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Tuesday, May 24, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

 हृदय में परम भक्ति का उदय होना एक अनोखी घटना है. जो भी किसी कामना से भगवान की पूजा करते हैं, मन्दिर जाते हैं, वे यदि सोचें कि उनके भीतर ईश्वर के प्रति भक्ति है तो यह गौणी भक्ति कही जा सकती है. एक और भक्ति है जो उस अनुभव के बाद उत्पन्न होती है जब भक्त और भगवान आत्मिक स्तर पर जुड़ जाते हैं. भौतिक दूरी तब कोई महत्व नहीं रखती. मीरा हजारों साल के अंतराल के बाद भी कृष्ण का दर्शन कर लेती है. शिष्य हजारों मील दूर होते हुए भी गुरू की कृपा का अनुभव करते हैं. बुद्धि और भावनाओं से भी परे जाकर उस अलौकिक भक्ति को पाया जा सकता है. मानव देह में घटने वाली यह सर्वोत्तम घटता कही जा सकती है. कृष्ण कहते हैं, मुझे ज्ञानी भक्त प्रिय है क्योंकि वह मेरा ही स्वरूप है. ऐसा महात्मा साक्षात ईश्वर स्वरूप ही हो जाता है. वह संसार को अपने जीवन से अनमोल ज्ञान, प्रेम और शांति देता है. वह दुखी, तनाव ग्रस्त लोगों को जीने का मार्ग दिखाता है. उसका होना ही जगत के लिए एक वरदान बन जाता है. जब मन हर तरह के स्वार्थ से ऊपर उठ चुका हो और केवल लोक संग्रह ही एक मात्र उद्देश्य रह जाये तब इस भक्ति का जन्म होता है. भरत देश में समय-समय पर ऐसी महान आत्माएं जन्म लेती हैं जो भक्ति के परम स्वरूप को प्रकट करती हैं. 

Tuesday, March 23, 2021

चोर न लूटे, खर्च न फूटे

 हम एक बेशकीमती रत्न  को अपने भीतर कहीं मन की गहराई में छिपाकर भूल गए हैं, जो अनमोल है और जिसे जितना भी खर्च किया जाये चुकेगा नहीं. नानक तभी कहते हैं वह बेअंत है. हजारों-हजारों संतों, ऋषियों ने उसी अनमोल धरोहर से संपदा पायी, पा रहे हैं और लुटा रहे हैं। यह जो संतों के यहाँ लाखों की भीड़ जुटती है वह उस हीरे की चौंध की झलक मात्र पाने हेतु ही तो, जबकि वह हीरा अपने भीतर भी है। संत इसी चमक का स्मरण कराते हैं। हम हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं। सांसारिक कामों को निपटाने की बड़ी जल्दी रहती है हमें। सब कुछ पा लेने की फिराक में, जल्दी से जल्दी गाड़ी, बंगला, रुतबा, शोहरत इन्हें पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, बिना सोचे कि ये सब हमें ले जाने वाले हैं एक दिन अग्नि की लपटों में। हमारी मंजिल यदि शमशान घाट ही है, चाहे वह आज हो या पचास वर्ष बाद, तो क्या हासिल किया। एक रहस्य जिसे दुनिया भगवान कहती है, हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करने हेतु सदा ही निकट है। वही जो प्रकृति के कण-कण से व्यक्त हो रहा है। वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।

Monday, August 13, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


१३ अगस्त २०१८ 
बूंद जैसे हम हैं और सागर जैसा भगवान, उससे मिलने जायेंगे तो हमें स्वयं को खोना ही पड़ेगा. बीज जैसे हम हैं और विशाल वटवृक्ष जैसा परमात्मा है, हम मिटेंगे तभी वह प्रकटेगा. मल, विक्षेप, आवरण से ढके हैं हम और वह अनंत खुले आकाश जैसा सब और व्याप्त है. हम पंचकोश में छिपे हैं. इच्छाओं और कामनाओं के दुर्ग में कैद हैं, मन है कि पीपल के पत्ते सा पल-पल डोला करता है, बात त्यागने लायक हो फिर भी उसे मन से लगाये रहते हैं. अहंकार ही दुःख का आवरण डाले रहता है पर उसे भी नहीं छोड़ते, जानते हुए भी उस मार्ग का त्याग नहीं कर पाते जिस पर चल कर सदा ही दुःख पाया है. जिसकी मंजिल अनंत आकाश है वह स्वयं को पिंजरे में कैद मानता है, यही तो माया है. सद्गुरू कहते हैं, जिस घड़ी भीतर मिटने से कोई भय नहीं रहेगा, अहंकार को विसर्जित करन सहज हो जायेगा, उसी पल सत्य में जागरण होगा.

