Sunday, March 26, 2017

जग जैसा वैसा दिख जाये

२७ मार्च २०१७ 
जीवन के प्रति हमारा जैसा भाव होगा जीवन उसी रूप में हमें मिलता है. किसी ने कितना सत्य कहा है “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि”. हमारी धारणाएं व मान्यताएं ही जीवन में मिलने वाले अनुभवों को परखने का मापदंड बनती हैं. जिस क्षण हमारा मन किसी भी धारणा से मुक्त होता है जीवन अपने शुद्ध रूप में नजर आता है. सृष्टि की भव्यता, दिव्यता और विशालता से हमारा परिचय होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर उस सम्भावना को छिपाए है जो उसे स्वयं के निर्भ्रांत स्वरूप से मिला सकती है. हम अपनी ही मान्यताओं के कारण जगत को बंधन बनाकर बंधे-बंधे अनुभव करते हैं. जबकि मुक्तता हमारा सहज स्वभाव है और हमारी मूलभूत आवश्यकता भी.

Saturday, March 25, 2017

निजता को जो पा जाये

२५ मार्च २०१७ 
हम जीवन को बाहर-बाहर से कितना सजाते हैं. सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं. धन, पद, संबंध और सम्मान में सुरक्षा खोजते हैं. किन्तु ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि जीवन किसी भी क्षण बिखर सकता है. जीवन की नींव पानी की धार पर रखी है. हम अहंकार को जितना-जितना बढ़ाते जाते हैं उतना-उतना स्वयं से दूर निकल जाते हैं, स्वयं से दूर जाते ही हम जगत से भी दूर हो जाते हैं. अहंकार की परिणिति एक अकेलापन है और स्वय के पास आने का फल इस ब्रह्मांड से एकता का अनुभव होता है. हमें लगता है अहंकार हमें हमारी पहचान देता है, पर हमारी निजता उसी क्षण प्रकट होती है जब हम अहंकार से मुक्त हो जाते हैं. हमें हमारा वास्तविक परिचय तभी मिलता है जब भीतर परम का प्राकट्य होता है. उसी के प्रकाश में एक नये तरह के जीवन का स्वाद मिलता है, जिसमें न किसी अतीत का भार है न ही भविष्य की योजनायें. पल-पल हृदय वर्तमान के लघुपथ पर गुनगुनाता हुआ स्वयं को धन्य महसूस करता है. 

Thursday, March 23, 2017

नव जीवन पल पल मिलता है

२४ मार्च २०१७ 
हम जहाँ हैं वहाँ नहीं होते, तभी परम के दरस नहीं होते
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते

स्मृति और कल्पना इन दोनों के मध्य ही निरंतर हमारा मन डोलता रहता है. अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना. हम वर्तमान में टिकते ही नहीं, हमारे वर्तमान के कर्म भी अतीत के किसी कर्म द्वारा पड़े संस्कार से प्रेरित होते हैं अथवा तो भविष्य की किसी कल्पना से. जीवन में कोई नयापन नहीं बल्कि एक दोहराव नजर आता है, जिससे नीरसता पैदा होती है, जबकि जीवन पल-पल बदल रहा है, जिसे देखने के लिए मन को बिलकुल खाली होना पड़ेगा, हर सुबह तब एक नया संदेश लेकर आएगी और हर रात्रि कुछ नया स्वप्न दिखाएगी. अभी तो हमारे स्वप्न भी वही-वही होते हैं. हमारे अधिकतर कर्म प्रतिक्रिया स्वरूप होते हैं, चाहे वे भौतिक हों या मानसिक.  

