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Thursday, May 30, 2024

मध्य मार्ग में चलना होगा

जो प्रसन्नता किसी बाहरी वस्तु पर आधारित नहीं है, उसमें कोई उत्तेजना नहीं है। यह मौन से उपजी है। इसमें मन शांत हो जाता है। यहाँ कुछ भी विशेष नहीं घटता है। यहाँ अहंकार छूट गया है। ऐसी मनोदशा में न ही निराशा है ना आशा,  न सुख न दुख। यह वास्तविक मुस्कान है, जिसमें आँसुओं की गहराई भी छिपी है।क्योंकि विपरीत मध्य में एक हो जाते हैं। यदि हम सुख  की तलाश करते हैं, तो दुख  पीछे आने ही वाला है। यदि शांति, स्थिरता, मौन की तलाश करते हैं, तो भीतर एक स्थिरता का अनुभव होगा। ध्यान में यही घटता है । पल-पल सहजता से आगे बढ़कर  उस मौन को पकड़ना है। इसे पोषित करके, इसकी रक्षा करनी है। संतोष का यही अर्थ है, जो कुछ भी है, वह अच्छा है।  कोई जहाँ भी है, वह जब कृतज्ञता अनुभव  करता है, तब भीतर जो प्रार्थना घटित होती है, वह तत्क्षण फलित होती है। 


Thursday, January 20, 2022

रस भीतर का जिसे मिला है

देह ऊर्जा का एक केंद्र है. ऊर्जा का चक्र यदि पूर्णता को प्राप्त न हो तो जीवन में एक अधूरापन रहता है. प्रार्थना में भक्त भगवान से जुड़ जाता है और चक्र पूर्ण होता है, तभी पूर्णता का अहसास होता है. हर व्यक्ति अपने आप में अधूरा है जब तक वह किसी के प्रति समर्पित नहीं हुआ. यही पूर्णता की चाह अनगिनत कामनाओं को जन्म देती है. व्यर्थ ही इधर-उधर भटक के अंत में एक न एक दिन व्यक्ति ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है. इस मिलन में कभी आत्मा परमात्मा हो जाता है और कभी परमात्मा आत्मा. मन जहाँ जहाँ अटका है, उसे वहाँ-वहाँ से खोलकर लाना है. इस जगत में या तो किसी के प्रति कोई जवाबदेही न रहे अथवा तो सबके प्रति रहे. एक साधक का इसके सिवा क्या कर्त्तव्य है कि भीतर एकरसता  बनी रहे, आत्मभाव में मन टिका रहे. जीवन जगत के लिए उपयोगी बने, किसी के काम आए. अहम का विसर्जन हो. परमात्मा ही हमारा आदर्श है जो सब कुछ करता हुआ कुछ भी न करने का भ्रम बनाये रखता है. चुपचाप प्रकृति इतना कुछ करती है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेती. फूल खिलने से पहले कितनी परिस्थितियों से दोचार नहीं होता है, बादल बरसने से पहले क्या-क्या नहीं झेलता. हम हर काम करने के बाद औरों के अनुमोदन की प्रतीक्षा करते हैं. हम भी छोटे-मोटे परमात्मा तो हैं ही, मस्ती, ख़ुशी तो हमारे घर की शै है, इन्हें कहीं मांगने थोड़े ही जाना है.


