Tuesday, September 21, 2021

तीन गुणों का जो साक्षी

इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति के रूप में  काली, लक्ष्मी और सरस्वती हमारे भीतर विद्यमान हैं। ये तीनों ही तमोगुण, रजो गुण तथा सतो गुण का भी प्रतीक हैं। तीनों गुणों के ऊपर एक ही ब्रह्म तत्व है। अलग-अलग नाम-रूप में वही एक तत्त्व समाया है। तीनों गुणों से पार जा कर ही मानव अपने सहज धर्म या स्वभाव का अनुभव करता है। सहज धर्म में स्थित रहना मानव को इन शक्तियों के शुद्ध रूप से जोड़कर रखता है। सहज धर्म से विचलन ही अहंकार है। आत्मा जब तीनों गुणों की साक्षी हो जाती है तो ब्रह्म तत्त्व में स्थित हो जाती है। उसे जानना ही आत्मसाक्षात्कार है। 



Saturday, September 18, 2021

ध्यान साधना होगा मन को

 ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य  बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष  से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति  शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो

Wednesday, September 8, 2021

मन जब खाली हो जायेगा

अनात्म का चिंतन न करना ही आत्मा में स्थित रहना है। जो संसार पल भर के लिए भी स्थिर नहीं रहता, उसको कितना भी संभाला जाए वह छूट ही जाएगा, पर जो इसे देख रहा है वह मन मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा। मन में यदि कोई अभाव है तो उसे पूर्ण करने के लिए वह संसार का आश्रय लेता है. थोड़ी देर के लिए लगता है मन भर गया पर फिर रिक्त हो जाता है. जैसे भोजन के कुछ घण्टों बाद पुनः भूख सताती है. मन को यदि यह ज्ञात हो जाये कि उसका स्वभाव ही खाली रहना है तो वह उसे स्वीकार लेगा और उस अभाव की गहराई में जाकर पूर्णता का अनुभव करेगा. जब मन को भरने की हर चाह गिर जाती है तब भी कुछ  बचता है, वही आत्मा है. वह एक उपस्थिति मात्र है शांत और आनंद से भरी उपस्थिति. साधक जब संसार का चिंतन छोड़कर कुछ पलों के लिए चुपचाप बैठ जाता है, तो वह खालीपन दिव्यता से भरने लगता है. 


 

Wednesday, September 1, 2021

मुक्ति का जो मार्ग चुनेगा

जब मन सीमित होता है  तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह  खो जाती है,  अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान  खो जाए, वही रहे  जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति  जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और  स्वयं से मिलाता है। 


Monday, August 30, 2021

जीवन में जब ध्यान घटेगा

घनीभूत चेतना हमारी सम्भावना है. हमारे चारों ओर जो प्रकाश बिखरा है, यदि उसे केंद्रित किया जाये तो अग्नि पैदा हो जाती है. चेतना का सागर हमारे चारों ओर लहर रहा है. ध्यान के अभ्यास के द्वारा उसे घनीभूत कर दें तो भीतर नए जगत का निर्माण हो जाता है. चैतन्य की अनुभूति ऐसे ही क्षणों में होती है, वह आनंद घन है, रसपूर्ण है, प्रतिपल नूतन है. वह सहज और सरल है. उसी से जीवन का प्राकट्य हुआ है.

Thursday, August 26, 2021

निज संस्कृति का सम्मान करे जो

भारतीय संस्कृति अनूठी है, यहाँ जीवन को उसकी समग्रता में  सम्मानित करने का भाव है. जीवन के आरम्भ होने से पूर्व ही उसे संस्कार के द्वारा परिष्कृत करने की व्यवस्था है. यदि सही अर्थ के साथ वेद मन्त्रों का पाठ तथा अध्ययन किया जाये तो जीवन को दिशा देने वाले सूत्र उनमें छिपे हैं. हमारी प्रार्थनाएं विश्व कल्याण की कामना लिए हुए हैं. सर्वे भवन्तु सुखिनः.. यदि हम नित्य प्रति अर्थ की प्रतीति करते हुए गाते हैं तो संसार के समस्त जीवों की शुभ भावना से भर जाते हैं. असतो मा सद गमय.. आदि तीन प्रार्थनाएं जीवन को उसके अंतिम लक्ष्य मोक्ष की तरफ ले जाने वाली हैं और त्वमेव माता च पिता त्वमेव.. परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना का भीतर सहज ही संचार करती है, जिससे भीतर अभय का जन्म होता है. या देवी सर्वभूतानां... में देवी को विद्या, निद्रा, क्षुधा, शक्ति आदि जीवन के हर रंग के रूप में देखा गया है. हमारी पाचन अग्नि के रूप में स्वयं कृष्ण भोजन को पचाते हैं तथा वाणी के रूप में वाग देवी कंठ में निवास करती हैं. हमारे मूलाधार में गणेश का वास है. यहां शरीर को देवालय कहा गया है. जिसके नौ द्वार बाहर की ओर खुलते हैं तथा दसवां द्वार भीतर की ओर. जीवन का इतना सम्मान जहाँ हो वहाँ प्रेम, करुणा और उदारता के उदहारण हजारों के रूप में मिलते हैं इसमें आश्चर्य कैसा ? 


Monday, August 23, 2021

जो जैसा मन जाने न वैसा

 

हम जो हैं जैसे हैं, उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना होगा, क्योंकि चुनाव करने वाला मन या बुद्धि अभी स्वयं ही बंटे हुए हैं, उनके द्वारा लिया गया निर्णय अनिर्णीत ही रह जायेगा. जब मन पूर्ण विश्रांति में होगा, भीतर शुद्ध चेतना का आविर्भाव होगा.  जहाँ कोई दूसरा नहीं होता ऐसी स्थिति में स्वयं को स्वयं की अनुभूति होती है. वहाँ कोई अस्वीकार नहीं है, सब कुछ एक से ही प्रकट हुआ है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति है. ऐक्य की उस अवस्था में स्वयं को तथा जगत को वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकारने की क्षमता प्रकट होती है.