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Saturday, August 8, 2026

जीवन में जब ध्यान सधेगा

यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।







Thursday, December 29, 2022

शरण में आए हैं हम तुम्हारी

शरणागति का अर्थ है जीवन में आने वाली हर परिस्थिति को समता से स्वीकार करने की क्षमता को विकसित करना। अक्सर हम सोचते हैं कोई ईश्वर की शरण में है तो अब उसके जीवन में कोई विकट परिस्थिति आएगी ही नहीं। जीवन विपरीत से बना है, यहाँ दो साथ-साथ चलते हैं। जो आज स्वस्थ है, वही कल रोगी हो सकता है। जो आज धनी है, वह कल धनहीन भी हो सकता है। परमात्मा की शरण का अर्थ है कोई इन दो के पार जाकर रहना सीख गया है, वह हर स्थिति को साक्षी भाव से स्वीकार कर सकता है। बाहर कुछ भी घटता हो गहराई में उसका मन समता में रहना सीख गया है। ऐसे मन में यह विश्वास सदा बना रहता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है और सब जानता है। 


Sunday, May 2, 2021

नाम रूप के बनें साक्षी

 नाम और रूप से यह सारा जगत बना है, आत्मा उनसे परे है. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद  और मत्सर हमें आत्मपद से नीचे उतार देते हैं, हमारी गरिमा से हमें च्युत कर देते हैं. रूप के प्रति आसक्ति को ही काम कहते है. कामना जगते ही लोभ उत्पन्न होता है, इच्छित वस्तु न मिलने पर या मिलकर टिके न रहने पर क्रोध होता है. क्रोध से अच्छे-बुरे का विवेक जाता रहता है. इस मोह से बुद्धि का विनाश हो जाता है. मन पर मद यानि एक बेहोशी छा जाती है और तब भीतर द्वेष का जन्म होता है और सारा सुख-चैन क्षण भर में हवा हो जाता है. आनंद में बने रहना आत्मा के निकट रहना है और दुःख, चिंता में बने रहना आत्मा से दूर चले जाना है. आँखें, रूप को देखती हैं, दोनों ही प्रकृति के अंग हैं और तीन गुणों से निर्मित हैं. आँखों के पीछे मन देखकर प्रसन्न होता है, आत्मा भी यदि स्वयं को मन या आँखें अर्थात देह मानकर प्रसन्न होने लगे तो वह अपने पद से नीचे आ गया, वह साक्षी मात्र बना रहे, मन व आँखों को प्रसन्न देखकर उसी तरह प्रसन्न हो जैसे दादाजी अपने पुत्र को उसके पुत्र से खेलते हुए देखते हैं. आत्मा तो स्वयं ही आनंद स्वरूप है, उसे जगत से सुख लेने की क्या आवश्यकता है ? वह स्वयं को भूली हुई है इसलिए कामनाओं के वशीभूत होकर सुख-दुःख का अनुभव करती है. यही तो अज्ञान है, जिससे गुरू हमें दूर करना चाहते हैं. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, भगवद्गीता का यह वाक्य तब समझ में आता है. प्रकृति ही प्रकृति के साथ खेल रही है, पुरुष की उपस्थिति में. उसकी उपस्थिति के बिना कुछ भी सम्भव नहीं, पर वह स्वयं में पूर्ण है यह मानते हुए लीला मात्र समझकर जगत को देखना है.  जैसे रात का स्वप्न टूट जाता है वैसे ही दिन का स्वप्न भी मृत्यु के एक झटके में टूट जाने वाला है.  


Friday, July 17, 2020

तीन गुणों का जो साक्षी


भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है, गुण ही गुणों में वर्तते हैं. हम अपनी सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकृति के अनुसार कर्मों को करते हैं. यही गुण हमारे कर्मों का कारण बनते हैं और हम स्वयं को कर्ता मानकर उनके द्वारा प्राप्त सुख-दुःख का भोग करते रहते हैं. यह क्रम जाने कब से चलता आ रहा है. अंतर्मुखी होकर जब साधक इस सत्य को देखता है तो गुणातीत होने की तरफ उसके कदम बढ़ते हैं. जब साक्षी भाव बढ़ने लगता है तो वह गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता. यदि तमस के कारण भीतर प्रमाद है तो वह उसके वश में नहीं होता, मन यदि चंचल है तो यह जानकर कि रजोगुण बढ़ा हुआ है वह ध्यान का प्रयोग करता है. सत्व में स्थित होने पर शांति का भी भोक्ता नहीं बनता बल्कि स्वयं को सदा ही अलिप्त देखता है. 

