Wednesday, June 22, 2022

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

इस जगत में जो कुछ भी त्रुटिपूर्ण होता है वह किसी न किसी चाहत के कारण है। स्वयं को पूर्ण करने की चाहत के कारण ही सभी किसी न किसी कर्म में रत हैं, चाहे उनका परिणाम कितना ही विपरीत क्यों न हो। किंतु जो पूर्ण है और स्वयं को अपूर्ण मान रहा है, वह कितना भी कर ले, पूर्णता का अनुभव तब तक नहीं करेगा जब तक अपनी भूल का अहसास न कर ले; स्वयं को पूर्ण स्वीकार न कर ले, अपने अनुभव के स्तर पर जान ले कि वह पहले से ही पूर्ण है। अभाव का अनुभव ही संसार है, तृप्ति का अनुभव ही सन्यास ! पीड़ा का अनुभव ही विरह है और आनंद का अनुभव ही योग ! परमात्मा पूर्ण था, पूर्ण है और पूर्ण रहेगा। उसमें जीवों के कल्याण के लिए सृष्टि का संकल्प जगा। हम सुबह उठकर यह संकल्प जगाते हैं कि हमें आज क्या पाना है ताकि हम थोड़ा सा और पूर्ण हो सकें पर वास्तव में हमारी हर इच्छा अपूर्णता की पीड़ा से उपजी है। हमें भी संकल्प उठाने आ जाएँ कि सबका कल्याण हो, सब सुखी हों। हमें अपनी पूर्णता का भास हो, हम सत्य का साक्षात्कार करें। ऋषियों की वाणी हमें जगाने के लिए आयी है।​​​​​​उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।जब मन में अपने लिए कोई कामना ना रहे और जगत का हित कैसे हो यह भावना जगे तो परमात्मा भीतर से स्वयं ही पूर्णता का अनुभव कराता है। 


Friday, June 17, 2022

निजता का जब फूल खिलेगा

हमें अपनी निजता को खोजना है, यह अहंकार नहीं है, अस्मिता है, अपने भीतर एक केंद्र को खोजना है जो बाहरी किसी भी प्रभाव से अछूता रहता है। यह एक चट्टान की तरह कठोर है। जिस पर धूप, पानी, अग्नि और हवाएं भी अपना प्रभाव नहीं डालतीं और उस फूल की तरह कोमल भी जो अपनी सुगंध और रूप से सभी का मन मोह लेता है. यह अपना होनापन किसी के विरुद्ध नहीं है, यह मानव होने की पहचान है. यह विवेक की उस अग्नि में तपकर मिलती है जो नित्य और अनित्य का भेद करके व्यर्थ को जला  देती है और ऐसा कुछ शेष रह जाता है जो कभी जल ही नहीं सकता, यह उस भरोसे से पैदा होता है जिसके सामने सारा ब्रह्मांड भी खड़ा हो जाए तो वह टूटता नहीं। जो श्रद्धा छोटी-छोटी बात पर खंडित होती हो वह निजता तक नहीं ले जा सकती। जब इस जगत में कुछ भी पाया जाने जैसा न लगे और साथ ही हर वस्तु अनमोल भी प्रतीत हो क्योंकि वह उसी एक  स्रोत से उपजी है, तब जानना चाहिए कि भीतर निजता का फूल खिला है। अब जगत एक क्रीड़ास्थली बन जाता है जहाँ अन्य लोग मात्र खिलाड़ी हैं और खेल में तो हार-जीत होती ही रहती है।सुख की चाह तब बाँधती नहीं क्योंकि सुख हमारा स्वभाव है यह ज्ञान हो जाता है।  


Sunday, June 5, 2022

पर्यावरण दिवस पर शुभकामनाएँ

आज पर्यावरण दिवस है, हवा दूषित है, कहीं बारिश होती है तो होती ही चली जाती है, कहीं मानसून झलक दिखा कर चला जाता है। कहीं बाढ़ से लोग परेशान हैं तो कहीं सूखे से। वैज्ञानिक कहते हैं, ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है, सूरज की हानिकारक किरणें भी धरती पर आ रही  हैं। धरती का हाल तो और भी दयनीय है, गंदगी, रासायनिक खाद, कीटनाशकों ने भूमि की गुणवत्ता समाप्त कर दी है। सब्ज़ियों में स्वाद नहीं आता, आए भी तो कैसे, इंजेक्शन लगाकर सब्ज़ियों का आकार बड़ा किया जाता है। दवाइयाँ डालकर फल उगाए जाते हैं। चाय जो लोग बड़े भरोसे से सुबह-शाम पीते रहते हैं, उसके  बाग़ानों में सबसे ज़्यादा विषैले कीटनाशकों का छिड़काव होता है। नदी किनारे उगने वाले शाक भी सुरक्षित नहीं, नदियाँ अब बहुत मैल धो चुकीं, अब उनकी क्षमता  से बाहर हो गया  है। इतना सब होने के बाद भी प्रकृति ने अपना रूप-सौंदर्य खोया नहीं है, क्योंकि उसके पास स्वीकार भाव है, वह मानवों से अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति शिकायत नहीं करती। अब मानव को चाहिए कि यदि उसे भी सहज  शांत रहना सीखना है तो प्रकृति के निकट जाना होगा, विकास के नाम पर, अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा में उसका अति दोहन नहीं करना होगा; तभी दोनों के मध्य संतुलन सधेगा और हर ऋतु अपने समय पर आएगी। फलों की मिठास लौट आएगी और हवा की सुगंध भी। पर्यावरण दिवस पर हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को और सुदृढ़ बनाना होगा।  


