Friday, August 18, 2017

विष भी जब अमृत बन जाये

१८ अगस्त २०१७ 
आकाश से जलधारा निरंतर बह रही है, मूसलाधार वर्षा हो रही है. धरती, पेड़-पौधे सब भीग रहे हैं, पंछी पत्तों में छुप गये हैं. कहाँ छिपा था यह नीर जो बादल बनकर बरस रहा है, क्या यह धरा से ही ऊपर नहीं उठा था. सागरों के ऊपर जब सूरज की किरणें छायी होंगी और उसे तप्त करके ऊपर उठा ले गयी होंगी, प्रकृति उस नमकीन जल को मीठा बनाकर फिर-फिर धरती को लौटा देती है. हमारा मन भी जब जगत के खारेपन को भीतर समा लेता है और उसे मृदु बनाकर लौटा देता है तो परमात्मा से जुड़ जाता है, अथवा कहें परमात्मा से जुड़कर ही ऐसा कर पाता है. हजार बूंदों के रूप में बारिश गीत गाती आ रही है. मन भी उस परमात्मा से जुड़कर अनंत भाव लुटा सकता है. उसके दामन में सब कुछ अनंत है. 

Thursday, August 17, 2017

सतरंगी यह जीवन सुंदर

१७ अगस्त २०१७ 
जीवन बहुआयामी है. विविधताओं से भरा है. प्रकाश की श्वेत किरण जैसे सात रंगों से बनी है, जीवन भी प्रेम, सुख, शांति, शक्ति, पवित्रता, आनंद और ज्ञान सप्त गुणों से ओतप्रोत है. इन गुणों का विकास ही साधक के लिए नित्य साधना है. प्रेम ही परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को एक सूत्र में बाँधता है. सुख की तलाश विज्ञान को नई खोजें करने की प्रेरणा देती है. शांति के वातावरण में ही संगीत आदि कलाओं का सृजन सम्भव है. शक्तिशाली तन और मन ही बदलते हुए समय में स्वयं को स्वस्थ रख सकता है. जीवन जब मर्यादाओं में रहकर आगे बढ़ता है तो दो तटों के मध्य बहती धारा की तरह एक पवित्रता का निर्माण करता चलता है. यही पावनता दिव्यता को जन्म देती है जो आनंद के रूप में मानव के भीतर प्रस्फुटित होती है. हृदय जब आनंदित हो तो सहज ही ऐसा अंतर्ज्ञान उपजता है जिसको पाने के बाद  हर समस्या का समाधान मिलने लगता है.

Wednesday, August 16, 2017

अध्यात्म की डगर सुहानी

१६ अगस्त २०१७ 
जीवन प्रतिपल बांट रहा है. हजारों युगों से एक क्षण भी रुके बिना पवन का संचार हो रहा है. तेज गति से पृथ्वी सूर्य का परिभ्रमण कर रही है. सूर्य की रश्मियाँ नित नये प्राणियों को जन्माने में सहायक हैं. मानव के भीतर कल्पना और बुद्धिमत्ता के अद्भुत संयोग से नित नये अविष्कार हो रहे हैं. कला और विज्ञान की ऊंचाईयों को इस युग ने स्पर्श किया है. इतना सब कुछ होने पर भी अपने आस-पास देखने पर एक निराशा और अभाव का दर्शन होता है, जिसके लिए बढती हुई जनसंख्या तथा मानव का बढ़ता हुआ लोभ, आपसी मतभेद और सम्प्रदायों के नाम पर होती हुई हिंसा जैसे कुछ कारण गिनाये जा सकते हैं. अध्यात्म के पास इन सभी समस्याओं का इलाज है. अध्यात्म मानव को  मानव, प्रकृति तथा सम्पूर्ण सृष्टि से एकत्व की भावना का अनुभव कराता है. अध्यात्म आज के समय की मांग है.   

Monday, August 14, 2017

तू ही जाने तेरा राज

१४ अगस्त २०१७ 
परमात्मा हमारे द्वारा इस जगत में प्रतिपल कितना कुछ कर रहा है. श्वास जो भीतर अनवरत चल रही है, उसी के कारण है. रक्त जो निरंतर गतिशील है, प्रेम जो शिशु की आँखों में झलकता है. मन की गहराई में आगे ही आगे जाने की ललक भी तो किसी अनाम ग्रह से आती है. जगत सदा मिलता हुआ प्रतीत होता है पर कभी मिलता नहीं, क्योंकि जो आज मिला है वह प्रतिपल बदल रहा है. परमात्मा जो सदा दूर ही प्रतीत होता है, निकट से भी निकट रहता चला आता है. जो जीवन उसके बिना हो ही नहीं सकता, उसे भी वह अपनी खबर नहीं होने देता, उससे बड़ा रहस्य और क्या हो सकता है. बस इसी तथ्य को जो जान ले वह निर्भार हो जाता है.

Friday, August 11, 2017

अभी-अभी वह यहीं कहीं हैं

११ अगस्त २०१७ 
समय की धारा प्रतिपल अविरत गति से आगे बढ़ती जा रही है. यह पल जो अभी-अभी उगा था खो गया है. पलक झपकते ही पल खो जाता है. संत कहते हैं जो इस पल में जाग गया, वह जिंदगी से उसी तरह मिल सकता है जैसे कोई प्रेम के क्षणों में अपने प्रिय से मिलता है. जब किसी के निकट होना ही पर्याप्त होता है, उससे कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि उस क्षण को साथ-साथ जीने के लिए, उसी तरह समय के एक नन्हे पल के पीछे छिपे अनंत से मिलना होता है. परमात्मा की मौजूदगी का अनुभव सदा ही एक क्षण में होगा, वह क्षण कौन सा होगा यह कोई नहीं कह सकता पर जिसने कभी क्षण में ठहरना नहीं सीखा वह उस पल को भी खो देगा. 

Tuesday, August 8, 2017

खाली मन ही टिके योग में

८ अगस्त २०१७ 
योग का एक अर्थ है कर्मों को इस कुशलता से करना कि कर्म के बाद न तो पश्चाताप रह जाये कि इससे अच्छा कर सकते थे न ही कोई आशंका ही शेष रहे कि पता नहीं इस कर्म का फल कैसा होगा. कर्म करने के पूर्व जिस सहज स्थिति में मन था उसी में बाद में भी रहे तो  कर्मयोग सिद्ध हो जाता है. अपरिग्रह योग की साधना में अति आवश्यक यम है. अपरिग्रह का शाब्दिक अर्थ है अनावश्यक संग्रह न करना, यह संग्रह वस्तुओं का हो सकता है, संबंधों का हो सकता है और विचारों का भी हो सकता है. व्यक्ति, वस्तु या विचार के प्रति आसक्ति या मोह की भावना ही परिग्रह है, जो दुख का कारण है. परिग्रह कृपणता को जन्म देता है और अपरिग्रह साधक को उदार बनाता है. मन यदि व्यर्थ के विचारों से भरा हुआ है तो चिंता और दुःख से कैसे बचा जा सकता है. योग की साधना करते-करते जब मन व्यर्थ तथा क्लिष्ट संस्कारों से मुक्त हो जाता है तो सहज ही अपरिग्रह सधने लगता है.

Monday, August 7, 2017

यह राखी बंधन है ऐसा

७ अगस्त २०१७ 
रक्षा बंधन का अर्थ है अपनी सहज स्वीकृति और प्रेम से अन्य की रक्षा का वचन देकर उससे बंध जाना. यह प्रेम का ऐसा अनोखा बंधन है जिसमें बाँधने वाला और बंधने वाला दोनों स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं. हमारे पुराणों में भी इस उत्सव का उल्लेख है, अर्थात इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है. पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्वप्रथम इन्द्राणी ने अपने पति की रक्षा के लिए मन्त्रों से सिद्ध सूत्र बाँधा था. द्रौपदी ने कृष्ण को और लक्ष्मी ने राजा बलि को भी रक्षा सूत्र बाँधा था. पहले-पहल ब्राह्मण भी अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बाँधते थे. एक दूसरे के सम्मान की रक्षा के लिए इस सूत्र को बाँधा जाता था. कालांतर में यह भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा. राखी का यह धागा मर्यादा का प्रतीक तो है ही, संकल्प की दृढ़ता का प्रतीक है और साथ ही समाज में सभी की समानता और भाईचारे का प्रतीक भी है. 

Friday, August 4, 2017

निज श्रम से ही भाग्य बनेगा

५ अगस्त २०१७ 
योग शब्द का एक अर्थ है जुड़ना अथवा जोड़ना. पहले देह को मन से फिर मन को आत्मा से और अंत में परमात्मा से जोड़ना है. आत्मा बीज रूप में सबके भीतर है पर योग द्वारा ही उस तक पहुंचा जा सकता है. इसके लिए मन की धरती पर उस बीज को बोकर साधना के जल से सींचा जाता है. अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भक्ति से, कोई ज्ञान से तथा कोई निष्काम कर्म से इस पौधे को बड़ा करता है. तीसरे यम ‘अस्तेय’ का पालन सभी के लिए आवश्यक है. ‘अस्तेय’ का शाब्दिक अर्थ है चोरी न करना. चोरी शब्द का यहाँ बहुत व्यापक अर्थ है, किसी की अनुपस्थिति में उसकी वस्तु का उपयोग भी चोरी ही कहा जायेगा. कम श्रम के बदले अधिक धन की लालसा, कर्तव्यों से पीछे हटना, व्यापार में ज्यादा मुनाफा कमाना, दूसरों के विचारों की चोरी भी स्तेय में आएगा. यदि मन में कहीं भी चोरी का संस्कार है, तो वह अन्यों के प्रति संदेह भी जगाता है. साधक को मन की निर्मलता के लिए किसी भी रूप में बिना अर्जित की हुई वस्तु का लोभ नहीं रखना चाहिए. 