Wednesday, March 22, 2017

श्रम में ही विश्राम छुपा है

२३ मार्च २०१७ 
सृष्टि में जैसे दिन-रात का चक्र अनवरत चल रहा है, अर्थात श्रम और विश्राम के लिए नियत समय दिया गया है, वैसे ही साधक के लिए प्रवृत्ति और निवृत्ति का विधान किया गया है. ध्यान का समय ऐसा हो जब दोनों तरह की  इन्द्रियां अर्थात कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ  बाहरी विषयों से स्वयं को निवृत्त कर लें, मन में कोई इच्छा न रहे, बुद्धि हर जिज्ञासा को परे रख दे, आत्मा स्वयं में ठहर जाए. ध्यान में मिले पूर्ण विश्राम के पश्चात जब कार्य में प्रवृत्त होने का समय आये तो ऊर्जा स्वतः ही प्रस्फुटित होगी. कर्म तब फल की इच्छा के लिए नहीं होगा बल्कि जो ऊर्जा ध्यान में भीतर जगी है, उसके सहज प्रकटीकरण के लिए होगा. इसीलिए हमारे शास्त्रों में  सन्धया करने के विधान का  विवरण मिलता है, दिन में कम से कम दो बार साधक शान्त होकर बाहरी जगत से निवृत्त हो जाये, तो जिस तरह दिन-रात सहज ही बदलते हैं, कर्म और विश्राम सहज ही घटेंगे. 

Tuesday, March 21, 2017

होना भर ही जब आ जाये

२२ मार्च २०१७ 
हम स्वयं को उस क्षण सीमित कर  लेते हैं जब केवल उपाधियों को ही अपना होना मान लेते हैं.  आज हर कोई अपनी पहचान बनाने में लगा है, वह जगत के सामने स्वयं को कुछ साबित कर के अपनी पहचान बनाना चाहता है, मानव यह भूल जाता है यह पहचान उसे अपने वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर ले जाती है. कोई अध्यापक तभी तक अध्यापक है जब तक वह कक्षा में पढ़ा रहा है, कोई वकील तभी तक वकील है, जब वह मुकदमा लड़ रहा है, किन्तु उसके अतिरिक्त समय में वह कौन है, हम कितनी भी उपाधियाँ एकत्र कर लें, भीतर एक खालीपन रह ही जाता है . बाहर की उपाधियाँ चाहे हमें  बौद्धिक व भावनात्मक सुरक्षा भी दे दें, किन्तु उसके बाद भी हमारी तलाश खत्म नहीं होती जब तक हमें अपनी अस्तित्त्वगत पहचान नहीं होती. जब हम स्वयं को मात्र होने में ही स्वीकार कर लेते हैं, उस क्षण भीतर एक सहजता का जन्म होता है, अब सारा जगत अपना घर लगने लगता है.

Monday, March 20, 2017

कौन यहाँ किसकी खातिर है

२० मार्च २०१७ 
हमने कितनी बार ये शब्द सुने हैं - 'कोई जीने के लिए आहार लेता है कोई खाने के लिए ही जीता है'. इसी तरह कोई कहता है आत्मा देह के लिए है और कोई कह सकता है देह आत्मा के लिए है. यदि हम यह मानते हैं कि भोजन देह धारण के लिए है तो हमारा भोजन संतुलित होगा, देह को आलस्य से नहीं भरेगा, स्वस्थ रखने में सहायक होगा. यदि हम भोजन के लिए ही जीते हैं तो सारा ध्यान भोजन के स्वाद पर होगा, आवश्यकता से अधिक भी खाया जा  सकता है. इसी तरह यदि हम यह मानते हैं देह आत्मा के लिए है तो हम आत्मा को पुष्ट करने वाले सात्विकआहार ही देह को देंगे, आहार में पाँचों इन्द्रियों से ग्रहण करने वाले सभी विषयों को लिया जा सकता है. अर्थात देखना, सुनना, खाना, सूँघना, स्पर्श करना सभी आत्मा का हित करने वाले होंगे. दूसरी ओर जब आत्मा को देह के लिए मानते हैं तो मन व इन्द्रियों को तुष्ट करना ही एकमात्र ध्येय रह जाता है. आत्मा की सारी ऊर्जा देह को सुखी करने में ही लगती रहती है और हम आत्मा के सहज गुणों को अनुभव ही नहीं कर पाते, 

Saturday, March 11, 2017

रंग चढ़े न दूजा कोई

१२ मार्च २०१७ 
होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता  है तो परम  उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.