Monday, November 28, 2022

कण -कण में जो देखे उसको

 जब तक हम सुख-दुःख के भोक्ता बनते हैं, मान-अपमान हमें प्रभावित करता है, तब तक हम मन के तल पर ही जी रहे हैं। आत्मा साक्षी है, वहाँ न सुख है न दुःख, एकरस आनंद है। न अपमान का भय है न मान की आकांक्षा, वह साक्षी सदा एक सी किंतु सहज अवस्था है। वह दिव्यता का एक अंश है जो हमारा वास्तविक स्वरूप है, पर जो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोष के आवरण में छिपा हुआ है, जिसे आनंदमय कोष भी कहते हैं। स्वयं के भीतर उसे अनुभव करना और विश्व आत्मा या परमात्मा के साथ एक हो जाना ही हर साधना का लक्ष्य है; अर्थात पहले हमें अपने भीतर उस दिव्य तत्व को अनुभव करना है फिर कण-कण में उस दिव्यता का अनुभव करना है। हर व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के पीछे वही एक सत्ता है, इसका अनुभव सीधे-सीधे नहीं हो सकता। पहले गुरू में उसके दर्शन होते हैं फिर स्वयं में तथा फिर जगत में, इसके बाद साधक जीते जी मुक्ति का अनुभव करते हैं। सारे बंधन मन के स्तर पर ही  अनुभव में आते हैं।  

Thursday, November 24, 2022

श्वास श्वास जब खिल जाएगी

अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की  जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं। 


Sunday, November 20, 2022

धैर्यशील है कुदरत सारी

जीवन हमें नित नए उपहार दे रहा है। हर घड़ी, हर नया दिन एक अवसर बनकर आता है। हमारे लक्ष्य छोटे हों या बड़े, हर पल हम उनकी तरफ़ बढ़ सकते हैं; यदि अपने आस-पास सजग होकर देखें कि प्रकृति किस तरह हमारी सहायक हो रही है। वह हमें आगे ले जाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। हम कोई  कर्म करते हैं और फिर प्रमाद वश या यह सोचकर कि इससे क्या होने वाला है, बीच में ही छोड़ देते हैं। किंतु प्रकृति धैर्य नहीं छोड़ती, वह माँ है जो सदा  अपने बच्चों को पूर्णता की ओर जाते देखना चाहती है। माया कहकर हम चाहे उसे दोष दें पर माया ही हमें जगाती है; फंसने से बचाती है, कभी पुरस्कार द्वारा, कभी फटकार द्वारा हमें सही मार्ग पर रखती है, ताकि एक दिन हम अपने गंतव्य तक पहुँच सकें, स्वयं को परमात्मा से जोड़ सकें। सदकर्मों को करते हुए, मन को शुद्ध रखें और कण-कण में छिपे देवत्व को अपने भीतर पहचान सकें। माँ की कृपा का अनुभव करना भी एक तरह की साधना है जो सजग होकर की जा सकती है। हम अपने वरदानों पर नज़र डालें तो वे बढ़ते जाते हैं, और वे प्रेरित करते हैं। पाँच इंद्रियों तथा मन के रूप में देवता हमारे सहायक बनें, वे हमें सन्मार्ग पर रखें, ऐसी ही प्रार्थना हमें करनी है। 


Thursday, November 17, 2022

मन के जो भी पार हुआ है

हमारे विचार शुभ हों, उनमें दिव्यता की झलक हो तो ईश्वरीय आनंद हमारे चारों तरफ़ अनुभव होने लगता है। यह जीवन एक अवसर के रूप में हमें मिला है, इसे सँवारना हमारे अपने हाथों में है। ईश्वर की  हज़ार-हज़ार शक्तियाँ हमारी सहायता के लिए तत्पर हैं, उनकी कृपा अनवरत बरस रही है। हमें उसकी तरफ़ स्वयं को उन्मुख करना है। अभी हम मनमुख हैं, अपने मन के ग़ुलाम, मन की छोटी-छोटी इच्छाओं, कामनाओं और संवेगों के इशारे पर चलते हैं। मन आदतों का एक पुंज है इसलिए हम बार-बार उन्हीं कृत्यों को करते हैं। जीवन एक दोहराव बन जाता है। हम कहीं पहुँचते हुए नहीं पाए जाते; जब तक मन के इस दुश्चक्र से बाहर निकल कर यह निर्णय नहीं लेते हैं कि जीवन की वास्तविकता आख़िर है क्या ? क्या सुख-दुःख के झूले में झुलाने के लिये ही धरती पर इतना आयोजन हुआ है। जगत में जो इतना अत्याचार, अनाचार चल रहा है, वह स्वार्थी मनों का ही तो परिणाम है। हर कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा है। पर इससे दुनिया सुंदर तो नहीं बन रही। हम इस दायरे से बाहर नकलते हैं तो स्वयं को एक विस्तृत आकाश में पाते हैं, जो शांति का घर है। 


Wednesday, November 16, 2022

जो बाहर वह भीतर भी है

जैसे एक दुनिया बाहर है, हमारे भीतर भी एक संसार है. स्वप्नों में हमारा मन जिन लोकों में विचरता है, वह अवचेतन का जगत है. ध्यान में योगी इस जगत को अपने भीतर देख लेते हैं. आत्मा को इन्द्रियों की जरूरत नहीं है, वह आँखों के बिना भी देख सकती है, कानों के बिना सुन सकती है, इसी तरह सूँघने, चखने व स्पर्श का अनुभव भी कर सकती है. हमारा जीवन कई आयामों पर एक साथ चल रहा है. देह के भीतर न जाने कितने प्रकार के जीवाणु हैं, जिनके जीवन और मृत्यु पर हमारा जीवन टिका है. सूक्ष्म कोशिकाएं हैं, जिनमें से हर एक स्वयं में पूर्ण है तथा अन्य कोशिकाओं से संयुक्त भी है. एक तरह की कोशिकाएं मिलकर ऊतक बनाती हैं, जिनसे अंग बनते हैं, वे अंग फिर एक तरह का संस्थान बनाते हैं. जिसे चलाने के लिए कुशलता व बुद्धि की आवश्यकता है, जो उनमें ही विद्यमान है. वह बुद्धिमत्ता उनमें ईश्वर द्वारा प्रदत्त ही मानी जा सकती है. हमारे प्राण शरीर को भी हम कितना कम जानते हैं. शरीर में होने वाली सब गतियां इन्हीं के कारण होती हैं. भोजन का पाचन, रक्त का परवाह, छींक आना, पलकों का झपकना आदि सभी क्रियाएं प्राणों के कारण हो रही हैं. मन के तल पर तो मनुष्य के पास अनंत स्मृतियों का ख़ज़ाना है, न जाने वह कितने जन्मों की यात्रा करके आया है, जिनकी स्मृति भीतर क़ैद है। ज्ञान का एक अनंत भंडार भी हमारे विज्ञान मय कोश में है, जिसके पार आनन्दमय कोश है।इसलिए कहा गया है यथा पिंडे, तथा ब्रह्मांडे ! 


Tuesday, November 15, 2022

कुदरत के संग एक हुआ जो

 ज्ञान अनंत है, अज्ञान है उसमें से थोड़ा बहुत जानना और सब जानने का भ्रम पाल लेना. हमारी इन्द्रियां सीमित हैं, मन के सोचने की क्षमता भी सीमित है. बुद्धि के तर्क की भी सीमा है, पर ज्ञान की कोई सीमा नहीं. आत्मा की क्षमता असीम है लेकिन असीम को जानकर भी असीम शेष रह जाता है. पुस्तकालयों में किताबें बढ़ती ही जा रही हैं, एक व्यक्ति पूरे जीवन में उनका एक अंश भी नहीं पढ़ सकता. योग के द्वारा मन, इन्द्रियों व प्राण की शक्ति को किसी हद तक बढ़ाया जा सकता है. बुद्धि के पार जाकर उस एकत्व का अनुभव किया जा सकता है, जहाँ प्रकृति अपने रहस्य खोलने लगती है. योगी विचारों की शक्ति से ऐसे-ऐसे कार्य कर लेते हैं कि सामान्य जन उन्हें चमत्कार कहते हैं. 

