Monday, April 24, 2017

स्रोत ऊर्जा का हो विकसित

 २५ अप्रैल २०१७ 
जीवन हमें नित नई चुनौतियाँ देता है, नये अवसर देता है, वह हर पल नये नये मार्ग सुझाता है, यदि हम नये को स्वीकारने में झिझकते हैं और उसी पुराने रास्तों  पर चलते रहते हैं तो जीवन वैसा ही बना रहता है. उसमें कोई सकारात्मक परिवर्तन आ ही नहीं सकता. प्रकृति शाश्वत होते भी नित नूतन है क्योंकि वह विरोध से घबराती नहीं, वह हर पल को वैसा ही स्वीकारती है और अपनी ऊर्जा को विरोध में नहीं विकास में खर्च करती है. हमारी ऊर्जा नकार में व्यर्थ ही जाती है और कई बार तो हम केवल अहंकार के कारण ही अपनी बात को गलत जानते हुए भी उस पर अड़े रहते हैं. कोई भी नकारात्मक भाव हमारी ऊर्जा के स्रोत को झुलसाने का काम करता है और सहजता व स्वीकार उसे पनपने का अवसर देता है. परमात्मा सहज भाव से हमें स्वीकार रहा है हर पल वह हमारे साथ है और यदि उसकी तरह हम भी जीवन को सहज ही खिलने का अवसर दें तो आनंद हमारा स्वभाव बन जायेगा.

Sunday, April 23, 2017

सुख भी जब बाधा बन जाये

२४ अप्रैल २०१७ 
हर व्यक्ति की आंतरिक पुकार एक ही है. सभी सुख और शांति का जीवन जीना चाहते हैं. सभी स्वस्थ रहना और सम्पन्न रहना भी चाहते हैं. सभी समाज में अपना सम्मान हुआ देखना चाहते हैं. इन्हीं को शास्त्रों में वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा और यशेष्णा के नाम से कहा गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि इन तीन एषनाओं के रहते कोई पूर्ण रूप से दुखों से मुक्त हो ही नहीं सकता. इसका अर्थ हुआ सुख की इच्छा ही दुःख का कारण बनती है, किसी भी तरह का अभाव भी दुःख है, सम्मान की आकांक्षा ही अपमान का बीज बो देती है. जब तक यह कटु सत्य हमें स्वीकार नहीं है तब तक हम सुख-दुःख के डोले में झूलते ही रहेंगे और हर सुख अपने पीछे एक दुःख की एक लंबी कहानी छिपाए होगा अथवा तो भविष्य में लायेगा. जब मन खाली हो, जीवन अपने असली रूप में सामने आता है. जब कोई चाह मन को नहीं सताती तब यह अपने मूल से जुड़ा रहने में ही आनंद का अनुभव करता है.

Saturday, April 22, 2017

मुक्त यहाँ स्वयं से ही होना

२३ अप्रैल २०१७ 
अपने ही संस्कारों में बंधे-बंधे हम जीवन को एक संघर्ष बना लेते हैं. हमें अच्छी तरह ज्ञात है, हमारे लिए कैसा भोजन उचित है, किस मात्रा में उचित है पर संस्कार वश उसी भोजन को हम ग्रहण करते हैं जो आज तक करते आ रहे हैं और जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. क्रोध करने से सदा ही हानि उठायी है पर संस्कार वश उन्हीं  बातों पर पुनः-पुनः झुंझला जाते हैं. यही तो बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है जिसे साधना के द्वारा हमें खोलना है. अपने ही मन के बनाये जाल को तोडकर भीतर एक ऐसी शुद्ध सत्ता को जन्म देना है जो किसी भी तरह के आग्रह से मुक्त हो, जो सहज ही अपना हित चाहने वाली हो, जिससे अहित होने का कोई डर ही न रहे, अन्यथा हम स्वयं ही अपने शत्रु बन जायेंगे और दोष भाग्य अथवा परिस्थिति पर ड़ाल देंगे. स्वयं के हर भाव, विचार और कर्म की जिम्मेदारी लिए बिना हम मनुष्य होने के अधिकारी नहीं हो सकते. 

Thursday, April 20, 2017

मुक्त हुआ मन कब डोले

२१ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों के अनुसार अनंत जन्मों के हमारे संचित कर्मों में से थोड़ा सा प्रारब्ध कर्म लेकर हम इस दुनिया में आते हैं. जिनके अनुसार जन्म, आयु, सुख-दुःख आदि हमें मिलते हैं. जब तक यह ज्ञान नहीं होता कि मनसा, वाचा, कर्मणा हर कर्म का फल मिलने ही वाला है, हम नये-नये कर्म बांधते चले जाते हैं, जिनका हिसाब चुकाना ही होगा. एक बार यह ज्ञान हो जाने के बाद हमें केवल पुराने कर्मों का हिसाब पूरा करना है. स्वयं को सदा मुक्त अनुभव करने के लिए कर्मों के जाल से छूटना ही एक मात्र उपाय है. जीवन में कैसी भी परिस्थिति आये मन को समता भाव में रहकर उससे पार हो जाना ही कर्मों से छूटना है, अन्यथा भविष्य के लिए एक नया बीज बो दिया जायेगा. जिस किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के साथ राग अथवा द्वेष का भाव मन में रहता है, उसका सही मूल्यांकन हम कभी नहीं कर सकते. राग अथवा द्वेष बुद्धि को धूमिल कर देते हैं और हम अनजाने ही नई रस्सियों में जकड़े जाते हैं. 

