Friday, January 19, 2018

स्वयं में होगा मिलन परम से

२० जनवरी २०१८ 
परमात्मा की कृपा को अनुभव करेगा कौन ? देह जड़ है, मन स्मृति और कल्पना से पूर्ण है. बुद्धि सदा हानि-लाभ की उधेड़बुन में लगी रहती है. चित्त न जाने कितने जन्मों के संस्कारों से भरा हुआ है. अहं चाहता है जैसे संसार मिला है वैसे ही परमात्मा भी मिल जाये. उसे यह ज्ञात ही नहीं जिस शक्ति से वह बना है, जो उसके भीतर ओत-प्रोत है, उसके शांत होते ही स्वयं को देख सकती है. संत कहते हैं, एक ही तत्व से यह सारा जगत बना है. देह, मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार की गहराई में भी वही छिपा है. उसे जानने के लिए कहीं दूर नहीं जाना है. ध्यानपूर्वक मन आदि को ठहराना है, आत्मा स्वयं ही प्रकट हो जाएगी और परमात्मा का अनुभव उसे ही होगा. बाद में देह, मन आदि पर उसका प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकेगा.    

Wednesday, January 17, 2018

कर्मशील हो जीवन सबका

१७ जनवरी २०१८ 
मुख में नाम, हाथ में काम’, ऐसे वचन हम बड़ों के मुख से सुनते आये हैं. कोई इसका अर्थ यह लगा सकता है कि कार्य करते समय भगवान का नाम लेते रहो, किन्तु नाम जपना कभी-कभी औपचारिक भी हो जाता है और यांत्रिक भी. ऐसा भी हो सकता है कि कार्य में लगे रहने पर मन उसी में सलंग्न हो जाये और नाम लेना भूल ही जाये. इसलिए इस सुंदर वचन का भाव कुछ और होना चाहिए. हमारा मन शांत हो अर्थात भीतर कोई हलचल न हो पर बाहर से हम निरंतर कार्य में लगे रहें. प्रमाद और आलस्य के वश होकर भक्ति के नाम पर बैठे न रहें बल्कि अपना हृदय परमात्मा को समर्पित करके उसकी सृष्टि को सुंदर बनाने के लिए अपना योगदान देते रहें. 

Saturday, January 13, 2018

अग्नि सम उन्नत हो जीवन

१३ जनवरी २०१८ 
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है.     


Friday, January 12, 2018

देवों का आशीष सदा है

१२ जनवरी २०१८
संत कहते हैं, जैसे कोई सिंह शावक बाल्यावस्था में भेड़ों के मध्य चला गया हो और स्वयं को भेड़ ही मानता रहे, वैसे ही मानव देव होने की क्षमता रखते हुए भी असुरों के मध्य चला जाता है और स्वयं को असुर मानने लगता है. देव होने का अर्थ है स्वयं को परमशक्ति के प्रति समर्पित मानना, सदा देने की भावदशा में रहना, आनंद और शांति के साथ सबके सुख की कामना करते हुए जीना. असुर स्वयं को असुरक्षित मानता है, फिर भी समर्पण नहीं करता. उसे अपने लिए ही कम पड़ता है, देने का ख्याल कहाँ से आएगा और स्वार्थपूर्ति के लिए वह अन्यों को दुःख भी पहुँचा सकता है. मानव यदि देवत्व को जगाने की कामना करता है तो सारी देव शक्तियाँ उसकी सहायता के लिए आ खड़ी होती हैं. आसुरी भाव में जीने वाला व्यक्ति आसुरी शक्तियों के प्रभाव में और भी दुर्बल हो जाता है.

Wednesday, January 10, 2018

जग जायेगी जब जिज्ञासा

१० जनवरी २०१८ 
देह प्रतिक्षण बदल रही है, मन कहीं ठहरता ही नहीं, इन्हें देखने वाला द्रष्टा मात्र साक्षी है. बचपन की देह अब नहीं रही, युवावस्था भी बीत गयी और प्रौढ़ावस्था भी अधिक देर तक नहीं रहेगी. एक दिन देह भी गिर जाएगी, उस क्षण भी एक तत्व अखंड बना रहेगा. उस एक तत्व को जो जान लेता है और उसमें टिकना सीख जाता है, वह सुख-दुःख के पार चला जाता है. जगत में रहकर कार्य करते हुए, गाढ़ निद्रा में अथवा स्वप्न देखते समय वह एक तत्व निरंतर देखता रहता है. हम संसार को देखते हैं पर उस देखने वाले को नहीं देखते. नींद से जगकर जब हम कहते हैं, रात अच्छी नींद आयी तो यह जवाब वहीं से आता है. हर साधना का लक्ष्य बुद्धि में उस एक तत्व को जानने की लालसा जगाना ही है.

Tuesday, January 9, 2018

बुल्लाह, की जाना मैं कौन ?

९ जनवरी २०१८ 
“मैं कौन हूँ” इस प्रश्न का जवाब खोजे नहीं मिलता. बुल्लेशाह तभी कहते हैं, बुल्लाह, की जाना मैं कौन ? हम किताबें पढ़ते हैं, शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, संतों की वाणी सुनते हैं, पर यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है. बाहर संसार है भीतर विचार है, ध्यान की गहराई में जाएँ तो वहाँ कुछ भी नहीं, पूछने वाला ही नहीं रहा, यदि पूछने वाला है तो ध्यान घटा ही नहीं. जहाँ कुछ नहीं रहता वहाँ परमात्मा है, और परमात्मा ने अखंड मौन धारण किया हुआ है. वास्तव में प्रकृति और परमात्मा के इस खेल में ‘मैं’ तभी तक है, जब तक अज्ञान है, अर्थात जब तक खोज शुरू ही नहीं हुई. देह और मन से परे ‘मैं’ एक अविनाशी सत्ता है, इसका ज्ञान होने पर ही पता चलता है, कि वहाँ कुछ भी नहीं है. जीवन तब एक खेल या नाटक ही प्रतीत होता है.

Thursday, December 28, 2017

हीरा जनम अमोल है

२९ दिसम्बर २०१७ 
जीवन का हर पल अनंत सम्भावनाएं छिपाए है. अगले पल क्या घटने वाला है, कोई नहीं जानता. हर घड़ी एक नया अवसर लेकर हमारे सम्मुख आती है. हम क्या चुनते हैं, यह हम पर निर्भर है. समय की धारा तो बही जा रही है. उसमें कुछ सूखे हुए पुष्प हैं तो कुछ नव कुसुमित कमल भी, कुछ बासी मालाएं हैं तो कुछ सूर्य की नव रश्मियाँ भी, हमारी दृष्टि किस पर है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है. कोई यूँही सोये-सोये भोर गंवा देता है तो कोई निकल पड़ता है, सुबह की लालिमा और हवा की स्नेह भरी छुअन को समेटने, परमात्मा को धन्यवाद देने अथवा तो ध्यान, सुमिरन में डूबने, जिससे ऊर्जा के उस महत स्रोत से वह जुड़ जाये और अपने भीतर ही तृप्ति का महासागर उसे मिल जाये. जीवन अनमोल है इसका मर्म जाने बिना इसका कीमत का अंदाजा नहीं होता. आने वाले वर्ष में अन्य लक्ष्यों के साथ इस एक खोज को भी जोड़ लें तो नया वर्ष कभी बीतेगा ही नहीं.