Monday, March 12, 2018

प्रेम गली अति सांकरी


१३ मार्च २०१८ 
प्रेम आत्मा का मूल स्वभाव है. सृष्टि के कण-कण में प्रेम किसी न किसी रूप में ओत-प्रोत है. सूर्यमुखी का पौधा सदा सूर्य की ओर तकता है, चकोर बादलों की ओर, पतंगे दीपक की तरफ लपकते हैं और भंवरे फूलों की तरफ....ये उदाहरण तो हम सबने सुने-पढ़े और देखे हैं. एक नवजात शिशु का माँ के प्रति प्रेम सहज ही होता है, क्योंकि नौ माह तक वह माँ के तन का ही हिस्सा था. जन्म के समय उसे लगता है, मानो वह स्वयं से ही दूर हो गया. स्वयं से जुड़ने की इसी प्यास का नाम ही प्रेम है. इसे पाने के लिए ही बालक पहले गुड़ियों से प्रेम करता है, फिर मित्रों व परिवार से और जब यह तलाश फिर भी पूर्ण नहीं होती तो वह भगवान से प्रेम करता है. परमात्मा भी जब तक अन्य पुरुष बना रहता है, वह अतृप्त रहता है. परमात्मा को उत्तम पुरुष के रूप में अनुभव करके अर्थात स्वयं के रूप में अनुभव करने के बाद ही मानव की तलाश पूर्ण होती है. जन्म के समय जो स्वयं से बिछड़ा था, आत्म रूप में उसे ही पाकर वह तृप्त हो जाता है.

Wednesday, January 17, 2018

कर्मशील हो जीवन सबका

१७ जनवरी २०१८ 
मुख में नाम, हाथ में काम’, ऐसे वचन हम बड़ों के मुख से सुनते आये हैं. कोई इसका अर्थ यह लगा सकता है कि कार्य करते समय भगवान का नाम लेते रहो, किन्तु नाम जपना कभी-कभी औपचारिक भी हो जाता है और यांत्रिक भी. ऐसा भी हो सकता है कि कार्य में लगे रहने पर मन उसी में सलंग्न हो जाये और नाम लेना भूल ही जाये. इसलिए इस सुंदर वचन का भाव कुछ और होना चाहिए. हमारा मन शांत हो अर्थात भीतर कोई हलचल न हो पर बाहर से हम निरंतर कार्य में लगे रहें. प्रमाद और आलस्य के वश होकर भक्ति के नाम पर बैठे न रहें बल्कि अपना हृदय परमात्मा को समर्पित करके उसकी सृष्टि को सुंदर बनाने के लिए अपना योगदान देते रहें. 

Wednesday, June 14, 2017

तू ही दाता तू ही विधाता

१४ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार हम जाने-अनजाने भगवान का नाम लेते रहते हैं. किसी कठिनाई में फंस जाएँ तब तो उसके नाम का जप भी शुरू हो जाता है. कुछ अच्छा हो जाये तो उसको धन्यवाद देते हैं और न हो तो उससे शिकायत भी करते हैं, किंतु कभी बैठकर उसकी नहीं सुनते. एकतरफा संवाद ही चलता रहता है और हम अपनी मर्जी से जीवन को जीये चले जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जिस भगवान के बिना हमारा जीवन चल ही नहीं सकता, वह हमारी कल्पना में ही है. बचपन से जो भी हमने सुना है, किताबों में पढ़ा है और कुछ हमारी स्वयं की धारणाओं के अनुसार एक छवि हमने गढ़ ली है और भगवान व हम स्वयं दो समानांतर रेखाओं की तरह चलते चले जाते हैं, जिनके मिलन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. 

Tuesday, March 24, 2015

पार सभी के जाना होगा

जुलाई २००८ 
चेतना पूरे शरीर में जग जाये तो वह ज्ञान है और वह ज्ञान फिर झुक जाये वही भक्ति है. भक्ति समय सापेक्ष नहीं है, वह जिम्मेदारी लेना सिखाती है. भक्त पहले भगवान को भीतर देखता है, फिर सारा संसार प्रभुमय देखता है. भक्ति चेतना की पूर्णता है, जहाँ भी हम झुके वहीं भक्ति का आरम्भ होता है. ईश्वर ने हमने यह मानव तन दिया है, सद्गुरु इस में सत्यता का बोध कराता है. जो इन्द्रियों का रस, विचार का रस, भावना का रस, आनंद का रस इन तनों से लेता रहता है तो ऐसे ही तन मिलते है, पर इनसे पार जब शुद्द सुख व शुद्ध रस मिलने लगे तब प्रेमाभक्ति का रस मिलता है.


