Friday, September 21, 2018

तू प्यार का सागर है


२२ सितम्बर २०१८ 
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, तुम मेरे प्रिय हो, तुम निष्पाप हो, इसलिए मैं तुमसे यह ज्ञान कहूँगा. हर साधक अर्जुन है और परमात्मा की नजरों में प्रिय भी. कैसी अद्भुत है उसकी शक्ति, वह एक होकर हजारों आत्माओं को अपना निस्वार्थ प्रेम दे सकता है. हम अपने निकटस्थ दो-चार को भी सहज प्रेम देने में कृपणता का अनुभव करते हैं. परमात्मा की दृष्टि में हम सभी आत्माएं हैं, जिन्हें वह अपने समान ही देखना चाहता है, शुद्ध और मुक्त...वह उन सभी को जो उससे प्रेम करते हैं और मार्गदर्शन चाहते हैं, सदा सन्मार्ग दिखाता है. अंतर्प्रेरणा के रूप में वह साधक को सचेत करता है. प्रेम करना उसका स्वभाव है, बल्कि वह प्रेम स्वरूप ही है, उसकी ओर एक कदम रखते ही शांति की लहरों का मधुर कलकल सुनाई देने लगता है. इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है, और उसकी सत्ता में कुछ भी अस्थिर नहीं है, वह अचल, अडोल और अच्युत है. उसे हम आज पुकारें, कल पुकारें, एक वर्ष बाद पुकारें या एक युग बाद, वह सदा उसी तरह स्वागत करता हुआ मिलेगा. इसीलिए वह मीरा का भी उतना है जितना राधा का.

Thursday, September 20, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


 २२ सितम्बर २०१८ 
भारत का सर्वपूज्य ग्रन्थ भगवद् गीता कृष्ण और अर्जुन के संवाद पर आधारित है, जो युदद्ध क्षेत्र में घटा था. इसके पीछे एक रहस्य है. वास्तव में एक साधक का जीवन योद्धा की भांति होता है. एक योद्धा अनुशासित, वीर, निर्भय और स्वालम्बी होता है, युद्ध करते समय उसे तत्काल निर्णय लेने होते हैं. उसे प्रतिपल सजग रहना होता है, वह अपने शत्रुओं को पहचानता है और उसे अपनी क्षमता का भी भान होता है. युद्ध क्षेत्र में उसकी छोटी सी असावधानी भारी पड़ सकती है. एक साधक को भी जीवन के कर्मक्षेत्र में सजग रहकर आलस्य, प्रमाद, पंच विकार अदि शत्रुओं से युद्ध लड़ना होता है. जो वस्तुएं उसके मार्ग में बाधक हैं, उनका प्रबल विरोध करके ही वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है. हम सभी किसी न किसी रूप में ईश्वर की भक्ति, आराधना, योग, ध्यान आदि करते हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य हमसे दूर ही बना रहता है. इसका सबसे बड़ा कारण है हम अपने शत्रुओं को अपना निजी संबंधी मानकर उन्हें नष्ट करने से मना कर देते हैं. जैसे अर्जुन अपने गुरुजनों, पितामह आदि को मारना नहीं चाहता था, जबकि वह भली-भांति जानता था कि वे उसके शत्रुओं से मिले हुए हैं. जब तक हम शुभ को पूर्ण स्वीकार कर अशुभ को अपने जीवन से पूर्ण तिलांजलि नहीं दे देते, हमारा जीवन पूर्ववत् ही बना रहता है, चाहे हम कितने ही जप-तप कर लें.

चक्रव्यूह से निकल सके जो


२० सितम्बर २०१८ 
महाभारत के युद्ध में हम सभी ने अभिमन्यु की कथा पढ़ी या सुनी है. अभिमन्यु चक्रव्यूह के छह द्वारों को भेद कर उसमें प्रवेश करना तो जानता था किन्तु सातवें को भेदकर उसमें से वापस निकल पाना उसे नहीं आता था, इसी कारण कौरवों के हाथों उसे मृत्यु प्राप्त हुई. हर मानव की कथा भी लगभग ऐसी ही है. शिशु जब जन्म लेता है, वह मानो जीवन के चक्रव्यूह में प्रवेश कर रहा है. जन्मते ही पहला चक्र जो उसे भेदना है वह है प्राण, अब तक वह स्वयं श्वास नहीं लेता था, पर अब उसके फेफड़े श्वास के लिए आतुर हैं. बच्चे का प्रथम रुदन इस चक्र के भेदन का प्रतीक है. दूसरा चक्र है देह, पहले उसे भूख के लिए कुछ करना नहीं था, अब देह में भोजन के लिए पुकार उठती है. तीसरा चक्र है मन, बाल्यावस्था में ही उसकी पसंद-नापसंद एक ढांचे में ढलने लगती है. चौथा चक्र है बुद्धि, स्कूल, कालेज में विद्याध्ययन करके उसके इस चक्र का भेदन होता है. पांचवा चक्र है स्मृति, पूर्वजन्मों की अथवा जन्म से लेकर हर घटना उसके चित्त पर अपनी छाप छोड़ देती है, जिसे उसे धारण करना है. छठा चक्र है, अहंकार, उसे लगता है वह इस जगत में विशिष्ट है, उसे अपनी पहचान बनानी है. यहाँ तक हर मानव पहुंच जाता है, और इसके बाद कौरवों रूपी मृत्यु के पाश उसे घेर लेते हैं. सातवाँ और अंतिम चक्र है आत्मा, जिसे कोई-कोई ही भेद पाता है. इसे भेद कर ही जीवन के इस चक्रव्यूह से बाहर निकला जा सकता है.     