Thursday, November 10, 2022

सच की राह पकड़ ले राही

दिखावा करना और दूसरों की नक़ल करने की आदत हमें जीवन में आगे बढ़ने से रोकती है। हम दिखावा करते हैं तो अहंकर को बढ़ावा देते हैं। दूसरों की नक़ल करते हैं तो असत्य को प्रश्रय देते हैं। संतुष्ट जीवन सत्य की राह से ही पाया जा सकता है, प्रामाणिकता वह पहली ईंट है जिस पर एक सुखद जीवन की इमारत खड़ी होती है। अहंकार चाहे कितना भी निर्दोष हो हमें अपने सच्चे स्वरूप से दूर ही रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है क्योंकि दिव्य चेतना हर एक के भीतर विद्यमान है। अपनी निजता को पहचान कर हमें उस एकता को पाना है जिसके बाद न ही दिखावा करने की ज़रूरत रह जाती है और न ही किसी की तरह बनने की आकांक्षा।जैसे बगीचे में खिला हर पुष्प अनोखा है वैसे  हर  मानव अपनी निजी पहचान लेकर दुनिया में आता है, जन्म-जन्मांतर की यात्रा करके वह स्वयं की दिव्यता को पहचान कर अस्तित्त्व के साथ मिलकर कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है। 


Wednesday, November 9, 2022

बन जाए जीवन जब उत्सव

जीवन एक प्रसाद की तरह हमें मिला है।हमारा तन, पाँच इंद्रियाँ, मन तथा बुद्धि इस प्रसाद को ग्रहण करने में सहायक बन सकते हैं, यदि हम उनके प्रति सम्मान का भाव रखें। अपने शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जब हम सृष्टि कर्ता  के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करते हैं तब हमारे सम्मुख एक नया आयाम खुलने लगता है। मन उसे जान नहीं सकता पर वह स्वयं मन को अपना आभास कराता है। जब जगत और अपने शरीर के प्रति हमारे भीतर सम्मान की भावना होती है तो अहंकार अपने शुद्ध रूप में प्रकट होता है। ऐसी स्थिति में हम स्वयं को जगत से पृथक मानकर स्वार्थ पूर्ति में लिप्त नहीं रहते बल्कि जगत का अंश मानकर स्वयं को उन कार्यों में लीन पाते हैं जो अपने साथ-साथ सबके लिए सुख का कारण बनें। छोटी-छोटी बातें अब व्यथित नहीं करतीं, एक गहन शांति का घेरा सदा ही चारों ओर बना रहता है और हम उस आनंद का अनुभव करते हैं जिसका कोई बाहरी कारण दिखायी नहीं देता। जीवन हमारे लिए एक अनवरत चलने वाला उत्सव बन जाता है। 


Wednesday, November 2, 2022

योग व शिक्षा - महर्षि अरविंद


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महर्षि अरविंद के अनुसार वैसे तो सारा जीवन ही योग है; किंतु एक साधना पद्धति के रूप में योग आत्म-पूर्णता की दिशा में एक व्यवस्थित प्रयास है, जो अस्तित्व की सुप्त, छिपी संभावनाओं को व्यक्त करता है। इस प्रयास में मिली सफलता व्यक्ति को सार्वभौमिक और पारलौकिक अस्तित्व के साथ जोड़ती है।

 

श्री अरविंद का विश्वास था कि मानव दैवीय शक्ति से समन्वित है और शिक्षा का लक्ष्य इस चेतना शक्ति का विकास करना है। इसीलिए वे मस्तिष्क को 'छठी ज्ञानेन्द्रिय' मानते थे।वह कहते थे शिक्षा का प्रयोजन इन छ: ज्ञानेन्द्रियों का सदुपयोग करना सिखाना होना चाहिए।उनके लिए वास्तविक शिक्षा वह है जो बच्चे को स्वतंत्र एवं सृजनशील वातावरण प्रदान करती है तथा उसकी रूचियों, सृजनशीलता, मानसिक, नैतिक तथा सौन्दर्य बोध का विकास करते हुए अंतत: उसकी आध्यात्मिक शक्ति के विकास को अग्रसरित करती है।


Sunday, October 23, 2022

एकै साधै सब सधै

इस जगत में जड़ पदार्थ और चेतना के पीछे कोई एक तत्त्व छुपा हुआ है, जिसने स्वयं को इन दो भागों में बाँट लिया है. जड़ पदार्थ में  वह  सत्ता रूप में स्थित है, मानव से इतर प्राणियों और वनस्पति में सत्ता व चेतना के  रूप में और मानव में सत्ता, चेतना व आनंद के रूप में. भौतिक जगत में रहते हुए हम अनेक वस्तुओं को देखते हैं, किन्तु उनके भीतर एकत्व का अनुभव नहीं कर पाते. अध्यात्म का अर्थ है इस विभिन्नता के पीछे उस एक्य को देख लेना। उस समरसता और एकता का बीज सभी के भीतर है, किंतु केवल मानव के भीतर वह सामर्थ्य है कि उसे पहचाने और अपने अहैतुक प्रेम, आनंद और शांति के रूप में बाहर व्यक्त करे। अध्यात्म से जुड़े व्यक्ति के लिए कर्म का अर्थ केवल अपना सुख प्राप्त करना नहीं है, उसके कर्म सारे जगत के कल्याण की भावना से भरे होते हैं। उसके मन की मूल भावना स्वार्थ से ऊपर उठ जाती है। ऐसे में वह स्वयं तो अपना कल्याण करता ही है, सहज ही जगत के प्रति मैत्री भाव से भर जाता है।

Wednesday, October 19, 2022

जगमग दीप जले

जब भीतर-बाहर, घर, द्वार, बाज़ार, दफ़्तर सभी जगह स्वच्छता का आयोजन सहज ही होने लगता है तब मानना चाहिए कि दिवाली आने वाली है।दीपावली का पर्व अनेक अर्थों को अपने भीतर धारण किए हुए है। यह राम से संयुक्त है तो कृष्ण से भी, इसमें यम की कथा भी आती है और धन्वन्तरि की भी। दिवाली लक्ष्मी से जुड़ी है तो काली से भी। जीवन में राम का आगमन हो तो अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है और ज्ञान, हर मार्ग को प्रकाशित करता हुआ आगे ले जाता है। इस आनंद को अकेले नहीं सबके साथ मिलकर अनुभव करना है, इसलिए इसमें एक-दूसरे को मिष्ठान व उपहार वितरित करते हैं। गोवर्धन पूजा का संदेश है प्रकृति का आराधन। माटी का एक छोटा सा जलता हुआ दीपक दूर से आकर्षित कर लेता है, फिर आज के दिन तो लाखों दीपक जलाए जाते हैं। मानव तन भी माटी से बना है, जिसमें चेतना की बाती जल रही है, जो स्नेह से प्रदीप्त रहती है। भीतर चैतन्य का दीपक जलता हो तो अंतर में उल्लास कम नहीं होता और सहज ही सब ओर बहने लगता है। सृष्टि में प्रकृति के साथ आदान-प्रदान आरम्भ हो जाता है। 


Sunday, October 16, 2022

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:


संत कहते हैं, इस जगत के और हमारे भी केंद्र में जो होना चाहिए, वह ईश्वर है. असल में वह जगह तो भगवान की है; किंतु आज उसकी जगह को अहंकार ने घेरा हुआ है.  मुल्कों के अहंकार ने, शासकों के अहंकार ने। अहंकर केवल सेवक है, पर मानव भूल गया है कि वह ईश्वर  की सत्ता के कारण अपना काम कर रहा है. मानव इस मूलभूत तथ्य को भूल गया है और मनमानी करता है; तब उसे लगता है कि जगत सुंदर नहीं है, जगत में कितने अत्याचार हो रहे हैं. जबकि मानव ने स्वयं प्रकृति को स्वयं कितना नुक़सान पहुँचाया है. कुछ लोग यह सोच कर कि इस कष्ट का अंत कभी नहीं होगा;  जीवन से  भाग जाते हैं,  आत्महत्या तक कर लेते हैं। वे जगत को सुंदर बनाने का कोई प्रयत्न नहीं करते. जो सत्य के पथ पर चलेगा उसका कल्याण होगा, उसे ही सौंदर्य की अनुभूति होगी। सत्यं शिवं सुंदरं के इस छोटे से सूत्र में यह संदेश चिरकाल  से  मानव को दिया गया है। विध्वंस तब होता है जब मानव कुछ और करना नहीं चाहता तब भगवान  के पास कोई विकल्प नहीं रहता. युद्ध कोई समाधान नहीं है, यह मानव की अंतिम मंज़िल नहीं हो सकती, इसके बाद शांति और मेल-मिलाप की सारी यात्रा पुनः करनी होगी। हमें अहिंसा को पुनः परम धर्म के रूप में स्थापित करना है। लक्ष्य यदि सम्मुख हो तो हमें राह मिलने लगती है। धरती को मानव ने दूषित किया है अब उसे ही सुधारना है। आज भारत के ज्ञान के प्रभाव से विश्व में परिवर्तन हो रहा है, अब ईश्वर के बताये मार्ग पर अनेक लोग चलने को उत्सुक हैं. वह दिन दूर नहीं जब भारत की बात सुनी जाएगी और सतयुग का सब जगह दर्शन होगा। 


Wednesday, October 12, 2022

ऐसी वाणी बोलिए

दिव्यता कण-कण में है  चाहे वह जड़ हो या चेतन। उस दिव्यता को हम पहचानें और आत्मसात् करें। एक बार निर्णय हो जाए तो उसी पथ पर चलें। एक मार्ग हो, उसे पकड़ कर राही को चलते जाना है। माना जंगल भी हैं सुंदर, पर दृष्टि को नहीं भटकाना है। नहीं कोई बाधा बन रोके, नहीं कोई जीवन को बहने से टोके । हमारी वाणी के दोष हमें अपनी मंज़िल पर जाने से रोकते हैं। वाणी शुद्द्ध हो, कल्याणकारी हो, रूक्ष ना हो, दोहरे अर्थों वाली न हो।उसमें लोच हो पर स्थिरता भी हो। वाणी में मिठास हो, दूसरों के दोष देखने वाली ना हो। व्याकरण का नियम विचलित न होता हो, भाषा की त्रुटि न हो। उसमें दिखावा न हो, पाखंड न हो, सत्य की अन्वेषी हो। व्यर्थ के कार्यों में न लगती हो। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो। ईश्वर का हाथ पकड़कर चलना है, इसका पूरा विश्वास हो। देह, मन, बुद्धि सभी दिव्य बनें। 


