इसी जीवन में, अपने इन्हीं नेत्रों से...उसको जानना और उस से बल पाकर सबको अपनाने का भाव जगाना. साधक के जीवन का यही लक्ष्य है.


Saturday, May 26, 2012

बीज रूप है प्रेम अभी


अप्रैल २००३ 
स्वयं में जो प्रेम छिपा है उसे जागृत करने का नाम ही भक्ति है. उसके ऊपर एक आवरण छा गया है, एक दीवार खड़ी हो गयी है उसके और हमारे बीच, उसे गिराना है, छोटी-छोटी बातों से जो खिन्न न हो, भावनाओं के आवेग व आवेश जिस पर हावी न हों, सुख में जो अभिमान न करे, दुःख में जो विचलित न हो ऐसा मन उस प्रेम को शीघ्र जगा सकता है. वह प्रेम रसमय है, आनंद मय है, हमारी देह, मन बुद्धि, चित्त व अहंकार हैं तो सब उसी के आश्रय से लेकिन उससे बेखबर हैं, जैसे किसी की आँख पर चश्मा चढ़ा हो और वह उसे ही ढूंढ रहा हो.

Friday, May 25, 2012

छिपा है सागर इक कतरे में


मार्च २००३ 
कभी कतरे को दरिया समझ कर डूब जाते थे
मगर अब निर्मल दरिया को भी कतरा समझते हैं....
सत्य हमें प्रेम और बल से भर देता है. उसका खजाना तो सदा है पर चाबी हमारे हाथ नहीं आती, उस चाबी का पता हमें साधना के रूप में मिलता है. इस खजाने की हिफाजत भी आवश्यक है, कहीं इसे पाकर सूक्ष्म अहंकार पुनः न दबोच ले. स्वयं को निरंतर कसौटी पर कसना है, स्वयं को बख्शना नहीं है और अन्यों की गलतियों पर ध्यान भी नहीं देना है. जो कर्म में सजग है वही ध्यान में भी सजग रहेगा.

Thursday, May 24, 2012

भीतर सूरज चमक रहा है


मार्च २००३ 
आत्मनिर्माण करना है तो मन पर चौकीदार रखना होगा और उसके नाम से अच्छी चौकीदारी कौन कर सकता है. परमात्मा का नाम अंतर को शुद्ध करता है और कितनी ही विघ्न-बाधाओं को पलक झपकते हटा देता है. आत्मनिर्माण का अर्थ है आत्मा में रस का अनुभव करना, आत्म साक्षात्कार इस पथ की मंजिल है. ज्ञान, ध्यान और अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे इसको अनावृत करते जाना है और एक दिन वह सूर्य की तरह अपनी पूरी दिव्यता के साथ चमकती है. उसके प्रकाश की झलक तो यात्रा के आरम्भ से ही मिलने लगती है. जीवन में उजाला छा जाता है कार्य में रूचि बढ़ जाती है, परहित का ख्याल आने लगता है, परिवार में सुख-शांति छाने लगती है और सब काम अपने आप सही समय पर होने लगते हैं. उसके इतने सारे उपकार हैं हम पर, अंधकार में रास्ता खोजते व्यक्ति का हाथ पकड़ कर जैसे कोई प्रकाश में ले आये, ज्ञान जीवन में हो वही जीवन जीवन है. हमें मुक्त करता है ज्ञान, फूल सा हल्का बना देता है, सारी जंजीरें काट कर उसके समक्ष पहुँचा देता है.

Wednesday, May 23, 2012

धर्म और विज्ञान


धर्म व्यक्ति का परिमार्जन करता है और विज्ञान वस्तु का परिमार्जन करता है. धर्म अंतर में ले जाता है, विज्ञान बाहर की ओर ले जाता है. अंतःकरण का परिमार्जन करने के बाद उसका उपयोग विज्ञान के लिये भी किया जा सकता है परहित के लिये. ऐसा विज्ञान दोषों के प्रति सजग होगा. और जो भी कार्य उसके द्वारा होगा, उसका कर्ताधर्ता एक ‘वही’ होगा, करने वाला निमित्त मात्र होगा. करने वाले का एक मात्र लक्ष्य तो अंतःकरण का परिमार्जन है सो वह निंदा का पात्र होने पर भी कभी अपमानित नहीं होगा, सुख-दुःख आदि में सम भाव में रहकर वह अपने अंतर आकाश को प्राप्त कर लेता है, जिस पर संसार रूपी बादल आते-जाते रहते हैं. पर वह सदा एक सा ही है.

Tuesday, May 22, 2012

तत्व ज्ञान की ओर


मार्च २००३  
तत्व में टिके बिना स्वस्थ नहीं रहा जा सकता. मन यदि वर्तमान में नहीं रहता और बुद्धि उसके पीछे जाती है, ‘स्व’ बुद्धि के पीछे जाता है तो स्व स्थ नहीं रहा अर्थात स्वस्थ नहीं रहा. जो स्वतः सिद्ध है उसमें टिके रहना ज्ञान से ही संभव है. अपनी कमियों की ओर नहीं बल्कि हमारे भीतर जो सहज प्राप्त परम तत्व है उसकी ओर अपनी दृष्टि रखें तो उसे ही प्राप्त होंगें. जीवन अनंत है, वर्तमान अटल है. जब तक यह तन है तब तक इसका सदुपयोग करके वर्तमान में ही टिके रहना है अर्थात स्व में स्थित रहना है. ताकि बारम्बार मरना न पड़े.

Monday, May 21, 2012

ज्ञान की हद प्रेम है


मार्च २००३ 
पढ़ने की हद समझ है, समझ की हद ज्ञान
ज्ञान की हद प्रेम है, प्रेम की उसका नाम
जो हमें सहज प्राप्त है, स्वतः प्राप्त है. आनंद, प्रेम और शांति बन कर जो भीतर स्वतः झरता रहता है, जिनके लिये एक अनंत स्रोत भीतर स्वतः उसने दिया है, जिसे किसी क्रिया से उपजा नहीं सकते, हाँ उसके प्रति अनभिज्ञ अवश्य हो सकते हैं. वह जो हमारा अभिन्न है, उसे एक क्षण के लिये भी कैसे भुला सकते हैं, वह ही तो श्वास के रूप में पल-पल जीवन देता है, वही तो प्रकाश बनकर हमारे नेत्रों में चमकता है. वही तो प्रेम का उजाला बनकर हमारे मन को रोशनी से भर देता है. उसे हमें कहीं खोजना भी नहीं है, कोई परिश्रम भी नहीं करना उसे पाने को, बस एक बार उसी को चाहना है, उसका हाथ थामना है. उसके बाद वह हमारी खोज खबर स्वयं ही लेता है.वह सच्चा मित्र है, उसे हमसे कुछ भी नहीं चाहिए, हमारा शुभ ही उसका एकमात्र अभीष्ट है. प्रकृति प्रतिपल बदल रही है, हमारा तन, मन, बुद्धि सभी प्रकृति में ही आते हैं, पर हम आत्मरूप हैं जो कभी नहीं बदलता, उस एक का साथ कर लें तो वह सब स्वयं ही छूट जाता है जो मिथ्या है या माया है अर्थात जो है नहीं पर दिखता है. तभी आत्मा का सूर्य चमकता है, उसका प्रकाश सदगुरु की कृपा से प्रकटता है.