Friday, September 4, 2026

शिक्षक दिशा दिखाते जग को

हर नया दिन अपने साथ एक नयी प्रेरणा और नया संदेश लेकर आता है। आज शिक्षक दिवस है, बचपन से लेकर आज तक न जाने कितने ही शिक्षकों ने हमारे जीवन को गढ़ा है। सर्वप्रथम हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता और भाई-बहन हमारे शिक्षक होते हैं,। जीवन की पहली पाठशाला अर्थात घर,  जो भी संस्कार बालमन पर डालता है, वह जीवन भर उसके साथ रहते हैं। ईमानदारी, सत्य, पुस्तकों से प्रेम, भक्ति, सेवा और अनुशासन का जो बीज बचपन में माता-पिता बच्चे के मन में रोपते हैं, उसी को शिक्षक अपने स्नेह से सींचते हैं। स्कूल और कॉलेज में जो शिक्षा दी जाती है, वह मात्र आजीविका प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाने की नहीं होती, वह जीवन में अपने पैर थिर करके खड़े होने की शक्ति भी प्रदान करती है। आज उन सभी शिक्षकों के प्रति आदर व सम्मान व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने अपने ज्ञान और प्रेम से हमारे मनों को प्रशस्त किया है। आज समाज में शिक्षा एक व्यापार बनती जा रही है,।मंहगे स्कूलों में जाने वाले बच्चे स्वयं को एक अभिमान से भर लेते हैं और उनके वे साथी जो ऐसे स्कूलों में नहीं पढ़ सकते, हीनभावना का शिकार हो जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस काल में आज शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। किंतु कंप्यूटर से कितनी भी सही जानकारी मिल जाये, एक शिक्षक की सजग दृष्टि विद्यार्थी के ह्रदय की भावनाओं को समझ लेती है, और बिना मानवीय स्पर्श से प्राप्त की गई उच्च से उच्च शिक्षा व्यक्ति को एक संवेदनशील नागरिक नहीं बना सकती।  

कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस धरती पर आये और आज तक अपने अनंत प्रेम व अनंत ज्ञान की वर्षा में भिगो रहे हैं। उनका जन्म व हर कर्म दिव्य था, इसलिए आज भी हम उनके प्रेम को अनुभव करते हैं। कृष्ण कितने विनम्र थे, इसका भान उनके  जीवन की कितनी ही घटनाओं से मिलता है। राजसूय यज्ञ में वह अपने लिए जो कार्य चुनते हैं, वह था, यज्ञ में पधारे ब्राह्मणों और अतिथियों के पैरों का प्रक्षालन और उनकी जूठी पत्तलें उठाना। कृष्ण इतने पूज्य और सम्मानित थे कि उनकी अग्रपूजा की गयी थी, फिर भी उन्होंने अपने लिए ये कार्य चुने। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य का महत्व उसके पीछे के भाव से होता है, उनके ह्रदय में सभी के लिए अथाह प्रेम था, जिसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने सेवा के ये कार्य चुने। कृष्ण को हम ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं, सृष्टि का कारण मानते हैं, पर वह स्वयं को गोपियों व ग्वालों के प्रेम का ऋणी मानते हैं। उनसे प्रेम करना मानो स्वयं को उनके आत्मीयों में शामिल कर लेना है। सारी प्रकृति उनसे प्रेम करती है, वे स्वयं गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। यमुना नदी, कालिया नाग, कदंब का वृक्ष, गौएँ और बंदर सभी तो उनकी लीला में शामिल हैं। हज़ारों वर्षों से कृष्ण की कथा ने कवियों और भक्तों के दिलों को आकर्षित किया है और यह आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। 