Tuesday, September 18, 2018

महापुरुष श्रीयुत शंकरदेव


१९ सितम्बर २०१८ 
भक्तिकाल के महान संत कवि श्री शंकरदेव जी की जयंती आज पूरे असम प्रदेश में श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है. सूर, तुलसी, कबीर जिस तरह उत्तर भारत में आस्था और सम्मान के साथ स्मरण किये जाते हैं वैसे ही शंकर देव असम में पूजनीय हैं. इनके लिखे बोर गीत नामघर में, जो यहाँ के मन्दिर हैं, जन-जन के अधरों पर नित्य ही सुशोभित होते हैं. यहाँ मूर्तिपूजा नहीं होती, परमात्मा के नाम का ही गान किया जाता है. शंकरदेव कवि, नाटककार, संगीतकार और संस्कृत के महान विद्वान् थे. इन्होने भागवद् पुराण का असमिया भाषा में अनुवाद किया, इसी ग्रन्थ को नामघर में वेदी पर रखा जाता है. वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले शंकर देव ने ‘एक शरण’ नामसे एक नये पन्थ की स्थापना की. उस समय असम में तरह-तरह के अन्धविश्वास फैले थे और बलिप्रथा का बहुत प्रचार था. समाज को एक नये अहिंसावादी धर्म का मार्ग दिखाकर उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया, उस समय उन्हें काफी प्रतिरोध भी झेलना पड़ा, किंतु वे हर परीक्षा में उत्तीर्ण हुए. उस समय से आजतक  असम के साहित्य, नाट्यकला, गीत-संगीत पर शंकरदेव का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है.

Sunday, September 16, 2018

स्वयं से मिलना होगा जब

१६ सितम्बर 2018
अध्यात्म के मार्ग पर चलने के लिए जो सबसे पहली पात्रता है, वह है स्वयं का ज्ञान. अध्यात्म शब्द का अर्थ है-आत्म संबंधी. स्वयं को जानने के लिए पहले हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्त्व - शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व आत्मा, हरेक का ज्ञान करना होगा. इसमें प्रथम यानि देह स्थूल है और शेष सभी सूक्ष्म. आत्मा इन सबको प्रकाशित करता है, अर्थात जिसके होने से ही देह आदि का अस्तित्त्व है. हमारा जीवन यदि देह तक ही सीमित है, अर्थात देह को स्वस्थ रखना, उसे आराम देना, सजाना-संवारना ही यदि हमारे लिए प्रमुख है तो हम अध्यात्म से बहुत दूर हैं. यदि हम मानसिक चिन्तन मनन अधिक करते हैं, साहित्य, कला आदि में हमारी रूचि है, या हम मनोरंजन के लिए लालायित रहते हैं तो भी हम अभी अध्यात्म से दूर हैं. बौद्धिक चिंतन भी हमें आत्मज्ञानी नहीं बनाता. इसके लिए तो इन छह स्तरों को पार करके स्वयं के होने का अनुभव करना होगा. स्वयं की सत्ता को जिसने जान लिया उसने अध्यात्म के पथ पर कदम रख दिया. अब धीरे-धीरे मन के संस्कारों का दर्शन आरम्भ होगा, तत्पश्चात उसका शुद्धिकरण आरंभ होगा.

Saturday, September 15, 2018

ढाई आखर प्रेम का


१५ सितम्बर २०१८ 
जगत का आधार है प्रेम, अपने शुद्ध रूप में प्रेम ही परमात्मा है. जीव जगत में प्रेम के कितने ही अनुपम रूप देखने को मिलते हैं. चकोर का चाँद के प्रति प्रेम, चातक का स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली वर्षा की बूंद के प्रति प्रेम, पतंगे का दीपक के प्रति प्रेम और सूर्यमुखी का सूर्य के प्रति प्रेम का बखान करते हुए गीत कवियों ने गाये हैं. जैसे परमात्मा अनंत है वैसे ही प्रेम की गहराई को कोई माप नहीं सकता. हर आत्मा में वह प्रेम छुपा है जो वह कितना ही लुटाये समाप्त नहीं होने वाला, फिर भी हम अपने आसपास हिंसा और शोषण होते हुए देखते हैं. अपने भीतर के हीरे को जिसने तराशा नहीं वह उसे कोयला समझ कर व्यर्थ ही जलता और जलाता है. प्रेम की यह अनमोल संपदा जिसके पास है वह अकिंचन होते हुए भी तृप्त रहता है.

Friday, September 14, 2018

हिंदी दिवस पर शुभकामनायें


 १४ सितम्बर २०१८ 
आज हिंदी दिवस है. हिंदी एक सरल, सहज और मधुर भाषा है. यह आसानी से समझी और बोली जाती है. बोलचाल की हिंदी सीखने में अहिन्दी भाषियों को ज्यादा समय नहीं लगता. यहाँ असम में जहाँ हम रहते हैं, लगभग हर प्रान्त के लोग रहते हैं. पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली, मलयालम और असमिया भाषा-भाषी लोग हिंदी को ही सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं. हर तबके के लोग हिंदी समझ लेते हैं और बोलने का प्रयास करते हैं. यह सही है कि राजकाज की भाषा के रूप में हिंदी का समुचित विकास नहीं हो रहा है और न ही निकट भविष्य में ऐसा होने की आशा है. हिंदी को अपने बलबूते पर ही आगे बढ़ना होगा. जन-जन में लोकप्रिय होने होने के कारण हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है.