Friday, September 22, 2017

मन, वाणी के पार हुआ जो

२३ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना अबूझ है और कितना सरल भी. हरियाली का आंचल ओढ़े माँ के समान पोषण करती यह धरती, जिसका अन्न और जल पाकर हमारा तन बनता है. पिता के समान प्राण भरता आकाश जिससे यह काया गतिशील होती है. अन्न और प्राण के संतुलन का नाम ही तो जीवन का आरम्भ है. इसके बाद वह पुष्पित और पल्लवित होता है शब्दों और विचारों में, वाणी का अद्भुत वरदान मानव जीवन को विशिष्ट बनाता है. वाणी के भी पार है वह परम तत्व जिसे जानकर जीव पूर्णता का अनुभव करता है. साधक पहले तन को साधता है, फिर मन को, पश्चात वाणी को, जिसके बाद चेतना स्वयं में ठहर जाती है. स्वयं के पार जाकर ही परम चैतन्य का अनुभव होता है.  


Thursday, September 21, 2017

शक्ति का संधान करें जब

२२ सितम्बर २०१७ 
देह प्रकृति का भाग है, चेतना पुरुष का. मानव इन दोनों का सम्मिलित रूप है. प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, एक दूसरे के पूरक हैं. देह के बिना आत्मा कुछ नहीं कर सकती और आत्मा के बिना देह शव है. इन दोनों के भिन्न-भिन्न स्वरूप को जानना ही प्रत्येक साधना का लक्ष्य है. इसीलिए भारतीय संस्कृति में दोनों की उपासना की जाती है. प्रकृति का उपयोग करके आत्मा का अपने चैतन्य स्वरूप का अनुभव कर लेना ही मानव जीवन की सर्वोत्तम उपलब्ध मानी गयी है. प्रकृति को माँ कहकर उसकी विभिन्न शक्तियों के अनुसार अनेक रूपों की कल्पना की गयी है. दुर्गा की स्तुति करके जब साधक अपने भीतर सात्विक शक्तियों को जगाता है, उसे स्वयं के पार उस चैतन्य का अनुभव होता है. जिसका अनुभव करने के बाद उसे परम संतोष का अनुभव होता है.  

आत्मशक्ति की करें साधना

२१ सितम्बर २०१७ 
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही सारा भारत जैसे भक्ति के रस में डूब जाता है. पहले नवरात्रि के नौ दिन जिनमें देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है, पश्चात दशहरा और उसके बीस दिनों बाद दीपों का पर्व दीवाली. वैदिक काल से ये उत्सव हमारे मन-प्राणों को झंकृत करते आ रहे हैं तथा  भारत को एक सूत्र में बाँध रहे हैं. पुराणों के अनुसार देवासुर-संग्राम में जब देवताओं द्वारा असुरों का नाश सम्भव नहीं हुआ तब उन्होंने शक्ति की देवी की आराधना की, सब देवताओं ने उसे अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये. सद्गुणों व दुर्गुणों के रूप में देव तथा असुर हमारे भीतर ही वास करते हैं. इसका अर्थ है हमारे भीतर की दैवीय शक्तियाँ जब संयुक्त हो जाती हैं तब ही वे विकार रूपी असुरों का नाश कर सकती हैं. सात्विक दिनचर्या अपनाकर इस आत्मशक्ति को बढ़ाने का उत्सव है नवरात्रि. नौ दिनों की शक्ति की उपासना के बाद जब साधक का मन शुद्ध हो जाता है. वह आत्मबल से युक्त हो जीवन के प्रति नवीन उत्साह से भर जाता है. 

Tuesday, September 19, 2017

मन के जो भी पार हुआ है

२० सितम्बर २०१७ 
भगवद गीता में कहा गया है, मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है और मन ही सबसे बड़ा शत्रु ! मन यदि धन, यश और पद की कामनाओं से युक्त है तो दुःख से उसे कोई नहीं बचा सकता. मन यदि अहंकार की तृप्ति करना चाहता है तो उसे कदम-कदम पर भय और दुःख का सामना करना पड़ेगा. जो मन स्वयं में ही तृप्त है, उसे न कोई भय है न ही पीड़ा. सात्विक भाव से युक्त मन सहज प्राप्त कर्मों को इसी भांति करता जाता है जैसे समय आने पर वृक्षों में फूल व फल लगते हैं. उसे न फल की इच्छा होती है न ही नाम की, वे तो उसी प्रकार प्राप्त होते हैं जैसे सुबह होने पर वातावरण में ताजगी और आह्लाद. जीवन के मर्म को जानना हो तो मन के पार जाना ही पड़ेगा, मन को हर दिन कुछ पलों के लिए विश्राम देने से वह मित्र बन जाता है. 