Monday, October 3, 2022

विजयदशमी की शुभकामनाएँ

दशहरा अर्थात दशानन का मरण, या दस सिर वाले असुर का विनाश। देवता और असुर दोनों ही कहाँ रहते हैं ? हमारे ही  मन में उनका निवास है, क्योंकि जो ब्रह्मांड में है, वही पिंड में है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, मद, मत्सर, दर्प, ईर्ष्या तथा अहंकार रूपी रावण के दस सिरों को भगवती दुर्गा की प्रार्थना के बाद ग्रहण की गयी शक्ति के कारण राम रूपी आत्मा नष्ट करती है। मन जब हनुमान की तरह समर्पित होता है और ध्यान  लक्ष्मण की तरह सेवा में तत्पर होता है, तब सीता रूपी बुद्धि को उपरोक्त दस विकारों की क़ैद से मुक्ति प्राप्त होती है। भारत भूमि पर मनाए जाने वाले हर उत्सव का एकमात्र उद्देश्य आत्मा को शक्तिशाली बनाना है ताकि वह प्रकृति के पार जा सके और अपनी दिव्यता को अनुभव करे। 


निज स्वभाव में जो टिक जाए

तीनों गुणों, प्रकृति, काल, कर्म और इस जगत से परे जाकर हमें अपने जीवन को पवित्र बनाना है. भोर में उठकर पहला विचार मांगलिक हो, रात्रि में सोने से पूर्व स्वयं में स्थित होकर सहज होकर  सोएँ. इस जगत में जहाँ हर क्षण सब कुछ बदल रहा है, जहाँ हमें कितने प्रभावों का सामना करना पड़ता है. कभी-कभी शोक के क्षण जो बना माँगे ही हमें मिलते रहते हैं क्या वे पूर्व कृत्यों का फल नहीं हैं ? हमारी प्रकृति कैसी है, सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक, इस पर भी कर्म निर्भर करते हैं, जिस गुण की प्रधानता हो वैसा ही स्वभाव हम धर लेते हैं, जिस वातावरण में हम रहते हैं पूर्व संस्कारों के अनुसार वही भाव दशा हमारे मन की हो जाती है. लेकिन हमें इन सारे प्रभावों से पार जाना है, अपने स्वभाव में लौटना है. प्रेम करना हमारा स्वभाव है, आनन्द हमारा स्वभाव है ! जब हमें किसी वस्तु का अभाव खटके तो भी हम स्वभाव से हट गये हैं. स्वभाव में तो पूर्णता है, वहाँ कोई कमी है ही नहीं. तो हमें प्रतिपल इस बात का ध्यान रखना होगा, कि अंतःकरण कैसा है, हम स्वभाव में हैं या नहीं, सुख तब कहीं खोजना नहीं पड़ेगा, परमात्मा स्वयं उसे लेकर आएगा.

Friday, September 30, 2022

गांधी जी ने यही कहा था

बापू के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह सत्य और अहिंसा के प्रति पूर्ण समर्पित थे। वह समय के पाबंद थे, नियमित भ्रमण करते थे, शाम को उनके सत्संग का भी समय निश्चित था। वह सात्विक व शाकाहारी भोजन के हिमायती थे। उनके आश्रमों के नियम बहुत कठोर थे और उस समय के लिए संभवतः आवश्यक भी थे। देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को उन्हें गढ़ना था। वह वस्तुओं का समुचित उपयोग करना चाहते थे, काग़ज़ का एक टुकड़ा हो या पैर रगड़ने वाला छोटा सा पत्थर, उनके लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने अपने लिए अनेक मर्यादाओं को तय किया और उनका पालन किया। सत्य या ईश्वर की खोज उनके जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती थी जितना देश को आज़ाद कराना। उन्होंने सविनय अवज्ञा व सत्याग्रह आदि जितने आंदोलन किए, अपने आदर्शों को सदा आगे रखा। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की दशा देखकर उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा का आरंभ किया, आज भी वहाँ उन्हें आदर से याद किया जाता है और नेल्सन मंडेला के उनके रास्ते पर चलकर अपने देश को आज़ाद कराया। गांधी जी ने अस्पृश्यता जैसे सामाजिक रोग को दूर करने के लिए बहुत कार्य किया। नारियों की शक्ति को पहचान कर उन्हें शिक्षा प्राप्त करने व सामाजिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं और गांधी वांग्मय नाम से उनके लिखे लेखों, भाषणों व पत्रों का एक विशाल भंडार है जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित कर सकता है। वह भारत में रामराज्य की स्थापना करना चाहते थे। सभी धर्मों के प्रति उनके मन में आदर था। अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को आगे लाना उनकी प्राथमिकता थी। विश्व के हर कोने में गांधी जी को सम्मान मिला। वर्तमान में कुछ लोग भले ही कुछ बातों के लिए उनका विरोध करते हों, पर उनके असाधारण कार्यों के लिए सभी के दिल में उनके लिए अपार आदर है। 


Thursday, September 29, 2022

सोहम का जो मर्म जानता

 हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को  जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।   

Friday, September 23, 2022

खुद को जिसने चेतन जाना

हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को  जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।   


Thursday, September 22, 2022

जीवन इक उपहार अनोखा

सेवा के रूप में किए गए कृत्य हमें वर्तमान में बनाए रखते हैं क्योंकि हमें उनसे भविष्य में कुछ भी पाने की चाह नहीं होती। जब हम जीवन को साक्षी भाव से देखते हैं तो चीजें स्पष्ट दिखायी देती हैं। जितना हम सामान्य बातों से ऊपर उठ जाते हैं तो वे बातें जो पहले बड़ी लगती थीं, अपना महत्व खो देती हैं। हमें यह जीवन उपहार स्वरूप दिया गया है, मन में इसके लिए अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता जगे तो कभी किसी अभाव का अनुभव नहीं होता। नियमित साधना, सेवा तथा जाप करने से मन तृप्त रहता है। जितना-जितना हम साधना के लिये समर्पित होंगे, आंतरिक ऊर्जा बढ़ती रहेगी और सहज उत्साह बना रहेगा। ऐसी स्थिति में हमारा हर कार्य भीतर के आनंद की अभिव्यक्ति के लिए होगा न कि भविष्य में आनंद पाने की लालसा में किया गया होगा। इसके लिए समय का उचित प्रबंधन और हर क्षेत्र में संयमित रहना है। संबंधों में मधुरता तभी बनी राह सकती है जब वे प्रेम बाँटने के लिए बने हों न कि प्रेम की माँग करने के लिए। 


Tuesday, September 20, 2022

लक्ष्य साध ले जो जीवन का

जीवन में किसी भी कर्म को करने का निर्णय लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना होगा कि क्या इस कर्म का परिणाम हमें केवल अल्पकालीन आनंद देगा । यदि थोड़े से सुख के लिए हम भविष्य के लिए दुःख का इंतज़ाम कर रहे हैं तो ऐसा कर्म किसी भी तरह करणीय नहीं है। यदि किसी कर्म से हमें थोड़ा कष्ट भी उठाना पड़े किंतु उसका परिणाम बाद में अच्छा हो तो वह कर्म अवश्य करना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए जीवन को स्वीकार भाव से जीना हमें सफलता के मार्ग पर ले जाता है।एक बार जब हम किसी भी लक्ष्य को तय कर लें अथवा किसी कार्य के प्रति प्रतिबद्ध हों तो उसे प्राप्त किए बिना छोड़ना नहीं चाहिए। जीवन का मार्ग अपने उत्तरदायित्वों पर आधारित हो न कि भावनाओं पर, जो सदा बदलती रहती हैं। उत्तरदायित्व के प्रति निष्ठा से आत्मिक शक्ति प्रकट होती है। भावनाओं से मुक्ति मन को स्वतंत्रता का आभास कराती है। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। यहाँ सदा उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इनके मध्य भी जो सदा आनंदित व  उत्साहित रहना सीख ले वही सफल कहा जाता है। 


Thursday, September 15, 2022

दुःख में सुमिरन सब करें

जीवन में जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, कोई अभाव नहीं खटक रहा होता. शरीर स्वस्थ होता है और कोई आर्थिक समस्या भी नहीं होती तब मानव ईश्वर को याद नहीं करता. वह यदि नित्य की पूजा में बैठता भी है तो उसकी प्रार्थनाओं में गहराई नहीं होती. वह फूल भी अर्पित करता है और उसके मन्दिर में घन्टा भी बजा देता है पर उसके मन में कोई कोई आतुरता नहीं होती. दुःख में की गयी प्रार्थना हृदय की गहराई से निकलती है. दुःख व्यक्ति को अपने करीब ले आता है, वह ईश्वर से जुड़ना चाहता है. वह उसकी कृपा का भागी होना चाहता है; किंतु उसका संबंध क्योंकि आत्मीय नहीं बना है, उसे आश्वासन मिलता हुआ प्रतीत नहीं होता। सन्त कहते हैं, सुख या दुःख दोनों के पार है परम सत्य, उसे अपने जीवन का आधार मानते हुए हर पल उसके प्रति कृतज्ञता की भावना रखनी चाहिए. उसकी उपस्थिति से ही हमारे प्राण जीवित हैं, रक्त प्रवाहित हो रहा है. हमें वाणी मिली है. हमारा होना ही उससे है. जीवन में आने वाले सुख-दुःख हमारे स्वयं के कर्मों के परिणाम हैं. वह साक्षी मात्र है. जब हमारे जीवन का केंद्र उसके प्रति कृतज्ञता के निकट स्थित होगा तब मन के सजगता पूर्ण होने के कारण कर्म सहज होंगे और उनका परिणाम भी दुखदायी नहीं होगा. सुख-दुःख तब समान हो जाएंगे और जीवन एक खेल की भांति प्रतीत होगा. 


Tuesday, September 13, 2022

हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है


हिंदी एक सरल, सुंदर, सहज व समृद्धभाषा है, इसका शब्दकोश अति विशाल है। हिंदी साहित्य की परंपरा अति प्राचीन काल से आरंभ होती है । समय के साथ-साथ हिंदी के रूप  बदलते रहे हों पर या एक विस्तृत धारा की तरह अनेक भाषाओं के शब्दों को सहेजती, परिवर्तित करती बहती आयी है। यह भारत के विभिन्न प्रदेशों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा है और एक दिन सारे विश्व को आपस में जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा बनने की क्षमता इसमें है। यह भारत की राजभाषा होने के साथ-साथ उत्तर भारत के नौ राज्यों की भी आधिकारिक भाषा है।विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ायी जाती है; वहाँ हिंदी में साहित्य भी रचा जाता है। इंटर्नेट के इस युग में हिंदी में लिखने वाले ब्लॉगर्स की संख्या भी बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया के हर रूप में हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है। यह सब देखकर लगता है हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। ऐसे में हिंदी भाषियों का दायित्व हो जाता है कि वे अधिक से अधिक शुद्ध हिंदी का प्रयोग करें , उसे सिखाएँ, प्रचार करें तथा उसके साहित्य का अध्ययन करें। 


Thursday, September 8, 2022

प्रकृति का सम्मान करें हम

जीवन जिस स्रोत से आया है और जिसमें एक दिन समा जाएगा, जिससे सब कुछ हुआ है, जो पंच भूतों का स्वामी  है, जो जगत का कारण है, उसे ही जानना है। यहाँ जो भी हो रहा है, उन सब कारणों का जो  कारण है। जो हमारे जीवन का आधार है। हवा, पानी, अग्नि, आकाश का जो जनक है, मानव ने उसे भुला दिया और दिशा विहीन सा आज भटक रहा है। मानव ने केवल अपने सुख-सुविधा को महत्व दिया। केवल शरीर को आराम देने के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बना कर रहने लगा। प्रकृति से दूर हो गया। कुछ दूर चलने के लिए भी वाहन का इस्तेमाल करने लगा, जो वायु प्रदूषण करते हैं। जल को दूषित किया। भोजन के लिए हज़ारों का जीवों का नाश किया। हिंसा को प्रश्रय देने वाला मानव आज स्वयं प्रकृति की विनाश लीला का सामना कर रहा है। मौसम की मार से बचने के लिए किए गए उपाय आज काम नहीं आ रहे हैं। कहीं जंगलों में आग लगी है, धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है,  अतिवृष्टि, बाढ़, तूफ़ान और भूकम्प आज सामान्य घटना बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की दी चेतावनी आज सत्य सिद्ध हो रही है। मानव को चेतना होगा कि जीवन को बनाए रखने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनकर जीना ही उसके लिए एक मात्र उपाय है । 


Sunday, September 4, 2022

शिक्षक का सम्मान करे जो

नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है।पहले माता-पिता उसके शिक्षक बनकर फिर विद्यालय में  शिक्षक और गुरूजन उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अच्छे मार्गदर्शन को पाकर एक व्यक्ति जीवन में अपार सफलता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है। एक शिक्षक का अंत:करण अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को  अपने भीतर समेटे होता है. वह शिष्यों की योग्यता का अनुमान लगाकर उन्हने उनकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर देता है। वह स्वयं भी जीवन भर सीखता रहता है और सदा उत्साहित बना रहता है।  ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये. ऐसा मन जब ज्ञान के अपार सागर में खोकर  अहंकार को विलीन कर दे तभी महान शिष्यों का निर्माण कर सकता है।  


Friday, September 2, 2022

चाह ज्ञान की जगे निरंतर

जीवन अनुभवों का दूसरा नाम है। हर अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाता है। यदि हम सीखने को सदा जारी रखें तो जीवन एक सुंदर यात्रा बन जाता है। यदि कोई कुछ सीखना न चाहे तो उसके लिए जीवन एक संघर्ष बन जाएगा। बच्चा सीखता है, इसलिए उसका मन ताज़ा बना रहता है। विद्यार्थी सीखता है और नए-नए विषयों को जानकर चमत्कृत होता है। प्रौढ़ होते-होते जैसे-जैसे सीखने की चाहत कम होती जाती है और तब सीमित ज्ञान के सहारे जीवन को चलाए जाने में  सुरक्षा महसूस होती है। धीरे-धीरे जीवन से रस और आनंद सूखने लगता है। यह दुनिया अति विशाल है, इसके बारे में हम कितना कम जानते हैं। अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान का कोई भी क्षेत्र लेकर हम उसके बारे में पढ़ें, सोचें व मनन करें तो कई नई बातों की ओर हमारा ध्यान अनायास ही जाएगा। कई ऐसी बातें हमें नज़र आ सकती हैं जो पहले नज़र अन्दाज़ कर देते थे।  नियमित ध्यान इसमें अति सहायक है। ध्यान हमें एक विषय पर केंद्रित रहने की कला सिखाता है। ज्ञान अनंत है और हमारी चेतना में ही निहित है। उसमें प्रवेश करने का तरीक़ा ध्यान, अध्ययन व मनन ही हो सकता है।  


Wednesday, August 31, 2022

नए माह में नया जोश हो

नया महीना यानि नए वायदे करने का वक्त, नए संकल्प करने, नयी चुनौतियाँ लेने, नई ख़ुशियाँ पाने और लुटाने का वक्त है।सितम्बर का पहला सप्ताह पोषण को समर्पित है और पहला पखवाड़ा हिंदी को। विभिन्न अन्न देह का पोषण करते हैं और भाषा मन व आत्मा का। भोजन में ज्वार, बाजरा व जौ आदि मोटे अनाज को सम्मिलित करके और नियमित व्यायाम के द्वारा हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकते हैं। हिंदी के विकास के लिए हमारा कर्तव्य है कि इसे अधिक से अधिक व्यवहार में लाएँ, इसकी शुद्धता का भी ध्यान रखें। हिंदी साहित्य का प्रचार व प्रसार करें। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद हो और इसका विपरीत भी, ताकि सभी हिंदी के महत्व व इसकी क्षमता को अनुभव कर सकें। इसी महीने शिक्षक दिवस भी मनाया जाएगा। इसी महीने इंजीनियर दिवस व हृदय दिवस भी आते हैं तथा विश्व शांति दिवस भी। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन गणपति का विसर्जन होगा व अगले दिन से पितृ पक्ष आरम्भ हो जाएगा। सितम्बर के अंतिम सप्ताह में नवरात्रि का उत्सव भी आरम्भ हो रहा है।आने वाला हर दिन सभी देशवासियों के लिए तथा विश्व के हर वासी के लिए मंगलकारी हो।

Friday, August 26, 2022

जीवन रंगमंच है सुंदर

 “मैं कौन हूँ” इस प्रश्न का जवाब खोजे नहीं मिलता. बुल्लेशाह तभी कहते हैं, बुल्लाह, की जाना मैं कौन ? हम किताबें पढ़ते हैं, शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, संतों की वाणी सुनते हैं, पर यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है. बाहर संसार है भीतर विचार है, ध्यान की गहराई में जाएँ तो वहाँ कुछ भी नहीं, पूछने वाला ही नहीं रहा, यदि पूछने वाला है तो ध्यान घटा ही नहीं. जहाँ कुछ नहीं रहता वहाँ परमात्मा है, और परमात्मा ने अखंड मौन धारण किया हुआ है. वास्तव में प्रकृति और परमात्मा के इस खेल में ‘मैं’ तभी तक है, जब तक अज्ञान है, अर्थात जब तक खोज शुरू ही नहीं हुई. देह और मन से परे ‘मैं’ एक अविनाशी सत्ता है, इसका ज्ञान होने पर ही पता चलता है, कि वहाँ कुछ भी नहीं है. जीवन तब एक खेल या नाटक ही प्रतीत होता है.

Tuesday, August 23, 2022

इस पल में जो जाग गया

 जीवन का हर नया पल एक उपहार की तरह हमें मिलता है. हम पुराने उपहार की मीनमेख निकालने में लगे रहते हैं या तो अब न जाने कौन सा उपहार मिलेगा इसकी  चिंता में इस पल के उपहार को खोलना ही भूल जाते हैं. इस तरह वर्तमान सदा ही अतीत के पश्चाताप या भविष्य के भय का शिकार बनता रहता है. जो भी खुशी है वह इस क्षण में मिलती है, सुख की हर स्मृति बीते कल की छाया है. भविष्य की कल्पना कितनी भी सुखद हो वह वास्तविक नहीं है. वह चित्र की नदी की तरह प्यास नहीं बुझाती. शुद्ध, निर्दोष, वास्तविक सुख केवल वर्तमान में बिना किसी कीमत के सहज ही बंट रहा है, जिसकी सबको तलाश है. खेल, खतरे भरे कार्यो में, प्रेम में हम वर्तमान में होते हैं, तभी ख़ुशी का अनुभव होता है. केवल ध्यानी व्यक्ति सदा ही वर्तमान में रह सकता है. 

Tuesday, August 16, 2022

कर्त्तव्यों का जिसे भान रहे

 किसी भी राष्ट्र को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए केवल सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती, उसके नागरिकों का योगदान भी उसमें बहुत प्रमुख भूमिका निभाता है। एक बार यदि बहुमत से कोई सरकार चुन ली जाती है तो उसकी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर उतारने के लिए जनता की भागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है। संविधान में भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्यों की चर्चा की  गयी है। हर नागरिक को उसका ज्ञान होना आवश्यक है. स्वच्छता अभियान पर सरकार चाहे करोड़ों रुपया खर्च करे, यदि देशवासी अपने आसपास गंदगी फैलाते रहेंगे, वन, झील, नदियों को दूषित करेंगे तो स्वच्छ भारत का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता। हर गाँव में सरकारी स्कूल खोले जाएँ पर लोग अपने बच्चों को पढ़ने न भेजें तो संविधान की अवहेलना होती है। हमारी प्राचीन धरोहरों  का सम्मान न करके यदि कोई उन्हें हानि पहुँचाए तो हम अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रहे। जल का सरंक्षण हो या ऊर्जा का, जनता को इसमें आगे आकर सम्मिलित होना होगा। सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने में भी आम आदमी को आगे आना होगा। यदि भारत का हर नागरिक सजग होकर हर प्रकार के उत्कर्ष को ही अपना ध्येय बनाएगा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विकसित देशों के साथ खड़ा होगा। 

Monday, August 8, 2022

उसकी चाह जगे जब मन में

 हमने इस जगत में अपने चारों ओर कुछ लोगों को वस्तुओं का गुलाम बनकर दुखी होते हुए तथा कुछ सजग व्यक्तियों को अकिंचन होकर भी प्रसन्न रहते हुए देखा है. वास्तविकता को भूले हुए कुछ लोग अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा करते रहते हैं, फिर उसकी साज-संभार में अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाते हैं. हमारी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को तथा स्वयं के इर्दगिर्द का वातावरण संवारने में होता रहे, तभी उसकी सार्थकता है. इसके लिए हमें समझना होगा कि आवश्यकता तथा इच्छा में अंतर है, इच्छाओं का कोई अंत नहीं पर आवश्कताएं सीमित हैं. आवश्यकता की पूर्ति होती है, उसकी निवृत्ति विचार द्वारा नहीं हो सकती पर इच्छा की निवृत्ति हो सकती है.अपनी इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में हम अपनी सहज आवश्यकता को भी भुला बैठते हैं.परमात्मा प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने वाली इच्छा है, पर संसार प्राप्ति की इच्छा कभी पूर्ण नहीं हो सकती. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा वास्तव में हमारी आवश्यकता है, हर जीव आनंद चाहता है, क्योंकि वह ईश्वर का अंश है, उसमें अपने अंशी से मिलने की जो स्वाभाविक चाह है, वह उसकी नितांत आवश्यकता है. जैसे भूख, प्यास आदि आवश्यकताओं की पूर्ति भोजन, जल आदि से हम करते हैं, वैसे ही हमारी आनन्द प्राप्ति की आवश्यकता की पूर्ति ईश्वर प्राप्ति के बाद ही होती है. 

Monday, August 1, 2022

पल-पल जीना सीखा जिसने


पानी पर खिंची लकीर की तरह मन में कोई भाव जगे और विलीन हो जाए तो उसके संस्कार नहीं पड़ते। बच्चों का हृदय ऐसा ही होता है, उन्हें रोते-रोते हँसते देर नहीं लगती, उनका अहंकार अभी मज़बूत नहीं हुआ है, बातों को पकड़कर रखने की अभी उन्हें जानकारी नहीं है। अहंकारी मन घटनाओं को पकड़ लेता है और वे उस पर गहरे प्रभाव डालती हैं। जीवनमुक्त पल पल में जीता है। हर क्षण उसके लिए नया अनुभव ला रहा है। प्रकृति भी नित नूतन है इसलिए  उसमें सौंदर्य है। कोई भी बात जब भावनाओं को प्रभावित न कर सके तब मानना चाहिए कि अपने स्वरूप में स्थिति दृढ़ हो गयी है।  


Friday, July 29, 2022

जीवन कैसे सरल बनेगा

हम सब यह जानते हैं कि संकल्पों से सृष्टि का निर्माण होता है। हर किसी के ज्ञान के अनुसार संकल्प उसके मन में उठते हैं।कभी-कभी हम विपरीत संकल्प भी उठा लेते हैं, कई बार अपने ही संकल्प को काट देते हैं। अहंकार वश अपने लिए हानिकारक संकल्प भी उठा लेते हैं क्यों कि मन पर हमारा वश नहीं है। सागर में निरंतर उठती लहरों की तरह वे उठते ही रहते हैं। अनजाने में हम अस्तित्त्व से विपरीत धारा में बहने लगते हैं और वहीं संघर्ष है, द्वंद्व है।सत्य क्या है हम नहीं जानते,  कल्पनाओं से अपने-अपने भगवान भी लोगों  ने गढ़ लिए हैं और उसी के नाम पर एक-दूसरे से लड़ते हैं। समर्पण, उत्साह व आनंद किसी भी भाव में हम रहें, सबमें सजगता आवश्यक है। सजग होकर ही हम सही संकल्प का चुनाव अपने लिए कर सकते हैं। होश में जीना ही आत्मा में  होना है, वही स्थितप्रज्ञता है। होश में होना ही अपने आप में होना है,  बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने भीतर संकल्प को उठते हुए देखना यदि आ जाए तो जीवन बहुत सरल और निर्दोष बन जाता है। 


Monday, July 25, 2022

जैसे नदी मिले सागर से

मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार  का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है। 


Friday, July 22, 2022

पर्यावरण जो करे सरंक्षित

जलवायु परिवर्तन के कारण आज विश्व का तापमान बढ़ रहा है।  जंगल जल रहे हैं , साथ ही  जल रहे हैं हज़ारों निरीह जीव। प्रकृति आज विक्षुब्ध प्रतीत होती है। मानव की बढ़ती हुई लिप्सा के कारण क्रुद्ध भी। आज मानव ने सुविधाओं के अम्बार लगा दिए हैं पर किस क़ीमत पर ? सूर्य की ऊर्जा ग्रीन गैसों की बढ़ती हुई मात्रा  के कारण बाहर नहीं जा पाती, इसलिए मौसम में असमय बदलाव हो रहे हैं। ईश्वर को नकारने का भाव मानव को स्वयं से भी दूर ले जा रहा है। सत्य की राह पर चलने के लिए उसे मानना तो पड़ेगा। अपने ज़मीर को भुलाकर युद्ध की आग में भी कुछ देश जल रहे हैं। अपने ही नागरिकों को भीषण दुःख में झोंकते हुए शासकगण एक बार भी नहीं सोचते। हथियारों की दौड़ में न जाने कितने  देश ग़लत नीतियों को अपना रहे हैं। जैविक और रासायनिक हथियारों पर शोध चल रही है यह जानते हुए भी कि इसके दुष्परिणाम इसी धरती के वसियों को भुगतने पड़ेंगे। प्रकृति के सामान्य नियमों को तोड़ते हुए मानव आज परिवार को भी जोड़ पाने में सक्षम नहीं रह गए हैं। किसी नीति, धर्म या परंपरा को न मानने का प्रण लेते हुए मानव को क्या दानव की वृत्ति अपनाने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। तभी शायद जंगलों में आग लगी है, युद्ध ख़त्म होने को नहीं आ रहा, कोरोना नियंत्रित होने का नाम नहीं ले रहा। विश्व जैसा आज दिशाहीन हो गया है। किंतु अस्तित्त्व आज भी अपने गौरव में मुस्का रहा है। यदि अब भी हम सजग हो जाएँ; अपने भीतर उस एक्य को महसूस करें जिससे यह कण-कण बना है; उस तत्व को नमन करें तो  कुछ अवश्य बचाया जा सकता है। एक बार फिर सादा जीवन और उच्च विचार की जीवन शैली को अपनाकर हम अपनी धरती को विनाश से बचा सकते हैं। 


Monday, July 18, 2022

अंतर में जब ध्यान सधे

महाभारत के शांति पर्व में मनु द्वारा बृहस्पति को दिया गया सुंदर उपदेश है जिसमें जीवन को सुखपूर्वक जीने का सुंदर मार्ग बताया गया है। प्रत्येक मानव को शारीरिक या मानसिक कष्टों का सामना जीवन में करना पड़ सकता है। यदि उन्हें  टालने का कोई उपाय दिखायी न दे तो शोक न करके उस दु:ख के निवारण का प्रयत्‍न करना चाहिये।उसे चाहिए कि कष्ट से होने वाले दुःख का चिंतन करना छोड़ दे। चिंतन करने से वह और भी बढ़ता है। शरीर के रोगों को दूर करने के लिए आवश्यक औषधियों का आश्रय लिया जा सकता है। मानसिक दुःख को बुद्धि और विचार द्वारा दूर करे। जगत अनित्य है, यह जानकर इसमें आसक्त नहीं होना है। जो मनुष्‍य सुख और दु:ख दोनों को छोड़ देता है, वह अक्षय ब्रह्म को प्राप्‍त होता है। अत: ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं। विषयों के उपार्जन में दु:ख है। अत: उनका नाश हो जाये तो चिन्‍ता नहीं करनी चाहिये।इसमे संदेह नहीं कि जीवन में सुख की अपेक्षा दु:ख ही अधिक है।परंतु जब साधक सबके आदिकारण निगुर्ण तत्त्व को ध्‍यान के द्वारा अपने अन्‍त:करण में प्राप्‍त कर लेता है, तब कसौटी पर कसे हुए सोने के समान ब्रह्म के यथार्थ स्‍वरूप का ज्ञान होता है।जब  बुद्धि अन्‍तर्मुखी होकर हृदय में स्थित होती है, तब मन विशुद्ध हो जाता है।​​ इस स्थिति में वह जगत में कमलवत रहता है। 


Friday, July 8, 2022

करे संचयन ऊर्जा का जो

कृष्ण हमारी आत्मा हैं और अष्टधा प्रकृति ही मानो उनकी आठ पटरानियाँ हैं। रानियाँ यदि कृष्ण के अनुकूल रहेंगी तो स्वयं भी सुखी होंगी और अन्यों को भी उनसे कोई कष्ट नहीं होगा। इसी तरह मन, बुद्धि, अहंकार और पंच तत्व ये आठों यदि आत्मा के अनुकूल आचरण करेंगे तो देह भी स्वस्थ रहेगी और जगत कल्याण में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। आत्मा ऊर्जा का स्रोत है। मन से संयुक्त हुईं सभी इंद्रियाँ ऊर्जा का उपयोग ही करती हैं, मन यदि संसार की ओर ही दृष्टि बनाए रखता है तो अपनी ऊर्जा का ह्रास करता है. बुद्धि यदि व्यर्थ के वाद-विवाद में अथवा चिंता में लगी रहती है तब भी ऊर्जा का अपव्यय होता है। जैसे घर में यदि कमाने वाला एक हो और उपयोग करने वाले अनेक तथा सभी खर्चीले हों तो काम कैसे चलेगा. मन को ध्यानस्थ होने के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता है, तब ऊर्जा का संचयन भी होता है. यदि दिवास्वप्नों में या इधर-उधर के कामों में वह उसे बिखेर देता है तो मन कभी पूर्णता का अनुभव नहीं कर पाता. उसे यदि एक दिशा मिल जाए तभी वह संतुष्टि का अनुभव कर सकता है, वरना जो ऊर्जा हम नित्य रात्रि में आत्मा के सान्निध्य में जाकर गहन निद्रा में प्राप्त करते हैं, दिन में जल्दी ही खत्म हो जाती है, और साधना, अन्वेषण या सृजन जैसा कोई महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए हमारे पास शक्ति ही नहीं होती।  


Monday, July 4, 2022

रस की धार बहे जब उर में

मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है। देह जड़ है, वह जैसी है वैसी ही प्रतीत भी होती है। देह स्वयं को स्वस्थ रखने का उपाय भी जानती है यदि हम उसे उसकी सहज, स्वाभाविक स्थिति में रहने दें। किंतु मन में लोभ है, जो अनावश्यक पदार्थों से तन को भरने पर विवश करता है। क्रोध में हानिकारक रसायनों को तन में छोड़ता है।  योग, व्यायाम व प्राणायाम के द्वारा तन व मन दोनों को स्वस्थ किया जा सकता है पर मन इसे भी अभिमान का विषय बना लेता है। हम आत्मा के आकाश में उड़ना तो चाहते हैं पर विकारों  की ज़ंजीरें पैरों में बांधे रहते हैं, यह दोहरापन ही द्वंद्व है जो मानव को चैन से नहीं रहने देता। लगता है वह दोनों पाँव धरा में धँसाए है और दोनों हाथ ऊपर उठकर परमात्मा को पुकारता है। जब तक वह अपनी पकड़ नहीं छोड़ता परमात्मा का सान्निध्य मिले भी तो कैसे ? मन के गहरे गह्वर को रूखा-सूखा दर्शन नहीं भर पाता, इसे तो केवल भक्ति के रस ही भरा जा सकता है. ईश्वर के प्रति अटूट, एकांतिक प्रेम ही हमारे मन को विश्राम देता है और रस की ऐसी धार बहाता है, जो उत्साह और उमंग के फूल खिलाती है. जीवन में उत्साह हो, सृजन की क्षमता हो, अनंत आनंद हो, बेशर्त प्रेम हो और कृतज्ञता हो तो तृप्ति की वर्षा होती ही है. परमात्मा के प्रति प्रेम एक निधि है. भक्ति योग से बढ़कर कुछ नहीं. 


Monday, June 27, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं, यह तो दिल में सम्भाल कर रखने जैसा क़ीमती रत्न है। प्रेम पूँजी है। प्रेम एक बीज की तरह है जिसे कोमल भावनाओं से सिंचित मन की भूमि चाहिए, जिसमें क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ के खर-पतवार न उगे हों। जहाँ भक्ति की शीतल पवन बहती हो और ज्ञान का सूरज भी अपनी किरणें बिखेरता हो। ऐसे मन में ही  प्रेम का वृक्ष पनपता है जो स्वयं को और अपने इर्द गिर्द अन्यों को भी छाया देता है। हम प्रेम को पाकर इतराते हैं और उसे ही अभिमान में बदल देते हैं तो वह बीज सूखने लगता है। प्रेम ऐसा कोमल है जो भाषा की रुक्षता भी सह नहीं पाता, जो ओस की बूँद की तरह नाज़ुक है जो द्वेष की हल्की सी रेखा से भी मलिन हो जाता है। इस अनमोल वरदान को जो हमें जन्म से ही मिलता है, जगत की आपाधापी में गँवा न दें। मिथ्या कठोरता का आवरण ओढ़कर हम उसे बचाए रख सकते हैं, ऐसा हम सोचते हैं पर वह किसी के काम नहीं आएगा। पहले पश्चाताप के आंसुओं में उस आवरण को गलाना होगा,पत्थर जैसे हो गए हृदय को पिघलना होगा फिर उसमें अंकुर फूटेगा जो प्रेम की अनेक शाखा प्रशाखाओं को जन्म देगा जो हमें जीवन की धूप से बचाएँगी तथा औरों को भी विश्रांति देंगी।  


Wednesday, June 22, 2022

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

इस जगत में जो कुछ भी त्रुटिपूर्ण होता है वह किसी न किसी चाहत के कारण है। स्वयं को पूर्ण करने की चाहत के कारण ही सभी किसी न किसी कर्म में रत हैं, चाहे उनका परिणाम कितना ही विपरीत क्यों न हो। किंतु जो पूर्ण है और स्वयं को अपूर्ण मान रहा है, वह कितना भी कर ले, पूर्णता का अनुभव तब तक नहीं करेगा जब तक अपनी भूल का अहसास न कर ले; स्वयं को पूर्ण स्वीकार न कर ले, अपने अनुभव के स्तर पर जान ले कि वह पहले से ही पूर्ण है। अभाव का अनुभव ही संसार है, तृप्ति का अनुभव ही सन्यास ! पीड़ा का अनुभव ही विरह है और आनंद का अनुभव ही योग ! परमात्मा पूर्ण था, पूर्ण है और पूर्ण रहेगा। उसमें जीवों के कल्याण के लिए सृष्टि का संकल्प जगा। हम सुबह उठकर यह संकल्प जगाते हैं कि हमें आज क्या पाना है ताकि हम थोड़ा सा और पूर्ण हो सकें पर वास्तव में हमारी हर इच्छा अपूर्णता की पीड़ा से उपजी है। हमें भी संकल्प उठाने आ जाएँ कि सबका कल्याण हो, सब सुखी हों। हमें अपनी पूर्णता का भास हो, हम सत्य का साक्षात्कार करें। ऋषियों की वाणी हमें जगाने के लिए आयी है।​​​​​​उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।जब मन में अपने लिए कोई कामना ना रहे और जगत का हित कैसे हो यह भावना जगे तो परमात्मा भीतर से स्वयं ही पूर्णता का अनुभव कराता है। 


