Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Wednesday, June 21, 2017

उसके आने के ढंग अजब

२२ जून २०१७ 
हमारा मन कभी वर्तमान में रहता नहीं और परमात्मा को अतीत या भविष्य में मिला नहीं जा सकता, सो कभी मिलन घटता ही नहीं. जैसे कोई किसी के पड़ोस में रहता है, पर जब वह काम पर जाता है, दूसरा सो रहा होता है और पहले के वापस आने तक उसकी शिफ्ट आरम्भ हो चुकी होती है, तो महीनों क्या वर्षों तक वे दोनों एक—दूसरे से नहीं मिल सकते. परमात्मा भी हमारा निकटतम है, पर क्यों कि जब वह मिल सकता है, हम वहाँ होते ही नहीं, जीवन बीत जाता है हम अजनबी ही बने रहते हैं. जब कोई किसी कार्य में तत्परता से लगा है, अतीत या भावी की कोई स्मृति या कल्पना तो दूर उसे यह भी ख्याल नहीं कि वह है, तब चुपके से परमात्मा आ जाता है और उसके काम में सहयोग करता है, तभी तो तल्लीनता में एक अपरिमित सुख का अनुभव होता है. 

योगी बनें उपयोगी बनें

२१ जून २०१७ 
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है. योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए करना. 

Sunday, June 18, 2017

जिन खोजा तिन पाइयाँ

२० जून २०१७ 
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता. हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है. 

Saturday, June 17, 2017

खोज मूल की होगी जब

१८ जून २०१७ 
हमारा मूल स्वभाव शांति, प्रेम और आनंद है, किसी को भी अशांत रहना पसंद नहीं, कोई उससे नफरत करे यह भी कोई नहीं सह सकता और दुःख से बचने की सहज ही हरेक के भीतर प्रवृत्ति होती है. नन्हा शिशु सहज ही प्रसन्न होता है, उसके प्रति अपने-पराये सभी का प्रेम उमड़ता है और छोटा सा दुःख आने पर वह रो-रोकर उससे छुटकारा पाने के लिए गुहार लगता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर अशांत होना सीख जाते हैं, प्रेम का अर्थ हर समय दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना मानने लगते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए वस्तुओं का आश्रय लेने लगते हैं. समय के साथ-साथ हमारा मूल स्वभाव कहीं नीचे दब जाता है, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से ये चीजें मिल ही नहीं सकतीं, इसका ज्ञान जब तक होता है तब तक तो हम अपने स्वभाव को भूल ही चुके होते हैं. अब शांति, प्रेम, आनंद के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं. जीवन में सत्य की खोज आरम्भ होती है. 

Friday, June 16, 2017

सुख-दुःख का कारण निज कर्म

१७ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक हम जो भी कार्य करते हैं, उसका लक्ष्य एक ही होता है, हमारा व हमारे प्रियजनों का जीवन सुखमय हो. किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम कभी-कभी ऐसे कार्य कर देते हैं जो दुःख का कारण बनते हैं. इस दुःख से कैसे बचा जाये, शास्त्र व संत इसका मार्ग बताते हैं. किसी भी  कार्य को करने से पहले उसके फल का विचार कर लेना चाहिए. यदि वह कार्य दीर्घकाल तक दुःख देने वाला है और करते समय अल्प सुख देने वाला है तो उसे नहीं करना चाहिए. इसके विपरीत यदि वह कार्य अल्पकाल के लिए कठिन लगता है पर उसका फल दीर्घकाल तक सुख देता है तो उसे शीघ्र ही कर लेना चाहिए. उदाहरण के लिए योग साधना करने में आरम्भ में श्रम करना होता है पर उसके कारण जीवन में स्वास्थ्य व आनंद के जो पुष्प खिलते हैं उनकी तुलना में वह दुःख कुछ भी नहीं. देर रात तक जगना व सुबह देर से उठाना तात्कालिक रूप से सुख देता प्रतीत होता है पर देह में तमस व रोग का कारण बनता है. 

Thursday, June 15, 2017

अति सर्वत्र वर्जयेत्


मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही. जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता व शांति का अनुभव कर सकते हैं.

Wednesday, June 14, 2017

कभी छुप न सकेगा परमात्मा

१५ जून २०१७ 
परमात्मा से हमारा मिलन क्यों नहीं होता, इसका सबसे बड़ा कारण है हमारी नकारात्मकता. परमात्मा सकारात्मकता का पुंज है. जैसे प्रकाश का अँधेरे से मिलन नहीं हो सकता वैसे ही परमात्मा का द्वेषपूर्ण मन से मिलन नहीं हो सकता. रेत और चीनी के कण कभी नहीं मिलते, मगर जल और चीनी मिल सकते हैं, ऐसे ही आत्मा व परमात्मा मिल सकते हैं, मन और परमात्मा नहीं. मन आत्मा के सागर पर उठी लहरों का ही नाम है, कुछ पल के लिए मन यदि शांत हो जाये तो परमात्मा की शांति का अनुभव हमें होता है. ध्यान, साधना के द्वारा जब हम मन को नकारात्मकता से मुक्त करते हैं, हमारे भीतर परमात्मा का सूर्य जगमगाने लगता है. 

तू ही दाता तू ही विधाता

१४ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार हम जाने-अनजाने भगवान का नाम लेते रहते हैं. किसी कठिनाई में फंस जाएँ तब तो उसके नाम का जप भी शुरू हो जाता है. कुछ अच्छा हो जाये तो उसको धन्यवाद देते हैं और न हो तो उससे शिकायत भी करते हैं, किंतु कभी बैठकर उसकी नहीं सुनते. एकतरफा संवाद ही चलता रहता है और हम अपनी मर्जी से जीवन को जीये चले जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जिस भगवान के बिना हमारा जीवन चल ही नहीं सकता, वह हमारी कल्पना में ही है. बचपन से जो भी हमने सुना है, किताबों में पढ़ा है और कुछ हमारी स्वयं की धारणाओं के अनुसार एक छवि हमने गढ़ ली है और भगवान व हम स्वयं दो समानांतर रेखाओं की तरह चलते चले जाते हैं, जिनके मिलन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. 

Tuesday, June 13, 2017

भगवद् गीता किञ्चिदधीता

13 jun 2017 
भगवद गीता पूजा की पोथी नहीं है, ग्रंथालय की शोभा नहीं है. भगवान का गीत है, ब्रह्म और जीव का अद्भुत संवाद है. ज्ञान रूपी अनंत अलौकिक खजाना है. निज स्वरूप में अवस्थित होकर जीवन जीने की कला है. चैतन्य का बहता हुआ झरना है यह, शब्दों के जंजाल से मुक्त होकर यदि कोई इस प्रवाह का अनुभव कर सके तो वह चैतन्य के साथ एकत्व का अनुभव कर सकता है. हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था पर यह नित नवीन है. सदियाँ बीत जाती हैं पर ज्ञान नहीं बदलता. यह मोक्ष शास्त्र है.

Saturday, June 10, 2017

मार्ग वही जो घर पहुँचाये

११जुन २०१७ 
जीवन हमें श्रेय और प्रेय दो मार्ग सुझाता है. पहला श्रेय मार्ग सदा ही कल्याण की ओर लेकर जाने का मार्ग है और दूसरा प्रेय मार्ग संसार के आकर्षणों का अनुभव कराते हुए सुख-दुःख के मार्ग पर भटकाने वाला है. हमारे सम्मुख अस्तित्त्व हर क्षण चुनाव का अवसर प्रस्तुत करता है. हम लगभग सदा ही प्रेय का चुनाव कर लेते हैं, यह आरम्भ में सुख देने वाला प्रतीत होता है, इसमें ज्यादा श्रम भी नहीं करना पड़ता, यह हमारी रुचियों के अनुकूल पड़ता है और हमें लगता है हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से इस मार्ग पर चल रहे हैं. जबकि हमारे संस्कार विवश करते हैं और हम बने बनाये रास्तों पर ही चलते रहते हैं, जो बार-बार उन्हीं पर घुमाते रहते हैं, पहुंचना कहीं होता ही नहीं. दूसरी तरफ कल्याण का मार्ग आरम्भ में कष्टपूर्ण लग सकता है, इस पर प्रयास पूर्वक चलना होता है, पर अंत में यही मार्ग हमें ऐसे जीवन की ओर ले जाता है जो सहज है, आनंदपूर्ण है और जिसको पाने के लिए संत सदा से कहते आये हैं.  

भीतर का जब दिखे गगन

१० जून २०१७ 
मन हर पल कल्पनाओं अथवा स्मृतियों के गलीचे बुनता रहता है. इसी व्यस्तता में वह आत्मा का निर्मल स्पर्श चूक जाता है. हमारे चारों ओर वह अव्यक्त सत्ता हर पल विद्यमान है. किन्तु मन के पर्दे पर अनवरत खेल चलता रहता है तो वह पर्दा कभी खाली ही नहीं होता और उसका होना छिपा ही रहता है. जैसे आकाश पर यदि सदा ही बादल बने रहें तो कोई आकाश को कैसे देखेगा, आत्मा के आकाश पर मन के बादल कभी विलीन ही नहीं होते. मन का होना आत्मा पर ही निर्भर है पर यह उसके अस्तित्त्व से ही बेखबर है, इसी को संतों ने माया कहा है. नींद में जब चेतन मन सो जाता है तब आत्मा का स्वाद मिलता है, तभी नींद इतनी प्रिय होती है. किन्तु नींद में उससे मुलाकात नहीं हो पाती, यह तो ध्यान में ही सम्भव है, जब मन भी न रहे और बुद्धि का सीधा साक्षात्कार आत्मा से हो सके.

Wednesday, June 7, 2017

बन सुवास जब मन बिखरे

७ जून २०१७ 

बादल बरस रहे हैं जैसे, कृपा बरसती प्रभु की वैसे
भीगा जैसे घर का आँगन, भीगे वैसे अंतर उपवन !

परमात्मा की कृपा का अनुभव साधक को हर घड़ी होता है, पर उस कृपा को सुवास बनाकर बाहर बिखेरना भी तो आना चाहिए. जैसे धरती जल लेकर सुवास देती है, वैसे ही कृपा के जल से भीगा हुआ मन प्रेम के गीत रचे. सुनहले शब्दों की चादर बुने, मोती से वचन कहे, जिसे हंस चुगें. धरा देती है, गगन देता है, प्रकृति देती है और मानव भरे जाते हैं भीतर. पाना ही उनका लक्ष्य है, पाकर वे उसे व्यर्थ कर देते हैं.  

Sunday, June 4, 2017

पर्यावरण बचाएं हम

५ जून २०१७ 
पृथ्वी को हम माँ कहते हैं. उसी से हम जन्मे हैं और एक दिन उसी में हमारे भौतिक अवशेष लीन हो जाने वाले हैं. पृथ्वी के उपकारों को याद करना आरम्भ करें तो उनका अंत ही नहीं आएगा. हमारे वस्त्र, मकान, भोजन सभी कुछ तो उसी से मिला है. जल को भी वही धारण करती है और अग्नि को भी अपने उदर में वही धारण किये हुए है. हजारों तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, हीरे-जवाहरात और खनिज लवण क्या नहीं है उसके आश्रय में. मानव ने पृथ्वी के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है. जंगल नष्ट किये जा रहे हैं, हवा को प्रदूषित किया जा रहा है, जल को भी पीने योग्य नहीं छोड़ा है. मानव का अज्ञान उसे किस ओर ले जा रहा है वह अपनी बेहोशी में यह भी नहीं देख पा रहा है. विश्व पर्यावरण दिवस हमें जागने के लिए मजबूर करता है, यदि हम अब नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी को जन्म से ही रोगों का सामना करना पड़ेगा. आज भी प्रदूषण के कारण रोगों की संख्या बढती जा रही है. योग युक्त जीवन शैली अपना कर हम पुनः इस धरा को हरा-भरा बना सकते हैं.  