Tuesday, June 12, 2018

जीवन नैया सदा डोलती


१२ जून २०१८ 
जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. यहाँ फूल के साथ कांटे भी हैं और सुख के साथ दुःख भी. यहाँ हर शै जोड़े में आती है. स्वास्थ्य के साथ रोग भी है और बचपन के साथ बुढ़ापा भी. जो इन दो के पार निकल गया वह बच गया जो दो में से एक को चाहता रहा और एक से बचता रहा, वह जीवन भर बंधन में फंसा रहा. पुण्य कर्म उदय होने पर सहज ही आनंद का अनुभव होता है, पाप का उदय होने पर विपत्ति आती है. सब कुछ सदा ही ठीक-ठीक चलता रहे ऐसी कामना जो करता है, उसे दो के पार ही जाना होगा. उस स्थिति में मन साक्षी भाव में टिकना सिख जाता है. साक्षी भाव में रहकर, कर्त्तव्य कर्म को पालन करते हुए अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने वाले साधक के जीवन में भविष्य के लिए पाप कर्म जमा नहीं होते. उसका वर्तमान भी संतुष्टिदायक होता है.

Monday, February 19, 2018

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा


२० फरवरी २०१८ 
जीवन हर पल नया है, एकदम ताजा, अछूता सा..हर घड़ी उसका स्पर्श मिले इसके लिए हमें भी हर क्षण का साक्षी होना होगा. उसी क्षण में उसे जानना होगा, हम वर्तमान को तब जीते हैं जब वह बीत जाता है, हम भविष्य को तब जीते हैं जब वह घटा भी नहीं होता. मन जिन बातों में हमें भरमाये रखता है, वे या तो बासी हो चुकी होती हैं, अथवा तो कल्पनाएँ मात्र ही होती हैं. परमात्मा उस नन्हे से पल में अपनी झलक दिखाता है, जिसमें हम उससे मिलने की कोई न कोई योजना बना रहे होते हैं. हम उसका नाम लेते हैं, ताकि हमारा जीवन वह भविष्य में खुशियों से भर दे, उसका नाम लेते समय यदि उससे मुलाकात नहीं हुई तो समझना चाहिए कि होगी ही नहीं. धरा इस क्षण में जैसी है, और गगन इस क्षण में जैसा है, वैसा अनंत युगों में नहीं हुआ, इस चमत्कार को जो खुली आंखों देख ले, वह कभी परमात्मा से विलग नहीं हो सकता.  

Tuesday, October 10, 2017

जग में रहे साक्षी बन जो

१० अक्तूबर २०१७ 
अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है. लाओत्से ने कहा है कि कोई मुझे हरा ही नहीं सका, कोई मेरा शत्रु भी न बना, कोई मुझे दुःख भी न दे सका क्योंकि मैंने न जीत की, न मित्रता की न सुख की अपेक्षा ही संसार से की. जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा है. परमात्मा ने किसी को इस जगत में खाली हाथ नहीं भेजा है. हम यदि उसके हैं और वह भरा हुआ है तो हमें किस बात की कमी हो सकती है. हम जिस शांति और ख़ुशी की तलाश बाहर कर रहे हैं, यदि उसी की तलाश भीतर करें तो वह मौजूद ही है. वास्तव में हमें वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं का साक्षी होना सीखना है, उनसे जुड़ना अथवा उनके द्वारा कुछ पाने की इच्छा करना ही दुःख को निमन्त्रण देना है.