Thursday, August 26, 2021

निज संस्कृति का सम्मान करे जो

भारतीय संस्कृति अनूठी है, यहाँ जीवन को उसकी समग्रता में  सम्मानित करने का भाव है. जीवन के आरम्भ होने से पूर्व ही उसे संस्कार के द्वारा परिष्कृत करने की व्यवस्था है. यदि सही अर्थ के साथ वेद मन्त्रों का पाठ तथा अध्ययन किया जाये तो जीवन को दिशा देने वाले सूत्र उनमें छिपे हैं. हमारी प्रार्थनाएं विश्व कल्याण की कामना लिए हुए हैं. सर्वे भवन्तु सुखिनः.. यदि हम नित्य प्रति अर्थ की प्रतीति करते हुए गाते हैं तो संसार के समस्त जीवों की शुभ भावना से भर जाते हैं. असतो मा सद गमय.. आदि तीन प्रार्थनाएं जीवन को उसके अंतिम लक्ष्य मोक्ष की तरफ ले जाने वाली हैं और त्वमेव माता च पिता त्वमेव.. परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना का भीतर सहज ही संचार करती है, जिससे भीतर अभय का जन्म होता है. या देवी सर्वभूतानां... में देवी को विद्या, निद्रा, क्षुधा, शक्ति आदि जीवन के हर रंग के रूप में देखा गया है. हमारी पाचन अग्नि के रूप में स्वयं कृष्ण भोजन को पचाते हैं तथा वाणी के रूप में वाग देवी कंठ में निवास करती हैं. हमारे मूलाधार में गणेश का वास है. यहां शरीर को देवालय कहा गया है. जिसके नौ द्वार बाहर की ओर खुलते हैं तथा दसवां द्वार भीतर की ओर. जीवन का इतना सम्मान जहाँ हो वहाँ प्रेम, करुणा और उदारता के उदहारण हजारों के रूप में मिलते हैं इसमें आश्चर्य कैसा ? 


Thursday, May 28, 2020

भेद प्रार्थना का जो जाने


हमारी प्रार्थनाएं हमारे मन की गहराई में छिपी आकांक्षाओं को प्रकट करने में अति सहायक होती हैं. हर धर्म में प्रार्थना का बहुत महत्व बताया गया है, जब हम परम श्रद्धा के साथ किसी इष्ट अथवा परमात्मा के सामने बैठकर प्रार्थना करते हैं तो हमें ज्ञात भी नहीं होता कि अगले क्षण भीतर से जो शब्द या वाक्य हम बोलने वाले हैं वह क्या होने वाला है. प्रार्थना सोच-सोच कर नहीं की जाती, न ही किसी रटे रटाये भजन या श्लोक को बोलकर की जाती है. यह तो स्वतः स्फूर्त होती है और हृदय की गहराइयों से निकलती है. हो सकता है वर्षों तक फिर दोबारा वे शब्द हमारे मुख से प्रकट  भी न हों, पर कभी न कभी जब वह पूर्ण होती है तब हमें याद आता है, या नहीं भी आ सकता. किन्तु इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. प्रतिदिन हमें कुछ समय प्रार्थना को देना चाहिए, यदि हम कह नहीं सकते तो एक नोटबुक में उसे लिख दें जो भी हमारी दिली इच्छा है, और शेष सब अस्तित्त्व पर छोड़ दें. शुभता की चाह मन में जगे हर प्रार्थना का यही लक्ष्य है.

Monday, February 24, 2020

जगे प्रार्थना ऐसी मन में


शास्त्र शुद्ध बुद्ध, मुक्त आत्मा का संदेश देते हैं. तन-मन से अशुद्धियाँ निकल जाएँ, यह प्रार्थना  ही हर कोशिका को जीवंत कर देती है जीवन से हर विकार दूर हो, प्रमाद, आलस्य और तमस की नींद से जाकर हम जीवन में नया सवेरा लाएं.परमात्मा की दी हुई शक्तियों को इस्तेमाल कर स्वयं से व्यक्त होने का उन्हें मौका दें. अध्यात्म का अर्थ है आत्मा हमसे प्रकटे, तन और मन उसमें बाधा न बनें तो वह स्वयं प्रकाशित है जैसे कोई खिड़की का पट उढ़का ले तो सूरज का प्रकाश रुक जाता है. प्रकाश के लिए सूरज बनाना तो नहीं है, न ही कहीं से लाना है,आत्मा है, हमने रोक हुआ है उसका मार्ग. देह स्थूल है, मन भी स्थूल है, देह प्रकृति है, मन भी प्रकृति का अंग है, जो पल-पल बदल रही है, आत्मा सदा एक सी  स्वयं में पूर्ण है, उसको मार्ग दें तो वह अपनी मुस्कान से भर देगी तन, मन दोनों को जैसे सूर्य प्रकाशित करता है घर की हर शै को ! 