Saturday, June 3, 2017

बँटती रहे ऊर्जा पल-पल

४ जून २०१७ 
जीवन प्रतिदिन एक नई सुबह का वरदान देता है. हर रात अपने साथ सारी थकान ही नहीं ले जाती, विश्राम के पलों में नई ऊर्जा से मन को भर देती है. जिसने हँसकर सुबह का स्वागत किया वह अपनी दोपहर में कुछ रचने ही वाला है, और उसकी संध्या भी अनंत के प्रति आभार से भर जाएगी. रात्रि का स्वागत भी वह एक तृप्त हृदय के साथ करेगा. जिसने आपने आनन्द को प्रकृति के साथ साझा करना सीख लिया प्रकृति भी उसके मार्ग में चमत्कार बुन देती है. प्रकृति पल-पल अपना सब कुछ बाँट रही है, हमें भी इस जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसी से मिला है, उसी की भांति देने की कला जब किसी को आ जाये तो जीवन का हर पल नया लगता है. 

Friday, June 2, 2017

भाग्य सदा हम स्वयं ही रचते

३ जून २०१७ 
यह जगत हमें अपनी आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ही मिलता है. मन की गहराई में जैसा हम चाहते हैं, यह सृष्टि वैसा ही रूप धर कर हमारे सामने प्रस्तुत होती रहती है. हर आत्मा के पास यह क्षमता है किन्तु मानव योनि में आकर ही वह इसका लाभ उठा सकती है. भाग्य का अर्थ बस इतना सा ही है कि अतीत में हमने कुछ चाहा था, वर्तमान में वह हमें मिल रहा है.

Wednesday, May 31, 2017

सबके हित में अपना हित हो

१ जून २०१७ 
यह ब्रह्मांड आपस में किन्हीं अदृश्य तंतुओं से जुड़ा हुआ है. मानव व अन्य सभी सूक्ष्म व स्थूल जीव अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए परस्पर निर्भर हैं. सभी जैसे एक विशाल देह के अंग हों. जिस प्रकार हमारी देह में हाथ अपने लिए नहीं है, पूरी देह की देखभाल के लिए है, पैर भी उसे गति प्रदान करने के लिए हैं, इसी प्रकार सभी प्राणी स्वयं के लिए नहीं हैं अन्यों के लिए हैं. जब समाज व परिवार में हर कोई अपनी उन्नति के साथ-साथ सभी की उन्नति के उपाय सोचेगा तो समाज  अपने आप समृद्धिशाली होगा. अपने पास जो भी योग्यता हो वह समाज के काम आ सके, ऐसी भावना भीतर जगते ही मन को गहरा विश्राम मिलता है. हाथों के द्वारा सेवा न भी ही सके, तो धन के द्वारा, ज्ञान के द्वारा, अपना समय देकर अथवा जगत के प्रति मंगल कामनाएं भेजकर ही हम उस ऋण को किसी हद तक उतार सकते हैं जो हमें इस सृष्टि के प्रति चुकाना है.

Tuesday, May 30, 2017

स्वयं से जब संबंध बने

३१ मई २०१७ 
अहंकार दुःख का भोजन करता है. किसी पल यदि मन में दुःख है तो अहंकार है, यदि कोई पूर्ण सुख में है तो उस क्षण में अहंकार रहता ही नहीं. हमारा अहंकार जितना बड़ा है उतने ही बड़े हमारे दुःख होंगे. जब भीतर से अहंकार चला जाता है तब जो खालीपन भीतर आता है वही शांति है, आनन्द है. ‘मैं’ और ‘मेरे’ से बने सारे संबंध दुःख का कारण हैं, चाहे वे किसी वस्तु से हों, व्यक्ति से या परिस्थिति से. वास्तव में आत्मा शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, इसीलिए संत कहते हैं सारे संबंध मिथ्या हैं, मिथ्या का अर्थ यह नहीं कि वे हैं ही नहीं, वे हैं पर जिस रूप में हम उन्हें संबंध मानते हैं, उस रूप में नहीं हैं. जब तक हमारा स्वयं के साथ संबंध हमें स्पष्ट नहीं होता तब तक हम अन्यों के साथ अपने सच्चे संबंध को जान ही नहीं पाते. 

Monday, May 29, 2017

जीवन जब उपहार बने

३० मई २०१७ 
जीवन की संपदा अपने आप में इतनी अनमोल है कि उस पर सब कुछ लुटाया जा सकता है, किन्तु मानव न जाने किस सुख की तलाश में जीवन को ही लुटा देने पर तुला रहता है. हम वस्तुओं को इकठ्ठा करते हैं, फिर वे एक बोझ बनकर अपनी सुरक्षा के लिए हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं. संबंध बनाते हैं पर दोनों तरफ की अपेक्षाएं उसे एक संघर्ष बना देती हैं. हम चाहते हैं सारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनी रहें पर जीवन का स्वभाव ऐसा नहीं है, यहाँ पल-पल संयोग बनते-बिगड़ते रहते हैं. इस आपाधापी में हम असली बात को भुला ही देते हैं, परमात्मा का साथ जो हमें सहज ही मिल सकता है, आत्मा का स्पर्श जो सदा ही हमारे साथ रहती है, हमारा मन जो स्वयं में डूबना चाहता है, कभी प्रकृति के सौन्दर्य में, कभी संगीत में, कभी बस चुपचाप प्रियजनों  के साथ  चांदनी रात में बैठकर, लेकिन आज के मानव के पास अपने निकट आने के लिए समय ही नहीं है. जीवन तब एक दुविधा बन जाता है. 

स्रोत छुपा है भीतर एक

२९ मई २०१७ 
जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति आ जाये, कितना भी अँधेरा छा जाये, ऐसा लगे सब रास्ते बंद हो गये हैं, जीवन तब भी भीतर ही भीतर महकता रहता है. यदि मन में इस का पूर्ण विश्वास हो तो आशा की एक छोटी सी किरण उस तक ले जाती है. मन कितने भी प्रश्न खड़ा करता रहे, आत्मा हर क्षण एक मधुर मुस्कान बिछाये प्रतीक्षारत है. आत्मा का स्रोत वह अनंत प्रेम स्वरूप परमात्मा है, जो सदा हितैषी है, सुहृद है. जगत में सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है, यहाँ अच्छा काल भी टिकने वाला नहीं है और बुरा काल भी. हर अनुभव आत्मा को परिपक्व कर सकता है, उसे जीवन के निकट ले जा सकता है यदि कोई हृदय में परम के प्रति आस्था का अखंड दीपक जलाये रखे.    

Friday, May 26, 2017

हितायु की करें कामना

२७ मई २०१७ 
आयुर्वेद के अनुसार हमारी आयु चार प्रकार की हो सकती है. सुखायु, दुखायु, हितायु और अहितायु. सभी चाहते हैं उसका जीवन सुख से पूर्ण रहे, सदा ही उसका हित हो, दुःख अथवा अहित कोई भी नहीं चाहता. किन्तु मात्र चाहने से ऐसा होता नहीं, हमारे कर्म ही यह निर्धारित करते हैं कि इन चारों में से हमारी आयु कौन सी है. यदि किसी की देह स्वस्थ हो, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण व शुद्ध हो, आर्थिक रूप से कोई अभाव न हो, समाज में यश हो अथवा तो अपयश न हो. परिवार में पूर्ण सामंजस्य हो, समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन ठीक से होता हो, धर्म व अध्यात्म की तरफ सहज रूचि हो तो कहा जा सकता है उस व्यक्ति की आयु हितायु है. उसका वर्तमान जीवन ही सुखपूर्ण व सार्थक नहीं है बल्कि आगे आने वाला जीवन भी सुखद होगा.  

सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

२६ मई २०१७ 
निंदक नियरे राखिये’ कबीर निंदक को भी अपने पास रखने को कहते हैं और हम हैं कि मित्रों को भी दूर रखते हैं. हमारा चिन्तन जितना सामान्य होगा, मन में द्वेष रहगा, भेदभाव रहेगा और जितना उच्च होगा वह हमें हल्का कर देगा. हम उपर उठ जाते हैं तो सब एक ही दीखता है, ऊपर जाकर देखें तो बस प्रकाश ही प्रकाश है. नीचे रहें तो कीट भी हैं और कीचड़ भी. हर वस्तु का एक सत्य होता है, उस पर नजर हो तो ऊपर के आवरण हमें भरमा नहीं सकेंगे. हमें शुभ का ही चिन्तन करना है, मन का आवरण हटाना है और अपने भीतर के सत्य का साक्षात्कार करना है. 

Wednesday, May 24, 2017

सहज मिले जब सुख का मोती

२५ मई २०१७ 
पंच इन्द्रियों से मिलने वाला सुख हमारी ऊर्जा को कम करता है, जब तक मन में प्रमाद और बुद्धि में जड़ता रहती है, अर्थात रजो गुण और तमो गुण अधिक होते हैं, हमें इस बात का आभास नहीं होता. सात्विक सुख की झलक मिल जाने के बाद ही समझ में आता है कि आज तक जिन्हें हम सुख के साधन मान रहे थे वास्तव में हमें दुर्बल बना रहे थे. अध्यात्म किसी भी तरह के प्रमाद और जड़ता को तोड़ने के लिए है. योग के द्वारा जब सतोगुण बढ़ता है भीतर सहज ही प्रसन्नता का अनुभव होता रहता है. ध्यान इस ऊर्जा को बढ़ाने का साधन है. 

जुड़ा रहे मन सदा सत्य से

२४ मई २०१७ 
स्व को एक क्षण के लिए भी भुलाना साधक के लिए उचित नहीं है. स्व का अर्थ है अस्तित्त्व के साथ एक होकर रहना, सहज होकर रहना और सजग होकर निरंतर कर्म में रहना. शरीर की हर कोशिका चेतना से ढकी है, यदि मन में नकारात्मक भावनाएं रहेंगी तो चेतना धूमिल हो जाएगी, चेतना जल की तरह है वह जिस पात्र में रखी जाती है उसका ही आकार ले लेती है. मन में हल्का सा भी तनाव हो तो चेतना पर आवरण छा जाता है और देह पर उसका असर होने लगता है. स्व की साधना में लगा हुआ साधक अपने जीवन को सजग होकर देखता है, इस देखने में ही मन शुद्ध होने लगता है, स्व मुखर हो जाता है. 

Tuesday, May 23, 2017

प्रकृति से जो जुड़ जाये

२३ मई २०१७ 
प्रकृति का हर रंग मनोहारी है. वर्षा की रिमझिम हो या या कोहरे से ढकी सुबह, रात की नीरवता हो या भरी दोपहरी में पंछियों के स्वर. प्रकृति के निकट रहने का अवसर जिसे मिलता है वह इसके जादू से अप्रभावित कैसे रह सकता है. प्रकृति माँ है, वह अन्नपूर्णा है, पोषित करती है और यह प्रकृति एक परम शक्ति की अध्यक्षता में कार्यरत है. वह समर्पित है, तभी सहज है. जितना-जितना मानव प्राकृतिक वातावरण से दूर रहने लगा है उसका नाता परमात्मा से भी कट सा गया है. उसकी प्रार्थनाएं भी अब सहज नहीं रह गयीं हैं. हरे-भरे खेतों में दौड़ लगाते, नीले आकाश की छाया में गुनगुनाते हुए कृषक बालक कितने मुक्त प्रतीत होते हैं. 

Sunday, May 21, 2017

भेद अभेद का राज जो जाने

२२ मई २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन शाश्वत तत्व हैं. ईश्वर ने जीव और प्रकृति दोनों को आच्छादित किया हुआ है. प्रकृति जीव के हित के लिए है. जीव दोनों पर आश्रित है, अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए वह प्रकृति पर आश्रित है तो आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर पर. कभी वह प्रकृति के आकर्षण में डूब जाता है और कभी दुःख पाने पर परमात्मा की ओर झुक जाता है. साधना के द्वारा जब वह अपनी प्रकृति से भिन्न अपनी स्वतंत्र सत्ता का अनुभव कर लेता है, और परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो उसके सारे संशय समाप्त हो जाते हैं.  