Friday, June 17, 2022

निजता का जब फूल खिलेगा

हमें अपनी निजता को खोजना है, यह अहंकार नहीं है, अस्मिता है, अपने भीतर एक केंद्र को खोजना है जो बाहरी किसी भी प्रभाव से अछूता रहता है। यह एक चट्टान की तरह कठोर है। जिस पर धूप, पानी, अग्नि और हवाएं भी अपना प्रभाव नहीं डालतीं और उस फूल की तरह कोमल भी जो अपनी सुगंध और रूप से सभी का मन मोह लेता है. यह अपना होनापन किसी के विरुद्ध नहीं है, यह मानव होने की पहचान है. यह विवेक की उस अग्नि में तपकर मिलती है जो नित्य और अनित्य का भेद करके व्यर्थ को जला  देती है और ऐसा कुछ शेष रह जाता है जो कभी जल ही नहीं सकता, यह उस भरोसे से पैदा होता है जिसके सामने सारा ब्रह्मांड भी खड़ा हो जाए तो वह टूटता नहीं। जो श्रद्धा छोटी-छोटी बात पर खंडित होती हो वह निजता तक नहीं ले जा सकती। जब इस जगत में कुछ भी पाया जाने जैसा न लगे और साथ ही हर वस्तु अनमोल भी प्रतीत हो क्योंकि वह उसी एक  स्रोत से उपजी है, तब जानना चाहिए कि भीतर निजता का फूल खिला है। अब जगत एक क्रीड़ास्थली बन जाता है जहाँ अन्य लोग मात्र खिलाड़ी हैं और खेल में तो हार-जीत होती ही रहती है।सुख की चाह तब बाँधती नहीं क्योंकि सुख हमारा स्वभाव है यह ज्ञान हो जाता है।  


Sunday, June 5, 2022

पर्यावरण दिवस पर शुभकामनाएँ

आज पर्यावरण दिवस है, हवा दूषित है, कहीं बारिश होती है तो होती ही चली जाती है, कहीं मानसून झलक दिखा कर चला जाता है। कहीं बाढ़ से लोग परेशान हैं तो कहीं सूखे से। वैज्ञानिक कहते हैं, ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है, सूरज की हानिकारक किरणें भी धरती पर आ रही  हैं। धरती का हाल तो और भी दयनीय है, गंदगी, रासायनिक खाद, कीटनाशकों ने भूमि की गुणवत्ता समाप्त कर दी है। सब्ज़ियों में स्वाद नहीं आता, आए भी तो कैसे, इंजेक्शन लगाकर सब्ज़ियों का आकार बड़ा किया जाता है। दवाइयाँ डालकर फल उगाए जाते हैं। चाय जो लोग बड़े भरोसे से सुबह-शाम पीते रहते हैं, उसके  बाग़ानों में सबसे ज़्यादा विषैले कीटनाशकों का छिड़काव होता है। नदी किनारे उगने वाले शाक भी सुरक्षित नहीं, नदियाँ अब बहुत मैल धो चुकीं, अब उनकी क्षमता  से बाहर हो गया  है। इतना सब होने के बाद भी प्रकृति ने अपना रूप-सौंदर्य खोया नहीं है, क्योंकि उसके पास स्वीकार भाव है, वह मानवों से अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति शिकायत नहीं करती। अब मानव को चाहिए कि यदि उसे भी सहज  शांत रहना सीखना है तो प्रकृति के निकट जाना होगा, विकास के नाम पर, अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा में उसका अति दोहन नहीं करना होगा; तभी दोनों के मध्य संतुलन सधेगा और हर ऋतु अपने समय पर आएगी। फलों की मिठास लौट आएगी और हवा की सुगंध भी। पर्यावरण दिवस पर हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को और सुदृढ़ बनाना होगा।  


Saturday, June 4, 2022

संतुलन को साधा जिसने

त्याग पर भोग हावी होता रहा तो पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना बहुत कठिन होगा. अनावश्यक भोग भी न हो तथा अनावश्यक कर्म भी न हों, कहीं तो हमें विकास के लिए भी सीमा रेखा खींचनी होगी. जीने का सीधा सरल रास्ता हमें ढूँढ़ निकलना होगा, ऐसा रास्ता जो हमें कल्याण की ओर ले जाये. वह परम सुख ही हमारी मंजिल है. आज सबकुछ होने के बावजूद हम शांति से वंचित रह जाते हैं. रिश्तों में औपचारिकता बढ़ रही है, सहज विश्वास जैसे खोता जा रहा है। अहंकार की दीवार मन का वह बाहर का वातावरण खंडित कर देती है। हम प्रेम बाँटने में कंजूसी करते हैं और प्रेम स्वीकारने में भी झिझकते हैं. वास्तव में अहंकार कुछ है ही नहीं, प्रेम का अभाव ही अहंकार है और प्रेम का कभी अभाव होता ही नहीं. जैसे ही हम सजग होते हैं, दूरी मिट जाती है. वातावरण में एक समरसता भर जाती है. सारा जगत तब अपना लगता है, वस्तुओं को भी उपभोग करना छोड़कर उनका उपयोग करना सीखते हैं. पर्यावरण के प्रति एक ज़िम्मेदारी का अहसास भीतर जगता  है  

Thursday, May 26, 2022

नित्य-अनित्य का भेद जो जाने

यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों  को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है,  जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता। 


Tuesday, May 24, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

 हृदय में परम भक्ति का उदय होना एक अनोखी घटना है. जो भी किसी कामना से भगवान की पूजा करते हैं, मन्दिर जाते हैं, वे यदि सोचें कि उनके भीतर ईश्वर के प्रति भक्ति है तो यह गौणी भक्ति कही जा सकती है. एक और भक्ति है जो उस अनुभव के बाद उत्पन्न होती है जब भक्त और भगवान आत्मिक स्तर पर जुड़ जाते हैं. भौतिक दूरी तब कोई महत्व नहीं रखती. मीरा हजारों साल के अंतराल के बाद भी कृष्ण का दर्शन कर लेती है. शिष्य हजारों मील दूर होते हुए भी गुरू की कृपा का अनुभव करते हैं. बुद्धि और भावनाओं से भी परे जाकर उस अलौकिक भक्ति को पाया जा सकता है. मानव देह में घटने वाली यह सर्वोत्तम घटता कही जा सकती है. कृष्ण कहते हैं, मुझे ज्ञानी भक्त प्रिय है क्योंकि वह मेरा ही स्वरूप है. ऐसा महात्मा साक्षात ईश्वर स्वरूप ही हो जाता है. वह संसार को अपने जीवन से अनमोल ज्ञान, प्रेम और शांति देता है. वह दुखी, तनाव ग्रस्त लोगों को जीने का मार्ग दिखाता है. उसका होना ही जगत के लिए एक वरदान बन जाता है. जब मन हर तरह के स्वार्थ से ऊपर उठ चुका हो और केवल लोक संग्रह ही एक मात्र उद्देश्य रह जाये तब इस भक्ति का जन्म होता है. भरत देश में समय-समय पर ऐसी महान आत्माएं जन्म लेती हैं जो भक्ति के परम स्वरूप को प्रकट करती हैं. 

Sunday, May 22, 2022

गुह्यतम ज्ञान सुनाये कान्हा

 देह देवालय है, देह में आत्मरूप से वही परमात्मा विद्यमान है. हम अहंकार के वशीभूत होकर इस सच से आँखें मूँदे रहते हैं. सदगुरू इस राज से पर्दा उठाते हैं और एक नयी दुनिया में हम कदम रखते हैं. जहाँ प्रेम का ही साम्राज्य है, जहाँ एक की ही सत्ता है, जहां अद्वैत मात्र सिद्धांत नहीं वास्तविकता है. जहाँ अपूर्व शांति है जहाँ जीवन अपने कोमलतम शुद्ध रूप में आँखें खोलता है.  वह अनुपम लोक जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ नेति-नेति कहकर ही शास्त्र इशारा करते हैं. ऐसा एक लोक हमारे भीतर है, सदगुरू इसका भेद बताते हैं. कृष्ण इसे ही गुह्यतम ज्ञान कहते हैं. 


