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Wednesday, July 19, 2023

जाने क्या है राज अनोखा

संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Sunday, April 4, 2021

जब आवै संतोष धन

 कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा  सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है. 


Friday, September 11, 2020

सत्यम परम अनंतं ज्ञानम

  अद्वैत के ग्रन्थों में रज्जु और सर्प का उदाहरण दिया जाता है. अँधेरे में हम रस्सी को सांप समझ लेते हैं और व्यर्थ ही भयभीत हो जाते हैं. प्रकाश होने पर जब ज्ञान होता है तो खुद पर ही हँसी आती है. इसी तरह चमकती हुई सीपी को देखकर चाँदी का व पीतल में स्वर्ण का भ्रम भी हो सकता है.  जीवन में हम मोह को प्रेम समझ लेते हैं. मोह से होने वाले दुःख को अनुभव करते हैं तब लगता है  प्रेम  दुखदायी है, जब ज्ञान होता है तभी समझ में आता है यह प्रेम था ही नहीं. प्रेम तो एक विशुद्ध भावना है, इसमें समर्पण है, हम अन्यों पर अधिकार चाहते हैं और उन्हें झुकाना चाहते हैं. देह, मन, बुद्धि  को आत्मा समझ लेते हैं और इनके रोगी होने या मिटने पर दुखी होते हैं, जबकि शाश्वत तो केवल आत्मा है, देह तो मरणशील है ही. धीरे-धीरे अद्वैत का सिद्धांत हमें इस सत्य की ओर ले जाता है कि जिसे हम जगत समझ रहे हैं वह परमात्मा ही है. परमात्मा सत्य, अनंत, ज्ञान और परम है, यह सृष्टि भी अनादि काल से है. परमात्मा को हम अनुभव कर सकते हैं, उसे पा नहीं सकते वह कभी भी वस्तु बनकर हमें नहीं मिल सकता, वैसे ही यह जगत कभी पकड़ में नहीं आता. न वस्तु शाश्वत है, न पकड़ने वाला ही. यह उस बाजार की तरह है जिसमें से हमें इसकी शोभा देखते हुए गुजर भर जाना है.   


Wednesday, October 2, 2019

शब्दों के वह पार मिलेगा



समय परिवर्तन का ही दूसरा नाम है. जब मन थम जाता है, भीतर एक शांति और स्थिरता का अनुभव होता है, लगता है समय ठहर गया है. सारी सृष्टि मन से ही उत्पन्न होती है. मन में विचार जब तेजी से चल रहे हों, लगता है समय भी भाग रहा है. मन द्वारा किया गया परमात्मा का चिंतन हमें परमात्मा से दूर ही करता है, उसके निकट जाना हो तो हर चिंतना का त्याग करना होगा. शब्दों से जिसे जाना ही नहीं जा सकता ऐसा वह परम अस्तित्त्व है. इसीलिए वह समयातीत भी है और शब्दातीत भी, और उसका होना या न होना शब्दों द्वारा सिद्ध भी नहीं किया जा सकता और खंडित भी नहीं किया जा सकता.

Monday, July 15, 2019

अंतर्मन के द्वार खोल दें



इस वक्त जो कुछ भी हमारे पास है, वह जरूरत से ज्यादा है, यदि यह ख्याल मन में आता है तो भीतर संतोष जगता है. क्या यह सही नहीं है कि कभी जिन बातों की हमने कामना की थी, उनमें से ज्यादातर पूरी हो गयी हैं. मन में कृतज्ञता की भावना लाते ही जैसे कुछ पिघलने लगता है और सारा भारीपन यदि कोई रहा हो तो गल जाता है. जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं तो जल धाराओं को बहाता हुआ विशाल आसमान जैसे यह संदेश देता नजर आता है कि भीतर कुछ भी बचाकर न रखें, सब यहीं से मिला है और सब यहीं छोड़कर जाना है, तो क्यों न सहज ही अंतर का वह द्वार खोल दें जिसके पीछे परम का अथाह खजाना छिपा है. हरीतिमा युक्त धरती भी अपने भीतर से जैसे सब कुछ उलीच देना चाहती है. जीवन प्रतिपल दे रहा है और हमें उसे अपने द्वारा बहने का मार्ग देना है.