Thursday, May 18, 2017

जगे प्रार्थना ऐसी भीतर

१९ मई २०१७ 
जीवन सुखमय हो ऐसी कामना सभी करते हैं, हमारे अपनों के जीवन में सदा सुख, सम्पन्नता और स्वास्थ्य बना रहे, ऐसी भी प्रार्थना हम विशेष अवसरों पर करते हैं. इसी तरह हमें भी कितनी बार अन्यों ने सुख व स्वास्थ्य की कामनाएं भेजी हैं, भेजते ही रहते हैं,. क्या हमने कभी सोचा है इन सबका कितना बड़ा असर हमारे जीवन पर पड़ता है. दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी भी बेअसर नहीं जाती, और ऊर्जा के नियम के अनुसार भीतर से निकली हुई हर सकारात्मक ऊर्जा लौट कर हमारे ही पास आती है. ऋषि जब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का गायन करते थे तो उसमें उनके हृदय की सच्ची भावना जुड़ी होती थी, जो जगत के कल्याण हेतु अपना काम करती थी,  वह छोटी सी प्रार्थना लौट कर उन्हें कितना आनन्द से न भर जाती होगी. कितना अच्छा हो यदि रोज सुबह हम अपने लिए तो प्रार्थना करें या न करें स्वजनों, मित्रों और नगर, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण सृष्टि  के कल्याण की कामना से अपने दिन का आरम्भ करें.

योग सधे जर्रे जर्रे से

१८ मई २०१७ 
 नीले अम्बर में सहज उड़ान भरता पंछी कितना प्रफ्फुलित प्रतीत होता है, अपने पंखों पर जब वह अप्रयास तिरने लगता है तब लगता है कोई अदृश्य सत्ता उसे सहेजे है. उसके पंखों में कितनी ऊर्जा है और उसके उर में कितना उल्लास, इसी तरह कूकते हुए पंछी अपनी मस्ती में न जाने कितने गीत गाते हैं. उनके भीतर संगीत के ये सुर किसी अनजान स्रोत से आते हुए प्रतीत होते हैं. मानव इन सबसे अनजान अपने छोटे-छोटे सुखों-दुखों में खोया हुआ प्रकृति के उस स्पर्श से वंचित ही रह जाता है जो मानवेतर जीवों को सहज ही प्राप्त है. कोई मानव जब स्वयं को  कुदरत से एक कर लेता है, विश्व के साथ अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो सारी कायनात उसे अपने साथ नाचती हुई दिखती है. हमारी उर्जा का स्रोत भी अजर हो सकता है बशर्ते हमें उससे जुड़ना आ जाये. 

Tuesday, May 16, 2017

श्वास श्वास है नेमत उसकी

१६ मई २०१७ 
वेदों में ऋषियों ने कितनी सुंदर प्रार्थनाएं गायी हैं. मन जब प्रार्थना से भर जाता है तो शुद्ध होने लगता है. सबके सुख की कामना, सम्पन्नता की कामना जब भीतर सहज ही उठने लगती है तो हृदय मधुरता का अनुभव करता है. जीवन के उपहार को पाकर जो मन अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता के भाव से नहीं भरा वह परमात्मा के आनन्द से वंचित ही रह जाता है. जीवन में प्रेम को अनुभव करने के कोमल पल भी साधक के लिए उसे ही याद करने का निमित्त बन जाते हैं. प्रकृति के सुहाने मंजर हों या किसी के कंठ की मधुर आवाज, वर्षा की सोंधी सुगंध हो या उषा का आकाश, हर शै उसे याद दिलाने का सबब बन जाती है. धन्यता और कृतज्ञता का भाव जिसके हृदय में जग जाता है वह अंतर पल-पल प्रार्थना में लीन रहता है. 

Monday, May 15, 2017

भाव भरा जब अंतर होगा

१५ मई २०१७ 
ऋषि कहते आये हैं भाव यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी. 

Friday, May 12, 2017

गुरू चरणों में नमन सदा

१३ मई २०१७ 
सत्य के खोजी को यदि कोई सत्य का चितेरा मिल जाये तो उसका मार्ग सरल हो जाता है. सरल ही नहीं उसके मार्ग पर फूलों के वृक्ष उग आते हैं. उसकी प्यास बुझाने के लिए कलकल करते झरने भी बहने लगते हैं और सदा एक हाथ उसके सर पर महसूस होता है जो उसे मार्ग पर ही टिकाये रखता है. किसी की दृष्टि उसे मिली है, वह नजर उसे अपने पथपर सजग रखती है. जिसने उस पथ के सारे मोड़ देखे हैं, जो उस पथ के हर कंकर-पत्थर से परिचित है, ऐसा कोई सद्गुरू यदि जीवन में आता है तो जीवन एक उत्सव बन ही जाता है. सत्य की राह तब एक मदमाती ख़ुशबू लिए अपनी ओर बुलाती है. मन निर्भार होकर, निर्भ्रांत होकर सहज ही अपने भीतर होते परिवर्तनों को देखता है. सुख-दुःख आते हैं, परिस्थितियाँ आती हैं, कभी रोग भी सताते हैं पर सबका साक्षी बना मन एक उसी के चरणों में समर्पित रहता है. जिसे एक बार सत्य की झलक मिल जाती है वह इस पल-पल बदलती दुनिया में कमल की भांति असंग रहना सीख जाता है.

Thursday, May 11, 2017

जग जाये जब शक्ति भीतर

१२ मई २०१७ 
शास्त्रों में कहा गया है, मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है. यहाँ जिस मानव जन्म की बात कही गयी है वह केवल मनुष्य का शरीर धारण करने मात्र से नहीं मिल जाता.यदि कोई अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग केवल देह को बनाये रखने के लिए ही करता है अथवा केवल इन्द्रियों के सुखों की प्राप्ति के लिए ही करता है तो उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता. मानव के भीतर देवत्व को पाने की जो चाह छिपी है उसे जागृत करके उस मार्ग पर चलना ही सही अर्थों में उसे मानव बनाता है. एक बीज के रूप में सभी के भीतर जो आत्मशक्ति छिपी है, साधना और भक्ति के द्वारा उसे प्रकट कर सकना ही मानव जन्म को दुर्लभ बनाता है. मनुष्य होकर जो भय, क्रोध अथवा शोक पर विजय प्राप्त नहीं कर सका उसने अभी देवत्व की ओर यात्रा आरम्भ नहीं की अर्थात वह मानव होने के वास्तविक अर्थ से वंचित ही रह गया. 

चिर नूतन जगती का मेला

११ मई २०१७ 
अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये. इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में, व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !  

Monday, May 8, 2017

मन जो लौट गया निज घर में

८ मई २०१७ 
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के  लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए. 

Thursday, April 27, 2017

तेरा तुझको अर्पण

२८ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों में दान की महिमा यूँ ही नहीं गाई गयी है. देने का भाव जिसके मन में जगता है वह देवत्व की और कदम बढ़ाने लगता है. प्रकृति इतनी प्रिय क्यों लगती है क्यों कि वह निरंतर लुटा रही है. नन्हे बच्चे सहज ही मुस्कान बांटते रहते हैं. पालतू पशु निस्वार्थ प्रेम लुटाते रहते हैं. संत जो समाज को सिर्फ देते ही देते हैं, सबके आदर के पात्र बन जाते हैं. तन, मन धन किसी भी प्रकार से हमें इस जगत  में कुछ देने का भाव रखना है. हाथों से सेवा न भी कर सकें तो वाणी से अथवा सद्विचारों के रूप  में मानसिक सेवा भी कर सकते हैं. ऐसा करने से सबसे बड़ा लाभ हमारा होता है, वस्तुओं के प्रति आसक्ति घटती है, मन खाली होता है और परमात्मा की कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है. जो खाली है, वही तो भरा जायेगा. हरेक के पास जगत को देने के लिए बहुत कुछ है, बल्कि जो कुछ हमारे पास है वह जगत से ही मिला है तो उसी की वस्तु उसी को लौटा देनी है और मुक्त भाव से इस जगत में विहार करना है.  

भरा हुआ है जो खाली

२७ अप्रैल २०१७ 
हम स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं , अपना आप इतना छोटा लगता है कि कुछ करके उसे भरना चाहते हैं. हमारे कृत्य उस खालीपन को भरने के लिए हैं न कि इस जगत को समृद्ध बनाने के लिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम स्वयं को जानते नहीं, अपने भीतर के उस खालीपन को भी नहीं जानते, जिसमें अपार सम्भावनाएं छिपी हैं . एक बार जो स्वयं को न कुछ होना स्वीकार लेता है जो वास्तव में सत्य है, तत्क्षण उसके जीवन में पूर्णता का अनुभव होने लगता है, कुछ नहीं को कुछ नहीं से ही भरा जा सकता है. इस ब्रहमांड  में जो दिखाई देता है वह अदृश्य की तुलना में बहुत थोड़ा है. सूक्ष्म स्थूल से ज्यादा बलशाली है. हमारा खालीपन ही वास्तव में हमारी संपदा है और उसी से हम भागते हैं, यही तो माया है. 

Tuesday, April 25, 2017

बहता जाये मन नदिया सा

२६ अप्रैल २०१७ 
प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों को हम आसानी से स्वीकार लेते हैं. उसके अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं. सर्दी और गर्मी से बचने के कितने ही साधन मानव ने खोज निकाले हैं. देह भी प्रकृति का ही अंश है और मन भी, देह भी सदा एक सी नहीं रहने वाली और मन तो पल-पल में बदलता है. जैसे स्वयं का मन बदलता है वैसे ही अन्यों का भी. किसी के प्रति कोई धारणा बनाकर उसी के अनुसार उससे व्यवहार करना वैसा ही है जैसे ग्रीष्म ऋतु के चले जाने पर भी सूती वस्त्र ही पहनने का आग्रह रखना. जैसे रुका हुआ पानी पीने लायक नहीं रहता वैसे ही रुका हुआ मन यानि की पूर्वाग्रहों से युक्त मन भी मैत्री,  करुणा व मुदिता के मार्ग पर नहीं चल सकता. जगत के प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव हमें जड़ता से मुक्त रखता है. अंतर में जगी करुणा ह्रदय को कोमल बनाये रखती है और मुदिता तो वह आभूषण है जो हर हाल में हमें सौन्दर्य प्रदान करता है. 

Monday, April 24, 2017

स्रोत ऊर्जा का हो विकसित

 २५ अप्रैल २०१७ 
जीवन हमें नित नई चुनौतियाँ देता है, नये अवसर देता है, वह हर पल नये नये मार्ग सुझाता है, यदि हम नये को स्वीकारने में झिझकते हैं और उसी पुराने रास्तों  पर चलते रहते हैं तो जीवन वैसा ही बना रहता है. उसमें कोई सकारात्मक परिवर्तन आ ही नहीं सकता. प्रकृति शाश्वत होते भी नित नूतन है क्योंकि वह विरोध से घबराती नहीं, वह हर पल को वैसा ही स्वीकारती है और अपनी ऊर्जा को विरोध में नहीं विकास में खर्च करती है. हमारी ऊर्जा नकार में व्यर्थ ही जाती है और कई बार तो हम केवल अहंकार के कारण ही अपनी बात को गलत जानते हुए भी उस पर अड़े रहते हैं. कोई भी नकारात्मक भाव हमारी ऊर्जा के स्रोत को झुलसाने का काम करता है और सहजता व स्वीकार उसे पनपने का अवसर देता है. परमात्मा सहज भाव से हमें स्वीकार रहा है हर पल वह हमारे साथ है और यदि उसकी तरह हम भी जीवन को सहज ही खिलने का अवसर दें तो आनंद हमारा स्वभाव बन जायेगा.