Friday, May 15, 2015

साक्षी का जब फूल खिलेगा

फरवरी २००९ 
हमारी नजर दूसरों के दोषों पर रहती है, जिससे अपने दोष नहीं दीखते. सद्गुरु कहते हैं, हम अपना अवलोकन करें जैसे कोई रास्ते के किनारे खड़ा होकर तटस्थ भाव से भीड़ को देखता है. हम न्यायाधीश न बनें, साक्षी बने रहें और हमारी तटस्थता से देखने से पता चलता है कि हम अपने कृत्यों से अलग हैं, हम कर्ता नहीं हैं, यही मुक्ति का द्वार है. जो अपने शुभ कर्मों से बंधा है, वह अशुभ से भी बंधा रहेगा. जिसने पुण्य का फल चाहा वह पाप के फल से बंधा ही रहेगा. राग-द्वेष से मुक्त मन ही साक्षी बन सकता है. साक्षी की सुवास टिकी रहे तो दिन भर मुदिता बनी रहती है. परमात्मा भीतर ही है, हृदय परमात्मा का है पर बुद्धि समाज द्वारा दी गयी है. प्रार्थना हृदय से उतरती है तो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है. वह अनवरत प्रतीक्षारत है, हम ही नजरें बचा लेते हैं.


Tuesday, January 27, 2015

कर्मशील हो पल पल अपना

जनवरी २००८ 
सम्बंध ही वह दर्पण है जिसमें हम अपना वास्तविक रूप देखते हैं. हमारे संबंधों की नींव में यदि मोह नहीं है तो उनमें कभी कटुता नहीं आती. भीतर जब एक क्षण के लिए भी विचलन न हो, सदा समता ही बनी रहे तो मानना चाहिए कि ज्ञान में स्थिति है. वाणी, समय व शक्ति का अपव्यय न हो तो इन हाथों से कितना कार्य हो सकता है. हमारे कर्मों के अनेक साक्षी हैं. सूर्य, चन्द्र, अनल, अनिल, आकाश, भूमि, यमराज, हृदय, रात्रि तथा दिवस, संध्या तथा धर्म ये सभी कर्मों के साक्षी हैं, हमारी आत्मा साक्षी है. परमात्मा रूपी सद्गुरु का हाथ सदा हमारे सिर पर है, हमारे मस्तिष्क पर उसकी पकड़ है, बुद्धि को वही प्रेरणा देता है, वही सद्विचारों से हमें भर देता है. साधना के समय जब मन दूसरी ओर चला जाता है तो वही इसे श्वास पर टिकाने में सहायक होता है.  

Monday, December 15, 2014

जब जैसा तब वैसा रे

जुलाई २००७ 
जो नश्वर को जानता है, वह शाश्वत है. वही हम हैं. हम अपने तन में होती संवेदनाओं को देखते हैं जो देखते-देखते नष्ट हो जाती हैं, क्योंकि वे नश्वर थीं. हमारे मन में उठने वाली प्रत्येक भावना, कल्पना, विचार नश्वर है, हम जो उनके साक्षी हैं, शाश्वत हैं. हम व्यर्थ ही मन की इन कल्पनाओं को सत्य मानकर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. हमें तो इन्हें ये जब जैसी हैं, वैसी मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए. ये तो जाने ही वाली हैं !

Friday, September 19, 2014

बना साक्षी सुख-दुःख का जो

मार्च २००७ 
जब गुरू जीवन में आते हैं तो जीवन को एक सही मार्ग मिलता है. हम साक्षी भाव को प्राप्त होते हैं. देह नित नाश की ओर जा रही है. हम स्वयं मरने वाले नहीं है, जड़ प्रकृति को अपना मान कर ही हम उपाधियों को प्राप्त होते हैं. सुखी-दुखी होने पर यह देखना चाहिए कि सुखी-दुखी कौन हो रहा है ? हम बेहोशी में स्वयं को ही सुखी-दुखी मान लेते हैं. साक्षी भाव में आते ही हम स्वयं को मुक्त अनुभव करते हैं. जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि साक्षी भाव जग रहा है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना है तथा मन, बुद्धि आदि में कोई हलचल हो भी तो उसे देखने मात्र से वह नष्ट हो जाती है. 