Monday, January 5, 2015

मिटकर ही जीवन खिलता है

अगस्त २००७ 
मैं निर्गुणिया गुण नहीं जाना
एक धनी के हाथ बिकाना
मैं कायर मेरा सद्गुरु सूरा
मैं ओछा मेरा सद्गुरु पूरा
मैं मूरख सद्गुरु सयाना
एक धनी के हाथ बिकाना

जब तक साधक अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो हजार गुना होकर वापस आता है. समर्पण इसी को कहते हैं, जो वह करवाए वही करना. जो वह चाहे उसी में हाँ मिलानी ही सच्चा समर्पण है. सद्गुरु को जब साधक समर्पित हो जाते हैं तो जीवन से सारा विषाद चला जाता है. इसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! नया दृष्टिकोण, नई विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसे भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है ! 

Monday, April 28, 2014

रहें भीतर जियें बाहर

जनवरी २००६ 
भगवान की निकटता का अनुभव करना ही भक्त का धर्म है और मन जब उससे दूर जाये तो वही अधर्म है. भगवान के वियोग में बहे आंसू ही भक्त की सम्पत्ति है, अर्थ है. भगवान की कामना ही काम है. उसका सुमिरन ही मोक्ष है. उसकी निकटता का अनुभव गुरू कृपा से होता है, तब धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अर्थ ही बदल जाते हैं. जीवन का उत्थान ही हमारा ध्येय हो जाता है. सन्त कहते हैं, “रहो भीतर, जीओ बाहर”, उनके अनुसार विपरीत तत्व जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ रहते हैं. जीवन के हर पहलू पर वे हमें चिन्तन करना सिखाते है. टुकड़ों में बंटी जिन्दगी से दूर एक पूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करते हैं. सद्गुरु व परमात्मा के आश्रय में हम कितने सुरक्षित हैं. उनकी कृपा का जल मन की सूखी धरती को हरा-भरा कर देता है.   

Monday, March 31, 2014

रस की खान को लें पहचान

नवम्बर २००५ 
भगवद प्राप्ति की प्यास जब जिधर भी जगी, वहीं से माया का लोप होने लगता है. यह प्यास भीतर से आती है, बुद्धि की पहुंच आत्मा तक नहीं है. आत्मा शाश्वत सुख का स्रोत है. जैसे शक्कर को मिठास खोजनी नहीं पडती वैसे ही आत्मारामी को सुख की खोज नहीं करनी है. जब ऐसी मंगलमय घड़ी साधक के जीवन में आती है, वहाँ कोई द्वैत नहीं रहता, कोई भेदभाव नहीं बचता. सब शुभ होता है. यह जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है. किन्तु यह प्यास भीतर जगे इसके लिए पुरुषार्थ हमें ही करना है. इसे भाग्य के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता. एक बार साधक के भीतर की सुप्त शक्ति जाग्रत हो जाये तो उसकी दिशा स्वयंमेव बदल जाती है. संसार की सत्यता स्पष्ट हो जाती है और दिव्यता की मांग भीतर से उठने लगती है.  

Monday, December 16, 2013

जुड़ा रहे मन उस अपने से

मई २००५ 
जिसका कार्य और रूचि एक हो, जिसका हृदय और मस्तिष्क एक हो उसमें सख्य भाव होता है. राम और लक्ष्मण में भी ऐसा सख्य भाव है. लक्ष्मण सदा से ही राम के संग हैं. जगे हुए ब्रह्म में जब सृष्टि की इच्छा होती है तो यह शेष उन्हें अपने शीश पर धारण करता है. दोनों में अद्वैत है. इसी तरह का सख्य भाव भक्त और भगवान में होता है, गुरु और शिष्य में होता है. मानसिक रूप से वे साथ रहते हैं, भौतिक दूरी उनके लिए कोई दूरी नहीं होती. जो ईश्वरीय तत्व को जानता है, वह हर क्षण जुड़ा रहता है, दोनों के बीच प्रेम की धारा अविरल बहती रहती है. समाधि का अनुभव दोनों को होता है. आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त होकर भक्त, भगवान के प्रेम का पात्र बन जाता है. अपनी ऊँचाई पर स्थित होते हुए भी वह उसके मन से जुड़ जाते हैं, वे सर्व समर्थ हैं.