Sunday, April 23, 2017

सुख भी जब बाधा बन जाये

२४ अप्रैल २०१७ 
हर व्यक्ति की आंतरिक पुकार एक ही है. सभी सुख और शांति का जीवन जीना चाहते हैं. सभी स्वस्थ रहना और सम्पन्न रहना भी चाहते हैं. सभी समाज में अपना सम्मान हुआ देखना चाहते हैं. इन्हीं को शास्त्रों में वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा और यशेष्णा के नाम से कहा गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि इन तीन एषनाओं के रहते कोई पूर्ण रूप से दुखों से मुक्त हो ही नहीं सकता. इसका अर्थ हुआ सुख की इच्छा ही दुःख का कारण बनती है, किसी भी तरह का अभाव भी दुःख है, सम्मान की आकांक्षा ही अपमान का बीज बो देती है. जब तक यह कटु सत्य हमें स्वीकार नहीं है तब तक हम सुख-दुःख के डोले में झूलते ही रहेंगे और हर सुख अपने पीछे एक दुःख की एक लंबी कहानी छिपाए होगा अथवा तो भविष्य में लायेगा. जब मन खाली हो, जीवन अपने असली रूप में सामने आता है. जब कोई चाह मन को नहीं सताती तब यह अपने मूल से जुड़ा रहने में ही आनंद का अनुभव करता है.

Saturday, April 22, 2017

मुक्त यहाँ स्वयं से ही होना

२३ अप्रैल २०१७ 
अपने ही संस्कारों में बंधे-बंधे हम जीवन को एक संघर्ष बना लेते हैं. हमें अच्छी तरह ज्ञात है, हमारे लिए कैसा भोजन उचित है, किस मात्रा में उचित है पर संस्कार वश उसी भोजन को हम ग्रहण करते हैं जो आज तक करते आ रहे हैं और जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. क्रोध करने से सदा ही हानि उठायी है पर संस्कार वश उन्हीं  बातों पर पुनः-पुनः झुंझला जाते हैं. यही तो बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है जिसे साधना के द्वारा हमें खोलना है. अपने ही मन के बनाये जाल को तोडकर भीतर एक ऐसी शुद्ध सत्ता को जन्म देना है जो किसी भी तरह के आग्रह से मुक्त हो, जो सहज ही अपना हित चाहने वाली हो, जिससे अहित होने का कोई डर ही न रहे, अन्यथा हम स्वयं ही अपने शत्रु बन जायेंगे और दोष भाग्य अथवा परिस्थिति पर ड़ाल देंगे. स्वयं के हर भाव, विचार और कर्म की जिम्मेदारी लिए बिना हम मनुष्य होने के अधिकारी नहीं हो सकते. 

Thursday, April 20, 2017

मुक्त हुआ मन कब डोले

२१ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों के अनुसार अनंत जन्मों के हमारे संचित कर्मों में से थोड़ा सा प्रारब्ध कर्म लेकर हम इस दुनिया में आते हैं. जिनके अनुसार जन्म, आयु, सुख-दुःख आदि हमें मिलते हैं. जब तक यह ज्ञान नहीं होता कि मनसा, वाचा, कर्मणा हर कर्म का फल मिलने ही वाला है, हम नये-नये कर्म बांधते चले जाते हैं, जिनका हिसाब चुकाना ही होगा. एक बार यह ज्ञान हो जाने के बाद हमें केवल पुराने कर्मों का हिसाब पूरा करना है. स्वयं को सदा मुक्त अनुभव करने के लिए कर्मों के जाल से छूटना ही एक मात्र उपाय है. जीवन में कैसी भी परिस्थिति आये मन को समता भाव में रहकर उससे पार हो जाना ही कर्मों से छूटना है, अन्यथा भविष्य के लिए एक नया बीज बो दिया जायेगा. जिस किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के साथ राग अथवा द्वेष का भाव मन में रहता है, उसका सही मूल्यांकन हम कभी नहीं कर सकते. राग अथवा द्वेष बुद्धि को धूमिल कर देते हैं और हम अनजाने ही नई रस्सियों में जकड़े जाते हैं. 

Tuesday, April 18, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

१९ अप्रैल २०१७ 
यह संसार हमें मिला है ताकि हम त्रिविध दुखों से बच सकें. आदिभौतिक, आदिदैविक व आध्यात्मिक दुखों से पूर्ण मुक्ति के लिए ही यह जीवन हमें मिला है. जब तक यह ज्ञान हमें नहीं है, तब तक हम नये-नये दुखों का निर्माण करते रहते हैं. पतंजलि के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश इन पंच क्लेशों से घिरे रहकर हम कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकते. अविद्या का अर्थ है अनात्म को आत्म मानना, अर्थात जो हम नहीं हैं उसे अपना स्वरूप मानना. अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध मानना, दुःख को सुख मानना भी अविद्या है. अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। दूसरे शब्दों में अविद्या भ्रांत ज्ञान है. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को अर्थात्‌ अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक मान लेना. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग है. चौथा क्लेश द्वेष है। दु:ख या दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है। क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को अनुचित अथवा अपने प्रतिकूल मान लेते हैं। जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश सभी को समान रूप से होता है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरंजीवी रहे। इसी जिजीविषा के वशीभूत होकर हम न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करते है और विचार न कर पाने के कारण नित्य नए क्लेशों में बँधते जाते हैं।



Sunday, April 16, 2017

समता की जब करें साधना

१७ अप्रैल २०१७ 
बीज एक है पर उसी से तना, डालियाँ, पत्ते, कलियाँ, फल व फूल प्रकट होते हैं, ऐसे ही जगत में विविधता है पर एक ही ऊर्जा देह और मन के माध्यम से प्रकट हो रही है. बीज यदि संक्रमित हो तो पौधा भी रोगग्रस्त होगा, अथवा तो पौधे को उचित जलवायु न मिले तो भी वह स्वस्थ नहीं होगा. इसी तरह ऊर्जा यदि नकारात्मक हुई अथवा उसको प्रकट होने का उचित माध्यम नहीं मिला तो जीवन स्वस्थ नहीं रह सकता. ऊर्जा को ऊपर से नीचे बहने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, नीचे गिरना सहज ही होता है पर ऊपर ऊठने के लिए प्रयास चाहिए, इसे ही हमारे शास्त्रों में पुरुषार्थ कहा गया है. मन यदि समता में रहता है तो ऊर्जा सहज ही ऊर्ध्वगामी होती है. सजगता ही इसका साधन है, सजगता बनी रहे इसके लिए ही आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि का विधान है. 

Friday, April 7, 2017

सारा जग अपना लागे जब

७ अप्रैल २०१७ 
'विभिन्नता में एकता' का सूत्र जितना हमारे देश की मूल भावना को दर्शाता है उतना ही मानव और प्राणी जगत की आंतरिक एकता को भी. ऊपर-ऊपर से जितना भेद दिखाई देता है, भीतर-भीतर उतना ही साम्य छिपा है. जैसे एक वृक्ष है उसकी डालियाँ और तना निकट के वृक्ष से पृथक हैं पर धरती के भीतर दोनों की जड़ें आपस में किस तरह घुल-मिल जाती हैं कि कोई भेद नजर नहीं आता. साथ ही जो हवा और प्रकाश एक की पत्तियां ग्रहण करती हैं दूसरे की भी वही. उनमें एक तरह की समानता सदा ही है, मनुष्य -मनुष्य के मध्य भी सूक्ष्म स्तर पर देखा जाये तो हवा और प्रकाश के साथ-साथ विचार की तरंगे बिना रोक-टोक एकदूसरे में प्रवेश करती हैं. चेतना का गुण-धर्म एक जैसा ही है, चाहे वह किसी के भीतर ही क्यों न हो. ध्यान में जब इसका अनुभव साधक को हो जाता है एक आत्मीयता की भावना भीतर भर जाती है. एक अपनापन जो जगत के प्राणीमात्र के प्रति प्रकट होने लगता है. 

Thursday, April 6, 2017

निज हाथों में मन की डोर

६ अप्रैल २०१७ 
आत्मा सागर है और मन उसमें उठने वाली तरंगें, आत्मा आकाश है, मन उसमें तिरने वाले बादल. आत्मा कच्चा माल है और मन उसका उत्पादन..हम किसी भी तरह से सोचें अस्तित्त्व और हमारे मध्य कोई न कोई संबंध देख ही सकते हैं. ऐसा संबंध जो हमने नहीं बनाया है जो सदा से है. हम इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं कि मन को कैसा मानें, तरंगों की भांति जिस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं, बादलों की भांति जो आते हैं और चले जाते हैं, अथवा तो स्वयं के पूर्ण नियन्त्रण में बनने वाले उत्पाद के रूप में. स्वयं को आत्मा जानकर जब  हम अपने विचारों को गढ़ते हैं, उन्हें सजाना-संवारना हमारे हाथ में होता है. हर विचार एक बीज है और हर बीज  कर्म रूप में वृक्ष  बनेगा जिस पर फल भी लगेंगे और नये बीज भी बनेंगे, जो बिलकुल वैसे ही होंगे जैसा बीज था. इसका अर्थ हुआ हमारा भाग्य हमारे विचारों का ही प्रतिफल है. 

Tuesday, April 4, 2017

जीवन बन मुस्कान बंटे

५ अप्रैल २०१७ 
जीवन क्या है, इसकी समझ आते-आते ही आती है,  कभी कभी तो मृत्यु के द्वार पर जाकर ही आती है, किन्तु उस समय उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. नया शरीर पाकर फिर दुनिया की रंग रलियों में उलझ कर मन रह जाता है और जीवन से मुलाकात ही नहीं हो पाती. जिसे आमतौर पर हम जीवन कहते हैं, वह तो एक बंधी-बंधायी दिनचर्या है, क्रिया और प्रतिक्रिया का एक निरंतर चल रहा खेल है. मन एक तरह से सोचना सीख जाता है और तमाम उम्र उन्हीं दायरों में खुद को कैद कर सुरक्षित होने का भ्रम पाल लेता है. जीवन का गीत अनगाया ही रह जाता है. प्रकृति को निकट से देखें तो प्रतिपल जीवंतता का अनुभव होता है, शिशु और पशु-पक्षी भी एक तरह से जीवन के अत्यंत निकट होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि शिशु को विकसित नहीं होना है या मानव को पशु और प्रकृति में फिर से लौट जाना है. जीवन को एक विशाल दृष्टिकोण से देखना है, मानव की भूमिका व उसकी महत्ता को अनुभव करना है. जैसे प्रकृति, प्राणी व शिशु सहज ही तृप्त हैं, वैसे ही हर मनुष्य यदि भीतर एक तृप्ति का अनुभव करे तो विकास के नाम पर अनावश्यक दोहन नहीं होगा. विकास करके मानव सुख ही तो पाना चाहता है, पर दुःख के साधन बढाये चला जाता है, जीवन स्वयं मुस्कुराने और जगत में मुस्कुराहट बांटने के लिए है यह भाव जगते ही सारे अभाव नष्ट हो जाते हैं.

'मैं' के पार वही बसता है

४ अप्रैल २०१७ 
परम तक जाने के दो ही मार्ग हैं, एक ज्ञान का मार्ग दूसरा प्रेम का मार्ग ! यह भेद आरम्भ में ही होता है, मंजिल पर जाकर दोनों मिल जाते हैं . ज्ञान का मार्ग संकल्प का मार्ग है, स्वयं को देह से अलग मानकर धीरे-धीरे श्वास, मन, व बुद्धि से भी अलग करते जाना है ताकि शुद्ध चेतना ही बचे, जहाँ केवल एक रहता है वहाँ परमात्मा ही रहता है. प्रेम का मार्ग कहता है परमात्मा के सिवा कुछ है ही नहीं, वहाँ आत्मा जगत के हर रूप में परमात्मा को ही देखती है. तब 'मैं' मिट जाता है, 'मैं' मिटते ही परम प्रकट हो जाता है. किसी भी मार्ग से चलें अहंकार को मिटाए बिना सत्य का अनुभव नहीं होता. 

