Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Wednesday, June 21, 2017

उसके आने के ढंग अजब

२२ जून २०१७ 
हमारा मन कभी वर्तमान में रहता नहीं और परमात्मा को अतीत या भविष्य में मिला नहीं जा सकता, सो कभी मिलन घटता ही नहीं. जैसे कोई किसी के पड़ोस में रहता है, पर जब वह काम पर जाता है, दूसरा सो रहा होता है और पहले के वापस आने तक उसकी शिफ्ट आरम्भ हो चुकी होती है, तो महीनों क्या वर्षों तक वे दोनों एक—दूसरे से नहीं मिल सकते. परमात्मा भी हमारा निकटतम है, पर क्यों कि जब वह मिल सकता है, हम वहाँ होते ही नहीं, जीवन बीत जाता है हम अजनबी ही बने रहते हैं. जब कोई किसी कार्य में तत्परता से लगा है, अतीत या भावी की कोई स्मृति या कल्पना तो दूर उसे यह भी ख्याल नहीं कि वह है, तब चुपके से परमात्मा आ जाता है और उसके काम में सहयोग करता है, तभी तो तल्लीनता में एक अपरिमित सुख का अनुभव होता है. 

योगी बनें उपयोगी बनें

२१ जून २०१७ 
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है. योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए करना. 

Sunday, June 18, 2017

जिन खोजा तिन पाइयाँ

२० जून २०१७ 
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता. हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है. 

Saturday, June 17, 2017

खोज मूल की होगी जब

१८ जून २०१७ 
हमारा मूल स्वभाव शांति, प्रेम और आनंद है, किसी को भी अशांत रहना पसंद नहीं, कोई उससे नफरत करे यह भी कोई नहीं सह सकता और दुःख से बचने की सहज ही हरेक के भीतर प्रवृत्ति होती है. नन्हा शिशु सहज ही प्रसन्न होता है, उसके प्रति अपने-पराये सभी का प्रेम उमड़ता है और छोटा सा दुःख आने पर वह रो-रोकर उससे छुटकारा पाने के लिए गुहार लगता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर अशांत होना सीख जाते हैं, प्रेम का अर्थ हर समय दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना मानने लगते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए वस्तुओं का आश्रय लेने लगते हैं. समय के साथ-साथ हमारा मूल स्वभाव कहीं नीचे दब जाता है, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से ये चीजें मिल ही नहीं सकतीं, इसका ज्ञान जब तक होता है तब तक तो हम अपने स्वभाव को भूल ही चुके होते हैं. अब शांति, प्रेम, आनंद के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं. जीवन में सत्य की खोज आरम्भ होती है. 

Friday, June 16, 2017

सुख-दुःख का कारण निज कर्म

१७ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक हम जो भी कार्य करते हैं, उसका लक्ष्य एक ही होता है, हमारा व हमारे प्रियजनों का जीवन सुखमय हो. किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम कभी-कभी ऐसे कार्य कर देते हैं जो दुःख का कारण बनते हैं. इस दुःख से कैसे बचा जाये, शास्त्र व संत इसका मार्ग बताते हैं. किसी भी  कार्य को करने से पहले उसके फल का विचार कर लेना चाहिए. यदि वह कार्य दीर्घकाल तक दुःख देने वाला है और करते समय अल्प सुख देने वाला है तो उसे नहीं करना चाहिए. इसके विपरीत यदि वह कार्य अल्पकाल के लिए कठिन लगता है पर उसका फल दीर्घकाल तक सुख देता है तो उसे शीघ्र ही कर लेना चाहिए. उदाहरण के लिए योग साधना करने में आरम्भ में श्रम करना होता है पर उसके कारण जीवन में स्वास्थ्य व आनंद के जो पुष्प खिलते हैं उनकी तुलना में वह दुःख कुछ भी नहीं. देर रात तक जगना व सुबह देर से उठाना तात्कालिक रूप से सुख देता प्रतीत होता है पर देह में तमस व रोग का कारण बनता है. 

Thursday, June 15, 2017

अति सर्वत्र वर्जयेत्


मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही. जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता व शांति का अनुभव कर सकते हैं.