डायरी के पन्नों से
जो पढ़ा, सुना व गुना !
Sunday, July 12, 2026
जागे जब अभीप्सा मन में
Monday, April 13, 2026
भावलोक के पार गया जो
भावलोक के पार गया जो
मन का स्वभाव है नीचे की ओर बहना, यह पानी की तरह तरल है। बुद्धि का स्वभाव है ऊपर की उठना, यह अग्नि की भाँति तेजपूर्ण है। इसलिए मन के लिए नदी की तरह बहते रहने की प्रार्थना की जाती है, रुका हुआ मन, एक ही बात पर अटका मन, पोखर में रुके पानी के समान दूषित हो जाता है। बुद्धि के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। जैसे प्रकाश में सभी कुछ स्पष्ट दिखायी देता है। प्रखर बुद्धि में अपने दोष व कमियाँ स्पष्ट दिखायी दें, जिससे ठोकर खाने व दुख उठाने के अवसर न आयें। बुद्धि के पार ही भावलोक है, भावना से युक्त हुआ मन-बुद्धि जीवन में सरसता का अनुभव करता है, अन्यथा सब कुछ रुखा-सूखा सा प्रतीत होता है। भावना से परे आत्मा का लोक है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है।
Tuesday, February 3, 2026
तेन त्यक्तेन भुंजीथा
Friday, January 23, 2026
बुद्धियोग जब सध जाएगा
‘मैं’ ‘मेरे’ का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं। ऐसी बुद्धि, जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली, उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है। ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है।
Thursday, September 25, 2025
पल-पल जब यह याद रहेगा
पल-पल जब यह याद रहेगा
जीवन वैसा ही बन जाता है, जैसा हम उसे बनाते हैं। जीवन में हास्य, मधुरता, प्रेम और रस हो ऐसा कौन नहीं चाहता ? किंतु इन्हें दिन-प्रतिदिन जीवन में पिरोना पड़ता है। सुमधुर संगीत सुनें तो मन स्वयं ही ठहर जाता है। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करें तो मन रस का अनुभव करता ही है। अस्तित्त्व के साथ एकता का अनुभव प्रेम की एक सहज अवस्था में ले जाता है। जीवन में एक लय, अनुशासन और प्रवृत्ति व निवृत्ति में एक सामंजस्य बना रहे तो हास्य की कमी नहीं रहती। हर पल जीवन हमें न जाने कितने अनमोल उपहार दे रहा है।उसके प्रति कृतज्ञता की भावना हमें भीतर से तृप्त करती है। देवी माँ की आराधना के यह नौ दिन हमें इसी बात का स्मरण कराने आते हैं।
Sunday, July 27, 2025
ध्यान ही बना जाता है ज्ञान
ध्यान का फल ज्ञान है, कोई जगत में लगाये या परमात्मा में। संसार में जिसका ज्ञान मिल जाता है, वहाँ से ध्यान हट जाता है क्योंकि ध्यान ज्ञान बन गया है। पदार्थ में जोड़ा ध्यान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि जब एक पदार्थ का ज्ञान मिल जाता है, दूसरे को जानने की चाह जग जाती है, पर इतने बड़े जगत में कितना कुछ अनजाना है ।अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता? वह अपने आप को इतर कामों में लगाकर उस प्रश्न से बचना चाहता है; जो उसे व्याकुल कर रहा है। वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है पर वह भी नहीं कर पाता; क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है। वह तब भी जगता नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाता है। जब तक कोई मांग है तब तक भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं किया जा सकता। संसार भीतर का प्रतिबिम्ब है। परमात्मा सदा रहस्य बना रहता है, वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है! यदि कोई परमात्मा में ध्यान लगाये तो वह ज्ञान होने के बाद भी नहीं हटता क्योंकि परमात्मा का ज्ञान कभी पूरा नहीं होता।
Sunday, July 13, 2025
स्वप्न सरिस यह जगत है सारा
संत व शास्त्र कहते हैं, आत्मा जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में रहती हुई इस जगत के सुख-दुख का अनुभव करती है।ध्यान में उसे तुरीय या चौथी अवस्था का बोध होता है, जिसमें रहकर वह अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करती है, जो सत्य है। सत्य शाश्वत है और सदा एक सा है। जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, और दसों इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में संलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर ज्ञानेन्द्रियाँ, मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है। स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में वैसा है नहीं. जगत के असत्य होने का प्रमाण अनित्यतता के सिद्धांत से मिलता है। वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है.