Wednesday, June 28, 2017

भाव बनें जब पावन अपने

२८ जून २०१७ 
हमारी पूजा और प्रार्थना मन के किस स्तर से आती हैं, साधक को इसका ध्यान रखना होगा. यदि पूजा से हम कुछ पाना चाहते हैं और प्रार्थना हम इसलिए करते हैं कि लोग हमें धार्मिक कहें, तो दोनों व्यर्थ हैं. पूजा को अहंकार बढ़ाने का नहीं उसे नष्ट करने का साधन बनाना है. जब तक मन पूर्ण संतोष व विश्राम का अनुभव नहीं कर लेगा उसे कुछ न कुछ बनने अथवा पाने का रोग लगा ही रहता है. ध्यान के बिना पूर्ण विश्राम सम्भव नहीं, अथवा तो मन जब श्रद्धा से ओतप्रोत हो जाये. भावशुद्ध हों तभी ध्यान घटता है. देह को पूर्ण शांत अवस्था में बैठाकर गहरी लम्बी श्वासें लेते हुए जब साधक स्वयं को परम के सम्मुख छोड़ देता है तब वही शांति और संतोष बनकर उसके मन व देह पर आच्छादित हो जाता है. 

Thursday, May 18, 2017

जगे प्रार्थना ऐसी भीतर

१९ मई २०१७ 
जीवन सुखमय हो ऐसी कामना सभी करते हैं, हमारे अपनों के जीवन में सदा सुख, सम्पन्नता और स्वास्थ्य बना रहे, ऐसी भी प्रार्थना हम विशेष अवसरों पर करते हैं. इसी तरह हमें भी कितनी बार अन्यों ने सुख व स्वास्थ्य की कामनाएं भेजी हैं, भेजते ही रहते हैं,. क्या हमने कभी सोचा है इन सबका कितना बड़ा असर हमारे जीवन पर पड़ता है. दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी भी बेअसर नहीं जाती, और ऊर्जा के नियम के अनुसार भीतर से निकली हुई हर सकारात्मक ऊर्जा लौट कर हमारे ही पास आती है. ऋषि जब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का गायन करते थे तो उसमें उनके हृदय की सच्ची भावना जुड़ी होती थी, जो जगत के कल्याण हेतु अपना काम करती थी,  वह छोटी सी प्रार्थना लौट कर उन्हें कितना आनन्द से न भर जाती होगी. कितना अच्छा हो यदि रोज सुबह हम अपने लिए तो प्रार्थना करें या न करें स्वजनों, मित्रों और नगर, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण सृष्टि  के कल्याण की कामना से अपने दिन का आरम्भ करें.

Tuesday, May 16, 2017

श्वास श्वास है नेमत उसकी

१६ मई २०१७ 
वेदों में ऋषियों ने कितनी सुंदर प्रार्थनाएं गायी हैं. मन जब प्रार्थना से भर जाता है तो शुद्ध होने लगता है. सबके सुख की कामना, सम्पन्नता की कामना जब भीतर सहज ही उठने लगती है तो हृदय मधुरता का अनुभव करता है. जीवन के उपहार को पाकर जो मन अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता के भाव से नहीं भरा वह परमात्मा के आनन्द से वंचित ही रह जाता है. जीवन में प्रेम को अनुभव करने के कोमल पल भी साधक के लिए उसे ही याद करने का निमित्त बन जाते हैं. प्रकृति के सुहाने मंजर हों या किसी के कंठ की मधुर आवाज, वर्षा की सोंधी सुगंध हो या उषा का आकाश, हर शै उसे याद दिलाने का सबब बन जाती है. धन्यता और कृतज्ञता का भाव जिसके हृदय में जग जाता है वह अंतर पल-पल प्रार्थना में लीन रहता है. 

