Friday, June 15, 2018

'मैं' को नहीं मुक्ति है 'मैं' से


१५ जून २०१८ 
एक व्यक्ति एक संत के पास गया और मुक्ति का मार्ग पूछा. संत ने कहा, सजगता में ही मुक्ति है. क्योंकि बंधन सदा ही असावधानी में बंधता है. असावधानी वश जो भी कार्य देह द्वारा होते हैं, उनके पीछे एक खोया हुआ मन होता है, मन के पीछे सुप्त बुद्धि होती है और होता है अहंकार. अहंकार कभी अपने को गलत नहीं मान सकता, भले ही वह जान लेता है कि बुद्धि ने उचित निर्णय नहीं लिया, मन में सही विचार नहीं आया और कृत्य सही नहीं है, पर वह उसे किसी न किसी तरह सही सिद्ध करना चाहता है. इस प्रक्रिया में वह बंधन में बंध जाता है. अब यही अहंकार पीड़ित होकर मुक्ति के उपाय खोजता है. जब तक मन वर्तमान में नहीं होगा, बुद्धि सतर्क नहीं होगी, कर्म सही नहीं हो सकते. वर्तमान के क्षण में अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं है, सजग बुद्धि को भी किसी की अनुशंसा नहीं चाहिए, यानि अहंकार की दाल वहाँ भी नहीं गलती, कर्म जब शुद्ध होते हैं तो उनसे किसी फल की आशा नहीं रहती, क्योंकि कर्म करते समय ही सुख का अनुभव होता है. कर्तापन के मिटते ही मुक्ति का अनुभव होता है.

Thursday, June 14, 2018

शक्तिस्रोत छुपा है भीतर


१५ जून २०१८ 
बाहरी साज-सज्जा कितनी भी शानदार हो यदि कोई घर भीतर से संवारा नहीं गया है तो उसमें रहने वाले स्वस्थ नहीं हो सकते. ऐसे ही हमारा मन यदि संसारी और किताबी ज्ञान से तो भरा हो पर भीतर से भीरु हो, भयभीत रहता हो, और संस्कारों का गुलाम हो तो आत्मा खिल नहीं सकती. बीज रूप में आत्मशक्ति सबके भीतर मौजूद है, उसे पनपने के लिए उर्वर भूमि चाहिए, ऐसा मन चाहिए जो तूफानों में भी अचल रहे, भक्ति की कल-कल धारा जिसमें बहती हो, शांति और आनंद से सुवासित पवन का जहाँ बेरोकटोक आवागमन हो. शांत और सुदृढ़ मन में ही आत्मा का तेज धारण करने की शक्ति हो सकती है. ऐसा मन जो जगत को साक्षी भाव से देखता हो, दर्पण की तरह जिसमें कोई प्रतिबिम्ब ठहरता न हो, जो अछूता ही रह जाता हो. ऐसे मन में ही उस ज्योति की झलक मिलती है. एक बार स्वयं का परिचय हो जाने के बाद मन परम के प्रति झुकने के साथ-साथ हर क्षण स्वयं को शक्तिशाली अनुभव करता है.

Tuesday, June 12, 2018

बालवत् जब जीना सीखें


१३ जून २०१८ 
शिशु जब जन्म लेता है, उस वक्त उसका कोई धर्म, जाति या नाम नहीं होता, समाज और परिवार ही उसे ये उपाधियाँ देते हैं. वह किसी का पुत्र कहाता है, किसी का भाई अथवा बहन, बाद में वह स्वयं किसी का माता या पिता बनता है, ये सब उपाधियाँ भी जगत के द्वारा प्रदान की गयी हैं. इस तरह एक ही आत्मा कितने ही नाम ग्रहण कर लेती है. इसी तरह एक ही परमात्मा जीव और प्रकृति की उपाधि ग्रहण करके इतने नाम और रूप धारण किये हुए है. ध्यान में ही हम अपने आत्म स्वरूप को जान सकते हैं, समाधि में जाने पर कोई परमात्मा के चिन्मात्र स्वरूप का भी अनुभव कर सकता है. जब तक शिशु को जगत का बोध नहीं होता, अहम भावना का जन्म नहीं हुआ होता, वह कितना सहज रहता है, ध्यान और समाधि को प्राप्त मन भी जगत की सारी हलचल के मध्य पूर्ण रूप से सहजता का जीवन जी सकता है. अपने कर्त्तव्य कर्मों का पालन करते हुए, अपने चारों तरफ प्रेम और शांति का वातावरण बना सकता है.