Monday, April 3, 2017

एक का होना जाना जिसने

३ अप्रैल २०१७ 
सभी धर्म यह स्वीकार करते हैं कि परमात्मा एक है.एक ही सत्ता से यह सारी सृष्टि अस्तित्त्व में आयी है. एक का विस्तार हुआ तो अनेक हुए, अब ध्यान में जाकर जब साधक जगत को मन में, मन को बुद्द्धि में,  बुद्धि को स्वयं में ठहरा लेता है तो कुछ काल के पश्चात स्वयं अपने आपको परमात्मा में ही स्थित पाता है. एक से अनेक को पहचान के फिर अनेक से एक होना ही ध्यान है. उस क्षण किसी के साथ कोई भेद नहीं रह जाता, एक सहज विश्वास से अंतर पूरित हो जाता है और ध्यान से बाहर आने के बाद भी देर तक उस एकत्व की ख़ुशबू मन व देह में समोई रहती है. ध्यानी के लिए न कोई स्पर्धा शेष रहती है न ही कोई प्रतिद्वन्द्वी, सारा जगत जब अपना ही विस्तार ज्ञात होने लगे तो कैसी दौड़ और कैसा आग्रह. पहली बार तब सृष्टि एक नयी नवेली आभा बिखेरती हुई नजर आती है जिसका उद्देश्य ऊर्जा का सहज स्फुरण मात्र है. तन और मन जब प्राणवान होते हैं आनंद सहज ही प्रकट होता है. 

Friday, March 31, 2017

सुख-दुःख सब स्वयं ही रच डाला

३१ मार्च २०१७ 
मानव के दुःख का हल उस क्षण से निकलने लगता है जब वह दुःख को दुःख रूप में जान लेता है. जब तक हम दुःख को जीवन का एक सामान्य अंग समझ कर स्वीकारते रहते हैं, दुःख भी साथ-साथ चलता रहता है. बीच-बीच में ख़ुशी के क्षण भी आते हैं और न भी हों तो एक उम्मीद भीतर लगी रहती है, कि एक न दिन सब ठीक हो जायेगा. जिस क्षण भी कोई यह तय कर लेता है कि आज के बाद जगत किसी भी बात के लिए दुखी नहीं कर सकता उसके जीवन से ऐसी परिस्थितियाँ ही विदा लेने लगती हैं. यह जगत हमारी ही प्रतिध्वनि है, हमारी भीतरी आकांक्षा ही जीवन में प्रतिफलित होती है. मन की गहराई से जिसको भी हम चाहते हैं वही जीवन में किसी न किसी माध्यम से प्रकट होने लगता है. भीतर यदि पीड़ा है, क्रोध है, लोभ है तो जीवन में वैसी ही घटनाएँ होने लगती  हैं. किसी ने सच कहा है हमारा भाग्य हमारे ही हाथों में है.

Thursday, March 30, 2017

तू छुप न सकेगा परमात्मा !

३० मार्च २०१७ 
आज आकाश ढका है बादलों से, पर बादलों के पार भी जो झांक सकता है, उसके लिए नीला शुभ्र आकाश उतना ही सत्य है जितना यह बदली भरा आकाश, बल्कि इससे भी अधिक सत्य क्योंकि यह बादल तो आज नहीं कल बरस कर रीते हो जायेंगे. इसी तरह जो देह के पीछे छिपे चिन्मय तत्व को देख सकता है उसके लिए देह का रहना  या न रहना अर्थहीन हो जाता है, क्योंकि जो सदा है वह उसकी दृष्टि से कभी ओझल ही नहीं होता,  जगत का कार्य-व्यवहार उसे क्रीड़ा मात्र ही प्रतीत होता है, और उसके पीछे छिपा निरंजन ही सत्य जान पड़ता है. बादल कितने भी घने हों एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे, इसी तरह भीतर का चैतन्य मन की धारणाओं, वासनाओं और कामनाओं से कितना भी क्यों न छिप गया हो, कभी मिटता नहीं. इस सत्य को स्वीकार करके उसे अपना अनुभव बनाना ही साधक का लक्ष्य है.  

Monday, March 27, 2017

भीतर का आकाश मिले जब

२८ मार्च २०१७ 
एक शिशु अपने भीतर खाली आकाश जैसा मन लेकर पैदा होता है. वह सहज ही प्रसन्न होता है, यदि रोता भी है तो किसी न किसी कारण वश और जब कारण दूर हो जाये तो वह पल में हँसने लगता है. जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसका मन भरता जाता है. वस्तुओं, घटनाओं, सूचनाओं, संबंधों की एक कई परतें उसके अंतर आकाश को भरने लगती हैं, सहजता खोने लगती है. यदि घर का वातावरण सात्विक है, सुबह सवेरे भजन आदि कानों में पड़ते हैं, व्रत-उत्सव पर घर में ध्यान पूजा होती है, प्रकृति का सान्निध्य उसे प्राप्त होता है तो  मन को खाली होने का अवसर मिलता रहता है, और वह पुनः-पुनः नया होकर जीवन का अनुभव करता है. किन्तु आज के व्यस्त माहौल में किसी के पास आराम से बैठकर साधना करने का समय नहीं है.  मन को विसर्जित होने का समय  ही नहीं मिलता तब तनाव केअलावा क्या होगा. जिसे जीवन का सबसे सुंदर समय माना गया था, उस अध्ययन काल में  आज विद्यार्थी भी तनाव के शिकार हो रहे हैं, हम बड़ों को ही बैठकर  इसका समाधान खोजना होगा, जीवन में आत्मज्ञान को उसका स्थान देना होगा ताकि मन अपने मूल से जुड़ा रहे और हम बेवजह ही दुःख को अपना साथी न बनाएं.

Sunday, March 26, 2017

जग जैसा वैसा दिख जाये

२७ मार्च २०१७ 
जीवन के प्रति हमारा जैसा भाव होगा जीवन उसी रूप में हमें मिलता है. किसी ने कितना सत्य कहा है “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि”. हमारी धारणाएं व मान्यताएं ही जीवन में मिलने वाले अनुभवों को परखने का मापदंड बनती हैं. जिस क्षण हमारा मन किसी भी धारणा से मुक्त होता है जीवन अपने शुद्ध रूप में नजर आता है. सृष्टि की भव्यता, दिव्यता और विशालता से हमारा परिचय होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर उस सम्भावना को छिपाए है जो उसे स्वयं के निर्भ्रांत स्वरूप से मिला सकती है. हम अपनी ही मान्यताओं के कारण जगत को बंधन बनाकर बंधे-बंधे अनुभव करते हैं. जबकि मुक्तता हमारा सहज स्वभाव है और हमारी मूलभूत आवश्यकता भी.

Saturday, March 25, 2017

निजता को जो पा जाये

२५ मार्च २०१७ 
हम जीवन को बाहर-बाहर से कितना सजाते हैं. सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं. धन, पद, संबंध और सम्मान में सुरक्षा खोजते हैं. किन्तु ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि जीवन किसी भी क्षण बिखर सकता है. जीवन की नींव पानी की धार पर रखी है. हम अहंकार को जितना-जितना बढ़ाते जाते हैं उतना-उतना स्वयं से दूर निकल जाते हैं, स्वयं से दूर जाते ही हम जगत से भी दूर हो जाते हैं. अहंकार की परिणिति एक अकेलापन है और स्वय के पास आने का फल इस ब्रह्मांड से एकता का अनुभव होता है. हमें लगता है अहंकार हमें हमारी पहचान देता है, पर हमारी निजता उसी क्षण प्रकट होती है जब हम अहंकार से मुक्त हो जाते हैं. हमें हमारा वास्तविक परिचय तभी मिलता है जब भीतर परम का प्राकट्य होता है. उसी के प्रकाश में एक नये तरह के जीवन का स्वाद मिलता है, जिसमें न किसी अतीत का भार है न ही भविष्य की योजनायें. पल-पल हृदय वर्तमान के लघुपथ पर गुनगुनाता हुआ स्वयं को धन्य महसूस करता है. 

Thursday, March 23, 2017

नव जीवन पल पल मिलता है

२४ मार्च २०१७ 
हम जहाँ हैं वहाँ नहीं होते, तभी परम के दरस नहीं होते
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते

स्मृति और कल्पना इन दोनों के मध्य ही निरंतर हमारा मन डोलता रहता है. अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना. हम वर्तमान में टिकते ही नहीं, हमारे वर्तमान के कर्म भी अतीत के किसी कर्म द्वारा पड़े संस्कार से प्रेरित होते हैं अथवा तो भविष्य की किसी कल्पना से. जीवन में कोई नयापन नहीं बल्कि एक दोहराव नजर आता है, जिससे नीरसता पैदा होती है, जबकि जीवन पल-पल बदल रहा है, जिसे देखने के लिए मन को बिलकुल खाली होना पड़ेगा, हर सुबह तब एक नया संदेश लेकर आएगी और हर रात्रि कुछ नया स्वप्न दिखाएगी. अभी तो हमारे स्वप्न भी वही-वही होते हैं. हमारे अधिकतर कर्म प्रतिक्रिया स्वरूप होते हैं, चाहे वे भौतिक हों या मानसिक.  

Wednesday, March 22, 2017

श्रम में ही विश्राम छुपा है

२३ मार्च २०१७ 
सृष्टि में जैसे दिन-रात का चक्र अनवरत चल रहा है, अर्थात श्रम और विश्राम के लिए नियत समय दिया गया है, वैसे ही साधक के लिए प्रवृत्ति और निवृत्ति का विधान किया गया है. ध्यान का समय ऐसा हो जब दोनों तरह की  इन्द्रियां अर्थात कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ  बाहरी विषयों से स्वयं को निवृत्त कर लें, मन में कोई इच्छा न रहे, बुद्धि हर जिज्ञासा को परे रख दे, आत्मा स्वयं में ठहर जाए. ध्यान में मिले पूर्ण विश्राम के पश्चात जब कार्य में प्रवृत्त होने का समय आये तो ऊर्जा स्वतः ही प्रस्फुटित होगी. कर्म तब फल की इच्छा के लिए नहीं होगा बल्कि जो ऊर्जा ध्यान में भीतर जगी है, उसके सहज प्रकटीकरण के लिए होगा. इसीलिए हमारे शास्त्रों में  सन्धया करने के विधान का  विवरण मिलता है, दिन में कम से कम दो बार साधक शान्त होकर बाहरी जगत से निवृत्त हो जाये, तो जिस तरह दिन-रात सहज ही बदलते हैं, कर्म और विश्राम सहज ही घटेंगे. 

Tuesday, March 21, 2017

होना भर ही जब आ जाये

२२ मार्च २०१७ 
हम स्वयं को उस क्षण सीमित कर  लेते हैं जब केवल उपाधियों को ही अपना होना मान लेते हैं.  आज हर कोई अपनी पहचान बनाने में लगा है, वह जगत के सामने स्वयं को कुछ साबित कर के अपनी पहचान बनाना चाहता है, मानव यह भूल जाता है यह पहचान उसे अपने वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर ले जाती है. कोई अध्यापक तभी तक अध्यापक है जब तक वह कक्षा में पढ़ा रहा है, कोई वकील तभी तक वकील है, जब वह मुकदमा लड़ रहा है, किन्तु उसके अतिरिक्त समय में वह कौन है, हम कितनी भी उपाधियाँ एकत्र कर लें, भीतर एक खालीपन रह ही जाता है . बाहर की उपाधियाँ चाहे हमें  बौद्धिक व भावनात्मक सुरक्षा भी दे दें, किन्तु उसके बाद भी हमारी तलाश खत्म नहीं होती जब तक हमें अपनी अस्तित्त्वगत पहचान नहीं होती. जब हम स्वयं को मात्र होने में ही स्वीकार कर लेते हैं, उस क्षण भीतर एक सहजता का जन्म होता है, अब सारा जगत अपना घर लगने लगता है.

