चैतन्य स्वरूप श्रीगणेश पवित्रता और शुभता के देव हैं। यदि किसी वृक्ष के आसपास का वातावरण पवित्र न हो तो वह वृक्ष भी जीवित नहीं रहता। साधक के मन, कर्म और वचनों में भी पवित्रता होनी चाहिए।गणपति मूलाधार के देवता हैं। हमें सजग होकर अपने भीतर गणेश तत्व को जगाना है। सत्य पर चलने वाला ही इस तत्व का अधिकारी है।जब श्रीगणेश को हम अपने भीतर जगाते हैं, इसी दुनिया में स्वर्ग को स्थापित कर सकते हैं। उनमें सुबुद्धि और प्रेम है, वह छोटी-छोटी भूलों को सहज ही क्षमा कर देते हैं। प्रेम से दिये एक मोदक से ही वह प्रसन्न हो जाते हैं। वह मानव को हर भय से मुक्त करते हैं। अक्सर व्यक्ति उसके पीछे भागता है, जो उसके अहंकार को बलवान बनाये। अहंकार के पीछे जाकर हम मूढ़ता के शिकार हो जाते हैं।वास्तविक आनंद आत्मा से मिलता है, जो सत्, चित् व आनंद स्वरूप है । साधना के कारण जब भीतर के आनंद का अनुभव होता है, उसे सहेज कर रखना होता है। जैसे एक नन्हा पौधा तभी बड़ा वृक्ष बन सकता है, जब उसकी देखभाल ठीक से की जाये। वैसे ही भीतर ज्ञान की नन्ही सी किरण भी उगे तो उसे सहेज कर रखना है, वरना अहंकार का अंधकार उसे ढक लेने के लिए तैयार ही बैठा है। साधक को मन की समता को बनाये रखना है।उसे मध्य में रहना है, किसी भी अति की तरफ़ नहीं जाना है।देह का उपयोग भी सजग होकर करना है और मन का सन्तुलन कभी भी खोना नहीं है।