Thursday, August 27, 2026

मन को जिसने जान लिया है

जब कोई ध्यान करता है तो उसे महसूस होता है, मन बहुत भागता है। भागते हुए मन में उष्णता है, जीवन है, तभी मन भागता है। विरोधात्मक मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं। स्थिर रहना और भागना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमें भागते हुए मन के साथ भागना है।मन को भगाने से वह स्थिर हो जाता है, रोकने की चेष्टा से भागता है। जब मन भागता है, शरीर असहज होता है, बेचैन होता है। कोई भी बीज जब फूटता है तो दो तरफ़ से  फूटता है। बेचैनी का एहसास है, तो जीवन है। बेचैनी इसलिए है कि हम चाहते हैं, सब जल्दी हो जाए। आदमी के सामने कई चुनाव होते हैं, इसके कारण वह भ्रम में पड़ जाता है। भ्रम से दूर होने के दो उपाय हैं, या तो उसे स्वीकार कर लें या उसे छोड़ दें. बुद्धि हो तो भ्रम भी होता है ।बेचैनी से शरीर में व्यर्थ की क्रिया होती है। यह स्वाभाविक है, लेकिन यही प्रगति की निशानी है।मन में भ्रांति होना भाग्यशाली है। आज मैं बहुत उलझन में हूँ, जब ऐसा प्रतीत हो तो आप लक्ष्य के निकट ही हैं। भ्रम अनंत आकाश की तरफ़ खोल देता है। गुरु के पास खुला आसमान है। भ्रम छूटने के लिए भ्रम होना भी ज़रूरी है। भ्रांति भी एक शक्ति है। घूमता हुआ अग्नि का बिंदु, गोला लगता है। घूमता हुआ मन भी कुछ और लगता है। एक पड़ाव छूटा, दूसरी तरफ़ चल पड़ा।  खाली होते ही अपने में स्थिर हो जाता है। हमारे पास तीन शरीर हैं,  पहला भौतिक या स्थूल शरीर। दूसरा विचार व भावनाओं से बना है, सूक्ष्म शरीर।सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से एक डेढ़ फ़ुट बड़ा है ।वहाँ बिना इन्द्रियों के काम होता है। तीसरा कारण शरीर चैतन्य से बना है। बुद्धि और शक्ति से बना है। गहरी नींद और ध्यान में हम कारण शरीर में होते हैं। जिससे आनंद व शक्ति मिलती है। 

Wednesday, August 19, 2026

शक्ति केंद्र जब जागेंगे भीतर

विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन यदि कोई है तो वह 'योग' है। योग हमें अपने भीतर केंद्रित होना सिखाता है। मानव के भीतर जो सुप्त शक्तियाँ हैं, उन्हें जगाने का उपाय बताता है। मानव देह में मूलाधार पर स्थित चक्र या केंद्र पर एक सकारात्मक व एक नकारात्मक, उत्साह और आलस्य, ये दो भाव विद्यमान हैं। आलस्य सभी को सहज ही प्रकृति द्वारा दिया गया है, उत्साह बीज रूप में विद्यमान है। इसीलिए हम आज के काम को कल पर टाल देते हैं। जब तक डेड लाइन न दी जाये, लोग काम पूरा नहीं करते। परीक्षा सिर पर न हो तो विद्यार्थी पढ़ाई नहीं करते। आलस्य का अर्थ है देह में ऊर्जा की कमी का अनुभव हो रहा है। योग के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करके मन में उत्साह के बीज को अंकुरित करके इसे जगाया जा सकता है। इसी तरह स्वाधिष्ठान केंद्र पर भी दो भाव हैं, कामनायें तथा सृजन। यदि हम अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति में ही लगे रहेंगे तो सृजन की क्षमता बीज रूप में सुप्त रहेगी। योग के द्वारा हम इस शक्ति को भी जगा सकते हैं। कला, संगीत व साहित्य की तरफ़ यदि आपका रुझान कम है तो योग साधना के बाद वह सहज ही जगने लगेगा। मणिपुर चक्र पर ध्यान करके उदारता व मुदिता के बीजों को को जगाया जा सकता है, वरना प्रकृति से प्राप्त ईर्ष्या व लोभ की भावना जीवन भर दंश देती रहेगी। ह्रदय के केंद्र पर प्रेम जगता है तो साधक को सारे विश्व के प्रति अपनापन महसूस होता है। इस केंद्र पर प्रकृति ने हमें भय की भावना दी है, जो अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु यदि हृदय में केवल भय ही भय हो तो तो व्यक्ति का पूरा विकास कैसे संभव हो सकता है। प्रेम का बीज फले-फूले इसके लिए योग साधना सहायक है। विशुद्धि चक्र पर प्रकृति ने दुख का भाव अनुभव करने की क्षमता दी है, जब कोई दूर जा रहा हो तो गला भर आता है, रोते समय गला रूँध जाता है। कृतज्ञता की भावना यहाँ बीज रूप में दी गई है, जिसे जितना बढ़ाया जाएगा, जीवन में समृद्धि बढ़ती जाएगी। आज्ञा चक्र पर क्रोध स्वाभाविक भावना है, लेकिन सजगता का बीज हमें रोपना है। तभी सहस्रार पर ऊर्जा का फूल खिलकर चारों ओर अपनी सुगंध फैलाएगा। यही योग का लक्ष्य है। 