Thursday, August 3, 2017

अहिंसा परमो धर्मः

४ अगस्त २०१७ 
एक बार यदि साधक यह निर्णय ले लेता है कि उसे योग मार्ग पर आगे बढ़ना है, जीवन के परम लक्ष्य को पाना है अर्थात सर्वदुखों से सर्वकाल के लिए मुक्त होना है तो तत्क्षण उसे साधना आरम्भ कर देनी चाहिए. चाहे आधा घंटा ही की जाये, प्रतिदिन नियमित की गयी साधना फल देने लगती है. भूतकाल में किसी न किसी को दुःख दिया होगा, मन ही मन उससे क्षमा मांगकर भविष्य में किसी को कोई दुःख नहीं देना है अर्थात अहिंसा के पालन का व्रत भी ले लेना चाहिए. क्रोध हिंसा का ही एक रूप है. दोष दृष्टि भी हिंसा है. मन में क्षोभ का भाव जगे अथवा द्वेष का ये सभी हिंसा हैं. मन को शांत रखने के लिए अहिंसा का पालन अति आवश्यक है.


Wednesday, August 2, 2017

सांच बराबर तप नहीं

३ अगस्त २०१७ 
योग के साधक को आसन व प्राणायाम के साथ-साथ यम व नियम का पालन करना नहीं भूलना चाहिए. योग का अंतिम लक्ष्य मुक्ति की प्राप्ति है, जिसका अर्थ है सर्वदुखों से मुक्ति. जो मन के विकारों से मुक्त हुए बिना सम्भव ही नहीं है. यम और नियम मन को शुद्ध करने के उपाय हैं, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य, ये पांच यम हैं तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं. सत्य के पालन करने का अर्थ है मनसा और वाचा में समता. जो मन में है वही वाणी से उजागर होने लगे तो साधक सत्य के निकट पहुँचने लगता है. किसी की कही बात को ज्यों की त्यों कहना, उसमें अपनी ओर से जरा भी फेर-बदल न करना, वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितयों को जैसी वे हैं वैसा ही देखना भी सत्य व्यवहार कहा जाता है. अपने लाभ के लिए असत्य का सहारा लेने वाला तो सत्य से बहुत दूर है.


Friday, July 28, 2017

एक उसी की चाहत हो जब

२८ जुलाई २०१७ 
साधक के लिए सबसे जरूरी बात है कि वह प्रामाणिक बने. उसे अपने मन की गहरी आकांक्षा को जानना होगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलकर वह क्या पाना चाहता है. परमात्मा और उसके मध्य यदि कोई भेद अब भी शेष है तो इसका कारण परमात्मा नहीं साधक के मन का दुराव है. यदि किसी क्षण में वह अपने मन को पूरी सच्चाई से परम के सामने खोल कर रख देता है, कोई छिपी हुई कामना अनदेखी नहीं रहती जिसे वह परमात्मा के द्वारा पूरा करना चाहता है, उसी क्षण मिलन घटता है. स्वयं को जानने के लिए ही योग साधना है. आसनों के द्वारा देह शुद्धि तथा ध्यान के द्वारा मन की स्थिरता प्राप्त करके ही हम स्वयं को जान सकते हैं. इससे पहले की गई भक्ति सकाम भक्ति होती है. जब तक हम परमात्मा से मांगते हैं पर परमात्मा को नहीं मांगते तब तक मुक्ति सम्भव नहीं.

Wednesday, July 26, 2017

सारा जग जब मीत बनेगा

२६ जुलाई २०१७ 
क्रोध और मोह से विहीन, राग-द्वेष से मुक्त जीवन ही असली जीवन है. यदि हम इन विकारों से मुक्त नहीं हो पाते तो इसका कारण बाहर नहीं है. हमारी असफलता का कारण भीतर ही है. सुख की कामना ही मोह है. मोह के कारण ही हमें भय सताता है और अज्ञान के कारण ही इस सत्य को हम देख नहीं पाते. सुख के जिन साधनों के पीछे जाकर पहले-पहल हम मुग्ध होते हैं बाद में वही दुःख का कारण बन जाते हैं. हमारे सुख में जो बाधक हो उसके प्रति द्वेष करते हैं पर नहीं जानते कि शुद्ध अहिंसा जब किसी हृदय में घटती है उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. जग के साथ वह एक हो जाता है और उसके अंतर्मन में करुणा जल अनायास ही बहने लगता है.

Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Saturday, July 22, 2017

निज स्वभाव है सदा एक रस

२३ जुलाई २०१७ 
संत, शास्त्र और हमारे जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि धर्म ही हमें थामता है. धर्म जो हमारा स्वभाव है, वही ताओ है, वही नियम है, वही ऋत है और वही जानने योग्य है. हम इस जीवन में अनेक लोगों से मिलते हैं पर खुद से मिलना मृत्यु तक टालते रहते हैं. हम जगत को महत्व देते हैं पर जो इस जगत को देखता है, उस आत्मा को अनदेखा ही रहने देते हैं. द्रष्टा दृश्य से बड़ा है या छोटा ? छोटी सी आँख में इतना बड़ा आकाश समाने की शक्ति है, छोटे से मन में सारा ब्रह्मांड समा जाता है. कितनी अपार शक्ति है हमारे भीतर. अनेक जन्मों के अनंत संस्कार मन पर अंकित हैं. स्वयं को पहचान कर ही हम सदा अडोल रह सकते हैं.

Friday, July 21, 2017

पूर्ण पूर्ण से ही उपजा है

२१ जुलाई २०१७
जीवन में होने वाला हर अनुभव हमें पूर्णता की ओर ले जाने के लिए है. हर आत्मा अपने भीतर सत्य की सम्भावना लिए हुई जन्मती है. सत्य की झलक उसे मिल भी सकती है और अंधकार में खो भी सकती है. सबसे पहला सत्य है हमारा स्वयं का अस्तित्त्व. मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार के रूप में अंतःकरण. मन की शक्ति अपार है, जिसका सही-सही ज्ञान होने पर हम इसका सदुपयोग करना सीख जाते हैं. मन के संस्कारों को शुद्ध करते हुए हम उसे उसके मूल तक ले जाते हैं, जहाँ से उसे पोषण मिलता है और वह उस तृप्ति का अनुभव करता है जिसकी उसे तलाश है. 

Thursday, July 20, 2017

तू प्रेम का सागर है

२० जुलाई २०१७ 
परमात्मा को हटा दें तो इस जगत में बचता ही क्या है ? उसका ऐश्वर्य, उसकी विभूतियाँ और उसका अनंत साम्राज्य ही चारों ओर फैला है. मानव चाहे तो उसका भागीदार बन सकता है अन्यथा मात्र पहरेदार ही रह सकता है. अपना जान के उसे पुकारे अथवा तो उसे भुलाकर सुख-दुःख के झूले में ही झूलता रहे. प्रेम को हटा दें तो भी कुछ नहीं बचता, अपनापन, आत्मीयता और दुलार यदि जीवन में न हों तो मरुथल बन जाता है जीवन. मानव चाहे तो अपना अहंकार खो कर उनमें डूब सकता है अन्यथा संबंधों में भी व्यापार ही चलता है.  

Wednesday, July 19, 2017

जिसने जाना राज अनोखा

१९ जुलाई २०१७ 
संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Tuesday, July 18, 2017

राम रतन धन पायो

१८ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, जिसकी हमें तलाश है वह मिला ही हुआ है. वे कहते हैं, यकीन कर लें और अपनी जेबें जरा टटोलें, हीरा पड़ा है.. जो इस बात पर यकीन करके खोजेगा सचमुच हीरा मिल जाएगा. मिलते ही जोर से हँसी आती है तब. खुद को ही खोजते-फिरते रहे थे, खुद को ही मिल नहीं पाते. जिनकी नजरें सदा बाहर लगी हैं भीतर कभी झांक ही नहीं पाते. एक दिन जब उसकी खबर हो जाएगी जो भीतर छिपा है तब एक ऐसा फूल खिलेगा, जो कभी नहीं मुरझाता. ऐसा नहीं होता तो कोई दिल भक्ति के गीत नहीं गाता.


Sunday, July 16, 2017

नित नूतन जब जग लगता है

१७ जुलाई २०१७ 
हम जो भी करते हैं, सोचते हैं या कहते हैं, वह निन्यानवे प्रतिशत बासी होता है. हम पुराने को ही दोहराते रहते हैं. सुबह अलार्म सुनकर बिस्तर छोड़ते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. अभ्यास वश ही पैर चप्पल तलाशते हैं, फिर अभ्यास वश ही ब्रश आदि, देह को जिन कामों का अभ्यास हो गया है, वह मशीन की तरह करता जाती है. फिर कोई विचार उड़ता हुआ सा मन में आ जाता है, उसके प्रति प्रतिक्रिया भी पूर्व के अनुसार ही होती है. हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी होता है वह भी तो दोहराता है स्वयं को. एक चक्र की भांति हम उसमें ऊपर-नीचे होते रहते हैं, कहीं पहुँचते नहीं. कुछ नया हो तभी मानव बुद्धि की सार्थकता है. प्रतिदिन या फिर प्रतिपल नया होने के लिए प्रकृति को क्या कुछ विशेष करना पड़ता है, इतना ही तो कि परिवर्तन का वह प्रतिरोध नहीं करती. जीवन को जिस रूप में वह आता है सहज स्वीकारने से नयापन बना ही रहता है. जब कोई पूर्वाग्रह, पूर्व मान्यता न हो, अपनी या दूसरों की विशेष इमेज के प्रति कोई राग न हो तब हर पल कुछ नया भी होगा तो वह सहज स्वीकार्य होगा.   