Friday, August 28, 2015

प्रार्थना जब जगेगी भीतर


प्रार्थना में अपार शक्ति है, प्रार्थना हमें विनीत बनाती है, हमारी भीतरी अभीप्सा से रूबरू कराती है. हम अपने भीतर उतर कर जब टटोलते हैं कि आखिर हम चाहते क्या हैं, तब ही प्रार्थना का जन्म होता है. प्रार्थना जब अपने आप जगती है, तब पूरी भी अपने आप होती है. अंतर जब पवित्रता का अनुभव करता हो तब जो प्रार्थना जन्मेगी वह हमें लक्ष्य तक ले ही जाएगी. जब अंतर प्रतिस्पर्धा से मुक्त हो तब सहज ही जो पुकार उठती है भीतर वही मुक्त करती है. 

Thursday, March 26, 2015

जब भीतर का छंद जगे

जुलाई २००८ 
जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में असमय फूल आ गये. हमें भी अपने भीतर इतनी संवेदनशीलता जगानी है कि फूलों की गुफ्तगू सुन सकें. प्रकृति के धीमे-धीमे स्वर हमें सुनाई दें. जब कोई भीतर के छंद को पा लेता है तो चारों ओर से परमात्मा उसे सहारा देने के लिए आ  जाता है. वह तो हर पल साथ है ही, हम ही बचते फिरते हैं, छिटके रहते हैं. जब हम प्रार्थना करना सीखते हैं, झुकना सीखते हैं, अहंकार को छोड़ देते हैं तब भीतर यह भाव पैदा होता है कि जो है वही होना चाहिए था. अहंकार हारता है पर लड़ने की प्रेरणा दिए जाता है. सम्मान की आकांक्षा ही अपमान को जन्म देती है. यदि हम कुछ होने की, कुछ पाने की जिद छोड़ दें तो जो है, जैसा है, वही प्रसाद सा लगने लगता है ! 

Tuesday, March 10, 2015

भीतर का प्रकाश जगे जब

अप्रैल २००८ 
अनेकांत हमें कहीं उलझने नहीं देता. जीवन के बारे में सच्चाई हो तो दुःख का कोई कारण नहीं. जीवन की परिस्थितियाँ बदल रही हैं, हमारे हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह बहा ले जा सकता है. दृष्टिकोण यदि सही हो तो मन एक समता में टिका रह सकता है. जब-जब हम प्रमाद में जाते हैं, तो संवेग नियन्त्रण की शक्ति कमजोर हो जाती है. हमारे किसी भी व्यवहार से यदि किसी को थोड़ा सा भी दुःख पहुँचे तो हमने कर्म बाँध ही लिया. हम अध्यात्म में टिके रहते हैं तो दूसरों के दोष देखना अपने आप छूट जाता है. यदि अब भी दोष दीखते हैं तो आत्मा में स्थिति दृढ़ नहीं है. परमात्मा हर जीव के भीतर है, वह सभी ओर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है. सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है, मेरे भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. हम इस जगत में प्रेम बांटने ही आये हैं अथवा तो सेवा करने. शरीर द्वारा सेवा व मन द्वारा प्रेम देना ही हमारा लक्ष्य है ! 



Monday, May 26, 2014

तेरी शरण में आये हैं हम

मार्च 2006
प्रार्थना में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं, कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.

