Sunday, July 19, 2026

मन जब भीतर मुड़ जाएगा

 मानव की दृष्टि सदा बाहर की तरफ़ रहती है। सभी इंद्रियाँ मन को बाहरी जगत की खबर देने के लिए तत्पर रहती हैं। जरा कहीं खटका हुआ, कान उधर मुड़ जाते हैं, जरा कहीं सुगंध की लहर आयी, नासिका सजग हो जाती है। इस तरह हमारी सारी ऊर्जा जो हम भोजन और नींद से प्राप्त करते हैं, जगत का ज्ञान प्राप्त करने में ही व्यय होती रहती है। ऐसे में जब कोई ध्यान करने के लिए कहता है, तो आधे घंटे के लिए भी शांत होकर इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ने का अभ्यास नहीं सध पाता। उस समय भी मन बाहर की ओर ही जाता है, बंद आखों से ही हम कल्पना में देख लेते हैं कि शायद दरवाज़े पर कोई आया है। अथवा सुगंध बता रही है कि आज खाने में क्या बना है। इस तरह भीतर जाने का एक और अवसर निकल जाता है। इसलिए ध्यान में बैठने से पहले ही मन को यह समझा देना चाहिए, कि उसे अगले कुछ समय तक केवल देह के भीतर चल रहे कार्य-कलापों पर भी ध्यान देना है। सबसे पहले श्वास पर ध्यान टिकाना है, इसके बाद नासिका के आगे के स्थान पर। इस तरह इंद्रियाँ कुछ देर के लिए शांत रहना सीख जायेंगी और यह भी समझ जायेंगी कि हर समय हमें उनकी ज़रूरत नहीं है, आख़िर गहरी नींद में भी तो मन जगत से विमुख होता है।वास्तव में ध्यान जागते हुए नींद में रहना ही है, जब मन जागे-जागे सोया हुआ है, वही ध्यान है। ऐसे में मन स्वयं को देख पाने में समर्थ होता है, वरना तो वह जगत को देखने में ही लगा रहता है।  

Friday, July 17, 2026

मन के पार ही वह मिलता है

जगत में सब कुछ दो पर टिका है, दिन-रात, सुख-दुख, आना-जाना, जन्म-मृत्यु!! मन भी इसी जगत का भाग है, वह दो के बिना रह ही नहीं सकता, जहाँ दो मिटते हैं, वहाँ मन, अमन हो जाता है। इसलिए जगत में इतनी अशांति है, क्योंकि मन को अमन बनाने की सहज कला ही मानव भूलता जा रहा है। प्रकृति के सान्निध्य में सहज ही मन थिर हो जाता है, इतना बड़ा आकाश और इतनी बड़ी धरती देखकर मन उतने समय के लिए एक में टिक जाता है। ईश्वर, गुरुजन अथवा बड़ों के आगे झुकते हुए भी मन एक हो जाता है, हाथ जोड़ते हुए भी उसी एकत्व का अनुभव होता है। शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है। संत अपने भीतर हर क्षण एकत्व का अनुभव करता है, सारा ब्रह्मांड उसे एक जीवित इकाई प्रतीत होता है। उसका मन आत्मा के रस में डूबकर आत्मा ही बन जाता है, जैसे रस में डूबा रसगुल्ला रस ही बन जाता है, या आग में पड़ा लोहा आग ही बन जाता है। 

Wednesday, July 15, 2026

मुक्ति की यदि चाह है भीतर

सत्य के साधक को हर तरह से आत्मनिर्भर होना है। अपने जीवन में आने वाले हर सुख-दुख का उत्तरदायित्व स्वयं पर लेना है। इस जगत में कोई किसी को आराम तो पहुँचा सकता है, पर सुखी तो भगवान भी नहीं कर सकता। इसलिए अपने सुख के लिए किसी पर निर्भर होना या किसी अन्य को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानना ऐसा ही है, जैसे पानी को तलवार से काटना। किसी के पास सारे ऐशो-आराम हों किन्तु यदि उसे अपने सुख के लिए किसी का मुँह देखना पड़ता है तो वह उसका ग़ुलाम है। सबसे बड़ी आज़ादी है, अपने सुख के लिए स्वयं पर निर्भर होना। दुनिया की किसी भी वस्तु का मोहताज न होना पड़े, किसी भी व्यक्ति और किसी भी परिस्थिति को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानने की भूल न करे तभी  इस पथ में वह आगे बढ़ सकता है। इस जगत में आज तक न कोई किसी को उसकी मर्ज़ी के बिना सुखी या दुखी कर सका है, न ही कर पाएगा। इसीलिए कृष्ण ने भगवद् गीता में जगत से मिलने वाले सुख-दुख, हानि-लाभ व जय-पराजय में व्यक्ति को समता में टिके रहने को कहा है। जो समता में स्थित होना सीख जाता है, वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ा ही चुका है। 