Saturday, July 15, 2017

आयेगी जब समता मन में

१६ जुलाई २०१७ 
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि’ ये शब्द हम सभी ने न जाने कितनी बार सुने हैं. जब कोई व्यक्ति हमारे दृष्टिकोण को समझ नहीं पाता, हम अपने को समझा लेते हैं कि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है जो हमारी बात को समझ सकें. किन्तु इस बोध वाक्य का अर्थ बहुत गहरा है. यह जगत हमें वैसा दिखाई देता है जैसा हमारा मन होता है. यदि मन उदास है, नकारात्मक है तो जगत के प्रति शिकायतों से भर जायेगा. शिकायती मन और भी ज्यादा उदासी से भर जायेगा, क्योंकि परिवर्तन के लिए ऊर्जा शक्ति चाहिए, नकारात्मक भाव ऊर्जा का हरण शीघ्र कर लेते हैं. यदि प्राण शक्ति बढ़ी हुई है, मन प्रफ्फुलित है तो जगत सुंदर दिखाई देगा. इस स्थिति में भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकेगा,  क्योंकि जब सब कुछ ठीक है तो कैसा परिवर्तन. मन यदि समता में स्थित है, तब वह जैसा है वैसा ही दिखाई पड़ेगा. जहाँ आवश्यक है परिवर्तन तब सहज ही होगा, जीवन एक ऊपर की ओर ले जाने वाली यात्रा बन जायेगा.  

Wednesday, July 12, 2017

छंद बद्ध हो जब जीवन

१३ जुलाई २०१७ 
जैसे प्रकृति में एक लय है, एक छंद है, एक नियमबद्धता है, एक अनुशासन है, वैसा ही यदि जीवन में घटित होने लगे तो जीवन आनंदपूर्ण हो सकता है. समय आने पर कैसे अपने आप ही पत्तियां झर जाती हैं, वृक्ष अपनी कुरूपता को सहज ही स्वीकार करता है और उसमें भी एक सौन्दर्य का निर्माण हो जाता है. वृद्धावस्था को यदि सहजता से स्वीकार लिया जाये तो उसमें भी एक सौन्दर्य है. अस्वस्थता में भी मन कैसे स्थिर हो जाता है, अकड़ चली जाती है, बुखार में भी मुख पर एक चमक आ जाती है, इन्हें निमन्त्रण नहीं देना है पर यदि किसी कारण वश देह स्वस्थ नहीं है, तो उसे पहले स्वीकार करके फिर आवश्यक कदम उठाने हैं. मन यदि ‘हाँ’ की भाषा सीख गया है, तो उसकी ऊर्जा एक लय में बंध जाती है, नकार की भाषा उसे अस्त-व्यस्त कर देती है.

Tuesday, July 11, 2017

प्रतिपल बदल रहा है जग यह

१२ जुलाई २०१७ 
हमारे दुखों का कारण हमारे ही भीतर है, इसका ज्ञान होते ही हम सबल हो जाते हैं. जिस वस्तु का निर्माण हमने किया है उसे नष्ट करने की क्षमता भी तो हमारे ही पास है. यदि जगत हमारे दुखों का कारण हो तब तो हम असहाय हैं, क्योंकि जगत को बदलने की क्षमता हमारे पास है ही नहीं, जगत अपनी राह चलेगा ही. यदि बाहरी कारण हमारे अंतर्मन की दशा को प्रभावित करते हैं तब तो हम कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकते क्योंकि बाहर तो सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. मौसम ही अनुकूल-प्रतिकूल होते रहते हैं. व्यक्ति बदल जाते हैं. यहाँ तक कि हमारा खुद का मन भी सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग भावों में रहता है. बस एक हम ही हैं जो कभी नहीं बदलते, जो अनंत काल से जैसे थे अनंत काल तक वैसे ही रहेंगे. पर हम तो अपने उस न बदलने वाले स्वयं से कभी मिले ही नहीं, इसलिए कभी ख़ुशी कभी गम के गीत ही गाते रहे. 

Monday, July 10, 2017

बने पथिक कोई उस पथ का

११ जुलाई २०१७ 
साधना का पथिक अपने भीतर सदा ही उस साम्राज्य में रहना चाहता है जहाँ एक रस शान्ति विराजती है. उसके अंतर से प्रेम की ऊर्जा किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना के प्रति प्रवाहित नहीं होती, वह निरंतर बहती रहती है जैसे जल से आप्लावित मेघ सहज ही जलधार बहाते हैं. जिस लोक में वह विचरना चाहता है, वह अग्नि सा पावन भी है और हिमशिखरों के समान शीतल भी. वहाँ तृप्ति की श्वास ही ली जा सकती है. जब किसी के भीतर इतनी सात्विक ऊर्जा भर जाये तो वह सहज ही श्रम करने का इच्छुक होगा, इस श्रम में कोई थकावट नहीं होगी, वह सहज होगा जैसे प्रकृति में सब काम सहज हो रहे हैं, क्योंकि प्रकृति सदा ही उस शांति से जुडी है. सेवा का फूल ऐसी ही भूमि में खिलता है. 

हर उलझन के पार हुआ जो

१० जुलाई २०१७ 
योग साधना का उद्देश्य है मोक्ष, अर्थात सारे दुखों से मुक्त हो जाना. जब तक जीवन में एक भी दुःख है, हम बंधे हैं, समस्या छोटी हो या बड़ी..मन को स्वयं तक केन्द्रित रखती है. किसी के जीवन में एक भी समस्या न हो ऐसा होना तो सम्भव ही नहीं है, हाँ यह हो सकता है कोई उनके प्रति सजग ही न हो. जीवन में दुःख है, पहले तो यह स्वीकारना होगा, मन यदि किसी भी बात पर उलझन महसूस करता है तो इसका अर्थ है वह बंधा है. योग हमें संवेदनशील बनाता है, भीतर जाकर ही पता चलता है मन कैसे बंधता है और फिर उसे खोलने के उपाय भी भीतर ही मिलते हैं. 

Saturday, July 8, 2017

गुरू हमारे मन मन्दिर में

९ जुलाई २०१७ 
जीवन में गुरू का पदार्पण एक अद्वितीय घटना है, इसे एक महान घटना भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जब किसी के मन में सत्य के लिए, गुरू के लिए प्यास जगती है तो परमात्मा की व्यवस्था से गुरू का आगमन होता है. यह सही है कि शिष्य ही गुरू को नहीं खोजता गुरू भी किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा शिष्य तक पहुँच जाते हैं. जब तक जीवन में गुरू की सच्ची आवश्यकता महसूस नहीं हुई है तब तक हम उसके महत्व को समझ नहीं पाते, लेकिन उसकी इतनी कृपा है कि अपने ज्ञान और प्रेम के बल पर वह हमारे मन में उस चाह को भी जगाता है. इसलिए चाहे अभी हमें गुरू के महत्व की जानकारी हो या न हो, गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने की ललक भीतर जगाएं और व्यास पूर्णिमा के इस सुंदर पर्व पर अपने जीवन को सुंदर दिशा दें. 

Friday, July 7, 2017

नये संस्कार उगें जब मन में

१० जुलाई २०१७ 
कभी-कभी न चाहते हुए भी हमसे ऐसे कृत्य हो जाते हैं, जिन पर बाद में पश्चाताप होता है. कभी मुख से ऐसे वचन निकल जाते हैं जिन्हें बोलने के बाद हमें लगता है, इनकी जरूरत ही नहीं थी. इनका कारण हमारे भीतर के क्रोध आदि विकार हैं, जो जरा सी परिस्थिति भी अनुकूल पाते ही सिर उठा लेते हैं अथवा तो जब उनके फल देने का वक्त होता है, परिस्थिति पैदा कर लेते हैं. क्रोध, मान, मोह, माया आदि पूर्व कर्मों के फल हैं. भीतर जो भी भाव उठते हैं वे संस्कारों के कारण होते हैं, संस्कार पूर्वकर्मों के अनुसार होते हैं, हमें उनसे प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है. स्वयं का ज्ञान होने पर ही यह पता चलता है. आत्मा के गुणों के आधार पर जो कर्म हम करते हैं, वे ही नये संस्कार बनाते हैं, अन्यथा हम बार-बार पुराने ढंग से ही जिए चले जाते हैं. सम्मान कभी भी वर्चस्व से नहीं समानता से प्राप्त किया जाता है, प्रेम और परोपकार से प्राप्त किया जाता है.