Friday, March 2, 2018

भंवरा बड़ा नादान है


३ मार्च २०१८ 
मन तितली या भंवरे की तरह इस विषय से उस विषय पर उड़ता रहता है, कुछ पल को एक जगह रुका फिर फर से उड़ गया. हल्की सी आहट भी उसमें हलचल ला देने में समर्थ है. फिर जैसे अचानक एक पुष्प पर तितली स्थिर हो जाती है और मधु का स्वाद उसे आने लगता है, वह उड़ना भूल जाती है वैसे ही मन जब अपने मूल में टिक जाता है, आनंद का अनुभव उसे होने लगता है, वह भटकना भूल जाता है. यदि कहीं जाता भी है तो पुनः घर लौटना चाहता है. परमात्मा का सुख उसे पुकारता रहता है. ऐसी ही स्थिति के लिए सूरदास ने कहा है, “जैसे उड़ी जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे”. ध्यान का अभ्यास और जगत से वैराग्य इन दो साधनों के द्वारा चंचल मन परम पुष्प के पराग का आस्वादन कर सकता है.  

Wednesday, July 19, 2017

जिसने जाना राज अनोखा

१९ जुलाई २०१७ 
संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Tuesday, April 4, 2017

'मैं' के पार वही बसता है

४ अप्रैल २०१७ 
परम तक जाने के दो ही मार्ग हैं, एक ज्ञान का मार्ग दूसरा प्रेम का मार्ग ! यह भेद आरम्भ में ही होता है, मंजिल पर जाकर दोनों मिल जाते हैं . ज्ञान का मार्ग संकल्प का मार्ग है, स्वयं को देह से अलग मानकर धीरे-धीरे श्वास, मन, व बुद्धि से भी अलग करते जाना है ताकि शुद्ध चेतना ही बचे, जहाँ केवल एक रहता है वहाँ परमात्मा ही रहता है. प्रेम का मार्ग कहता है परमात्मा के सिवा कुछ है ही नहीं, वहाँ आत्मा जगत के हर रूप में परमात्मा को ही देखती है. तब 'मैं' मिट जाता है, 'मैं' मिटते ही परम प्रकट हो जाता है. किसी भी मार्ग से चलें अहंकार को मिटाए बिना सत्य का अनुभव नहीं होता. 

Saturday, March 25, 2017

निजता को जो पा जाये

२५ मार्च २०१७ 
हम जीवन को बाहर-बाहर से कितना सजाते हैं. सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं. धन, पद, संबंध और सम्मान में सुरक्षा खोजते हैं. किन्तु ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि जीवन किसी भी क्षण बिखर सकता है. जीवन की नींव पानी की धार पर रखी है. हम अहंकार को जितना-जितना बढ़ाते जाते हैं उतना-उतना स्वयं से दूर निकल जाते हैं, स्वयं से दूर जाते ही हम जगत से भी दूर हो जाते हैं. अहंकार की परिणिति एक अकेलापन है और स्वय के पास आने का फल इस ब्रह्मांड से एकता का अनुभव होता है. हमें लगता है अहंकार हमें हमारी पहचान देता है, पर हमारी निजता उसी क्षण प्रकट होती है जब हम अहंकार से मुक्त हो जाते हैं. हमें हमारा वास्तविक परिचय तभी मिलता है जब भीतर परम का प्राकट्य होता है. उसी के प्रकाश में एक नये तरह के जीवन का स्वाद मिलता है, जिसमें न किसी अतीत का भार है न ही भविष्य की योजनायें. पल-पल हृदय वर्तमान के लघुपथ पर गुनगुनाता हुआ स्वयं को धन्य महसूस करता है. 

Tuesday, January 24, 2017

माली सींचे मूल को

२४ जनवरी २०१७ 
जीवन का निर्माण अंधकार में आरम्भ होता है, एक बीज को धरती के नीचे बोया जाता है और एक दिन वह वृक्ष का रूप ले लेता है, जड़ों के रूप में उसका स्रोत छिपा ही रहता है. जड़ों की भी यदि खोद के निकाल लें तो जीवन सूख जाता है. उन्हें वहीँ पोषित करना होता है. इसी तरह हमारा मूल भी भीतर छिपा है, जिसे वहीं पोषित करना है, मूल तक पहुंचने का नाम ही ध्यान है. देह को स्थिर करके पहले मन को देखना फिर मन को शांत करते हुए उस बीज तक पहुंचना जो जीवन का स्रोत है, यह पहला चरण है, फिर उस स्रोत को परम से जोड़ना जिससे वह पोषित हो सके दूसरा सोपान है. प्रार्थना भी ध्यान का विकल्प हो सकती है और नाम जप भी, अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भी मार्ग अपनाकर हम अपने मूल को सींच सकते हैं. 

