गुरुदेव कहते हैं “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो बल्कि स्वभाव में रहो”. अभाव मानव का सहज स्वभाव नहीं है क्योंकि वास्तव में मानव पूर्ण है. अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी गयी है, और चाहे कितनी ही इच्छा पूर्ति क्यों न हो जाये यह मिटने वाली नहीं. आप मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो आप हैं ही, बंधन खुद के बनाये हुए हैं, ये प्रतीत भर होते हैं. ईश्वर से आपका सम्बन्ध सनातन है, आप उसी के अंश हैं. अज्ञान वश जब आप इस सम्बन्ध को भूल जाते हैं तथा प्रेम को स्वार्थ सम्बन्धों में ढूंढने का प्रयास करते हैं तो दुःख को प्राप्त होते हैं. आपको अपने जीवन के प्रति जागना है. कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व आप भीतर खड़े कर लेते हैं उसके प्रति जागना है. आपके मन को जो अकड़ जकड़ लेती है, असजगता की निशानी है. खाली मन जागरण की खबर देता है , क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये. मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है, जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है.
Friday, July 11, 2025
Monday, March 17, 2025
आभारी हो मन यह प्रतिपल
जीवन में धन का अभाव हो या किसी भी और बात का, फिर भी उतनी हानि नहीं उठानी पड़ती जितनी हानि तब होती है जब मन में कृतज्ञता का अभाव हो। कृतघ्न व्यक्ति से ख़ुशी ऐसे ही दूर भागती है जैसे सिपाही को देखकर चोर। मानव रूप में जन्म मिला है, तो ईश्वर के प्रति इतनी कृतज्ञता हमारे मन में होनी चाहिए मानो कोई अनमोल ख़ज़ाना मिल गया हो। न जाने कितनी योनियों से गुजर कर हम आये हैं, चट्टान से वनस्पति, कीट, पक्षी, पशु होते हुए मानव का मस्तिष्क मिला है। इसके बाद माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का पौधा मन में उगाना चाहिए जो कभी न सूखे, इसके लिए उसमें सदा ही स्नेह व आदर का जल डालते रहना होगा। यदि जीवन में उत्साह और उमंग का आगमन निर्विरोध चाहिए तो अपने परिवार के प्रति, पति-पत्नी और बच्चों के प्रति कृतज्ञता जताने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। अपने शिक्षकों, गुरुजनों, लेखकों, और शासकों के प्रति भी हमें कृतज्ञ होना है। किसानों और व्यापारियों के लिए और समाज के हर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना है, जिसने हमारे जीवन को सरल और सुंदर बनाने में कोई न कोई योगदान दिया है।
Tuesday, July 4, 2023
मर्म गुरु का जाना जिसने
जब किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण होने वाला होता है, उसके पूर्व उसके मन में ईश्वर के प्रति प्रेम जागृत होता है। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे कोई पथ प्रदर्शक भेज दे। वह मार्ग ढूँढ रहा होता है पर उसे मार्ग दर्शक नहीं मिलता। तब अस्तित्त्व या परमेश्वर ही गुरु को भेजते हैं। गुरु, आत्मा और ईश्वर एक ही हैं। जब पुकार आत्मा की गहराई से उठती है, अंतर्यामी परमात्मा उसे सुन लेता है और उससे एक हुए गुरु तक वह पहुँच जाती है। दिल की गहराई से की गई कोई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती, वह अवश्य फलीभूत होती है। हमारी प्यास यदि सच्ची है तो जल वहीं छलक जाता है।जीवन में जैसे उजाला हो जाता है, गुरु का अर्थ ही है जो अंधकार को दूर करे और प्रकाश फैलाए। कोई एक सदगुरु करोड़ों लोगों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैला सकते हैं । वह आत्मा की गहराई में वैसे ही जुड़े हैं जैसे परमात्मा सर्वव्याप्त है। वह भी अंतर्यामी हैं, उनके मन व बुद्धि गंगाजल की तरह पवित्र और कैलास स्थित मानसरोवर के हंस के समान नीर-क्षीर विवेकी हैं। वह शुद्धता की कसौटी पर सच्चे मोती की तरह हैं, वह निसंग, निर्द्वंद, निरंजन हैं। वह निरन्तर समाधि का अनुभव करते हैं। वह उस तत्व से जुड़े हैं जो अविनाशी, अजर, अमर है, वह उस ज्ञान की पराकाष्ठा हैं जो हृदय को आनंद व प्रेम से भर देता है।