Saturday, May 21, 2022

कैसे हाथ बंटाए जग में

 यह जगत तब तक ही जगत जैसा दिखायी देता है, जब तक स्वयं को जगत से पृथक मानते हैं. जब हम भीतर एक को जान लेते हैं तब इस जगत से पृथकता का अनुभव नहीं करते. एक ही चेतना हर जगह व्याप्त है, जो भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रही है; तब न किसी को पाने की इच्छा, न खोने का भय, जीवन से स्वार्थ सिद्धि लुप्त हो जाती है. स्व में सारा जगत समा जाता है. तब किसी के दोष देखने की प्रवृत्ति का भी नाश हो जाता है, क्योंकि आत्मरूप से सब एक में ही स्थित हैं और जगत रूप से सभी कुछ परिवर्तित हो रहा है. जैसे स्वयं के मन, बुद्धि आदि विकारों का शिकार होते हैं, वैसे सभी के साथ होता है. जगत परमात्मा का क्रीड़ा स्थल है, यहाँ उसके इस आयोजन में अपना हाथ बंटाना भर है, अपना नया खेल आरंभ नहीं करना है ! 


Tuesday, May 17, 2022

जीवन का आधार वही है

जीवन अमूल्य है, परमात्मा का उपहार है, वही इसका आधार भी है. हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति जलाकर बैठा है. यह जगत शरीर को चलाने और परमात्मा का ज्ञान पाने के लिए एक साधन है. परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते हैं. कृपा का अनुभव होते ही साधक का जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह यह अनुभव अंतर को रस से भर देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट हो जाता है, कहीं कोई संशय नहीं रहता. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब-जब परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह साधक की सुप्त चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर होते ही सत्य का साक्षात्कार होता है. 

Sunday, May 15, 2022

जीवन एक यात्रा सुंदर


 जैसे जमीन की गहराई में पानी तथा तेल छिपा होता है, गहरी खुदाई करके निकला जाता है, वैसे ही शरीर की गहराई में आत्मा की अनंत शक्ति छिपी है जिसे उजागर करने पर स्वास्थ्य सहज ही मिलता है.  खिडकियों पर भारी पर्दे लगे हों तो कमरे में प्रकाश मद्धिम सा ही दीख पड़ता है वैसे ही यदि मन पर प्रमाद छा जाये तो आत्मा की शक्ति ढक जाती है व तन अस्वस्थ हो जाता है. किसी संस्थान को सुचारू रूप से चलाने के लिये अनुशासन बहुत जरूरी है वैसे ही शरीर रूपी संस्थान ठीक रहे इसके लिये सोने, जगने व्यायाम, भोजन का अनुशासन बहुत जरूरी है. प्रकृति में एक गति है, लय है, रात-दिन तथा ऋतु परिवर्तन उसी लय के अनुसार होते हैं वैसे ही तन, श्वास तथा मन में भी एक लय है रिदम है जिसके बिगड़ने पर रोग हो सकते हैं. कार के भीतर ड्राइवर स्टीयरिंग पर से कंट्रोल छोड़ दे तो दुर्घटना होगी ही वैसे ही तन रूपी रथ की सारथी बुद्धि, मन रूपी घोड़े को खुला छोड़ दे, भोजन, नींद, व्यायाम में संयम, तथा सही मात्रा व सही समय का ध्यान न रखे तो हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं.शरीर के भीतर स्वयं को स्वस्थ रखने का पूरा प्रबंध है बस उसे हमारा सहयोग चाहिए जरूरत से ज्यादा उसे थकाएं भी नहीं और आराम भी न दें.नम वातावरण में, गीले मौसम में ठंडी चीजें नुकसान करती हैं, इनसे दूर ही रहें.जैसे हम रेल यात्रा करने जाएँ तो हमारी सीट, कूपा तथा सहयात्री सभी पहले से तय होते हैं वैसे ही जीवन यात्रा में हमें जहाँ-जहाँ जो मिलेगा वह पूर्व निर्धारित है, जैसे हम रेल यात्रा को सुखद बनाना जानते हैं, वैसे ही सही दृष्टिकोण रखकर हम जीवन यात्रा को सुखद बना सकते हैं.

Monday, May 2, 2022

समाधान जो चाहे पाना

मानव को यदि अपनी उलझनों का समाधान चाहिए तो भीतर मिलेगा। मन की गहराई में जो शुद्ध चैतन्य है, जो सत् है, आनंद है, उसके सान्निध्य में मिलेगा। बाहर जगत में उलझाव है, प्रतिस्पर्धा है, तनाव है, बाहर सब कुछ निरंतर बदल रहा है। सागर में उठी लहरों की तरह जग निरंतर विनाश को प्राप्त हो रहा है। भीतर एक अवस्था ऐसी है जो सदा एकरस है, उसमें टिके बिना पूर्ण विश्रांति नहीं मिलती। वहाँ जाने में बाधा क्या है ? स्वयं के और दूसरों के बारे में हमारी धारणाएँ, मान्यताएँ और विचार ही सबसे बड़ी बाधा हैं। वह निर्विकल्प अवस्था है, मन कल्पनाओं का घर है। वहाँ प्रेम का साम्राज्य है, मन जगत में दोष देखता है। जब हम जगत को जैसा वह है पूर्ण रूप से वैसा ही स्वीकार करके मन को कुछ समय के लिए ख़ाली कर देते हैं तब उस शांति का अनुभव अपने भीतर करते हैं। 


Wednesday, April 27, 2022

कण-कण में जो देखे उसको

हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Monday, April 25, 2022

जीवन में जब रंग भरेगा


हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं. 


Thursday, April 21, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

 अहंकार स्वयं को बचाए रखने के लिए तर्क का आश्रय लेता है। प्रेम हर तर्क से ऊपर है, वह आत्मा का सहज गुण है। प्रेम को मरने का भय नहीं होता, वह शाश्वत है। जहाँ प्रेम है वहाँ अभय है। अहंकार आहत  होता है तो प्रतिशोध लेना चाहता है, प्रेम पिघल जाता है, वह दीनता का अनुभव करता है। प्रेम में भी विरह की पीड़ा है पर वह पीड़ा मन को शुद्ध करती है। अहंकार से उत्पन्न पीड़ा दुःख का कारण होती है। संत कहते हैं जब भी भीतर दुःख हो शरण में आ जाना चाहिए। अहंकार में व्यक्ति स्वयं प्रमुख होता है, प्रेम में सामने वाला मुख्य होता है, उसकी प्रसन्नता में ही प्रेमी अपनी ख़ुशी देखता है।   

Monday, April 18, 2022

प्राण ऊर्जा बहे अबाध जब


आयुर्वेद के अनुसार शरीर के सभी अंगों में प्राण-ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीस घण्टे होता है,पर हर समय एक सा प्रवाह नहीं होता. प्रायः जिस समय जो अंग सर्वाधिक सक्रिय हो उस समय उससे सम्बन्धित कार्य करने से हम उसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. प्रातः तीन बजे से पांच बजे तक फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक रहता है, इसी कारण ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने अथवा  प्राणायाम आदि करने से शरीर स्वस्थ बनेगा. सुबह पांच बजे से सात बजे तक ऊर्जा बड़ी आंत में जाती है, जो व्यक्ति इस समय सोये रहते हैं व शौच क्रिया नहीं करते उन्हें कोई न कोई पेट का रोग हो सकता है. इस समय योगासन व व्यायाम करना चाहिए. सात से नौ बजे तक सर्वाधिक ऊर्जा आमाशय में रहती है इसलिए सुबह का नाश्ता जल्दी कर लेना चाहिए. नौ से ग्यारह बजे तक तिल्ली और पैंक्रियाज की सक्रियता का समय है, यदि दोपहर का भोजन ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद कर लें तो पाचन अच्छा हो सकता है. दिन में ग्यारह से एक बजे तक हृदय में विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है. हृदय हमारी संवेदनाओं, दया, करुणा तथा प्रेम का प्रतीक है, इस समय लेखन या रूचि का कोई काम अच्छा हो सकता है. दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक छोटी आंत में पोषण का कार्य होता है, इसलिए दोपहर का भोजन देर से नहीं करना चाहिए. शाम को पांच से सात बजे तक किडनी में ऊर्जा का प्रवाह होता है. शाम का भोजन सात बजे तक कर लेना चाहिए. सात से नौ बजे तक ऊर्जा मस्तिष्क में जाती है, यह समय अध्ययन के लिए उत्तम है. नौ से ग्यारह बजे तक रीढ़ की हड्डी में सर्वाधिक ऊर्जा होती है, यह समय सोने के लिए उत्तम है. रात्रि ग्यारह से एक बजे तक पित्ताशय में ऊर्जा प्रवाहित होने से मानसिक गति विधियों पर नियंत्रण होता है, इस समय जगे रहने से पित्त तथा नेत्र के रोग हो सकते हैं. रात्रि एक से तीन बजे तक लिवर में ऊर्जा का परवाह सर्वाधिक होता है, इस समय गहरी नींद आवश्यक है. लिवर से पुनः ऊर्जा फेफड़ों में चली जाती है और एक नए दिन का आरम्भ होता है. 

(गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण में प्रकाशित एक लेख से साभार )