Monday, July 13, 2026

करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान

 जब सत्य की अभीप्सा भीतर जगती है, जीवन को एक दिशा मिल जाती है। इसके पूर्व मानव का लक्ष्य भौतिक जीवन को सुंदर, सुविधापूर्ण और सुखी बनाने तक ही सीमित रहता है। किंतु भौतिक जीवन को कितना भी बेहतर बनाओ, इधर-उधर कोई न कोई कमी सालती ही रहती है। कभी आपसी मेलज़ोल ठीक बना नहीं रह पाता। संबंधों में अहंकार आड़े  आ जाता है तो कभी रूप, धन या यश की कमी खलती है। कहते हैं न कि, किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,  कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता! इसके विपरीत जब जीवन में एक उच्च लक्ष्य मिल जाता है, तब छोटी-मोटी बातें प्रभावित ही नहीं करतीं। संतों की वाणी जैसे एक नयी दुनिया के दरवाज़े खोल देती है। दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की तरफ़ जाती है। पहले-पहल तो भीतर कुछ भी नज़र नहीं आता। बल्कि अनगढ़ और अस्त-व्यस्त विचारों की एक दुनिया ही सामना करती है। किंतु सतत अभ्यास से एक दिन मन स्थिर होने लगता है और स्वयं के प्रति कुछ भरोसा जगता है। योग के प्रति रुचि भी जागती है और अपनी दिनचर्या में उसे समुचित स्थान मिल जाता है। 

Sunday, July 12, 2026

जागे जब अभीप्सा मन में

जीवन प्रतिक्षण नये रूप में सम्मुख आता है। मौसम बदलते हैं तो चर्या भी बदल जाती है, मन भी बदल जाता है। विश्व की राजनीति का असर एक छोटे से गाँव में रह रहे किसान को भी झेलना पड़ता है। उसी तरह हर व्यक्ति के कर्म का असर पूरे संसार पर पड़ता है। कर्म चाहे मानसिक हो या भौतिक, उसकी तरंगें दूर-दूर तक फैल जाती हैं। यदि कोई समाज योग और अध्यात्म में रुचि रखता है तो निश्चय ही उसके आसपास का वातावरण शांति से भरा होगा। जहाँ भाषा की शुद्धता व सौम्यता का ध्यान रखा जाता हो, उस परिवार में आपसी कलह व द्वेष पनप ही नहीं सकते। जिस संस्था का प्रमुख अपने कृत्यों से आत्मीयता का वातावरण पैदा करे, वहाँ विकास सहज ही होता है। इसी प्रकार जहाँ मार्गदर्शन विद्वत्जनों, लेखकों साहित्यकारों का सम्मान होता है, लोग उनकी बात को सुनते हैं और उसका आदर करते हैं, वह समाज आगे बढ़ता है। यदि कोई अपने जीवन में सार्थकता का अनुभव करना चाहता है तो उसे निरन्तर ऊँचाई की तरफ़ देखना होगा, अपने सम्मुख उच्च आदर्शों को बनाये रखना होगा।छोटे-छोटे कदम उठाकर भी एक दिन उस मंज़िल को पाया जा सकता है, जिसकी अभिलाषा अंतर की गहराई में प्रायः सुप्त अवस्था में ही बनी रहती है। उस अभीप्सा को जगाना ही साधक का प्रथम कर्त्तव्य है। 

Monday, April 13, 2026

भावलोक के पार गया जो


भावलोक के पार गया जो


मन का स्वभाव है नीचे की ओर बहना, यह पानी की तरह तरल है। बुद्धि का स्वभाव है ऊपर की उठना, यह अग्नि की भाँति तेजपूर्ण है। इसलिए मन के लिए नदी की तरह बहते रहने की प्रार्थना की जाती है, रुका हुआ मन, एक ही बात पर अटका मन, पोखर में रुके पानी के समान दूषित हो जाता है। बुद्धि के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। जैसे प्रकाश में सभी कुछ स्पष्ट दिखायी देता है। प्रखर बुद्धि में अपने दोष व कमियाँ स्पष्ट दिखायी दें, जिससे ठोकर खाने व दुख उठाने के अवसर न आयें। बुद्धि के पार ही भावलोक है, भावना से युक्त हुआ मन-बुद्धि जीवन में सरसता का अनुभव करता है, अन्यथा सब कुछ रुखा-सूखा सा प्रतीत होता है। भावना से परे आत्मा का लोक है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है।


Tuesday, February 3, 2026

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

परमात्मा हर पल हमारे मन का द्वार खटखटाता है, हम कभी खोलते ही नहीं। वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है, वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है। चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है। जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी नहीं करना है, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है। हमें अपनेहोनेकी सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है।हम अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले। जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें। हम किस निमित्त हैं, हम किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में हमारा भी योगदान हो। हमारेपास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, हम उसके सहचर बन जाएँ। सन्नाटे में भी जो हमारे साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो हमारे निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है।जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा।  समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं। समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है। जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया!