Tuesday, February 3, 2026

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

परमात्मा हर पल हमारे मन का द्वार खटखटाता है, हम कभी खोलते ही नहीं। वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है, वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है। चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है। जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी नहीं करना है, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है। हमें अपनेहोनेकी सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है।हम अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले। जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें। हम किस निमित्त हैं, हम किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में हमारा भी योगदान हो। हमारेपास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, हम उसके सहचर बन जाएँ। सन्नाटे में भी जो हमारे साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो हमारे निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है।जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा।  समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं। समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है। जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया!

Friday, January 23, 2026

बुद्धियोग जब सध जाएगा


मैं मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं। ऐसी बुद्धि, जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली, उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है। ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें  प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है।



Thursday, September 25, 2025

पल-पल जब यह याद रहेगा

पल-पल जब यह याद रहेगा 

जीवन वैसा ही बन जाता है, जैसा हम उसे बनाते हैं। जीवन में हास्य, मधुरता, प्रेम और रस हो ऐसा कौन नहीं चाहता ? किंतु इन्हें दिन-प्रतिदिन जीवन में पिरोना पड़ता है। सुमधुर संगीत सुनें तो मन स्वयं ही ठहर जाता है। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करें तो मन रस का अनुभव करता ही है। अस्तित्त्व के साथ एकता का अनुभव प्रेम की एक सहज अवस्था में ले जाता है। जीवन में एक लय, अनुशासन और प्रवृत्ति व निवृत्ति में एक सामंजस्य बना रहे तो हास्य की कमी नहीं रहती। हर पल जीवन हमें न जाने कितने अनमोल उपहार दे रहा है।उसके प्रति कृतज्ञता की भावना हमें भीतर से तृप्त करती है। देवी माँ की आराधना के यह नौ दिन हमें इसी बात का स्मरण कराने आते हैं।  


Sunday, July 27, 2025

ध्यान ही बना जाता है ज्ञान

ध्यान का फल ज्ञान है, कोई जगत में लगाये या परमात्मा में। संसार में जिसका ज्ञान मिल जाता है, वहाँ से ध्यान हट जाता है क्योंकि ध्यान ज्ञान बन गया है। पदार्थ में जोड़ा ध्यान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि जब एक पदार्थ का ज्ञान मिल जाता है, दूसरे को जानने की चाह जग जाती है, पर इतने बड़े जगत में कितना कुछ अनजाना है ।अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता? वह अपने आप को इतर कामों में लगाकर उस प्रश्न से बचना चाहता है; जो उसे व्याकुल कर रहा है। वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है पर वह भी नहीं कर पाता; क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है। वह तब भी जगता नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाता है। जब तक कोई मांग है तब तक भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं किया जा सकता। संसार भीतर का प्रतिबिम्ब है। परमात्मा सदा रहस्य बना रहता है, वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है! यदि कोई परमात्मा में ध्यान लगाये तो वह ज्ञान होने के बाद भी नहीं हटता क्योंकि परमात्मा का ज्ञान कभी पूरा नहीं होता।


Sunday, July 13, 2025

स्वप्न सरिस यह जगत है सारा

संत व शास्त्र कहते हैं, आत्मा जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में रहती हुई इस जगत के सुख-दुख का अनुभव करती है।ध्यान में उसे तुरीय या चौथी अवस्था का बोध होता है, जिसमें रहकर वह अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करती है, जो सत्य है। सत्य शाश्वत है और सदा एक सा है। जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, और दसों इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में संलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर ज्ञानेन्द्रियाँ, मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है। स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में वैसा है नहीं. जगत के असत्य होने का प्रमाण अनित्यतता के सिद्धांत से मिलता है। वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है. 


Friday, July 11, 2025

गुरु पूर्णिमा पर अनमोल संदेश

गुरुदेव कहते हैं  “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो बल्कि स्वभाव में रहो”. अभाव मानव का  सहज स्वभाव नहीं है क्योंकि वास्तव में मानव पूर्ण है. अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी गयी है, और चाहे कितनी ही इच्छा पूर्ति क्यों न हो जाये यह मिटने वाली नहीं. आप मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो आप हैं ही, बंधन खुद के बनाये हुए हैं, ये प्रतीत भर होते हैं. ईश्वर से आपका सम्बन्ध सनातन है, आप उसी के अंश हैं. अज्ञान वश जब आप इस सम्बन्ध को भूल जाते हैं तथा प्रेम को स्वार्थ सम्बन्धों में ढूंढने का प्रयास करते हैं तो दुःख को प्राप्त होते हैं.  आपको अपने जीवन के प्रति जागना है. कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व आप भीतर खड़े कर लेते हैं उसके प्रति जागना है. आपके मन को जो अकड़ जकड़ लेती है, असजगता की निशानी है. खाली मन जागरण की खबर देता है , क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये. मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है, जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है.


Monday, March 17, 2025

आभारी हो मन यह प्रतिपल

जीवन में धन का अभाव हो या किसी भी और बात का, फिर भी उतनी हानि नहीं उठानी पड़ती जितनी हानि तब होती है जब मन में कृतज्ञता का अभाव हो। कृतघ्न व्यक्ति से ख़ुशी ऐसे ही दूर भागती है जैसे सिपाही को देखकर चोर। मानव रूप में जन्म मिला है, तो ईश्वर के प्रति इतनी कृतज्ञता हमारे मन में होनी चाहिए मानो कोई अनमोल ख़ज़ाना मिल गया हो। न जाने कितनी योनियों से गुजर कर हम आये हैं, चट्टान से वनस्पति, कीट, पक्षी, पशु होते हुए मानव का मस्तिष्क मिला है। इसके बाद माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का पौधा मन में उगाना चाहिए जो कभी न सूखे, इसके लिए उसमें सदा ही स्नेह व आदर  का जल डालते रहना होगा। यदि जीवन में उत्साह और उमंग का आगमन निर्विरोध चाहिए तो अपने परिवार के प्रति, पति-पत्नी और बच्चों के प्रति कृतज्ञता जताने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। अपने शिक्षकों, गुरुजनों, लेखकों, और शासकों के प्रति भी हमें कृतज्ञ होना है। किसानों और व्यापारियों के लिए और समाज के हर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना है, जिसने हमारे जीवन को सरल और सुंदर बनाने में कोई न कोई योगदान दिया है।