Tuesday, April 18, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

१९ अप्रैल २०१७ 
यह संसार हमें मिला है ताकि हम त्रिविध दुखों से बच सकें. आदिभौतिक, आदिदैविक व आध्यात्मिक दुखों से पूर्ण मुक्ति के लिए ही यह जीवन हमें मिला है. जब तक यह ज्ञान हमें नहीं है, तब तक हम नये-नये दुखों का निर्माण करते रहते हैं. पतंजलि के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश इन पंच क्लेशों से घिरे रहकर हम कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकते. अविद्या का अर्थ है अनात्म को आत्म मानना, अर्थात जो हम नहीं हैं उसे अपना स्वरूप मानना. अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध मानना, दुःख को सुख मानना भी अविद्या है. अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। दूसरे शब्दों में अविद्या भ्रांत ज्ञान है. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को अर्थात्‌ अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक मान लेना. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग है. चौथा क्लेश द्वेष है। दु:ख या दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है। क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को अनुचित अथवा अपने प्रतिकूल मान लेते हैं। जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश सभी को समान रूप से होता है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरंजीवी रहे। इसी जिजीविषा के वशीभूत होकर हम न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करते है और विचार न कर पाने के कारण नित्य नए क्लेशों में बँधते जाते हैं।



Sunday, April 16, 2017

समता की जब करें साधना

१७ अप्रैल २०१७ 
बीज एक है पर उसी से तना, डालियाँ, पत्ते, कलियाँ, फल व फूल प्रकट होते हैं, ऐसे ही जगत में विविधता है पर एक ही ऊर्जा देह और मन के माध्यम से प्रकट हो रही है. बीज यदि संक्रमित हो तो पौधा भी रोगग्रस्त होगा, अथवा तो पौधे को उचित जलवायु न मिले तो भी वह स्वस्थ नहीं होगा. इसी तरह ऊर्जा यदि नकारात्मक हुई अथवा उसको प्रकट होने का उचित माध्यम नहीं मिला तो जीवन स्वस्थ नहीं रह सकता. ऊर्जा को ऊपर से नीचे बहने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, नीचे गिरना सहज ही होता है पर ऊपर ऊठने के लिए प्रयास चाहिए, इसे ही हमारे शास्त्रों में पुरुषार्थ कहा गया है. मन यदि समता में रहता है तो ऊर्जा सहज ही ऊर्ध्वगामी होती है. सजगता ही इसका साधन है, सजगता बनी रहे इसके लिए ही आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि का विधान है. 

Friday, April 7, 2017

सारा जग अपना लागे जब

७ अप्रैल २०१७ 
'विभिन्नता में एकता' का सूत्र जितना हमारे देश की मूल भावना को दर्शाता है उतना ही मानव और प्राणी जगत की आंतरिक एकता को भी. ऊपर-ऊपर से जितना भेद दिखाई देता है, भीतर-भीतर उतना ही साम्य छिपा है. जैसे एक वृक्ष है उसकी डालियाँ और तना निकट के वृक्ष से पृथक हैं पर धरती के भीतर दोनों की जड़ें आपस में किस तरह घुल-मिल जाती हैं कि कोई भेद नजर नहीं आता. साथ ही जो हवा और प्रकाश एक की पत्तियां ग्रहण करती हैं दूसरे की भी वही. उनमें एक तरह की समानता सदा ही है, मनुष्य -मनुष्य के मध्य भी सूक्ष्म स्तर पर देखा जाये तो हवा और प्रकाश के साथ-साथ विचार की तरंगे बिना रोक-टोक एकदूसरे में प्रवेश करती हैं. चेतना का गुण-धर्म एक जैसा ही है, चाहे वह किसी के भीतर ही क्यों न हो. ध्यान में जब इसका अनुभव साधक को हो जाता है एक आत्मीयता की भावना भीतर भर जाती है. एक अपनापन जो जगत के प्राणीमात्र के प्रति प्रकट होने लगता है. 