Monday, March 20, 2017

कौन यहाँ किसकी खातिर है

२० मार्च २०१७ 
हमने कितनी बार ये शब्द सुने हैं - 'कोई जीने के लिए आहार लेता है कोई खाने के लिए ही जीता है'. इसी तरह कोई कहता है आत्मा देह के लिए है और कोई कह सकता है देह आत्मा के लिए है. यदि हम यह मानते हैं कि भोजन देह धारण के लिए है तो हमारा भोजन संतुलित होगा, देह को आलस्य से नहीं भरेगा, स्वस्थ रखने में सहायक होगा. यदि हम भोजन के लिए ही जीते हैं तो सारा ध्यान भोजन के स्वाद पर होगा, आवश्यकता से अधिक भी खाया जा  सकता है. इसी तरह यदि हम यह मानते हैं देह आत्मा के लिए है तो हम आत्मा को पुष्ट करने वाले सात्विकआहार ही देह को देंगे, आहार में पाँचों इन्द्रियों से ग्रहण करने वाले सभी विषयों को लिया जा सकता है. अर्थात देखना, सुनना, खाना, सूँघना, स्पर्श करना सभी आत्मा का हित करने वाले होंगे. दूसरी ओर जब आत्मा को देह के लिए मानते हैं तो मन व इन्द्रियों को तुष्ट करना ही एकमात्र ध्येय रह जाता है. आत्मा की सारी ऊर्जा देह को सुखी करने में ही लगती रहती है और हम आत्मा के सहज गुणों को अनुभव ही नहीं कर पाते, 

Saturday, March 11, 2017

रंग चढ़े न दूजा कोई

१२ मार्च २०१७ 
होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता  है तो परम  उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.

Friday, March 10, 2017

जब जीवन उत्सव बन जाये

११ मार्च २०१७
आजतक न जाने कितने लेखकों, कवियों और विचारकों ने जीवन की परिभाषा की है, पर कोई उसे पूर्णतया परिभाषित नहीं कर पाया. संतों ने जीवन की एक नई परिभाषा दी है, जीवन एक उत्सव है, परिभाषा कोई भी हो, कितनी भी अच्छी हो,  जब तक वह हमारे लिए सत्य नहीं है, जीवन अपरिभाषित ही रह जाता है. एक सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन एक संघर्ष है, विद्यार्थी के लिए जीवन सतत् श्रम है. भक्त के लिए जीवन पूजा है, ज्ञानी के लिए जीवन उत्सव है. उनके लिए उत्सव का अर्थ है, आनंदित होना व आनंद फैलाना. ऐसा आनंद जो कहीं से लाना भी नहीं है, स्वतः स्फूर्त है, जो सहज ही है उसे फैलाने का भी प्रयास नहीं करना है, वह फूल की खुशबू की तरह बिखरने ही वाला है. हम कोई उत्सव मनाते हैं तो कितना आयोजन करते हैं, अचछे वस्त्र, फल-फूल, मिठाई का प्रबंध कर मित्रों को बुलाते हैं, और तब परिणाम रूप में आनंदित होते हैं, लेकिन संत कहते हैं, जीवन उत्सव है तो ये सब आयोजन तो उसका परिणाम है, आनंदित व्यक्ति सबके साथ ऐश्वर्य बाँटना ही चाहता है. 

Thursday, March 9, 2017

ममेवांशो जीवलोका:

१० मार्च २०१७ 
कबीर ने कहा है, कोई सागर को स्याही बना ले और सारे वनों की कलम बना ले तब भी उस परमात्मा का बखान नहीं कर सकता. कृष्ण कहते हैं, मैं अपने एक अंश में इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करता हूँ. आज के वैज्ञानिक भी कहते हैं जो दिखाई देता है वह उस न दिखाई देने वाले की तुलना में अति सूक्ष्म है. हमारी बुद्धि चकरा जाती है यह सोचकर कि अरबों, खरबों  गैलेक्सी भी उस अनंत के सामने कुछ नहीं. इस विशाल सृष्टि में मानव का स्थान कितना छोटा है पर उसके भीतर जो चैतन्य है वह उसी परमात्मा का अंश है, राजा कितना भी बड़ा हो, उसके पुत्र के लिए वह सदा सुलभ है, ऐसे ही परमात्मा कितना भी महान हो मानव के लिए वह हर क्षण उपलब्ध है. मानव जन्म का इसीलिए इतना गौरव गाया गया है. हमारा मूल बना है उसी तत्व से जिससे वह बना है. प्रेम, शांति, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, सुख और आनंद हमारा मूल स्वभाव है, तभी तो इससे विपरीत होते ही हम व्याकुल हो जाते हैं. जितना-जितना हम अपने मूल से दूर चले जाते हैं, दुःख को प्राप्त होते हैं. 

Wednesday, March 8, 2017

भीतर जब एकांत बढ़े

९ मार्च २०१७ 
शास्त्र व संत कहते हैं हमारे अस्तित्त्व  के सात स्तर हैं, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, संस्कार, अहंकार तथा आत्मा. एक-एक कर इन सोपानों पर चढ़ते हुए हमें परमात्मा तक पहुँचना है. समान ही समान से मिल सकता है इस नियम के अनुसार केवल आत्मा ही परमात्मा से मिल सकता है. इसका अर्थ हुआ पहले हमें आत्मा तक पहुँचना है, योग साधना के द्वारा पहले देह को स्वस्थ करना है, व्याधिग्रस्त देह के द्वारा समाधि का अभ्यास नहीं किया जा सकता. प्राणायाम के द्वारा प्राणों को बलिष्ठ बनाना है. स्वाध्याय तथा ज्ञान  के द्वारा मन व बुद्धि को निर्मल करना है, ध्यान के द्वारा संस्कारों को शुद्ध करना है. उस अहंकार को समर्पित कर देना है जो परमात्मा से दूर किये रहता है. इस तरह धीरे-धीरे भीतर एकांत बढ़ता जाता है जहाँ पहले पहल आत्मा स्वयं से परिचित होती है, और फिर जब वह अपने पार देखती है परमात्मा ही परमात्मा उसे चारों ओर से घेरे है. 

Tuesday, March 7, 2017

निज अनुभव जब उसे बना लें

८ मार्च २०१७ 
घोर अंधकार में जब हाथ को हाथ नहीं सूझता हो, अचानक तेज बिजली चमक जाये तो पल भर को सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है. जीवन यात्रा में चलते समय भी जब कभी ऐसा समय आता है कि कुछ नहीं सूझता, तब अचानक किसी हृदय की गहराई से निकला हुआ कोई सूत्र  वस्तुओं को स्पष्ट दिखा देता है. सत्य ऐसा ही होता है, वह राह दिखाता है, समाधान करता है, सत्य का अभ्यास नहीं करना होता, सत्य को अनुभव करना होता है और वह तब तक नहीं होता जब तक अनुकूल परिस्थिति न आ गयी हो. उसके पहले हम बौद्धिक रूप से कितना ही दोहराते रहें पर जब तक कोई सत्य हमने स्वयं अनुभव नहीं किया हमारे लिए वह सार्थक नहीं हो पाता. हम सभी कहते हैं जीवन क्षणिक है, यहाँ सब कुछ पल-पल बदल रहा है, पर ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदा के लिए यहाँ रहना हो, संग्रह करने की प्रवृत्ति हमें देने के अतुलनीय सुख से वंचित रखती है. देह मिटने वाली है यह कहते हुए भी सुबह से शाम तक हम देह का ही ध्यान रखते हैं, जैसे कोई व्यक्ति कार का ही ध्यान रखे पर ड्राइवर को उपेक्षित  रखे, ऐसे ही हम देह को तो पूरा आराम देते हैं पर मन को विश्राम नहीं देते. ज्ञान का सम्मान करने से ही जीवन उस ज्ञान का साक्षी बनता है. 

Monday, March 6, 2017

बनें साक्षी हर द्वंद्व के

७ मार्च २०१७ 
जीवन द्वंद्वों से गुंथा है, दिन-रात, सुबह-शाम, धरा-आकाश, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख, अपना-पराया कितने सारे जोड़े हैं जिनसे हम प्रतिदिन दो-चार होते हैं. हमारी कठिनाई यही है कि हम सुख चाहते हैं, दुःख नहीं, स्वर्ग के गीत गाते हैं नर्क से मुँह फेरते हैं, अपनों के लिए आँखें  बिछाते हैं, पराये से कोई मतलब नहीं, पर जीवन ऐसा होने नहीं देता, वह सदा जोड़ों में ही मिलता है. हर सुख की कीमत दुःख के रूप में देर-सवेर चुकानी ही है. स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर ही गुजरता है. कोई अपना कब पराया बन जायेगा पता ही नहीं चलता. क्या  इसका अर्थ हुआ कि जीवन हमें छल रहा है ? नहीं, जीवन हमें द्वन्द्व से पार जाने का  एक अवसर दे रहा है, क्योंकि  उसके पार ही ही है वह महाजीवन जिसे कोई परमात्मा कहता है कोई, खुदा ! जब तक हम सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी के साक्षी बनकर उनसे प्रभावित होना त्याग नहीं देते, सहज आनंद की धारा में, जो अनवरत अस्तित्त्व बहा रहा है भीगने से हम वंचित ही रह जाते हैं.

Sunday, March 5, 2017

योग सधेगा जब जीवन में

६ मार्च २०१७ 
योग के साधक का अंतिम लक्ष्य होता है सदा के लिए भीतर समाधान को प्राप्त होना, अर्थात बाहर की परिस्थिति कैसी भी हो मन के भीतर समता बनी रहे, समता ही नहीं समरसता भी.  इस लक्ष्य को पाने के लिए वह अपनी रूचि के अनुसार एक पथ का निर्धारण करता है. यदि उसमें तर्कबुद्धि है तो ज्ञानयोग, भावनाबुद्धि है तो भक्ति योग और दोनों का सम्मिलन तो कर्मयोग के द्वारा वह अपने पथ पर आगे बढ़ता है. सत्य के प्रति निष्ठा और श्रद्धा तीनों के लिए प्रथम आवश्यकता है. योग का साधक वही तो हो सकता है जिसके भीतर स्वयं के पार जाने की आकांक्षा जगी हो, जो स्वयं से ही संतुष्ट नहीं हो गया है, जो जानता है कि उसके पास उन सवालों के जवाब नहीं है जो इस जगत को देखकर उसके मन में उठते हैं. जो अपने मन में निरंतर उठने-गिरने वाली लहरों के जाल से स्वयं को बचा नहीं सकता. वह देखता है जो व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति आज सुखद है वही कल दुःख का कारण हो जाती है. जीवन को गहराई से देखने वाला हर व्यक्ति एक न एक दिन अपने पार जाने की कला सीखना चाहेगा. निज बुद्धि के पार उस विवेक को पा लेगा जो हर कठिनाई को एक अवसर बना देता है.

