यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।
Saturday, August 8, 2026
Thursday, December 29, 2022
शरण में आए हैं हम तुम्हारी
शरणागति का अर्थ है जीवन में आने वाली हर परिस्थिति को समता से स्वीकार करने की क्षमता को विकसित करना। अक्सर हम सोचते हैं कोई ईश्वर की शरण में है तो अब उसके जीवन में कोई विकट परिस्थिति आएगी ही नहीं। जीवन विपरीत से बना है, यहाँ दो साथ-साथ चलते हैं। जो आज स्वस्थ है, वही कल रोगी हो सकता है। जो आज धनी है, वह कल धनहीन भी हो सकता है। परमात्मा की शरण का अर्थ है कोई इन दो के पार जाकर रहना सीख गया है, वह हर स्थिति को साक्षी भाव से स्वीकार कर सकता है। बाहर कुछ भी घटता हो गहराई में उसका मन समता में रहना सीख गया है। ऐसे मन में यह विश्वास सदा बना रहता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है और सब जानता है।
Sunday, May 2, 2021
नाम रूप के बनें साक्षी
नाम और रूप से यह सारा जगत बना है, आत्मा उनसे परे है. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर हमें आत्मपद से नीचे उतार देते हैं, हमारी गरिमा से हमें च्युत कर देते हैं. रूप के प्रति आसक्ति को ही काम कहते है. कामना जगते ही लोभ उत्पन्न होता है, इच्छित वस्तु न मिलने पर या मिलकर टिके न रहने पर क्रोध होता है. क्रोध से अच्छे-बुरे का विवेक जाता रहता है. इस मोह से बुद्धि का विनाश हो जाता है. मन पर मद यानि एक बेहोशी छा जाती है और तब भीतर द्वेष का जन्म होता है और सारा सुख-चैन क्षण भर में हवा हो जाता है. आनंद में बने रहना आत्मा के निकट रहना है और दुःख, चिंता में बने रहना आत्मा से दूर चले जाना है. आँखें, रूप को देखती हैं, दोनों ही प्रकृति के अंग हैं और तीन गुणों से निर्मित हैं. आँखों के पीछे मन देखकर प्रसन्न होता है, आत्मा भी यदि स्वयं को मन या आँखें अर्थात देह मानकर प्रसन्न होने लगे तो वह अपने पद से नीचे आ गया, वह साक्षी मात्र बना रहे, मन व आँखों को प्रसन्न देखकर उसी तरह प्रसन्न हो जैसे दादाजी अपने पुत्र को उसके पुत्र से खेलते हुए देखते हैं. आत्मा तो स्वयं ही आनंद स्वरूप है, उसे जगत से सुख लेने की क्या आवश्यकता है ? वह स्वयं को भूली हुई है इसलिए कामनाओं के वशीभूत होकर सुख-दुःख का अनुभव करती है. यही तो अज्ञान है, जिससे गुरू हमें दूर करना चाहते हैं. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, भगवद्गीता का यह वाक्य तब समझ में आता है. प्रकृति ही प्रकृति के साथ खेल रही है, पुरुष की उपस्थिति में. उसकी उपस्थिति के बिना कुछ भी सम्भव नहीं, पर वह स्वयं में पूर्ण है यह मानते हुए लीला मात्र समझकर जगत को देखना है. जैसे रात का स्वप्न टूट जाता है वैसे ही दिन का स्वप्न भी मृत्यु के एक झटके में टूट जाने वाला है.