Saturday, August 30, 2014

पल भर भी न स्वयं को भूलें

फरवरी २००७ 
साक्षी होकर रहना ही ध्यान है, आत्मा द्रष्टा है, अज्ञान के कारण वह स्वयं को कभी देह, कभी मन, कभी बुद्धि तथा कभी अहंकार मानता है और व्यर्थ ही सुख-दुःख का भागी बनता है. यहाँ जो कुछ भी दिखाई देता है वह नष्ट होने वाला है. यहाँ दो ही कृत्य हो रहे हैं - जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. अध्यात्म हमें वास्तविकता की ओर ले जाता है, वह हमें पाप-पुण्य दोनों से मुक्त करता है. तब हम कर्ता नहीं रहते. जब हम कर्ता नहीं हैं तो कोई दूसरा भी कर्ता कैसे हो सकता है. अतः किसी को दोषी देखना भूल ही है. व्यर्थ ही ऐसा करके हम अपने मन में विचारों का बवंडर खड़ा कर लेते हैं, जबकि साधक का लक्ष्य तो स्वयं को इन विचारों से मुक्त करना है. इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने जैसा ही है, थोड़ी सी असावधानी से हम अपने स्वरूप से हट जाते हैं, थोड़ी देर के लिए अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाते हैं.


Tuesday, May 20, 2014

बनें साक्षी निज मन के ही

मार्च २००६ 
मन का यह विचित्र स्वभाव है कि जिस कांटे से बिंधता है बार-बार उसी के पास जाना चाहता है, जैसे किसी के दांत में दर्द हो तो जिह्वा बार-बार उसी जगह जाती है, पर मन को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाये उतना ही अच्छा है कि वह अपनी प्रकृति का शिकार स्वयं ही होता है, संस्कार गहरे करता जाता है और जाल में फंसता जाता है. हम जितना-जितना प्रतिक्रिया करेंगे, गुण-दोष की परवाह करेंगे, निर्णायक बनेंगे, उतना-उतना ही हमारे कर्म संस्कार गहरे होते जायेंगे, जितना-जितना साक्षी भाव में रहेंगे, उतना ही मुक्तता का अनुभव करेंगे. जो अपने स्वभाव में स्थित ‘होना’ सीख जाता है, जगत उसे प्रभावित नहीं कर पाता. उसे कुछ करके या पाके स्वयं को सिद्ध नहीं करना वह सहज ही संतुष्ट है और निर्लिप्त होकर जगत के खेल देखता है.  


Sunday, December 8, 2013

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

अप्रैल २००५
गुरु हमारी संवेदनाओं और भावनाओं को परिष्कृत करते है. वे हमें प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर ले जाना चाहते हैं. मन को देह से ऊपर उठाना सिखाते हैं. मन के पार जाते ही भीतर अपने आप परिवर्तन होने लगता है. हमारे भीतर सत्य को जानने के लिए जो कुछ भी होता है अपने आप ही होता है, वह कृपा के कारण ही है, हम केवल साक्षी मात्र बनते हैं. हमारा कार्य केवल शरण में जाना है, हमारे इर्द-गिर्द न जाने कितने बंधन घेरा डाले खड़े हैं, इन बन्धनों को तोड़ना हम नहीं जानते. अपने मन के हाथों हम बार-बार दुःख पाते हैं. अपनों से लड़ाई करना कितना कठिन है. सद्गुरु हमारे मन को मजबूत करते हैं, उसे सही मार्ग देते हैं, ध्यान, प्राणायाम की विधियाँ बताते हैं. मन तब सजग होता है, नित्य-अनित्य को पहचानने लगता है, भीतर प्रज्ञा जगती है, हम आत्मा को जानने के अधिकारी बनते हैं.