Sunday, August 16, 2026

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

आज यह विचार करने की बहुत ज़रूरत है कि वास्तव में स्वाधीनता क्या है? क्या राजनीतिक रूप से स्वाधीन देश में निवास करने मात्र से हम स्वयं को स्वाधीन मान सकते हैं ? जब तक हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, स्वाधीनता भ्रम ही बनी रहती है। किसी का मन यदि भय से ग्रस्त है, दूसरों से तुलना करता है, सदा कुछ न कुछ पाने की फ़िराक़ में लगा रहता है, तो वह मन परतंत्र ही कहा जायेगा। जब हम भीतर अतृप्त बने रहते हैं, जीवन की दौड़ में स्वयं को पिछड़ गया मानते हैं, तो हम उस मानसिकता के ग़ुलाम हैं, जो जीवन को एक संघर्ष में बदल देती है। जीवन एक कला है, कोई युद्ध नहीं। जिस भी परिस्थिति में किसी को रखा गया है, वह उसके विकास के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य दिखाती है। किंतु जो मन मुक्त नहीं है, वह इस खुले द्वार को देख ही नहीं सकता। जीवन हमारे चारों ओर हवा और धूप की तरह बिखरा है, लेकिन हम उसकी ओर नज़र नहीं उठाते। जीवन ऊर्जा श्वासों के रूप में दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, उसकी भरपाई के रूप में हमारे ऋषियों ने ध्यान-प्राणायाम की अद्भुत विद्या सिखायी है। जिसके द्वारा हम जीवन के स्रोत से जुड़ सकते हैं और स्वयं के भीतर मुक्ति का द्वार पा सकते हैं। मृत्यु यदि जीवन का अंत है तो जीवन, मृत्यु का भी अंत हुआ। इस रहस्य को भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं। आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही वह जीवन है जो मृत्यु का अंत है। ध्यान में हम उसी आत्मा का अनुभव करते हैं, वहीं सच्ची मुक्ति का अहसास होता है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है, इसलिए भय, तुलना, आगे-पीछे, छोटा-बड़ा भी कुछ नहीं है। वहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र है, तब स्वयं पर शासन करने की विधि ज्ञात होती है। हमारे शास्त्र हमें इसी मोक्ष की याद बार-बार दिलाते हैं। 

Monday, August 10, 2026

जीवन एक यात्रा सुंदर

जीवन एक यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जिसमें हर पड़ाव पर कुछ बोझ हल्का होता जाता है। कितना सारा सामान उठाकर यात्री घर से निकलता है, पर मार्ग में उसे जिन-जिन वस्तुओं की ज़रूरत पड़ती जाती है, वे समाप्त होती जाती हैं और धीरे-धीरे गठरी हल्की होने लगती है। जिस स्थान पर यात्री को जाना है, वहाँ सब कुछ है, वहाँ कुछ भी ले जाने की ज़रूरत नहीं है। जो भी उसे चाहिए, केवल रास्ते के लिए है। अन्तिम लक्ष्य आने से पहले न जाने कितने पड़ावों से होकर उसे गुजरना है। बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था, पढ़ाई, विवाह, नौकरी, सेवा निवृत्ति, धर्म, अध्यात्म, सेवा, रुचियाँ, कलाएँ, संगीत, मनोरंजन, भक्ति, प्रेम, घृणा, ईर्ष्या, सत्य, असत्य, जागरण, निद्रा, स्वप्न, कर्म, ज्ञान, अध्ययन, प्रयत्न, व्यायाम, विश्राम, ध्यान, योग और भी न जाने कितने पड़ाव उसके जीवन में आते हैं। हर जगह अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वह देर-सेवर पहुँचता है, अपनी सामर्थ्य और रुचि के अनुसार हर पड़ाव पर नये कर्म करता है, नये कर्मफल बाँधता है। जो आगे की यात्रा में उसके काम आयेंगे। कर्मफलों की गठरी बाँधे वह चलता रहता है। जब तक इनकी समाप्ति नहीं होगी, यात्रा जारी रहेगी। इनका निपटारा ही यात्रा का अंत है। यह जन्मों-जन्मों की यात्रा है। यदि नये कर्म न करे, पुराने कर्मों के फलों को अनासक्त भाव से सह ले। हर सुख-दुख को साक्षी भाव से देखकर आगे बढ़ जाये तो धीरे-धीरे उनका बोझ कम होता जाता है, वह हल्का हो जाता है, ख़ाली हो जाता है और यही तो घर जाना है! 

Saturday, August 8, 2026

जीवन में जब ध्यान सधेगा

यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।