Wednesday, July 19, 2023
जाने क्या है राज अनोखा
Sunday, April 4, 2021
जब आवै संतोष धन
कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है.
Friday, September 11, 2020
सत्यम परम अनंतं ज्ञानम
अद्वैत के ग्रन्थों में रज्जु और सर्प का उदाहरण दिया जाता है. अँधेरे में हम रस्सी को सांप समझ लेते हैं और व्यर्थ ही भयभीत हो जाते हैं. प्रकाश होने पर जब ज्ञान होता है तो खुद पर ही हँसी आती है. इसी तरह चमकती हुई सीपी को देखकर चाँदी का व पीतल में स्वर्ण का भ्रम भी हो सकता है. जीवन में हम मोह को प्रेम समझ लेते हैं. मोह से होने वाले दुःख को अनुभव करते हैं तब लगता है प्रेम दुखदायी है, जब ज्ञान होता है तभी समझ में आता है यह प्रेम था ही नहीं. प्रेम तो एक विशुद्ध भावना है, इसमें समर्पण है, हम अन्यों पर अधिकार चाहते हैं और उन्हें झुकाना चाहते हैं. देह, मन, बुद्धि को आत्मा समझ लेते हैं और इनके रोगी होने या मिटने पर दुखी होते हैं, जबकि शाश्वत तो केवल आत्मा है, देह तो मरणशील है ही. धीरे-धीरे अद्वैत का सिद्धांत हमें इस सत्य की ओर ले जाता है कि जिसे हम जगत समझ रहे हैं वह परमात्मा ही है. परमात्मा सत्य, अनंत, ज्ञान और परम है, यह सृष्टि भी अनादि काल से है. परमात्मा को हम अनुभव कर सकते हैं, उसे पा नहीं सकते वह कभी भी वस्तु बनकर हमें नहीं मिल सकता, वैसे ही यह जगत कभी पकड़ में नहीं आता. न वस्तु शाश्वत है, न पकड़ने वाला ही. यह उस बाजार की तरह है जिसमें से हमें इसकी शोभा देखते हुए गुजर भर जाना है.