जीवन नैया सदा डोलती


१२ जून २०१८ 
जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. यहाँ फूल के साथ कांटे भी हैं और सुख के साथ दुःख भी. यहाँ हर शै जोड़े में आती है. स्वास्थ्य के साथ रोग भी है और बचपन के साथ बुढ़ापा भी. जो इन दो के पार निकल गया वह बच गया जो दो में से एक को चाहता रहा और एक से बचता रहा, वह जीवन भर बंधन में फंसा रहा. पुण्य कर्म उदय होने पर सहज ही आनंद का अनुभव होता है, पाप का उदय होने पर विपत्ति आती है. सब कुछ सदा ही ठीक-ठीक चलता रहे ऐसी कामना जो करता है, उसे दो के पार ही जाना होगा. उस स्थिति में मन साक्षी भाव में टिकना सिख जाता है. साक्षी भाव में रहकर, कर्त्तव्य कर्म को पालन करते हुए अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने वाले साधक के जीवन में भविष्य के लिए पाप कर्म जमा नहीं होते. उसका वर्तमान भी संतुष्टिदायक होता है.

Monday, June 11, 2018

खिले सुमन सा मन जिस क्षण


११ जून २०१८ 
प्रकाश, हवा और जल के बिना एक नन्हा सा फूल भी आँखें नहीं खोल पाता, साथ ही उसे धरती का आधार भी चाहिए और बढ़ने के लिए आकाश भी. मानव मन के संबंध में प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है, वायु सजगता का और जल प्रेम का, धरती है देह और आकाश है आत्मा. मन को यदि उड़ान भरनी है तो देह को स्वस्थ व सबल रखना होगा. शास्त्रों और गुरुजनों द्वारा बताए गये ज्ञान का अनुसरण करना होगा, अंतर में प्रेम को पनपने का अवसर देना होगा, यानि भावपक्ष भी सबल हो और बुद्धि पक्ष भी तभी मन आत्मा के आकाश में ऊपर और ऊपर जा सकता है, जहाँ जाकर सारे भेद समाप्त हो जाते हैं. जैसे एक बीज फूल बनकर तृप्त होता है, मन भी जब पूरा खिल जाता है, तभी तृप्ति का अनुभव करता है.

Saturday, June 9, 2018

जीवन जब उपहार बनेगा


९ जून २०१८ 
जीवन हमारे चारों और बिखरा है, हमारे भीतर है, रग-रग में बह रहा है, फिर भी हमारी उससे मुलाकात नहीं होती. जीवन प्रतिपल बरस रहा है, लेकिन हमारे अंतर में कोई रसधार बहती नजर नहीं आती. ध्यान करने बैठें तो विचारों की एक भीड़ चली आती है. शब्दों का ऐसा जाल हमें भीतर जकड़ लेता है कि कहीं आत्मा के दर्शन नहीं होते. संत कहते हैं, यह जगत पूर्ण से उपजा है, अपने आप में पूर्ण है और इसका हर अंश पूर्ण है. हमें संदेह भी नहीं होता कि अपूर्णता का दर्शन केवल मन की कल्पना ही तो नहीं. नकारात्मकता पर हमें पूरा विश्वास है और सकारात्मकता पर संदेह. जीवन विधेय का प्रतीक है और उसी को मिलता है जो पूरे स्वीकार भाव में टिक जाता है. जीवन में जिस क्षण भी हमारे भीतर द्वंद्व समाप्त हो जाता है, हम उसमें स्थित हो जाते हैं,


Thursday, June 7, 2018

मुक्त सदा जो मन तनाव से


८ जून २०१८ 
आज के युग में तनाव या डिप्रेशन का होना एक सामान्य सी घटना हो गयी है. व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, किसी भी वर्ग, धर्म, जाति या लिंग का हो, तनाव से ग्रस्त होना जैसे उसका मौलिक अधिकार बन गया है. आये दिन समाचार पत्रों में इसके बार में हम पढ़ते ही रहते हैं. क्या इसका कोई समाधान है, संत कहते हैं, जीवन आनंद से भरा है, शांति और प्रेम के धागों से बुना है, सुख और ज्ञान इसके फल हैं. ऐसा जीवन पाने की एक ही शर्त है पवित्रता और आत्मशक्ति ! यदि जीवन में अनुशासन हो, ध्यान और साधना के द्वारा आत्मशक्ति का संवर्धन हो तो तनाव उसी तरह दूर रहता है जैसे प्रकाश के सम्मुख अँधेरा. कृष्ण कहते हैं, योग के मार्ग पर किया गया अल्पप्रयास भी महान फल देने वाला होता है. स्वाध्याय, सत्संग, सेवा और साधना के चार पहियों पर जीवन की गाड़ी सहज ही नई मंजिलों की ओर ले जाती है. यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें हर कदम पर पूर्णता भी है और आगे बढ़ते रहने की ललक भी. जहाँ प्रियतम के साथ संयोग और वियोग एक साथ घटते हैं.