Thursday, August 20, 2015

उसकी ओर जरा मुड़ देखें


वह परम चैतन्य जो इस सम्पूर्ण सृष्टि का नियंता है, जो ऋत है, नियम है, आनन्दमय है, नित है, ज्ञानमय है. सब प्राणियों को जानने वाला है. वह अगोचर है पर उसी के द्वारा देखा जाता है, उसी के द्वारा सुना जाता है, वह ईश्वर हर आत्मा को अपनी ओर उन्मुख करना चाहता है, कभी सुख कभी दुःख के द्वारा वह हमें सजग करता है. उसके प्रति जागरूक होना ही साधना का फल है. 

Tuesday, July 7, 2015

नित नूतन यह जग है सुंदर

मई २०१०
जीवन में विस्मय न होने का कारण है ज्ञान, इन्द्रियों का सीमित ज्ञान... स्मृति से निश्चय होता है और उससे हम जीवन को पुराने चश्मे से देखते हैं. नित नवीन परमात्मा का यह संसार भी नित नवीन है लेकिन हम अपने पुराने अनुभवों, सूचनाओं तथा मान्यताओं के कारण कुछ भी नवीनता नहीं देख पाते, न तो अपने भीतर न समाज में. ऐसे में जीवन से आनंद व सुख चले जाते हैं. विस्मय बना रहे इसके लिए जरूरी है कि हम स्वयं को जानकार न मानें, बालवत् हो जाएँ, भोले बन जाएँ, तभी हर समय जगत अपने पर से पर्दा उठाकर हमें नवीनता का दर्शन कराएगा ! जीवन रहस्यों से भरा हुआ है पर दुःख से पीड़ित मन की उस तक नजर ही नहीं जाती, भक्त उसे देख लेता है, ज्ञानी भी उसे देख लेता है और प्रतिपल आनंद की वृद्धि का अनुभव करता है. ऐसा सुख से भरा यह हमारा जीवन है कि जितना लुटाओ खत्म ही नहीं होता, पर मिथ्या अहंकार इसे जानने में बाधा बना बैठा है, अहंकार का भोजन ही दुःख है और आत्मा का भोजन ही सुख है. 

Wednesday, June 17, 2015

मस्त हुआ जो वही पा गया

जनवरी २०१० 
अभ्यास और वैराग्य ये दो पंख हैं, जिनके सहारे साधक अध्यात्म के आकाश में उड़ता है. अभ्यास समय सापेक्ष है पर वैराग्य समय सापेक्ष नहीं है. परम को प्रेम करें तो संसार से वैराग्य हो जाता है. मन ही तो संसार है, जब मन स्थिर हो जाता है तो वह ज्योति स्तम्भ बन जाता है, तब शरीर हल्का हो जाता है. मस्ती में परम वैराग्य है. वैराग्य से समाधि का अनुभव होता है, समाधि से प्रज्ञा पुष्ट होती है. पूर्णता का अनुभव होता है.    

Sunday, January 4, 2015

जब उसकी ओर मुड़े मुखड़ा

अगस्त २००७
हमें वीतराग बनना है, धीरे-धीरे मूर्छा को तोड़ना है, राग-द्वेष से मुक्त होना है. साधना का यह सर्वोतम लक्ष्य है. वीतरागता हमें दृढ़ बनाती है, सक्षम करती है. आत्मनिर्भर बनाती है. पदार्थ से हटाकर विचार पर दृढ करती है. हम अस्थिर, क्षणभंगुर जगत का आलम्बन लेना छोड़कर उस स्थायी शाश्वत परम सत्ता, चेतना या आत्मा पर निर्भर करते हैं. वह परम सत्ता हमारे अंग-संग सदा ही रहती है पर हम ही बेखबर रहते हैं. विमुख रहते हैं, सन्मुख होते ही वह हमें दिखाई देती है.

Monday, August 4, 2014

मुक्ति का जब बोध रहे

जनवरी २००७ 
हर कामना की पूर्ति के बाद हम मोक्ष का अनुभव करते ही हैं तथा बोध तो आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही हर कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख हमें कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब हम मुक्ति का अनुभव करते हैं तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव हो जाता है जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रहता. 

Tuesday, June 3, 2014

हर घड़ी पलकें बिछाये

अप्रैल २००६ 
साधक के हृदय में जब यह भाव जगने लगता है कि कौन सा वह पल होगा जब उसे परम अनुभव होगा, वह उससे मिलेगा जिसकी खबर तो आती है, जिसके चर्चे तो उसने बहुत सुने हैं, जिसकी झलक तो उसने बहुत देखी है पर जो अभी उससे छिपे हैं, वह तब कहीं फंसना नहीं चाहता. वह कहीं भी भटकना नहीं चाहता, वह हर घड़ी स्वयं को मुक्त रखता है ताकि उनका स्वागत कर सके. वह अपना हृदय उनके स्वागत में खाली रखना चाहता है, वह कोई चांस नहीं ले सकता, पहले ही इतना समय निकल गया है.  