Thursday, January 23, 2014

दिल से जब उठती है प्रार्थना

जून २००५ 
सन्त जन कहते हैं, शरीर कुछ कहे, मन कुछ कहे तो मन की मानें,  मन कुछ कहे, बुद्धि कुछ कहे तो बुद्धि की मानें. लोग कुछ कहें और हृदय कुछ कहे तो हृदय की मानें. यदि जीवन में कोई समस्या आ जाये तो ईश्वर से पुकार करें प्रार्थना करें, एक बार नहीं बार-बार प्रार्थना करें. पुकार करते-करते एक बार फिर शांत हो जाएँ और अपने आप ही वह प्रार्थना उस तक पहुंच जाती है. वह हमारी बात को कब तक अनसुना कर सकता है. एहिक अथवा पारमार्थिक सामर्थ्य या सफलता पाने के लिए ईश्वर का स्मरण, चिन्तन तथा स्वयं को उसके आश्रित जानकर छोड़ देना ही प्रार्थना है. हमारा सूक्ष्म शरीर मृत्यु के बाद भी रहता है, प्रार्थना पूर्ण हृदय को मृत्यु के क्षण में अनोखी शांति का अनुभव होता है. प्रार्थना करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, वही हमारा मार्ग दर्शक है, उसकी शरण में जाना ही भक्त का प्रिय कार्य है. 

Friday, July 13, 2012

प्रार्थना में बल है


मई २००३ 
हे परमेश्वर ! हमारा आज का दिन मंगलमय हो, अंतर में शांति का साम्राज्य बना रहे. उसे कोई भी न तोड़ सके, मन समता से भरपूर हो. जो सुखकारी हो, मंगलकारी हो ऐसा वातावरण हम बनाएँ, सत्य वाणी ही हम बोलें. कर्म परम लक्ष्य की ओर ले जाने वाले हों. नियमपूर्वक अविरत हम अपना नियत कर्म पूरा करें, प्रमाद हमें छू भी न पाए. सौम्यता, कोमलता और मधुरता हमारे आभूषण बनें हमारी  प्रार्थना में पुरुषार्थ हो, श्रम हो तभी हमारी प्रार्थना सफल होगी. कभी-कभी जीवन हमारी परीक्षा लेता है, इसमें ईश्वर पर अटूट विश्वास ही हमें स्थिर रख सकता है. जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे कोई न कोई उद्देश्य है, धागे जो उलझ गए हैं अपने आप ही सुलझ जायेंगे, जहाँ अंधकार नजर आता है कल वहीं उजाला होगा. अभी जहाँ उलझाव है वहीं उसके पीछे उसका हल है जो हमें अभी नजर न आ तरह हो पर भविष्य में आयेगा. वह परम चेतना हम सब के भीतर है, सभी को निर्देश दे रही है. हम सभी सुरक्षित हाथों में हैं.

Friday, March 9, 2012

आओ मन के पार चलें


साधना एक तरह का मानसिक स्नान ही तो है, जैसे दिन भर में तन व वस्त्रों पर धूल या मैल लग जाती है, वैसे ही मन के वस्त्र पर भी मैल जम जाती है जिसे हर सुबह ध्यान, प्रार्थना आदि से हम स्वच्छ करते हैं, स्वाध्याय के माध्यम से उसे सुंदर बनाते हैं. हमारे मन की गहराई में आनन्दमय कोष है, जो वास्तव में हमारा स्वरूप है. जो कभी-कभी झलक भी दिखाता है जब पल भर के लिये मन ठहर जाता है. वह हर पल हमारे सम्मुख प्रगट होने को आतुर है पर हम ऐसे अभागे हैं कि मन को थोड़ी देर के लिये भी इतर विषयों से मुक्त नहीं कर पाते, मन में संसार प्रवेश किया रहे तो उसे कहाँ बिठाएं, मन की ही चलती है ज्यादातर, हम जो वास्तव में हैं वह तो कहीं पीछे ही छिपे रह जाते हैं. जैसे कोई अपने ही घर में एक कोने में दुबका रहे और घर पर पड़ोसी कब्जा कर ले, वही हालत हमारी है. दुनिया भर की फिक्रें हम करते हैं बिना किसी जरूरत के, पर जो वास्तव में हमें करना चाहिए उसके लिये समय नहीं निकल पाते. मनोराज्य बहुत हो गया अब आत्म राज्य की बारी है, आत्मा में रहकर ही विशुद्ध प्रेम का अनुभव होता है.