Tuesday, August 27, 2013

ज्ञान वही जो आये अनुभव में

जनवरी २००५ 
देह में प्रतिक्षण संवेदनाएं हो रही हैं, जैसे अहंकार जगते ही मन स्थिर नहीं रहता, अहंकार को चोट लगने पर तो और भी अस्थिर हो जाता है, तो देह में भी इसका भास होता है. मन में कोई भी उत्तेजना जगे तो तन संवेदनाएं जगाने लगता है. मन सुखद संवेदनाओं को तो चाहता है, जो आकर कुछ देर बाद अपने आप चली जाती हैं, पर दुखद को नहीं, उनका विरोध करता है, विरोध करते ही और दुखद संवेदनाएं आ जाती हैं. एक श्रंखला ही बनने लगती है, यदि हम इन्हें सजग होकर देखें तो धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं. वास्तव में प्रतिक्रिया जगाने वला मन ही सुख-दुख का भागी होता है. यदि भीतर केवल साक्षी रहे तो बड़ी से बड़ी बात भी कोई दुःख नहीं दे सकती. यह अनुभव की बात है. धीरे धीरे हमें इसे अनुभव में उतारना होगा और फिर यह स्वभाव का अंग बन जायेगा. 

Friday, August 16, 2013

इक राह मिले तुझ तक

जनवरी २००५ 
सुखमयी स्थिति हो और हम स्वयं को उसमें न फंसायें, दुखमयी स्थिति हो और हम उसमें  स्वयं को न उलझाएँ, यही साधना है. दोनों ही स्थितियों में हम साक्षी भाव में रहें तो मन की समता बनी रहेगी अन्यथा मन की उर्जा व्यर्थ ही नष्ट होगी क्योकि न सुख टिकने वाला है न दुःख ही. प्रतिक्षण इस संसार में हजारों जन्म लेते है औए हजारों मरते हैं, कीट-पतंगों से लेकर मानव तक में चैतन्य है, मानव इस बात को जान सकता है और सदा के लिए सुख-दुःख के पार हो सकता है. परमात्मा का यह खेल रचा हुआ है जो ज्ञान के साथ इसे खेलते हैं वे मुक्त कहलाते हैं अन्यथा बंधन में पड़ा मनुष्य अपने को दुखी बनाता है. भीतर के आनन्द के स्रोत से वह वंचित ही रह जाता है. मन की धारा जब भीतर की ओर बहती है तब वह  राह मिलती है जो उस तक ले जाती है.


Monday, July 1, 2013

तू अनंत.. अपार.. असीम....

अक्तूबर २००४ 
हमें मानव योनि मिली है यह प्रभु की कृपा है. हमारे जीवन का लक्ष्य मानव देह पाकर स्वयं ही निर्धारित हो जाता है, वह है अनंत का अनुभव. हमारे भीतर आत्मा का सूरज जगमगा रहा है पर उसका प्रकाश हमारे कर्मों के जाल से आच्छादित है. वह प्रकट होना चाहता है, पर प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म तथा क्रियमाण कर्मों की लम्बी श्रंखला है जो उसे ढके हुए है, यदि हम नियमित ध्यान करें तो क्रियमाण कर्म घटते चले जायेंगे, सद्गुरु या परमात्मा की शरण में जाते ही वह हमारे संचित कर्मों को काट देते हैं. रह गये प्रारब्ध कर्म, उनका फल तो हमें भोगना ही पड़ेगा पर जीने की कला यदि आती हो तो प्रारब्ध कर्म हमें बांध नहीं सकते. आते-जाते सुखों-दुखों को देखते हुए हम मस्त रहते हैं. हम साक्षी भाव में टिकने लगते हैं तो अनंत स्वयं को छुपा नहीं सकता. हमारे जीवन का उद्देश्य यदि हर पल सामने रहेगा तो एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जायेगा, सारा उद्यम उस एक की प्राप्ति के लिए होगा तो शेष सब अपने आप व्यवस्थित होता चला जायेगा, आनन्द, शांति व प्रेम के फूल खिलने लगेंगे. अनंत अपने पूरे वैभव के साथ हमारे ही भीतर है, और वह प्रकट होना चाहता है, वहाँ कोई विरोध नहीं, कोई द्वैत नहीं, कोई अभाव नहीं.

Monday, March 4, 2013

जरा सामने तो आओ...


मई २००४ 
यह जो एक नामालूम सी कसक भीतर छायी है, यह जो अनजानी सी पीड़ा ने मन को व्यथित किया है, यह विरह की पीड़ा है. चैन नहीं लेने देती यह, मन को पल-पल जलाती है, तड़पाती है, इसे नाम नहीं दिया जा सकता पर यह है वही, वह नहीं मिलता जब, तभी यह अभाव मन को खटकता है, पर वह तो नित हमारे साथ है, फिर यह दर्द क्यों , वह है पर मन पर पर्दा पड़ा है, वह छिप गया है. वह  मिला तो गर्व हो गया अब उस गर्व को मिटाने के लिए यह पीड़ा रूपी औषधि लेनी है. जो भी हो रहा है, उसे साक्षी भाव से देखना है, भोक्ता नहीं बनना है, यह सोचते ही मन हल्का होने लगता है. जो कुछ भी हो रहा है वह मन के बाहर की बात है, जैसे सड़क के किनारे खड़े होके देखें तो अनगिनत लोग गुजर जाते हैं, हम अलिप्त रहते हैं, वैसे ही मन को देखते जाना है, मन में तरंगे उठती हैं, गिरती हैं, हम उसके द्रष्टा हैं, द्रष्टा भाव दिया है उसी परमात्मा की शक्ति ने, इसके पार वही तो है. 

Monday, February 25, 2013

मन का सरवर हिलता जाता


अप्रैल २००४ 
जो दुःख हर ले, वही अध्यात्म है, परिस्थितियां कैसी भी हों, हम उनके द्वारा प्रभावित न हों, प्रभावित तभी होते हैं, जब स्वयं को अस्तित्व से पृथक मानते हैं. अस्तित्व को कोई सुख-दुःख नहीं व्यापता, वह पूर्ण मुक्त है और साक्षी है. जब हम भी मन को साक्षी भाव से देखने लगते हैं, तो वह भी अपना स्वभाव छोड़ने लगता है, शांत होने लगता है. मन को देखना आ जाये तो उसका निग्रह करना आसान है. इन्द्रियां प्रत्यक्ष रूप से विषयों के सम्पर्क में आती जरूर हैं, पर उन्हें कहता तो मन ही है. आँख यदि कुछ असुंदर देखती है तो उसका दुख मन ही अनुभव करता है, और यदि मन भी सो जाये तो हमें उसका पता ही नहीं चलता. हमें इसी अमनी भाव में आना है. अहंकार की जड़ भी यह मन है, और दुःख तथा अहंकार का कारण भी यह मन है, जो अस्थिर होकर ज्ञान को टिकने से रोकता है. यदि दूध में जामन डाल दें और निरंतर उसे हिलाते रहें तो दही नहीं जमेगा. मन स्थिर होगा तभी अस्तित्व उसके दर्पण में झलकेगा.

Friday, January 18, 2013

भक्त जहाँ वहीं भगवान


जनवरी २००४ 
भक्त को परमात्मा की निकटता का अनुभव होता है, जैस वह उसकी बात सुन रहे हों और समझ भी रहे हों, जवाब भी दे रहे हों. वह उसके जीवन के हर कार्यकलाप के साक्षी होते हैं, उसे आश्चर्य नहीं होता क्योंकि परमात्मा घट-घट में ऐसा वह जानता है. उसके मन के स्वच्छ दर्पण में जब उनका सौम्य दर्शन होता है तो मन भीग जाता है, नयनों में जल भर आता है. कृष्ण से युगों की दूरी का कोई महत्व नहीं, वह आज भी हैं, आत्मा की अमरता का उपदेश देते हुए, शुद्ध भक्ति का पाठ पढ़ाते हुए, प्रेम के लिए आतुर आत्माओं को असीम प्रेम बांटते हुए. भक्त और भगवान के मध्य प्रेम का यह आदान-प्रदान कितना अद्भुत है. हृदय को जैसे इसी कार्य के लिए रचा गया है !  ऐसा भक्त सहिष्णुता, सामंजस्य, शांतिपूर्ण सह अस्तित्त्व का सहज ही पालन करता है, क्योंकि वह सबमें उसी को देखता है. उसके स्व का विस्तार होता ही चला जाता है.