Thursday, March 2, 2017

देह बने देवालय जब

३ मार्च २०१७
पंच तत्वों से बना है हमारा शरीर, तो जाहिर है पंच तत्वों के सारे गुण उसमें भी होंगे. पृथ्वी का सा अपार धैर्य और उसकी जैसी शक्ति भी, जिसे अनुभव करना चाहें तो धावकों अथवा खिलाडियों को देख सकते हैं, जो अकल्पनीय कारनामें कर लेते हैं. प्राणमय देह वायु तत्व से बनी है, गति उसका स्वभाव है प्राण के ही कारण सारी गतियाँ देह में होती हैं. प्राणायाम के द्वारा हम इसे पुष्ट कर सकते हैं. प्राण ऊर्जा यदि कम हो तो देह व्याधियों से जल्दी ग्रस्त हो जाती है और प्राण ऊर्जा यदि बढ़ी हुई हो तो देह में स्फूर्ति बनी रहती है. मन विचारों, भावनाओं, कामनाओं, आकांक्षाओं का केंद्र है. स्वाध्याय और ध्यान इसे सही दिशा देते हैं. मन यदि बहते जल सा प्रवाहमान रहता है तो ताजा रहता है. काम, क्रोध, लोभ मन को बांधते हैं तथा अंततः दैहिक व मनोरोगों के कारण होते हैं. भावमय देह हमारे आदर्शों पर आधारित होती है, यदि जीवन में हम किन्हीं मूल्यों को महत्व देते हैं, सहानुभति, सद्भावना और सेवा के भाव भीतर पल्लवित होने लगते हैं. अग्नि की भांति हम आगे-आगे बढ़ना चाहते हैं. यह सब जिस आकाश तत्व में होता है वैसा ही है आत्मा का वास्तविक स्वरूप, जो होकर भी नहीं सा लगता है किन्तु जो सब कारणों का कारण है.

Wednesday, March 1, 2017

स्वयं से जुदा रहे न कोई

 २ मार्च २०१७ 
एक व्यक्ति ने किसी संत से पूछा, सत्य क्या है ? उन्होंने कहा, नेत्र बंद करो और अपने भीतर कुछ ऐसा खोजो जो सदा एक सा है, जो आजतक नहीं बदला, न ही जिसके बदलने की सम्भावना है. वह व्यक्ति कुछ देर बाद नेत्र खोल कर बोला, ऐसा तो भीतर कुछ भी नहीं मिला, शरीर का अनुभव हुआ, पर वह तो कितना बदल गया है,  विचार निरंतर बदल रहे हैं, भावना भी बदल रही है. संत ने कहा, जो यह परिवर्तन देख रहा है वह तुम कौन हो ?  हमारे भीतर हम स्वयं ही अपरिवर्तित रह जाते हैं, किन्तु स्वयं से अपरिचित होने के कारण हम इसे देख ही नहीं पाते. दर्पण में देखने पर हम स्वयं को देह मानकर उसके साथ एकत्व का अनुभव करते हैं, सिर पर श्वेत केशों के झलकते ही उदास हो जाते हैं. नाटक देखते समय मन के साथ एकत्व कर लेते हैं और पल-पल सुखी-दुखी होते रहते हैं. किसी ने हमारे प्रतिकूल कुछ कह दिया तो भावनाओं के साथ एक हो जाते हैं और व्यर्थ ही स्वयं को आहत कर लेते हैं. ध्यान में जब हमे स्वयं के साथ जुड़ते हैं तो ही सहजता का अनुभव करते हैं, सहजता आत्मा का स्वाभाविक गुण है, जो आज का व्यक्ति खोता जा रहा है. 

खिले सदा मुस्कान लबों पर

१ मार्च २०१७ 
संत कहते हैं सदा प्रसन्न रहना भगवान की सबसे बड़ी पूजा है. प्रसन्न रहने का अर्थ है एक ऐसी मुस्कुराहट का मालिक बनना जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति मिटा न सके, ऐसी प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहती, वह स्वाभाविक सहजता से उत्पन्न होती है. प्रतिपल यदि हम सजग रहते हैं और अस्तित्त्व से निरंतर झरती हुई ऊर्जा से एकत्व का अनुभव करते हैं तब ही इसका अनुभव किया जा सकता है. अतीत जो जा चुका, पश्चाताप या क्रोध के रूप में हमारी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दे और भविष्य जो अभी आया नहीं हमें आशंकित न करे तो जीवन को उसके समग्र सौन्दर्य के साथ जीने का अनुभव प्राप्त होता है. हमारे चारोंओर जो सृष्टि का इतना बड़ा आयोजन चल रहा है, उसके पीछे छिपे अज्ञात हाथों का स्पर्श हम भी महसूस करने लगते हैं. आकाश हमारा मित्र बन जाता है और हवाएँ सहयोगी. 

Tuesday, February 28, 2017

अभय जगे जिस पल भीतर

२८ फरवरी २०१७ 
हमारे भीतर ही दैवी संपदा है और आसुरी संपदा भी. कृष्ण भगवद गीता में इन दोनों संपदाओं के लक्षणों का वर्णन करते हैं. अभय दैवी संपदा का सबसे पहला लक्षण है, पाखंड आसुरी संपदा का. यदि हमारे भीतर स्वयं के कल्याण की आकांक्षा जगती है, यह इस बात का प्रमाण है कि भीतर दैवी संपदा है, हो सकता है अभी वह ढकी है. यदि कोई अपने जीवन का ध्येय केवल सुख-सम्पत्ति जुटाने को ही बना लेता है तो सम्भव है उसके भीतर आसुरी संपदा हो. दैवी संपदा मुक्त करती है, अंततः हमें आत्मिक सुख से भरती है,  जबकि आसुरी संपदा बांधती है, यह मन को संतुष्टि का अनुभव नहीं होने देती. स्वतंत्र होना हर कोई चाहता है पर इसके साथ जो अनिश्चितता जुड़ी है उसे कोई नहीं चाहता, परतंत्र होना कोई नहीं चाहता पर उसके साथ जुड़ी सुरक्षा हर किसी को पसंद है. यही कारण है कि हम स्वयं अपने लिए बंधन पैदा करते हैं, अपने आस-पास सुख और समृद्धि का ऐसा वातावरण पैदा करना चाहते हैं जो भले ही कितने दुखों का सामना करके मिलता हो. हर दुःख हमें एक काल्पनिक सुख की आशा दिलाता है, जबकि वास्तविक सुख लेकर हम पैदा ही हुए हैं.

Sunday, February 26, 2017

एक यात्रा है मन की

२७ फरवरी २०१७ 
मानव का मन एक सीढ़ी है, जिससे ऊपर भी जाया जा सकता और नीचे भी. यह एक पुल है जिससे संसार तक भी जाया जा सकता है और परमात्मा तक भी. ऊर्जा एक ही है. जब मन नीचे के केन्द्रों में रहता है तब जिस दुःख और पीड़ा का अनुभव वह करता है, वह उसी ऊर्जा से निकली है जिससे ऊपर के केन्द्रों में रहकर सुख और आनन्द का भी अनुभव किया जा सकता है. हम शाश्वत सत्य की तरफ मुख करके भी चल सकते हैं और पल-पल बदलने वाले मिथ्या जगत की ओर भी. यह सदा याद रखना होगा कि मन को भरा नहीं जा सकता क्योंकि मन नाम ही उसी का है जो कभी संतुष्ट नहीं होता, अन्यथा जगत में इतना विकास न दिखाई देता. मन एक ऊर्जा है और उसका न विनाश किया जा सकता है न  उत्पन्न किया जा सकता है, हाँ उसको दिशा दी जा सकती है. दोनों दिशाएं हमारे भीतर ही हैं और पलक झपकते ही हम अपनी दिशा को बदल सकते हैं. कृष्ण कहते हैं दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी किसी क्षण यदि सत्य की और बढ़ता है तो उसे भी सत्य प्राप्त होता है. आत्मा पूर्ण स्वतंत्र है कि वह कौन सा मार्ग चुने, परमात्मा अनंत धैर्यशाली है, वह सदा ही हमारी प्रतीक्षा करता है, वह सदा उपलब्ध ही है, हमें ही उसकी ओर दृष्टि करने की देर है. 

Friday, February 24, 2017

विस्मयकारी है जीवन यह

२५ फरवरी २०१७ 
प्रकृति से हम जितना जुड़े होते हैं, विस्मय हमें निरंतर आह्लादित किये रहता है. प्रकृति से कटकर कंक्रीट की दुनिया में रहने वाले नन्हे बीज से अंकुरित  होते गेहूँ के पौधे को बालियों से भरते भी नहीं देख पाते और उनके लिए अन्न के लिए  सम्मान की भावना भी नहीं उपजती. सृष्टि एक रहस्य से भरी है, पर विज्ञान पढने वाले के लिए जैसे हर रहस्य का उत्तर मानो पुस्तकों में बंद है. नीले आकाश को यदि एक बार भर नजर कोई देखे तो मन खो जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है. अनंत है जिसका विस्तार उसके बारे में कोई कहे भी तो क्या..संतों के पास जाकर भी मन ठहर जाता है, वे भी एक रहस्य ही जान पड़ते हैं. ध्यान उसी विस्मय में डूबने का ही तो नाम है. 

Thursday, February 23, 2017

शिवरात्रि पर सधे जागरण

२४ फरवरी २०१७ 
सुबह जब आकाश पर तारे भी दिखते  हों और उषा की भनक भी मिलती हो, आकाश का गहरा नीला रंग और त्रयोदशी का  पीला चाँद शिव के विशाल मनोहारी रूप का दर्शन कराता हुआ सा लगता है. गगन के समान सब जगह व्याप्त है शिव की सत्ता, उसकी उपस्थिति मात्र से  सब ओर गहन शांति छा जाती है. शिव ही ऊर्जा है जो इस सृष्टि का मूल है, सृष्टि ही वह शक्ति है जो निरंतर शिव के साथ है पर फिर भी उससे पृथक. आत्मा और देह की भांति शिव और शक्ति एकदूसरे के पूरक हैं, शिव शक्ति के परे भी है जैसे आत्मा देह के बाद भी रहती है. शिवरात्रि वह रात्रि है जब शिव कृपा को अबाध पाया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है.

सागर में इक लहर उठी

२३ फरवरी २०१७ 
वैज्ञानिक कहते हैं पदार्थ कुछ और नहीं ऊर्जा का ही दूसरा  रूप है, संत कहते हैं अहंकार कुछ और नहीं आत्मा ही है. हमारे चारों ओर सृष्टि का जो अति विशाल विस्तार दिखाई पड़ रहा है, यह पहले इस रूप में नहीं था और अभी भी निरंतर बदल रहा है, किन्तु जिस ऊर्जा के महासागर में यह स्थित है और जिससे बना है वह सदा से ऐसी ही है. हर व्यक्ति के भीतर जो 'मैं' की अनुभूति होती है वह भी जन्म के बाद ही समाज द्वारा दी गयी होती है, नवजात शिशु  के पास कोई 'मैं' नहीं होता, केवल चेतना होती है, वह भी शुद्ध चेतना के महासागर में उठी एक लहर ही तो है. जो सदा से है और सदा रहेगी वही शुद्ध चेतना ही ईश्वर है. 

Wednesday, February 22, 2017

स्वयं के निकट देह से दूर

२२ फरवरी २०१७ 
उपवास का वास्तविक अर्थ है स्वयं के निकट निवास करना, अर्थात देह से पृथक भीतर की चेतना के निकट वास करना. जब साधक अपने पास रहने की कला सीखना चाहता है तो ध्यान के द्वारा प्रसाद रूप में पाया उपवास इसमें सहायक है. भीतर यह भान होने लगता है  कि भूख देह को लगती है आत्मा इसे देखने वाला साक्षी मात्र है, भोजन आवश्यक है पर इसके प्रति आसक्ति आवश्यक नहीं है. साधक जब उपवास को सही अर्थों में समझने के बाद ही इसे करने का व्रत लेता है तो स्वयं को आत्मा के निकट सहज ही  पाता है. स्वयं का होना ही उसे पर्याप्त लगता है. जब देह का स्मरण ही नहीं आता तब ही सच्चा उपवास घटता है. मन में तरह-तरह के व्यंजनों को खाने की इच्छा हो और उपवास के नाम पर उनका सेवन हो तो आत्मा से दूरी बढ़ जाएगी और मन देह में ही वास करेगा. 