Saturday, September 16, 2017

आदिशिल्पी को करें नमन

१७ सितम्बर २०१७ 
आज विश्वकर्मा पूजा है. पुराणों में विश्वकर्मा देव का उल्लेख कई स्थानों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है. इन्हें आदिशिल्पी कहा जाता है. रावण की स्वर्णलंका और कृष्ण की द्वारिका का निर्माण इन्होंने ही किया था. इनके वशंजों ने ही विश्व की विभिन्न हस्तकलाओं जैसे सुनार, लोहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि की कलाओं को जन्म दिया. वास्तु शास्त्र के ज्ञाता इन देव की युगों-युगों से अर्चना की जाती रही है. भारत के पूर्वी प्रदेशों में, बंगाल तथा उत्तर-पूर्व भारत में विशेष तौर से हर वर्ष १७ सितम्बर को सभी अभियांत्रिकी संस्थानों में विश्वकर्मा देव की पूजा होती है. सभी औजारों तथा मशीनों की भी साफ-सफाई करके पूजा की जाती है. यहाँ तक कि साइकिलों, कारों, ट्रकों के मालिक अपने वाहनों को अच्छी तरह से स्वच्छ करके उनकी पूजा करते हैं. बदलते हुए समय के साथ उत्सवों का रूप बदल जाता है, वे अपने शुद्ध रूप में नहीं रह जाते, फिर भी उत्सव रोजमर्रा के जीवन में एक नया उत्साह भर देते हैं.

Thursday, September 14, 2017

सादा जीवन उच्च विचार यही सुखी जीवन का सार

१५ सितम्बर २०१७ 
यह काल संक्रमण का काल है. मूल्य बदल रहे हैं, संस्कृतियाँ और सभ्यताएं बदल रही हैं. देशों की सीमाएं बदल रही हैं. विश्व की उन्नति का आधार आर्थिक विकास माना जाने लगा है. व्यापारिक संबंध बढ़ रहे हैं, देश निकट आ रहे हैं. किन्तु इस सबके साथ मानव को विकास की बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है. एक पीढ़ी पहले तक भी एक व्यक्ति को परिवार का सहयोग और प्रेम सहज ही मिल जाता था, जिसके कारण उसके भीतर मानवीय मूल्यों की स्थापना घर से ही आरम्भ हो जाती थी और विद्यालय उसमें विस्तार करता था. आज एकल परिवार होने के कारण बच्चे उस स्नेह और विश्वास से वंचित हैं, स्कूल भी इस कमी को पूरा नहीं कर पा रहा है. आये दिन स्कूलों में होने वाले हादसे अभिभावकों और बच्चों में एक भय की भावना भर रहे हैं. यदि मानव अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले, लोभ और दिखावे पर नियन्त्रण रखे. ध्यान और योग को अपना कर सुख के अविनाशी स्रोत को अपने भीतर ही खोज ले तो स्वतः ही उसकी यह अंधी दौड़ समाप्त हो जाएगी.  

जन-जन की भाषा है हिंदी

१४ सितम्बर २०१७ 
आज हिंदी दिवस है. ‘हिंदी’ एक ऐसी भाषा जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया हुआ है. जो अनेकता में एकता का जीता-जागता उदाहरण है. बारहवीं शतब्दी से हिंदी की धारा भारत में जन-जन के हृदयों को आप्लावित कर रही है. मध्य काल में सूर, तुलसी हों या कबीर और रहीम, हिंदी की ध्वजा सदा ही लहराती रही है. आधुनिक काल में भी हिंदी के विद्वानों की एक लम्बी श्रंखला चलती आ रही है, जिसने जन मानस के हृदयों को हिंदी-सुधा से पोषित किया है. आज सामान्य जन की बोलचाल भाषा हो या साहित्य की भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हिंदी फल-फूल रही है, कमी है तो बस इसकी कि आजादी के सत्तर वर्षों के बाद भी इसे राजकाज की भाषा नहीं बनाया जा सका. अनुवादित व क्लिष्ट भाषा के सहारे इस कार्य को नहीं किया जा सकता. मौलिक रूप से हिंदी में ही सरल भाषा में किया गया कार्य ही सरकारी कार्यालयों में अपनाना होगा वरना वहाँ यह केवल हिंदी दिवस तक ही सिमट कर रह जाएगी.