Thursday, April 6, 2017

निज हाथों में मन की डोर

६ अप्रैल २०१७ 
आत्मा सागर है और मन उसमें उठने वाली तरंगें, आत्मा आकाश है, मन उसमें तिरने वाले बादल. आत्मा कच्चा माल है और मन उसका उत्पादन..हम किसी भी तरह से सोचें अस्तित्त्व और हमारे मध्य कोई न कोई संबंध देख ही सकते हैं. ऐसा संबंध जो हमने नहीं बनाया है जो सदा से है. हम इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं कि मन को कैसा मानें, तरंगों की भांति जिस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं, बादलों की भांति जो आते हैं और चले जाते हैं, अथवा तो स्वयं के पूर्ण नियन्त्रण में बनने वाले उत्पाद के रूप में. स्वयं को आत्मा जानकर जब  हम अपने विचारों को गढ़ते हैं, उन्हें सजाना-संवारना हमारे हाथ में होता है. हर विचार एक बीज है और हर बीज  कर्म रूप में वृक्ष  बनेगा जिस पर फल भी लगेंगे और नये बीज भी बनेंगे, जो बिलकुल वैसे ही होंगे जैसा बीज था. इसका अर्थ हुआ हमारा भाग्य हमारे विचारों का ही प्रतिफल है. 

Tuesday, April 4, 2017

जीवन बन मुस्कान बंटे

५ अप्रैल २०१७ 
जीवन क्या है, इसकी समझ आते-आते ही आती है,  कभी कभी तो मृत्यु के द्वार पर जाकर ही आती है, किन्तु उस समय उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. नया शरीर पाकर फिर दुनिया की रंग रलियों में उलझ कर मन रह जाता है और जीवन से मुलाकात ही नहीं हो पाती. जिसे आमतौर पर हम जीवन कहते हैं, वह तो एक बंधी-बंधायी दिनचर्या है, क्रिया और प्रतिक्रिया का एक निरंतर चल रहा खेल है. मन एक तरह से सोचना सीख जाता है और तमाम उम्र उन्हीं दायरों में खुद को कैद कर सुरक्षित होने का भ्रम पाल लेता है. जीवन का गीत अनगाया ही रह जाता है. प्रकृति को निकट से देखें तो प्रतिपल जीवंतता का अनुभव होता है, शिशु और पशु-पक्षी भी एक तरह से जीवन के अत्यंत निकट होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि शिशु को विकसित नहीं होना है या मानव को पशु और प्रकृति में फिर से लौट जाना है. जीवन को एक विशाल दृष्टिकोण से देखना है, मानव की भूमिका व उसकी महत्ता को अनुभव करना है. जैसे प्रकृति, प्राणी व शिशु सहज ही तृप्त हैं, वैसे ही हर मनुष्य यदि भीतर एक तृप्ति का अनुभव करे तो विकास के नाम पर अनावश्यक दोहन नहीं होगा. विकास करके मानव सुख ही तो पाना चाहता है, पर दुःख के साधन बढाये चला जाता है, जीवन स्वयं मुस्कुराने और जगत में मुस्कुराहट बांटने के लिए है यह भाव जगते ही सारे अभाव नष्ट हो जाते हैं.

'मैं' के पार वही बसता है

४ अप्रैल २०१७ 
परम तक जाने के दो ही मार्ग हैं, एक ज्ञान का मार्ग दूसरा प्रेम का मार्ग ! यह भेद आरम्भ में ही होता है, मंजिल पर जाकर दोनों मिल जाते हैं . ज्ञान का मार्ग संकल्प का मार्ग है, स्वयं को देह से अलग मानकर धीरे-धीरे श्वास, मन, व बुद्धि से भी अलग करते जाना है ताकि शुद्ध चेतना ही बचे, जहाँ केवल एक रहता है वहाँ परमात्मा ही रहता है. प्रेम का मार्ग कहता है परमात्मा के सिवा कुछ है ही नहीं, वहाँ आत्मा जगत के हर रूप में परमात्मा को ही देखती है. तब 'मैं' मिट जाता है, 'मैं' मिटते ही परम प्रकट हो जाता है. किसी भी मार्ग से चलें अहंकार को मिटाए बिना सत्य का अनुभव नहीं होता. 

Monday, April 3, 2017

एक का होना जाना जिसने

३ अप्रैल २०१७ 
सभी धर्म यह स्वीकार करते हैं कि परमात्मा एक है.एक ही सत्ता से यह सारी सृष्टि अस्तित्त्व में आयी है. एक का विस्तार हुआ तो अनेक हुए, अब ध्यान में जाकर जब साधक जगत को मन में, मन को बुद्द्धि में,  बुद्धि को स्वयं में ठहरा लेता है तो कुछ काल के पश्चात स्वयं अपने आपको परमात्मा में ही स्थित पाता है. एक से अनेक को पहचान के फिर अनेक से एक होना ही ध्यान है. उस क्षण किसी के साथ कोई भेद नहीं रह जाता, एक सहज विश्वास से अंतर पूरित हो जाता है और ध्यान से बाहर आने के बाद भी देर तक उस एकत्व की ख़ुशबू मन व देह में समोई रहती है. ध्यानी के लिए न कोई स्पर्धा शेष रहती है न ही कोई प्रतिद्वन्द्वी, सारा जगत जब अपना ही विस्तार ज्ञात होने लगे तो कैसी दौड़ और कैसा आग्रह. पहली बार तब सृष्टि एक नयी नवेली आभा बिखेरती हुई नजर आती है जिसका उद्देश्य ऊर्जा का सहज स्फुरण मात्र है. तन और मन जब प्राणवान होते हैं आनंद सहज ही प्रकट होता है.