Saturday, June 4, 2022

संतुलन को साधा जिसने

त्याग पर भोग हावी होता रहा तो पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना बहुत कठिन होगा. अनावश्यक भोग भी न हो तथा अनावश्यक कर्म भी न हों, कहीं तो हमें विकास के लिए भी सीमा रेखा खींचनी होगी. जीने का सीधा सरल रास्ता हमें ढूँढ़ निकलना होगा, ऐसा रास्ता जो हमें कल्याण की ओर ले जाये. वह परम सुख ही हमारी मंजिल है. आज सबकुछ होने के बावजूद हम शांति से वंचित रह जाते हैं. रिश्तों में औपचारिकता बढ़ रही है, सहज विश्वास जैसे खोता जा रहा है। अहंकार की दीवार मन का वह बाहर का वातावरण खंडित कर देती है। हम प्रेम बाँटने में कंजूसी करते हैं और प्रेम स्वीकारने में भी झिझकते हैं. वास्तव में अहंकार कुछ है ही नहीं, प्रेम का अभाव ही अहंकार है और प्रेम का कभी अभाव होता ही नहीं. जैसे ही हम सजग होते हैं, दूरी मिट जाती है. वातावरण में एक समरसता भर जाती है. सारा जगत तब अपना लगता है, वस्तुओं को भी उपभोग करना छोड़कर उनका उपयोग करना सीखते हैं. पर्यावरण के प्रति एक ज़िम्मेदारी का अहसास भीतर जगता  है  

Thursday, May 26, 2022

नित्य-अनित्य का भेद जो जाने

यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों  को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है,  जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता। 


Tuesday, May 24, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

 हृदय में परम भक्ति का उदय होना एक अनोखी घटना है. जो भी किसी कामना से भगवान की पूजा करते हैं, मन्दिर जाते हैं, वे यदि सोचें कि उनके भीतर ईश्वर के प्रति भक्ति है तो यह गौणी भक्ति कही जा सकती है. एक और भक्ति है जो उस अनुभव के बाद उत्पन्न होती है जब भक्त और भगवान आत्मिक स्तर पर जुड़ जाते हैं. भौतिक दूरी तब कोई महत्व नहीं रखती. मीरा हजारों साल के अंतराल के बाद भी कृष्ण का दर्शन कर लेती है. शिष्य हजारों मील दूर होते हुए भी गुरू की कृपा का अनुभव करते हैं. बुद्धि और भावनाओं से भी परे जाकर उस अलौकिक भक्ति को पाया जा सकता है. मानव देह में घटने वाली यह सर्वोत्तम घटता कही जा सकती है. कृष्ण कहते हैं, मुझे ज्ञानी भक्त प्रिय है क्योंकि वह मेरा ही स्वरूप है. ऐसा महात्मा साक्षात ईश्वर स्वरूप ही हो जाता है. वह संसार को अपने जीवन से अनमोल ज्ञान, प्रेम और शांति देता है. वह दुखी, तनाव ग्रस्त लोगों को जीने का मार्ग दिखाता है. उसका होना ही जगत के लिए एक वरदान बन जाता है. जब मन हर तरह के स्वार्थ से ऊपर उठ चुका हो और केवल लोक संग्रह ही एक मात्र उद्देश्य रह जाये तब इस भक्ति का जन्म होता है. भरत देश में समय-समय पर ऐसी महान आत्माएं जन्म लेती हैं जो भक्ति के परम स्वरूप को प्रकट करती हैं. 

Sunday, May 22, 2022

गुह्यतम ज्ञान सुनाये कान्हा

 देह देवालय है, देह में आत्मरूप से वही परमात्मा विद्यमान है. हम अहंकार के वशीभूत होकर इस सच से आँखें मूँदे रहते हैं. सदगुरू इस राज से पर्दा उठाते हैं और एक नयी दुनिया में हम कदम रखते हैं. जहाँ प्रेम का ही साम्राज्य है, जहाँ एक की ही सत्ता है, जहां अद्वैत मात्र सिद्धांत नहीं वास्तविकता है. जहाँ अपूर्व शांति है जहाँ जीवन अपने कोमलतम शुद्ध रूप में आँखें खोलता है.  वह अनुपम लोक जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ नेति-नेति कहकर ही शास्त्र इशारा करते हैं. ऐसा एक लोक हमारे भीतर है, सदगुरू इसका भेद बताते हैं. कृष्ण इसे ही गुह्यतम ज्ञान कहते हैं.