Saturday, February 11, 2017

लय और ताल सधे जीवन में

११ फरवरी २०१७ 
प्रकृति के हर काम में एक लय झलकती है. दिन-रात के होने और ऋतु परिवर्तन के अनुसार मन के भी मौसम होते हैं। उन्हें समझकर जो उनके अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है, वह स्वस्थ रह सकता है। प्रातःकाल मन शांत होता है, उस समय का उपयोग स्वाध्याय व साधना में लगे तो दिन भर ताजगी रहेगी. जीवन में संगीत तभी प्रकटेगा जब एक लय हमारे मन, वचन तथा कर्मों में होगी। नियत समय पर नियत कार्य होते रहें तो  मन देह से ऊपर जा सकता है, अन्यथा सामान्य जीवन से परे भी एक अलौकिक जीवन है, इसकी ओर दृष्टि ही नहीं जाती।

Wednesday, February 8, 2017

मृत्यु जीवन का सच है

८ फरवरी २०१७ 
संत कहते हैं मन में सदा मृत्यु का स्मरण रखना चाहिए, मृत्यु किसी भी पल हमें अपना ग्रास बना सकती है. वह हमारे दो कदम पीछे ही चल रही है साथ-साथ. वास्तव में हर पल हम अपनी मृत्यु के लिए मार्ग बना रहे हैं., हर नया दिन मृत्यु को और करीब ले आता है. हम इस सबसे अनभिज्ञ ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदा ही बने रहेंगे. जीवन की भव्यता से भी परिचित नहीं पाते, यदि किसी को यह पता चल जाये कि कल उसे मरना है तो वह आज को किस शिद्दत से न जियेगा. संत ऐसे ही जीते हैं हर पल को गहराई से महसूस करते हुए, कुदरत के नजरों को देख निहाल होते हुए और मन को सदा हल्का और खाली रखते हुए. इसका अर्थ हुआ मृत्यु ही जीवन को सुंदर बनाती है.

Monday, February 6, 2017

जीवन बने सात्विक सबका

७ फरवरी २०१७ 
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से सारी प्रकृति आच्छादित है. सत्व गुण प्रकाश, सुख  और ज्ञान को बढ़ाता है. रज हमें क्रियाशील बनाता है और तम निद्रा और जड़ता का कारण है. हमारा जीवन तभी सुंदर होगा जब रज और तम ये दोनों गुण संतुलित मात्रा में हों. आज समाज में जो दुःख और विषाद छाया है, उसका कारण तमस की अधिकता है. बच्चे और युवा रजस की अधिकता से पीड़ित हैं, वे शांत बैठना नहीं चाहते, नींद का समय खिसकते-खिसकते आधी रात तक चला गया है. आधुनिक गैजेट्स उनके मस्तिष्क को उत्तेजित किये रहते हैं. सत्व की अधिकता होने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर सहज ही कदम बढ़ाता है और सत्व की कमी होने पर रोगों का शिकार हो जाता है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्व को कैसे बढ़ाएं, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या अर्थात योग साधना से दिन का आरम्भ, नियमित स्वाध्याय, जीवन में अनुशासन, ध्यान का अभ्यास आदि सत्व गुण को पोषित करते हैं. देह स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि तीक्ष्ण हो यह कौन नहीं चाहता, इसके लिए आवश्यक है कि रज और तम को धीरे-धीरे कम करते जाएँ.

सरल अति हो जीवन अपना

६ फरवरी २०१७ 
मानव के शरीर में हर क्षण कुछ न कुछ घट रहा है. श्वास का आना-जाना कितना सहज है पर इसके पीछे का विज्ञान कितना जटिल है. इसी तरह इस विशाल प्रकृति में पल-पल कितना कुछ घट रहा है, इसे जानना सबके वश में नहीं है पर इन सबके साथ एक मैत्री भाव का अनुभव करना, इन्हें अपना जानना हर किसी के हाथ में है. जीवन तब सरल हो जाता है, जब सारा संसार अपना घर लगता है, पर ऐसी स्थिति तक पहुंचने के लिए अपने  छोटे से  घर से ममता का त्याग करना होगा, अंतर को इतना विशाल बनाने के लिए लघु से मोह को तो छोड़ना ही होगा. अहंकार के लिए तब कोई काम नहीं बचेगा, क्योंकि अपना कहने जैसा तब कुछ भी नहीं होगा, सृष्टि जितनी अपनी है उतनी ही हर किसी की, सहजता और सरलता तब जीवन के सूत्र बन जायेंगे. 

Thursday, February 2, 2017

एक विशाल गगन भीतर है

३ फरवरी २०१७ 
प्रकृति में निरंतर एक संगीत गूंज रहा है, हम अपने मन में चल रहे शोर के कारण उसे सुन न पायें वह बात अलग है. सत्य एक शून्य की भांति, आकाश की भांति चारों ओर फैला हुआ है, हम उसे स्पर्श नहीं कर पाते न ही देख पाते हैं, दोनों का आयाम ही अलग है. दोनों के गुण धर्म ही अलग हैं, जब तक कोई देह और मन के पार की झलक नहीं पा लेता तब तक उसके जीवन में प्रकाश नहीं उतरता.  

सुख-दुःख दोनों रचना मन की

२ फरवरी २०१७ 
स्वयं को जाने बिना हम यह उम्मीद करते हैं कि दूसरे हमें जानें, स्वयं को समझे बिना हम दूसरों को समझने की कोशिश करते हैं. दोनों ही बार निराशा ही मिलने वाली है. इस दुनिया में हमें जो कुछ दिखाई दे रहा है वह स्वयं के दर्पण पर प्रतिबिम्बित होकर ही दिखाई दे सकता है. स्वयं में यदि कहीं कोई उलझाव है तो प्रतिबिम्ब भी स्पष्ट नहीं बन सकता. साधना का एकमात्र उद्देश्य यही है कि हम स्वयं को भीतर बाहर अच्छी तरह परख लें. किस बात से हम दुःख बनाते हैं और किस बात से सुख, सुख-दुःख का निर्माता हमारा स्वयं का मन ही है, यह बात जब अनुभव के तौर पर नजर आने लगती है तो तत्क्षण हम दुःख के पार हो जाते हैं. 

Thursday, January 26, 2017

प्रेममयी तू ज्ञानमयी

२७ जनवरी २०१७ 
जगत प्रतिपल बदल रहा है. देह, मन, बुद्धि सभी कुछ तो प्रतिक्षण बदल रहे हैं. जब तक हम अपने भीतर एक ऐसी अवस्था का अनुभव नहीं कर लेते जो सदा एक सी रहती है, एक रस है, शांत है अचल है, हमारी बुद्धि और मन विश्राम को नहीं पा सकते. एक बार बुद्धि जब आत्मा के सान्निध्य का अनुभव कर लेती है तो उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है. श्वासों के नियमन से अर्थात प्राणायाम के नियमित अभ्यास से जब मन ठहरने लगता है तो उसकी झलक मिलती है. साधक को यह अनुभव होता है कि उसके भीतर एक चेतना भी है जो प्रेममयी है.  मन बार-बार उस का संग पाना चाहता है और एक दिन उसे व्यवहार काल में भी भीतर एक सघन चेतना का अनुभव होने लगता है. तब संसार की कोई घटना उसके भीतर की शांति को भंग नहीं कर सकती क्योंकि चेतना स्वयं पर ही निर्भर है, वह स्वतंत्र है. 

Wednesday, January 25, 2017

सबका मंगल होए रे

२५ जनवरी २०१७ 
हम जीवन में कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं. जिनमें कुछ के साथ थोड़े समय के लिए कुछ के साथ देर तक हम समय बिताते हैं. विचारों का आदान-प्रदान भी होता है और वस्तुओं का भी. इससे भी सूक्ष्म एक शै है जिसका आदान-प्रदान निरंतर चलता रहता है, चाहे वह व्यक्ति सम्मुख हो या हम उसके बारे में किसी से बात कर रहे हों, या उसके बारे में कुछ सोच रहे हों. किसी के प्रति हमारी भावना केवल हम तक सीमित नहीं रह पाती, वह तत्क्षण उस तक पहुँच जाती है. स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली है. हम शब्दों का ध्यान रख लेते हैं और भीतर क्रोध रखते हुए भी बाहर से जाहिर नहीं करते, कभी-कभी इसका विपरीत भी हो सकता है. कोई भीतर प्रेम होते हुए भी बाहर से उदासीनता व्यक्त करे, पर दोनों ही स्थितियों में सूक्ष्म तरंगों के द्वारा हमारी वास्तविक भावनाएं उसके अंतरतम तक पहुँच जाती हैं, और भविष्य में उसका व्यवहार उनसे भी प्रभावित होगा. इसीलिए संत कहते हैं सदा हृदय से सबके लिए मंगल कामना करते रहें. 

Tuesday, January 24, 2017

माली सींचे मूल को

२४ जनवरी २०१७ 
जीवन का निर्माण अंधकार में आरम्भ होता है, एक बीज को धरती के नीचे बोया जाता है और एक दिन वह वृक्ष का रूप ले लेता है, जड़ों के रूप में उसका स्रोत छिपा ही रहता है. जड़ों की भी यदि खोद के निकाल लें तो जीवन सूख जाता है. उन्हें वहीँ पोषित करना होता है. इसी तरह हमारा मूल भी भीतर छिपा है, जिसे वहीं पोषित करना है, मूल तक पहुंचने का नाम ही ध्यान है. देह को स्थिर करके पहले मन को देखना फिर मन को शांत करते हुए उस बीज तक पहुंचना जो जीवन का स्रोत है, यह पहला चरण है, फिर उस स्रोत को परम से जोड़ना जिससे वह पोषित हो सके दूसरा सोपान है. प्रार्थना भी ध्यान का विकल्प हो सकती है और नाम जप भी, अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भी मार्ग अपनाकर हम अपने मूल को सींच सकते हैं. 

Sunday, January 22, 2017

एक अचलता पलती भीतर

२३ जनवरी २०१७ 
संसार वही है जो पल-पल बदलता है, फिर अगर कोई व्यक्ति, परिस्थति या वस्तु बदल जाती है तो इसमें आश्चर्य कैसा..हम चाहते हैं संसार जैसा है वैसा ही बना रहे, यही तो वही बात हुई कि आग ठंडी रहे. अब संसार को बदलना ही है क्योंकि यही उसका स्वभाव है, और परमात्मा सदा एकरस है जो कभी नहीं बदलता, उसको पाकर हमारी अबदल रहने की इच्छा पूरी हो सकती है पर यदि हम परमात्मा की अचलता का अनुभव करना चाहते हैं तो कुछ पलों के लिए हमें भी स्थिर होना पड़ेगा, हम भी तो संसार का अंग हैं पल-पल बदल रहे हैं, अबदल का अनुभव कैसे हो. ध्यान में जब मन टिक जाता है तो परमात्मा को ढूँढने नहीं जाना पड़ता वह स्थिरता ही हमें उसका अनुभव करा देती है. 

Friday, January 20, 2017

समरसता जब भीतर छाये

२१ जनवरी २०१७ 
इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति तीनों हमारे पास हैं. सत, रज और तम तीनों गुण  भी मन व बुद्धि, व संस्कारों में हैं  में हैं. मन ही इच्छा शक्ति को धारण करता है और सदा संकल्प-विकल्प उठाता रहता है. सात्विक मन में ही शुद्ध संकल्प जगता है. बुद्धि यदि सात्विक होगी तो ज्ञान शक्ति भी शुद्ध होगी. जैसा ज्ञान होगा वैसे ही संकल्प उठेंगे फिर वैसे ही कर्म होंगे, जब तीनों शक्तियाँ एक रस होंगी तभी जीवन में सुख और संतोष बढ़ेगा. इच्छा यदि अपरिमित है, ज्ञान उसके अनूरूप नहीं है और कर्मशीलता भी नहीं सधती तो भीतर समरसता कैसे हो सकती है. इसीलिए संत कहते हैं, साधक मनसा, वाचा, कर्मणा सदा एकरस होकर रहे, जैसा सोचे, वैसा ही बोले, वैसा ही उसका कृत्य भी हो.