Wednesday, July 5, 2017

स्वाध्याय का फूल खिले

६ जुलाई २०१७ 
सुबह से शाम तक हम अनगिनत सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, अख़बार, टेलीविजन, पत्रिकाएँ, मित्रों व पुस्तकों के माध्यम से हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. आजकल तो सुबह-सुबह मोबाइल पर ही सुंदर ज्ञान के सूत्र पढने को मिलते हैं किन्तु इस ज्ञान से हमारा आध्यात्मिक विकास नहीं होता. इसके लिए तो साधना के पथ पर कदम रखना ही होगा. जीवन में एक अनुशासन हो, नियमित योगाभ्यास व व्यायाम हो, उचित समय पर सोना व जगना हो और स्वाध्याय हो. स्वाध्याय का अर्थ है केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं है, इसका एक अर्थ है स्वयं का अध्ययन. स्वयं का ज्ञान होने पर ही हम स्वयं का अध्ययन कर सकते हैं. गुरू अथवा शास्त्रों के माध्यम से हमें स्वयं का पता चलता है. स्वयं का ज्ञान ही हमें संसार की दौड़ से मुक्त कर देता है, यही वास्तविक ज्ञान है. इसके होने पर जीवन पूर्ववत् चलता रहता है बस मन जिस शांति व स्थिरता का अनुभव करता है, वह किसी बाहरी घटना से खंडित नहीं होती.

Tuesday, July 4, 2017

मन तू अपना मूल पिछान

५ जुलाई २०१७ 
साधना के पथ पर चलते समय इस बात का निरंतर ध्यान रखना होगा कि हम अपने मूल स्वभाव की और जा रहे हैं या नहीं. ऐसा नहीं कि स्वयं को विशेष मानकर अथवा तो औरों को अपने पथ में बाधा मानकर हम मन में विकार जगा लें. हमारी दिशा सही होनी चाहिए. अध्यात्म के पथ पर जो धैर्यवान है, वह एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँचेगा. जब तक हम अपन शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते, परमात्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकते. शांति, प्रेम, आनंद आदि आत्मा का स्वभाव है, हमें इनका उपयोग करना है. ऐसा करने से सबसे पहले उसका लाभ स्वयं को मिलता है तथा बाद में औरों को मिलता है. 

Monday, July 3, 2017

ज्ञान बिना सुख इक सपना है

४ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, सुख के पीछे जाने से दुःख पीछे आता है, ज्ञान के पीछे जाने से सुख पीछे आता है. समझदारी तो इसी में हुई कि हम ज्ञान का अनुशीलन करें. भगवद्गीता में कृष्ण ने सुंदर शब्दों में ज्ञान की व्याख्या की है. वैराग्य की भावना, इन्द्रियों का निग्रह, शोक और भय से मुक्ति, अहंकार का त्याग ये सभी ज्ञान के लक्षण हैं. दुःख का कारण सुख की लालसा है, मिल जाने पर उसके खो जाने का भय भी दुःख का कारण है और बाद में उसकी स्मृति भी दुःख का कारण है. ज्ञान का चिंतन करने से ही मन शांति का अनुभव करता है और शांति के बाद उपजा सुख शाश्वत होता है. 

Sunday, July 2, 2017

स्वयं को जिसने जान लिया है

३ जुलाई २०१७ 
हम परमात्मा की पूजा करते हैं, उससे अपने व परिवार जनों के सुख के लिए प्रार्थना करते हैं. किन्तु मन में किसी न किसी रूप में संदेह बना ही रहता है. यदि किसी को उस पर पूर्ण विश्वास हो तो मौन ही उसकी प्रार्थना होगी, तब उसे कुछ माँगने की जरूरत ही नहीं होगी. परमात्मा से हमारा रिश्ता बिलकुल वैसा ही है जैसा खुद के साथ होता है. जितना-जितना खुद से हमारा परिचय प्रगाढ़ होता जाता है, खुदा हमारे करीब होता जाता है. यदि कोई स्वयं को बेशर्त प्रेम करता है तो परमात्मा को प्रेम करता ही है. स्वयं को प्रेम करने के लिए खुद को जानना भी तो आवश्यक है. यदि हम स्वयं को जानते हैं तो ही उसे भी जानते हैं.

Saturday, July 1, 2017

दो के पार ही वह मिलता है

२ जुलाई २०१७ 
बादल बरस रहे हैं, धरती हरी-भरी हो रही है. कुछ लोग इस वर्षा का आनंद उठा रहे हैं तो कितने ही लोग बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं और अपने घरों से उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा है. जीवन सदा ही विरोधाभासों से घिरा हुआ है. यहाँ दिन के साथ रात और सुख के साथ दुःख मिला हुआ है. हमारी नजर यदि द्वन्द्वों के पार एकरस अस्तित्त्व को देखने में सक्षम नहीं होती है तो हम जीवन को उसके वास्तविक रूप में कभी नहीं देख पाते. कभी हँसना तो कभी रोना यही तो जीवन नहीं हो सकता. सारी आपदाओं के पार भी एक ऐसी सत्ता है जो सदा निर्विकार है, जो हमारा मूल है. उससे मिलना ही जीवन से मिलना है.

Thursday, June 29, 2017

पहला सुख निरोगी काया

३० जून २०१७ 
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है, एक व्यक्ति अपनी निर्धनता से तंग आकर मरना चाहता है, एक साधु उससे कहते हैं, तुम्हारे पास तो लाखों रूपये हैं, यदि तुम अपनी एक आँख ही दे दो तो राजा तुम्हें एकम लाख रूपये दे देंगे. इसी तरह वह हर अंग की एक कीमत बताता है. निर्धन व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपने अंग बेचना नहीं चाहता. उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है और वह किसी भी तरह मेहनत करके अपना जीवन यापन करने का प्रण लेता है. हम सभी अपने शरीर की अच्छी तरह देखभाल करते हैं, भरसक उसे उचित आहार, व्यायाम तथा विश्राम देकर स्वस्थ रखने का प्रयत्न करते हैं. इसके बावजूद हम रोगों के शिकार होते हैं, क्योंकि हम अपने भीतरी अंगों का उतना ध्यान नहीं रखते, वे दृष्टि से परे हैं सो हम जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं. जितनी बार हम क्रोध करते हैं, मस्तिष्क और हृदय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. अति ठंडा अथवा अति गर्म भोजन लेने पर दोनों ही स्थति में हमारा पेट प्रभावित होता है. आलस्य और प्रमाद का असर हड्डियों और मांसपेशियों को भुगतना पड़ता है. लोभ और ईर्ष्या का कुप्रभाव हमारी आँतों पर पड़ता है. न जाने कितने व्यर्थ के भय हम पाले रहते हैं, जिसका असर रक्त वाहिनियों पर पड़ता है. 

ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत

२९ जून २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है, उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा. 

Wednesday, June 28, 2017

भाव बनें जब पावन अपने

२८ जून २०१७ 
हमारी पूजा और प्रार्थना मन के किस स्तर से आती हैं, साधक को इसका ध्यान रखना होगा. यदि पूजा से हम कुछ पाना चाहते हैं और प्रार्थना हम इसलिए करते हैं कि लोग हमें धार्मिक कहें, तो दोनों व्यर्थ हैं. पूजा को अहंकार बढ़ाने का नहीं उसे नष्ट करने का साधन बनाना है. जब तक मन पूर्ण संतोष व विश्राम का अनुभव नहीं कर लेगा उसे कुछ न कुछ बनने अथवा पाने का रोग लगा ही रहता है. ध्यान के बिना पूर्ण विश्राम सम्भव नहीं, अथवा तो मन जब श्रद्धा से ओतप्रोत हो जाये. भावशुद्ध हों तभी ध्यान घटता है. देह को पूर्ण शांत अवस्था में बैठाकर गहरी लम्बी श्वासें लेते हुए जब साधक स्वयं को परम के सम्मुख छोड़ देता है तब वही शांति और संतोष बनकर उसके मन व देह पर आच्छादित हो जाता है. 

Tuesday, June 27, 2017

भीतर एक विराट छिपा है

२७ जून २०१७ 
हमारा छोटा मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता, उसे जितना मिले उस पर वह अपना अधिकार ही मानता है. कृतज्ञता की भावना उसमें नहीं होती. उसे प्रेम भी मिलता है तो वह उसे अपनी योग्यता मानता है अथवा तो उसके प्रति उदासीनता दिखाता है. जीवन में जितने भी दुःख अथवा कष्टों का अनुभव हमें होता है वह इसी छोटे मन के कारण. हमारे ही भीतर एक विराट मन भी है, जहाँ कोई अपूर्णता नहीं, जो सदा तृप्त है, जो सृष्टि की हर वस्तु के प्रति हर क्षण कृतज्ञ है. जिसे देह, मन, बुद्धि आदि भी ईश्वर का एक उपहार लगता है, जिसके माध्यम से वह जगत को देख, सुन सकता है. साधना के द्वारा हम छोटे मन से ऊपर उठकर विराट से जुड़ते हैं. हम देने के भाव से भर जाते हैं. उत्साह, सृजनात्मक शक्ति, उदारता, प्रेम, कृतज्ञता, अभय, सजगता और आनंद हमारे स्वभाव में झलकने लगते हैं.

Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Wednesday, June 21, 2017

उसके आने के ढंग अजब

२२ जून २०१७ 
हमारा मन कभी वर्तमान में रहता नहीं और परमात्मा को अतीत या भविष्य में मिला नहीं जा सकता, सो कभी मिलन घटता ही नहीं. जैसे कोई किसी के पड़ोस में रहता है, पर जब वह काम पर जाता है, दूसरा सो रहा होता है और पहले के वापस आने तक उसकी शिफ्ट आरम्भ हो चुकी होती है, तो महीनों क्या वर्षों तक वे दोनों एक—दूसरे से नहीं मिल सकते. परमात्मा भी हमारा निकटतम है, पर क्यों कि जब वह मिल सकता है, हम वहाँ होते ही नहीं, जीवन बीत जाता है हम अजनबी ही बने रहते हैं. जब कोई किसी कार्य में तत्परता से लगा है, अतीत या भावी की कोई स्मृति या कल्पना तो दूर उसे यह भी ख्याल नहीं कि वह है, तब चुपके से परमात्मा आ जाता है और उसके काम में सहयोग करता है, तभी तो तल्लीनता में एक अपरिमित सुख का अनुभव होता है. 

योगी बनें उपयोगी बनें

२१ जून २०१७ 
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है. योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए करना. 

Sunday, June 18, 2017

जिन खोजा तिन पाइयाँ

२० जून २०१७ 
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता. हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है. 

Saturday, June 17, 2017

खोज मूल की होगी जब

१८ जून २०१७ 
हमारा मूल स्वभाव शांति, प्रेम और आनंद है, किसी को भी अशांत रहना पसंद नहीं, कोई उससे नफरत करे यह भी कोई नहीं सह सकता और दुःख से बचने की सहज ही हरेक के भीतर प्रवृत्ति होती है. नन्हा शिशु सहज ही प्रसन्न होता है, उसके प्रति अपने-पराये सभी का प्रेम उमड़ता है और छोटा सा दुःख आने पर वह रो-रोकर उससे छुटकारा पाने के लिए गुहार लगता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर अशांत होना सीख जाते हैं, प्रेम का अर्थ हर समय दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना मानने लगते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए वस्तुओं का आश्रय लेने लगते हैं. समय के साथ-साथ हमारा मूल स्वभाव कहीं नीचे दब जाता है, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से ये चीजें मिल ही नहीं सकतीं, इसका ज्ञान जब तक होता है तब तक तो हम अपने स्वभाव को भूल ही चुके होते हैं. अब शांति, प्रेम, आनंद के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं. जीवन में सत्य की खोज आरम्भ होती है. 

Friday, June 16, 2017

सुख-दुःख का कारण निज कर्म

१७ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक हम जो भी कार्य करते हैं, उसका लक्ष्य एक ही होता है, हमारा व हमारे प्रियजनों का जीवन सुखमय हो. किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम कभी-कभी ऐसे कार्य कर देते हैं जो दुःख का कारण बनते हैं. इस दुःख से कैसे बचा जाये, शास्त्र व संत इसका मार्ग बताते हैं. किसी भी  कार्य को करने से पहले उसके फल का विचार कर लेना चाहिए. यदि वह कार्य दीर्घकाल तक दुःख देने वाला है और करते समय अल्प सुख देने वाला है तो उसे नहीं करना चाहिए. इसके विपरीत यदि वह कार्य अल्पकाल के लिए कठिन लगता है पर उसका फल दीर्घकाल तक सुख देता है तो उसे शीघ्र ही कर लेना चाहिए. उदाहरण के लिए योग साधना करने में आरम्भ में श्रम करना होता है पर उसके कारण जीवन में स्वास्थ्य व आनंद के जो पुष्प खिलते हैं उनकी तुलना में वह दुःख कुछ भी नहीं. देर रात तक जगना व सुबह देर से उठाना तात्कालिक रूप से सुख देता प्रतीत होता है पर देह में तमस व रोग का कारण बनता है. 

Thursday, June 15, 2017

अति सर्वत्र वर्जयेत्


मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही. जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता व शांति का अनुभव कर सकते हैं.

Wednesday, June 14, 2017

कभी छुप न सकेगा परमात्मा

१५ जून २०१७ 
परमात्मा से हमारा मिलन क्यों नहीं होता, इसका सबसे बड़ा कारण है हमारी नकारात्मकता. परमात्मा सकारात्मकता का पुंज है. जैसे प्रकाश का अँधेरे से मिलन नहीं हो सकता वैसे ही परमात्मा का द्वेषपूर्ण मन से मिलन नहीं हो सकता. रेत और चीनी के कण कभी नहीं मिलते, मगर जल और चीनी मिल सकते हैं, ऐसे ही आत्मा व परमात्मा मिल सकते हैं, मन और परमात्मा नहीं. मन आत्मा के सागर पर उठी लहरों का ही नाम है, कुछ पल के लिए मन यदि शांत हो जाये तो परमात्मा की शांति का अनुभव हमें होता है. ध्यान, साधना के द्वारा जब हम मन को नकारात्मकता से मुक्त करते हैं, हमारे भीतर परमात्मा का सूर्य जगमगाने लगता है. 

तू ही दाता तू ही विधाता

१४ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार हम जाने-अनजाने भगवान का नाम लेते रहते हैं. किसी कठिनाई में फंस जाएँ तब तो उसके नाम का जप भी शुरू हो जाता है. कुछ अच्छा हो जाये तो उसको धन्यवाद देते हैं और न हो तो उससे शिकायत भी करते हैं, किंतु कभी बैठकर उसकी नहीं सुनते. एकतरफा संवाद ही चलता रहता है और हम अपनी मर्जी से जीवन को जीये चले जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जिस भगवान के बिना हमारा जीवन चल ही नहीं सकता, वह हमारी कल्पना में ही है. बचपन से जो भी हमने सुना है, किताबों में पढ़ा है और कुछ हमारी स्वयं की धारणाओं के अनुसार एक छवि हमने गढ़ ली है और भगवान व हम स्वयं दो समानांतर रेखाओं की तरह चलते चले जाते हैं, जिनके मिलन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. 

Tuesday, June 13, 2017

भगवद् गीता किञ्चिदधीता

13 jun 2017 
भगवद गीता पूजा की पोथी नहीं है, ग्रंथालय की शोभा नहीं है. भगवान का गीत है, ब्रह्म और जीव का अद्भुत संवाद है. ज्ञान रूपी अनंत अलौकिक खजाना है. निज स्वरूप में अवस्थित होकर जीवन जीने की कला है. चैतन्य का बहता हुआ झरना है यह, शब्दों के जंजाल से मुक्त होकर यदि कोई इस प्रवाह का अनुभव कर सके तो वह चैतन्य के साथ एकत्व का अनुभव कर सकता है. हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था पर यह नित नवीन है. सदियाँ बीत जाती हैं पर ज्ञान नहीं बदलता. यह मोक्ष शास्त्र है.

Saturday, June 10, 2017

मार्ग वही जो घर पहुँचाये

११जुन २०१७ 
जीवन हमें श्रेय और प्रेय दो मार्ग सुझाता है. पहला श्रेय मार्ग सदा ही कल्याण की ओर लेकर जाने का मार्ग है और दूसरा प्रेय मार्ग संसार के आकर्षणों का अनुभव कराते हुए सुख-दुःख के मार्ग पर भटकाने वाला है. हमारे सम्मुख अस्तित्त्व हर क्षण चुनाव का अवसर प्रस्तुत करता है. हम लगभग सदा ही प्रेय का चुनाव कर लेते हैं, यह आरम्भ में सुख देने वाला प्रतीत होता है, इसमें ज्यादा श्रम भी नहीं करना पड़ता, यह हमारी रुचियों के अनुकूल पड़ता है और हमें लगता है हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से इस मार्ग पर चल रहे हैं. जबकि हमारे संस्कार विवश करते हैं और हम बने बनाये रास्तों पर ही चलते रहते हैं, जो बार-बार उन्हीं पर घुमाते रहते हैं, पहुंचना कहीं होता ही नहीं. दूसरी तरफ कल्याण का मार्ग आरम्भ में कष्टपूर्ण लग सकता है, इस पर प्रयास पूर्वक चलना होता है, पर अंत में यही मार्ग हमें ऐसे जीवन की ओर ले जाता है जो सहज है, आनंदपूर्ण है और जिसको पाने के लिए संत सदा से कहते आये हैं.  

भीतर का जब दिखे गगन

१० जून २०१७ 
मन हर पल कल्पनाओं अथवा स्मृतियों के गलीचे बुनता रहता है. इसी व्यस्तता में वह आत्मा का निर्मल स्पर्श चूक जाता है. हमारे चारों ओर वह अव्यक्त सत्ता हर पल विद्यमान है. किन्तु मन के पर्दे पर अनवरत खेल चलता रहता है तो वह पर्दा कभी खाली ही नहीं होता और उसका होना छिपा ही रहता है. जैसे आकाश पर यदि सदा ही बादल बने रहें तो कोई आकाश को कैसे देखेगा, आत्मा के आकाश पर मन के बादल कभी विलीन ही नहीं होते. मन का होना आत्मा पर ही निर्भर है पर यह उसके अस्तित्त्व से ही बेखबर है, इसी को संतों ने माया कहा है. नींद में जब चेतन मन सो जाता है तब आत्मा का स्वाद मिलता है, तभी नींद इतनी प्रिय होती है. किन्तु नींद में उससे मुलाकात नहीं हो पाती, यह तो ध्यान में ही सम्भव है, जब मन भी न रहे और बुद्धि का सीधा साक्षात्कार आत्मा से हो सके.

Wednesday, June 7, 2017

बन सुवास जब मन बिखरे

७ जून २०१७ 

बादल बरस रहे हैं जैसे, कृपा बरसती प्रभु की वैसे
भीगा जैसे घर का आँगन, भीगे वैसे अंतर उपवन !