Thursday, August 22, 2013

स्वयं को खो क्या जग का पाना

जनवरी २००५ 
हम भगवान को तो मानते हैं पर भगवान ‘की’ नहीं मानते, यदि हम key को भी अपना लें तो जीवन की कई गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं. हम जितना-जितना बाहर सुख खोजते हैं, उतना उतना सत्य से दूर होते जाते हैं. तब मानव अपने स्वार्थ के लिए वस्तुओं को ही नहीं व्रतों, नियमों यहाँ तक की नीतियों में भी परिवर्तन कर लेते हैं. क्षणिक सुख के पीछे लालायित होकर अपने को नीचे गिराने में भी आज कोई शर्म की बात नहीं समझता. लोग रिश्वत लेने को तो फिर भी बुरा मानते हैं पर रिश्वत देने को नहीं. आज भ्रष्ट आचरण को सामान्य जीवन का अंग मान लिया गया है, क्योंकि समाज के उच्च कहे जाने लोग ही इसे अपनाते हैं. अपनी इच्छा को ही सर्वोपरि  मानने वाला समाज नीति, कानून तथा धर्म की परवाह करना ही छोड़ देता है.




Friday, March 22, 2013

मुक्त करेगा प्रेम


जून २००४ 
संतजन कहते हैं, परमात्मा अन्तर्यामी है, वह सभी के हृदय का साक्षी है, वे आनन्दस्वरूप हैं, पर भक्तों के प्रेम में वे भी आनंद पाते हैं. जिस तरह भक्त भगवान को प्रेम करते हैं, वे भी करते हैं. प्रेम के इस आदान-प्रदान में भक्त और भगवान एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं. हर वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है, हमारा स्वभाव आनंद है उसमें बाधा आते ही हम विचलित हो जाते हैं, हमारा सहज स्वभाव ही प्रेम पाना व प्रेम देना है, पर यह प्रेम सहज और विशुद्ध होना चाहिए अग्नि की तरह, सूक्ष्म होना चाहिए आकाश की तरह, ईश्वर की तरफ प्रेम भरी नजर उठते ही सद्गुरु की कृपा होती है, वह हमें रसमय, मधुमय बनाते हैं.

Thursday, January 10, 2013

माँ के जैसा ही वह है


जनवरी २००४ 
जैसे माँ बच्चे के रूप में अपना विस्तार करती है, फिर उसे प्रेम देती है व प्राप्त करती है, वैसे ही परमात्मा ने हमें सिरजा है, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का आदान-प्रदान ही भगवत्ता को सार्थक करता है. जैसे बच्चे माँ को भुला देते हैं, वैसे ही हम परम को भूल जाते हैं, पर तब भी वह हमें चाहते हैं वह सदा प्रतीक्षा रत हैं कि हम उनके निकट जाएँ जैसे माँ को बच्चों की सदा एक आस बनी रहती है. हमारे भीतर के सद्गुण रूपी देवता उसी परमात्मा की आराधना करते हैं और दुर्गुण रूपी असुर उससे उत्पीड़ित होते हैं. शुभ-अशुभ दोनों को वह ही रचता है और दोनों से परे वह अव्यक्त है. वह हमारे भीतर तीन रूपों में विद्यमान है, क्रिया, ज्ञान और भावना. वही कर्म के लिए प्रेरित करता है, वही हमें हमारे होने का ज्ञान देता है ज्ञान जब भीतर रच-बस जाता है वही भक्ति में बदल जाता है. मुक्त हुए बिना भक्ति सम्भव नहीं. यह त्रिवेणी जब जीवन में उतरती है तो जीवन का हर क्षण सुंदर बन जाता है.

Thursday, May 17, 2012

प्रेम दीवाने जो भये


मार्च २००३ 
प्रेम दीवाने जो भये, मन भयो चकनाचूर, छकत रहे घूमत फिरे, सहजो कहत हजूर ! हृदय में ईश्वर के लिये प्रेम होगा तो एक नादान बालक की रक्षा जैसे माँ करती है, वैसे ही वह अन्तर्यामी हमारे कुशल क्षेम का भार उठा लेगा. वह, जिसे हमारे पल-पल की खबर है, उसके लिये हृदय में चाह तीव्र से तीव्रतर होती जाये तो वह स्वयं को प्रकट करता है. जैसे भक्त भगवान की राह देखता है भगवान भी उसकी राह देखते हैं. अंतर्मन यदि पूरी तरह खाली हो जाये और संसार की कोई लालसा शेष न रहे तो वह उसमें आ विराजता है. उसके कदम पड़ते ही भीतर प्रकाश हो जाता है, इस अनंतता में हम हैं, अनंत हमारे साथ है, यही अहसास रह जाता है, अपने पास होने का अनुभव और सारी दुविधाओं का नाश एक साथ ही घटित होते हैं. तब कृतज्ञता वश नेत्रों में जल भर आता है या हृदय में ऐसी कचोट उठती है कि उसे शब्दों में कहना संभव नहीं. देहाध्यास को मिटाते जाना है उस परम को पाने के लिये.