Sunday, June 25, 2023
जब स्वीकार जगे अंतर में
यह जगत ईश्वर का ही साकार स्वरूप है। जड़-चेतन सबका आधार एक ब्रह्म है। एक ही ऊर्जा भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जीव और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है, सारे भेद ऊपर के हैं। अंत:करण में चैतन्य का आभास होने से बुद्धि स्वयं को चेतन मानने लगती है, और मिथ्या अहंकार का जन्म होता है।अहंकार हरेक को पृथकत्व का बोध कराता है, यह अलगाव ही जगत में दुख का कारण है। जो व्यर्थ तुलना और स्पृहा के कारण व्यथित हो जाये, जो नाशवान वस्तुओं के कारण स्वयं को गर्वित अनुभव करे, उस अहंकार का भोजन दुख ही है। मन, बुद्धि आदि जड़ होने के कारण स्वतंत्र नहीं है, प्रकृति के गुणों के अधीन हैं।जैसे कोई खिलौना स्वयं को गतिशील देखकर चेतन मान ले ऐसे ही चिदाभास या प्रतिबिंबित चेतना स्वयं को कर्ता मान लेती है। मानव सदा एकरस, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य आत्मा है।वह पूर्ण है, प्रेमस्वरूप है, आनंद उसका स्वभाव है। प्रेम तथा आनंद को व्यक्त करना दैवीय गुण हैं। आत्मा में रहना सदा स्वीकार भाव में होने का नाम है।
Friday, January 13, 2023
हर उत्सव यह याद दिलाता
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है. मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है, हर उत्सव पर हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, उसके करीब जाते हैं, मन के उल्लास को जगाते हैं, उत्सव हमें मन को इतर कार्यों से खाली करने का प्रयास है, अथवा तो जो भी अच्छा-बुरा जीवन में हो उसे समर्पण करके पुनः नए हो जाने का संदेश देता है. उत्सव में एक साथ मिलकर जब आनंद मनाते हैं, तो ऊर्जा का संचार होता है, भीतर एक नया जोश भर जाता है. क्षण भर के लिए ही भौतिक देह का भाव मिटने लगता है, सारे भेद गिर जाते हैं और उस अव्यक्त की झलक मिल जाती है.
Thursday, December 29, 2022
शरण में आए हैं हम तुम्हारी
शरणागति का अर्थ है जीवन में आने वाली हर परिस्थिति को समता से स्वीकार करने की क्षमता को विकसित करना। अक्सर हम सोचते हैं कोई ईश्वर की शरण में है तो अब उसके जीवन में कोई विकट परिस्थिति आएगी ही नहीं। जीवन विपरीत से बना है, यहाँ दो साथ-साथ चलते हैं। जो आज स्वस्थ है, वही कल रोगी हो सकता है। जो आज धनी है, वह कल धनहीन भी हो सकता है। परमात्मा की शरण का अर्थ है कोई इन दो के पार जाकर रहना सीख गया है, वह हर स्थिति को साक्षी भाव से स्वीकार कर सकता है। बाहर कुछ भी घटता हो गहराई में उसका मन समता में रहना सीख गया है। ऐसे मन में यह विश्वास सदा बना रहता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है और सब जानता है।
Wednesday, October 12, 2022
ऐसी वाणी बोलिए
दिव्यता कण-कण में है चाहे वह जड़ हो या चेतन। उस दिव्यता को हम पहचानें और आत्मसात् करें। एक बार निर्णय हो जाए तो उसी पथ पर चलें। एक मार्ग हो, उसे पकड़ कर राही को चलते जाना है। माना जंगल भी हैं सुंदर, पर दृष्टि को नहीं भटकाना है। नहीं कोई बाधा बन रोके, नहीं कोई जीवन को बहने से टोके । हमारी वाणी के दोष हमें अपनी मंज़िल पर जाने से रोकते हैं। वाणी शुद्द्ध हो, कल्याणकारी हो, रूक्ष ना हो, दोहरे अर्थों वाली न हो।उसमें लोच हो पर स्थिरता भी हो। वाणी में मिठास हो, दूसरों के दोष देखने वाली ना हो। व्याकरण का नियम विचलित न होता हो, भाषा की त्रुटि न हो। उसमें दिखावा न हो, पाखंड न हो, सत्य की अन्वेषी हो। व्यर्थ के कार्यों में न लगती हो। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो। ईश्वर का हाथ पकड़कर चलना है, इसका पूरा विश्वास हो। देह, मन, बुद्धि सभी दिव्य बनें।
Thursday, January 20, 2022
रस भीतर का जिसे मिला है