परमात्मा की कृपा का अनुभव साधक को हर घड़ी होता है, पर उस कृपा को सुवास बनाकर बाहर बिखेरना भी तो आना चाहिए. जैसे धरती जल लेकर सुवास देती है, वैसे ही कृपा के जल से भीगा हुआ मन प्रेम के गीत रचे. सुनहले शब्दों की चादर बुने, मोती से वचन कहे, जिसे हंस चुगें. धरा देती है, गगन देता है, प्रकृति देती है और मानव भरे जाते हैं भीतर. पाना ही उनका लक्ष्य है, पाकर वे उसे व्यर्थ कर देते हैं.  

Sunday, June 4, 2017

पर्यावरण बचाएं हम

५ जून २०१७ 
पृथ्वी को हम माँ कहते हैं. उसी से हम जन्मे हैं और एक दिन उसी में हमारे भौतिक अवशेष लीन हो जाने वाले हैं. पृथ्वी के उपकारों को याद करना आरम्भ करें तो उनका अंत ही नहीं आएगा. हमारे वस्त्र, मकान, भोजन सभी कुछ तो उसी से मिला है. जल को भी वही धारण करती है और अग्नि को भी अपने उदर में वही धारण किये हुए है. हजारों तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, हीरे-जवाहरात और खनिज लवण क्या नहीं है उसके आश्रय में. मानव ने पृथ्वी के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है. जंगल नष्ट किये जा रहे हैं, हवा को प्रदूषित किया जा रहा है, जल को भी पीने योग्य नहीं छोड़ा है. मानव का अज्ञान उसे किस ओर ले जा रहा है वह अपनी बेहोशी में यह भी नहीं देख पा रहा है. विश्व पर्यावरण दिवस हमें जागने के लिए मजबूर करता है, यदि हम अब नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी को जन्म से ही रोगों का सामना करना पड़ेगा. आज भी प्रदूषण के कारण रोगों की संख्या बढती जा रही है. योग युक्त जीवन शैली अपना कर हम पुनः इस धरा को हरा-भरा बना सकते हैं.  

Saturday, June 3, 2017

बँटती रहे ऊर्जा पल-पल

४ जून २०१७ 
जीवन प्रतिदिन एक नई सुबह का वरदान देता है. हर रात अपने साथ सारी थकान ही नहीं ले जाती, विश्राम के पलों में नई ऊर्जा से मन को भर देती है. जिसने हँसकर सुबह का स्वागत किया वह अपनी दोपहर में कुछ रचने ही वाला है, और उसकी संध्या भी अनंत के प्रति आभार से भर जाएगी. रात्रि का स्वागत भी वह एक तृप्त हृदय के साथ करेगा. जिसने आपने आनन्द को प्रकृति के साथ साझा करना सीख लिया प्रकृति भी उसके मार्ग में चमत्कार बुन देती है. प्रकृति पल-पल अपना सब कुछ बाँट रही है, हमें भी इस जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसी से मिला है, उसी की भांति देने की कला जब किसी को आ जाये तो जीवन का हर पल नया लगता है. 

Friday, June 2, 2017

भाग्य सदा हम स्वयं ही रचते

३ जून २०१७ 
यह जगत हमें अपनी आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ही मिलता है. मन की गहराई में जैसा हम चाहते हैं, यह सृष्टि वैसा ही रूप धर कर हमारे सामने प्रस्तुत होती रहती है. हर आत्मा के पास यह क्षमता है किन्तु मानव योनि में आकर ही वह इसका लाभ उठा सकती है. भाग्य का अर्थ बस इतना सा ही है कि अतीत में हमने कुछ चाहा था, वर्तमान में वह हमें मिल रहा है.

Wednesday, May 31, 2017

सबके हित में अपना हित हो

१ जून २०१७ 
यह ब्रह्मांड आपस में किन्हीं अदृश्य तंतुओं से जुड़ा हुआ है. मानव व अन्य सभी सूक्ष्म व स्थूल जीव अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए परस्पर निर्भर हैं. सभी जैसे एक विशाल देह के अंग हों. जिस प्रकार हमारी देह में हाथ अपने लिए नहीं है, पूरी देह की देखभाल के लिए है, पैर भी उसे गति प्रदान करने के लिए हैं, इसी प्रकार सभी प्राणी स्वयं के लिए नहीं हैं अन्यों के लिए हैं. जब समाज व परिवार में हर कोई अपनी उन्नति के साथ-साथ सभी की उन्नति के उपाय सोचेगा तो समाज  अपने आप समृद्धिशाली होगा. अपने पास जो भी योग्यता हो वह समाज के काम आ सके, ऐसी भावना भीतर जगते ही मन को गहरा विश्राम मिलता है. हाथों के द्वारा सेवा न भी ही सके, तो धन के द्वारा, ज्ञान के द्वारा, अपना समय देकर अथवा जगत के प्रति मंगल कामनाएं भेजकर ही हम उस ऋण को किसी हद तक उतार सकते हैं जो हमें इस सृष्टि के प्रति चुकाना है.

Tuesday, May 30, 2017

स्वयं से जब संबंध बने

३१ मई २०१७ 
अहंकार दुःख का भोजन करता है. किसी पल यदि मन में दुःख है तो अहंकार है, यदि कोई पूर्ण सुख में है तो उस क्षण में अहंकार रहता ही नहीं. हमारा अहंकार जितना बड़ा है उतने ही बड़े हमारे दुःख होंगे. जब भीतर से अहंकार चला जाता है तब जो खालीपन भीतर आता है वही शांति है, आनन्द है. ‘मैं’ और ‘मेरे’ से बने सारे संबंध दुःख का कारण हैं, चाहे वे किसी वस्तु से हों, व्यक्ति से या परिस्थिति से. वास्तव में आत्मा शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, इसीलिए संत कहते हैं सारे संबंध मिथ्या हैं, मिथ्या का अर्थ यह नहीं कि वे हैं ही नहीं, वे हैं पर जिस रूप में हम उन्हें संबंध मानते हैं, उस रूप में नहीं हैं. जब तक हमारा स्वयं के साथ संबंध हमें स्पष्ट नहीं होता तब तक हम अन्यों के साथ अपने सच्चे संबंध को जान ही नहीं पाते. 

Monday, May 29, 2017

जीवन जब उपहार बने

३० मई २०१७ 
जीवन की संपदा अपने आप में इतनी अनमोल है कि उस पर सब कुछ लुटाया जा सकता है, किन्तु मानव न जाने किस सुख की तलाश में जीवन को ही लुटा देने पर तुला रहता है. हम वस्तुओं को इकठ्ठा करते हैं, फिर वे एक बोझ बनकर अपनी सुरक्षा के लिए हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं. संबंध बनाते हैं पर दोनों तरफ की अपेक्षाएं उसे एक संघर्ष बना देती हैं. हम चाहते हैं सारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनी रहें पर जीवन का स्वभाव ऐसा नहीं है, यहाँ पल-पल संयोग बनते-बिगड़ते रहते हैं. इस आपाधापी में हम असली बात को भुला ही देते हैं, परमात्मा का साथ जो हमें सहज ही मिल सकता है, आत्मा का स्पर्श जो सदा ही हमारे साथ रहती है, हमारा मन जो स्वयं में डूबना चाहता है, कभी प्रकृति के सौन्दर्य में, कभी संगीत में, कभी बस चुपचाप प्रियजनों  के साथ  चांदनी रात में बैठकर, लेकिन आज के मानव के पास अपने निकट आने के लिए समय ही नहीं है. जीवन तब एक दुविधा बन जाता है. 

स्रोत छुपा है भीतर एक

२९ मई २०१७ 
जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति आ जाये, कितना भी अँधेरा छा जाये, ऐसा लगे सब रास्ते बंद हो गये हैं, जीवन तब भी भीतर ही भीतर महकता रहता है. यदि मन में इस का पूर्ण विश्वास हो तो आशा की एक छोटी सी किरण उस तक ले जाती है. मन कितने भी प्रश्न खड़ा करता रहे, आत्मा हर क्षण एक मधुर मुस्कान बिछाये प्रतीक्षारत है. आत्मा का स्रोत वह अनंत प्रेम स्वरूप परमात्मा है, जो सदा हितैषी है, सुहृद है. जगत में सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है, यहाँ अच्छा काल भी टिकने वाला नहीं है और बुरा काल भी. हर अनुभव आत्मा को परिपक्व कर सकता है, उसे जीवन के निकट ले जा सकता है यदि कोई हृदय में परम के प्रति आस्था का अखंड दीपक जलाये रखे.    

Friday, May 26, 2017

हितायु की करें कामना

२७ मई २०१७ 
आयुर्वेद के अनुसार हमारी आयु चार प्रकार की हो सकती है. सुखायु, दुखायु, हितायु और अहितायु. सभी चाहते हैं उसका जीवन सुख से पूर्ण रहे, सदा ही उसका हित हो, दुःख अथवा अहित कोई भी नहीं चाहता. किन्तु मात्र चाहने से ऐसा होता नहीं, हमारे कर्म ही यह निर्धारित करते हैं कि इन चारों में से हमारी आयु कौन सी है. यदि किसी की देह स्वस्थ हो, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण व शुद्ध हो, आर्थिक रूप से कोई अभाव न हो, समाज में यश हो अथवा तो अपयश न हो. परिवार में पूर्ण सामंजस्य हो, समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन ठीक से होता हो, धर्म व अध्यात्म की तरफ सहज रूचि हो तो कहा जा सकता है उस व्यक्ति की आयु हितायु है. उसका वर्तमान जीवन ही सुखपूर्ण व सार्थक नहीं है बल्कि आगे आने वाला जीवन भी सुखद होगा.  

सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

२६ मई २०१७ 
निंदक नियरे राखिये’ कबीर निंदक को भी अपने पास रखने को कहते हैं और हम हैं कि मित्रों को भी दूर रखते हैं. हमारा चिन्तन जितना सामान्य होगा, मन में द्वेष रहगा, भेदभाव रहेगा और जितना उच्च होगा वह हमें हल्का कर देगा. हम उपर उठ जाते हैं तो सब एक ही दीखता है, ऊपर जाकर देखें तो बस प्रकाश ही प्रकाश है. नीचे रहें तो कीट भी हैं और कीचड़ भी. हर वस्तु का एक सत्य होता है, उस पर नजर हो तो ऊपर के आवरण हमें भरमा नहीं सकेंगे. हमें शुभ का ही चिन्तन करना है, मन का आवरण हटाना है और अपने भीतर के सत्य का साक्षात्कार करना है. 

Wednesday, May 24, 2017

सहज मिले जब सुख का मोती

२५ मई २०१७ 
पंच इन्द्रियों से मिलने वाला सुख हमारी ऊर्जा को कम करता है, जब तक मन में प्रमाद और बुद्धि में जड़ता रहती है, अर्थात रजो गुण और तमो गुण अधिक होते हैं, हमें इस बात का आभास नहीं होता. सात्विक सुख की झलक मिल जाने के बाद ही समझ में आता है कि आज तक जिन्हें हम सुख के साधन मान रहे थे वास्तव में हमें दुर्बल बना रहे थे. अध्यात्म किसी भी तरह के प्रमाद और जड़ता को तोड़ने के लिए है. योग के द्वारा जब सतोगुण बढ़ता है भीतर सहज ही प्रसन्नता का अनुभव होता रहता है. ध्यान इस ऊर्जा को बढ़ाने का साधन है. 

जुड़ा रहे मन सदा सत्य से

२४ मई २०१७ 
स्व को एक क्षण के लिए भी भुलाना साधक के लिए उचित नहीं है. स्व का अर्थ है अस्तित्त्व के साथ एक होकर रहना, सहज होकर रहना और सजग होकर निरंतर कर्म में रहना. शरीर की हर कोशिका चेतना से ढकी है, यदि मन में नकारात्मक भावनाएं रहेंगी तो चेतना धूमिल हो जाएगी, चेतना जल की तरह है वह जिस पात्र में रखी जाती है उसका ही आकार ले लेती है. मन में हल्का सा भी तनाव हो तो चेतना पर आवरण छा जाता है और देह पर उसका असर होने लगता है. स्व की साधना में लगा हुआ साधक अपने जीवन को सजग होकर देखता है, इस देखने में ही मन शुद्ध होने लगता है, स्व मुखर हो जाता है. 

Tuesday, May 23, 2017

प्रकृति से जो जुड़ जाये

२३ मई २०१७ 
प्रकृति का हर रंग मनोहारी है. वर्षा की रिमझिम हो या या कोहरे से ढकी सुबह, रात की नीरवता हो या भरी दोपहरी में पंछियों के स्वर. प्रकृति के निकट रहने का अवसर जिसे मिलता है वह इसके जादू से अप्रभावित कैसे रह सकता है. प्रकृति माँ है, वह अन्नपूर्णा है, पोषित करती है और यह प्रकृति एक परम शक्ति की अध्यक्षता में कार्यरत है. वह समर्पित है, तभी सहज है. जितना-जितना मानव प्राकृतिक वातावरण से दूर रहने लगा है उसका नाता परमात्मा से भी कट सा गया है. उसकी प्रार्थनाएं भी अब सहज नहीं रह गयीं हैं. हरे-भरे खेतों में दौड़ लगाते, नीले आकाश की छाया में गुनगुनाते हुए कृषक बालक कितने मुक्त प्रतीत होते हैं. 

Sunday, May 21, 2017

भेद अभेद का राज जो जाने

२२ मई २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन शाश्वत तत्व हैं. ईश्वर ने जीव और प्रकृति दोनों को आच्छादित किया हुआ है. प्रकृति जीव के हित के लिए है. जीव दोनों पर आश्रित है, अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए वह प्रकृति पर आश्रित है तो आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर पर. कभी वह प्रकृति के आकर्षण में डूब जाता है और कभी दुःख पाने पर परमात्मा की ओर झुक जाता है. साधना के द्वारा जब वह अपनी प्रकृति से भिन्न अपनी स्वतंत्र सत्ता का अनुभव कर लेता है, और परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो उसके सारे संशय समाप्त हो जाते हैं.  

Thursday, May 18, 2017

जगे प्रार्थना ऐसी भीतर

१९ मई २०१७ 
जीवन सुखमय हो ऐसी कामना सभी करते हैं, हमारे अपनों के जीवन में सदा सुख, सम्पन्नता और स्वास्थ्य बना रहे, ऐसी भी प्रार्थना हम विशेष अवसरों पर करते हैं. इसी तरह हमें भी कितनी बार अन्यों ने सुख व स्वास्थ्य की कामनाएं भेजी हैं, भेजते ही रहते हैं,. क्या हमने कभी सोचा है इन सबका कितना बड़ा असर हमारे जीवन पर पड़ता है. दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी भी बेअसर नहीं जाती, और ऊर्जा के नियम के अनुसार भीतर से निकली हुई हर सकारात्मक ऊर्जा लौट कर हमारे ही पास आती है. ऋषि जब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का गायन करते थे तो उसमें उनके हृदय की सच्ची भावना जुड़ी होती थी, जो जगत के कल्याण हेतु अपना काम करती थी,  वह छोटी सी प्रार्थना लौट कर उन्हें कितना आनन्द से न भर जाती होगी. कितना अच्छा हो यदि रोज सुबह हम अपने लिए तो प्रार्थना करें या न करें स्वजनों, मित्रों और नगर, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण सृष्टि  के कल्याण की कामना से अपने दिन का आरम्भ करें.

योग सधे जर्रे जर्रे से

१८ मई २०१७ 
 नीले अम्बर में सहज उड़ान भरता पंछी कितना प्रफ्फुलित प्रतीत होता है, अपने पंखों पर जब वह अप्रयास तिरने लगता है तब लगता है कोई अदृश्य सत्ता उसे सहेजे है. उसके पंखों में कितनी ऊर्जा है और उसके उर में कितना उल्लास, इसी तरह कूकते हुए पंछी अपनी मस्ती में न जाने कितने गीत गाते हैं. उनके भीतर संगीत के ये सुर किसी अनजान स्रोत से आते हुए प्रतीत होते हैं. मानव इन सबसे अनजान अपने छोटे-छोटे सुखों-दुखों में खोया हुआ प्रकृति के उस स्पर्श से वंचित ही रह जाता है जो मानवेतर जीवों को सहज ही प्राप्त है. कोई मानव जब स्वयं को  कुदरत से एक कर लेता है, विश्व के साथ अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो सारी कायनात उसे अपने साथ नाचती हुई दिखती है. हमारी उर्जा का स्रोत भी अजर हो सकता है बशर्ते हमें उससे जुड़ना आ जाये. 

Tuesday, May 16, 2017

श्वास श्वास है नेमत उसकी

१६ मई २०१७ 
वेदों में ऋषियों ने कितनी सुंदर प्रार्थनाएं गायी हैं. मन जब प्रार्थना से भर जाता है तो शुद्ध होने लगता है. सबके सुख की कामना, सम्पन्नता की कामना जब भीतर सहज ही उठने लगती है तो हृदय मधुरता का अनुभव करता है. जीवन के उपहार को पाकर जो मन अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता के भाव से नहीं भरा वह परमात्मा के आनन्द से वंचित ही रह जाता है. जीवन में प्रेम को अनुभव करने के कोमल पल भी साधक के लिए उसे ही याद करने का निमित्त बन जाते हैं. प्रकृति के सुहाने मंजर हों या किसी के कंठ की मधुर आवाज, वर्षा की सोंधी सुगंध हो या उषा का आकाश, हर शै उसे याद दिलाने का सबब बन जाती है. धन्यता और कृतज्ञता का भाव जिसके हृदय में जग जाता है वह अंतर पल-पल प्रार्थना में लीन रहता है. 

Monday, May 15, 2017

भाव भरा जब अंतर होगा

१५ मई २०१७ 
ऋषि कहते आये हैं भाव यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी. 

Friday, May 12, 2017

गुरू चरणों में नमन सदा

१३ मई २०१७ 
सत्य के खोजी को यदि कोई सत्य का चितेरा मिल जाये तो उसका मार्ग सरल हो जाता है. सरल ही नहीं उसके मार्ग पर फूलों के वृक्ष उग आते हैं. उसकी प्यास बुझाने के लिए कलकल करते झरने भी बहने लगते हैं और सदा एक हाथ उसके सर पर महसूस होता है जो उसे मार्ग पर ही टिकाये रखता है. किसी की दृष्टि उसे मिली है, वह नजर उसे अपने पथपर सजग रखती है. जिसने उस पथ के सारे मोड़ देखे हैं, जो उस पथ के हर कंकर-पत्थर से परिचित है, ऐसा कोई सद्गुरू यदि जीवन में आता है तो जीवन एक उत्सव बन ही जाता है. सत्य की राह तब एक मदमाती ख़ुशबू लिए अपनी ओर बुलाती है. मन निर्भार होकर, निर्भ्रांत होकर सहज ही अपने भीतर होते परिवर्तनों को देखता है. सुख-दुःख आते हैं, परिस्थितियाँ आती हैं, कभी रोग भी सताते हैं पर सबका साक्षी बना मन एक उसी के चरणों में समर्पित रहता है. जिसे एक बार सत्य की झलक मिल जाती है वह इस पल-पल बदलती दुनिया में कमल की भांति असंग रहना सीख जाता है.