देह ऊर्जा का एक केंद्र है. ऊर्जा का चक्र यदि पूर्णता को प्राप्त न हो तो जीवन में एक अधूरापन रहता है. प्रार्थना में भक्त भगवान से जुड़ जाता है और चक्र पूर्ण होता है, तभी पूर्णता का अहसास होता है. हर व्यक्ति अपने आप में अधूरा है जब तक वह किसी के प्रति समर्पित नहीं हुआ. यही पूर्णता की चाह अनगिनत कामनाओं को जन्म देती है. व्यर्थ ही इधर-उधर भटक के अंत में एक न एक दिन व्यक्ति ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है. इस मिलन में कभी आत्मा परमात्मा हो जाता है और कभी परमात्मा आत्मा. मन जहाँ जहाँ अटका है, उसे वहाँ-वहाँ से खोलकर लाना है. इस जगत में या तो किसी के प्रति कोई जवाबदेही न रहे अथवा तो सबके प्रति रहे. एक साधक का इसके सिवा क्या कर्त्तव्य है कि भीतर एकरसता बनी रहे, आत्मभाव में मन टिका रहे. जीवन जगत के लिए उपयोगी बने, किसी के काम आए. अहम का विसर्जन हो. परमात्मा ही हमारा आदर्श है जो सब कुछ करता हुआ कुछ भी न करने का भ्रम बनाये रखता है. चुपचाप प्रकृति इतना कुछ करती है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेती. फूल खिलने से पहले कितनी परिस्थितियों से दोचार नहीं होता है, बादल बरसने से पहले क्या-क्या नहीं झेलता. हम हर काम करने के बाद औरों के अनुमोदन की प्रतीक्षा करते हैं. हम भी छोटे-मोटे परमात्मा तो हैं ही, मस्ती, ख़ुशी तो हमारे घर की शै है, इन्हें कहीं मांगने थोड़े ही जाना है.
Monday, December 6, 2021
दिव्य प्रेम के रूप अनेक
Thursday, September 30, 2021
निज स्वभाव में टिक जाए जो
Saturday, September 18, 2021
ध्यान साधना होगा मन को
ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो
Monday, May 24, 2021
ज्योतिपुंज है कोई भीतर
शास्त्रों में ईश्वर की तुलना आकाश से, आत्मा की सूर्य से, मन की चंद्रमा से और देह की पृथ्वी से की गई है। जिसमें सब कुछ टिका है, पर जो किसी पर आश्रित नहीं है, जब कुछ भी नहीं था तब भी जो था और कुछ नहीं होगा जो तब भी रहेगा वही आकाश है । जैसे कोई भव्य इमारत यदि खड़ी हो जाए तो आकाश की सत्ता जस की तस रहती है और गिर जाए तो भी कोई परिवर्तन नहीं होता। सूर्य के होने से ही धरती पर जीवन संभव है, इसी प्रकार आत्मा से ही देह में चेतनता है। जैसे चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है, मन, आत्मा का ही प्रतिबिंब है। मन बाहरी परिस्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। कभी कभी सूर्य के सामने बादल आ जाते हैं और धरती पर अंधकार छा जाता है। अहंकार ही वह बादल है जो देह को आत्मा के प्रकाश से वंचित रखता है। यदि मन सदा समता में रहे तो आत्मजयोति उसमें एक सी प्रकाशित होगी और देह भी उस ज्योति से वंचित नहीं होगी।
Wednesday, May 19, 2021
एक सनातन वृक्ष है जगत
भागवत पुराण में यह वर्णन आता है. यह संसार एक सनातन वृक्ष है, इस वृक्ष का आश्रय है एक प्रकृति. इसके दो फल हैं - सुख और दुःख; तीन जड़ें हैं, सत्व, रज और तम. चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. इसको जानने के पांच प्रकार हैं-कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका. इसके छह स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट हो जाना. इस वृक्ष की छाल हैं सात धातुएं - रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र. इसकी आठ शाखाएँ हैं - पंचमहाभूत, मन, बुद्धि और अहंकार. मुख, दो आँखें आदि नव द्वार इसमें बने हुए खोड़र हैं. प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, देवदत्त, कूर्म, कृकल, नाग और धनजंय - ये दस प्राण ही इसके पत्ते हैं. इस संसार रूपी वृक्ष पर दो पक्षी हैं - जीव और ईश्वर . इस वृक्ष की उत्पत्ति का आधार भी ईश्वर है. यदि जीव अपना ध्यान इस वृक्ष से हटाकर ईश्वर पर लगाए तो सहज ही सुख-दुःख रूपी फलों के आकर्षण से बच सकता है, जिसके बाद ही उसे ईश्वरीय आनंद का अनुभव होता है.
Sunday, April 4, 2021
जब आवै संतोष धन
कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है.