Thursday, May 11, 2017

जग जाये जब शक्ति भीतर

१२ मई २०१७ 
शास्त्रों में कहा गया है, मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है. यहाँ जिस मानव जन्म की बात कही गयी है वह केवल मनुष्य का शरीर धारण करने मात्र से नहीं मिल जाता.यदि कोई अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग केवल देह को बनाये रखने के लिए ही करता है अथवा केवल इन्द्रियों के सुखों की प्राप्ति के लिए ही करता है तो उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता. मानव के भीतर देवत्व को पाने की जो चाह छिपी है उसे जागृत करके उस मार्ग पर चलना ही सही अर्थों में उसे मानव बनाता है. एक बीज के रूप में सभी के भीतर जो आत्मशक्ति छिपी है, साधना और भक्ति के द्वारा उसे प्रकट कर सकना ही मानव जन्म को दुर्लभ बनाता है. मनुष्य होकर जो भय, क्रोध अथवा शोक पर विजय प्राप्त नहीं कर सका उसने अभी देवत्व की ओर यात्रा आरम्भ नहीं की अर्थात वह मानव होने के वास्तविक अर्थ से वंचित ही रह गया. 

चिर नूतन जगती का मेला

११ मई २०१७ 
अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये. इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में, व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !  

Monday, May 8, 2017

मन जो लौट गया निज घर में

८ मई २०१७ 
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के  लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए. 

Thursday, April 27, 2017

तेरा तुझको अर्पण

२८ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों में दान की महिमा यूँ ही नहीं गाई गयी है. देने का भाव जिसके मन में जगता है वह देवत्व की और कदम बढ़ाने लगता है. प्रकृति इतनी प्रिय क्यों लगती है क्यों कि वह निरंतर लुटा रही है. नन्हे बच्चे सहज ही मुस्कान बांटते रहते हैं. पालतू पशु निस्वार्थ प्रेम लुटाते रहते हैं. संत जो समाज को सिर्फ देते ही देते हैं, सबके आदर के पात्र बन जाते हैं. तन, मन धन किसी भी प्रकार से हमें इस जगत  में कुछ देने का भाव रखना है. हाथों से सेवा न भी कर सकें तो वाणी से अथवा सद्विचारों के रूप  में मानसिक सेवा भी कर सकते हैं. ऐसा करने से सबसे बड़ा लाभ हमारा होता है, वस्तुओं के प्रति आसक्ति घटती है, मन खाली होता है और परमात्मा की कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है. जो खाली है, वही तो भरा जायेगा. हरेक के पास जगत को देने के लिए बहुत कुछ है, बल्कि जो कुछ हमारे पास है वह जगत से ही मिला है तो उसी की वस्तु उसी को लौटा देनी है और मुक्त भाव से इस जगत में विहार करना है.  

भरा हुआ है जो खाली

२७ अप्रैल २०१७ 
हम स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं , अपना आप इतना छोटा लगता है कि कुछ करके उसे भरना चाहते हैं. हमारे कृत्य उस खालीपन को भरने के लिए हैं न कि इस जगत को समृद्ध बनाने के लिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम स्वयं को जानते नहीं, अपने भीतर के उस खालीपन को भी नहीं जानते, जिसमें अपार सम्भावनाएं छिपी हैं . एक बार जो स्वयं को न कुछ होना स्वीकार लेता है जो वास्तव में सत्य है, तत्क्षण उसके जीवन में पूर्णता का अनुभव होने लगता है, कुछ नहीं को कुछ नहीं से ही भरा जा सकता है. इस ब्रहमांड  में जो दिखाई देता है वह अदृश्य की तुलना में बहुत थोड़ा है. सूक्ष्म स्थूल से ज्यादा बलशाली है. हमारा खालीपन ही वास्तव में हमारी संपदा है और उसी से हम भागते हैं, यही तो माया है. 

Tuesday, April 25, 2017

बहता जाये मन नदिया सा

२६ अप्रैल २०१७ 
प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों को हम आसानी से स्वीकार लेते हैं. उसके अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं. सर्दी और गर्मी से बचने के कितने ही साधन मानव ने खोज निकाले हैं. देह भी प्रकृति का ही अंश है और मन भी, देह भी सदा एक सी नहीं रहने वाली और मन तो पल-पल में बदलता है. जैसे स्वयं का मन बदलता है वैसे ही अन्यों का भी. किसी के प्रति कोई धारणा बनाकर उसी के अनुसार उससे व्यवहार करना वैसा ही है जैसे ग्रीष्म ऋतु के चले जाने पर भी सूती वस्त्र ही पहनने का आग्रह रखना. जैसे रुका हुआ पानी पीने लायक नहीं रहता वैसे ही रुका हुआ मन यानि की पूर्वाग्रहों से युक्त मन भी मैत्री,  करुणा व मुदिता के मार्ग पर नहीं चल सकता. जगत के प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव हमें जड़ता से मुक्त रखता है. अंतर में जगी करुणा ह्रदय को कोमल बनाये रखती है और मुदिता तो वह आभूषण है जो हर हाल में हमें सौन्दर्य प्रदान करता है. 

Monday, April 24, 2017

स्रोत ऊर्जा का हो विकसित

 २५ अप्रैल २०१७ 
जीवन हमें नित नई चुनौतियाँ देता है, नये अवसर देता है, वह हर पल नये नये मार्ग सुझाता है, यदि हम नये को स्वीकारने में झिझकते हैं और उसी पुराने रास्तों  पर चलते रहते हैं तो जीवन वैसा ही बना रहता है. उसमें कोई सकारात्मक परिवर्तन आ ही नहीं सकता. प्रकृति शाश्वत होते भी नित नूतन है क्योंकि वह विरोध से घबराती नहीं, वह हर पल को वैसा ही स्वीकारती है और अपनी ऊर्जा को विरोध में नहीं विकास में खर्च करती है. हमारी ऊर्जा नकार में व्यर्थ ही जाती है और कई बार तो हम केवल अहंकार के कारण ही अपनी बात को गलत जानते हुए भी उस पर अड़े रहते हैं. कोई भी नकारात्मक भाव हमारी ऊर्जा के स्रोत को झुलसाने का काम करता है और सहजता व स्वीकार उसे पनपने का अवसर देता है. परमात्मा सहज भाव से हमें स्वीकार रहा है हर पल वह हमारे साथ है और यदि उसकी तरह हम भी जीवन को सहज ही खिलने का अवसर दें तो आनंद हमारा स्वभाव बन जायेगा.

Sunday, April 23, 2017

सुख भी जब बाधा बन जाये

२४ अप्रैल २०१७ 
हर व्यक्ति की आंतरिक पुकार एक ही है. सभी सुख और शांति का जीवन जीना चाहते हैं. सभी स्वस्थ रहना और सम्पन्न रहना भी चाहते हैं. सभी समाज में अपना सम्मान हुआ देखना चाहते हैं. इन्हीं को शास्त्रों में वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा और यशेष्णा के नाम से कहा गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि इन तीन एषनाओं के रहते कोई पूर्ण रूप से दुखों से मुक्त हो ही नहीं सकता. इसका अर्थ हुआ सुख की इच्छा ही दुःख का कारण बनती है, किसी भी तरह का अभाव भी दुःख है, सम्मान की आकांक्षा ही अपमान का बीज बो देती है. जब तक यह कटु सत्य हमें स्वीकार नहीं है तब तक हम सुख-दुःख के डोले में झूलते ही रहेंगे और हर सुख अपने पीछे एक दुःख की एक लंबी कहानी छिपाए होगा अथवा तो भविष्य में लायेगा. जब मन खाली हो, जीवन अपने असली रूप में सामने आता है. जब कोई चाह मन को नहीं सताती तब यह अपने मूल से जुड़ा रहने में ही आनंद का अनुभव करता है.

Saturday, April 22, 2017

मुक्त यहाँ स्वयं से ही होना

२३ अप्रैल २०१७ 
अपने ही संस्कारों में बंधे-बंधे हम जीवन को एक संघर्ष बना लेते हैं. हमें अच्छी तरह ज्ञात है, हमारे लिए कैसा भोजन उचित है, किस मात्रा में उचित है पर संस्कार वश उसी भोजन को हम ग्रहण करते हैं जो आज तक करते आ रहे हैं और जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. क्रोध करने से सदा ही हानि उठायी है पर संस्कार वश उन्हीं  बातों पर पुनः-पुनः झुंझला जाते हैं. यही तो बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है जिसे साधना के द्वारा हमें खोलना है. अपने ही मन के बनाये जाल को तोडकर भीतर एक ऐसी शुद्ध सत्ता को जन्म देना है जो किसी भी तरह के आग्रह से मुक्त हो, जो सहज ही अपना हित चाहने वाली हो, जिससे अहित होने का कोई डर ही न रहे, अन्यथा हम स्वयं ही अपने शत्रु बन जायेंगे और दोष भाग्य अथवा परिस्थिति पर ड़ाल देंगे. स्वयं के हर भाव, विचार और कर्म की जिम्मेदारी लिए बिना हम मनुष्य होने के अधिकारी नहीं हो सकते.