Wednesday, May 28, 2014

तेरे हाथों सौंप दिया सब

मार्च २००६ 
जितना-जितना हम उस परम सत्ता के करीब होते जाते हैं, उससे घनिष्ठ नाता जोड़ते जाते हैं, जो सत्ता कण-कण में व्याप्त है. हम देह की सीमाओं से पार होते जाते हैं. कृत्य का अभिमान नहीं रहता. ज्यादा करने की चाह भी समाप्त हो जाती है. हमारे कर्म तब अपने आप होते प्रतीत होते हैं, वह परमात्मा जैसे हमें अपने हाथों में नचा रहा हो. हम निर्भार होकर जीने लगते हैं. पदार्थों के प्रति भाव भी बदल जाता है, पदार्थ हमारे उपयोग में आयें बस वहीं तक उनका महत्व है, वे हमारे अहंकार को बढ़ाएं तो उनका त्यागना ही उचित है. भीतर एक सहजता का जन्म होता है. यह कितना अद्भुत अनुभव है. एक अनोखी शांति और स्थिरता भीतर बनी रहती है. हम उस स्रोत से जुड़ जाते हैं जहाँ से आए हैं.

Monday, March 31, 2014

आपे आप सुरंजन सोई

नवम्बर २००५ 
नानक के अनुसार, “कीता न होई थापया न जाई, आपे आप सुरंजन सोई” ! ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव करना है. कहीं से लाना नहीं है वह, कुछ करने से नहीं, कुछ भी न करने से वह प्रकट होता है, ध्यान साधना से जब पल भर के लिए मन खाली हो जाता है तो एक अनोखी पुलक से भर जाता है. जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. हमारे भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, हम चाहें तो तत्क्ष्ण उन्हें पा सकते हैं. हमारे मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोये रहते हैं और जो निधियां हम सहज ही पा सकते हैं, जन्म भर उनसे वंचित ही रह जाते हैं. परम के प्रति मन में श्रद्धा का भरना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है. हम सुख स्वरूप परमात्मा को कुछ-कुछ पहचानने लगते हैं.     

Saturday, March 1, 2014

मरना जिसने सीख लिया

अगस्त २००५ 
मृत्यु के समय अंतिम क्षण में हमारे मन के जो भाव होते हैं, अगला जन्म उन्हीं के अनुरूप होता है. वास्तव में एक क्षण से अधिक हमारे पास कभी भी नहीं होता, यदि वर्तमान का यह क्षण शांति से भरा है, तो उसका परिणाम अगला क्षण भी वैसा ही नहीं होगा, यदि यह क्षण दुःख से भरा है तो अगला क्षण उसकी छाया ही होगा. हम जिस क्षण अपने मन को ईश्वर से वियुक्त कर लेते हैं, दुःख के भागी होते हैं क्योंकि उस क्षण अहंकार ही होता है, अहंकार का भोजन दुःख है, वह शांति में बचता ही नहीं, अर्थात जब हम शांत होते हैं, ईश्वर से युक्त होते हैं, क्योंकि तब हम होते ही नहीं, वही होता है. मृत्यु के क्षण में जो शांत है वह परम स्वतंत्र है. 

Saturday, August 10, 2013

एक पुकार जगे जब भीतर

दिसम्बर २००४ 
हमारा जीवन ऊपर से चाहे जितना छोटा अथवा सामान्य दिखाई देता हो वह भीतर से है अत्यंत विशाल, अनंत और असाधारण. वह उस परम शक्ति का ही विस्तार है और इसके भीतर अनंत सम्भावनाएं छिपी हैं. प्रकृति के सारे रहस्य हमारे ही मन में छिपे हैं, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं तो एक विशाल दुनिया का दरवाजा खुल जाता है. वह दुनिया जो बाहर की दुनिया से अलग है पर उसके विरोध में नहीं. भीतर जो सच है वह किसी का विरोधी हो ही नहीं सकता वह परम प्रेम से उपजा है, वह शांति की सन्तान है और शांति का ही जनक है. वह सत्य हमें मुक्त करता है. शुभ-अशुभ सारे संस्कारों से परे ले जाता है. वह बाहरी जीवन को भी एक दिशा प्रदान करता है, वह सत्य रसपूर्ण है, आनन्द की वर्षा करता है. सृजन के क्षणों को जन्म देता है, वह तृप्ति भी प्रदान करता है और प्यास भी बनाये रखता है. वह विरह की पीड़ा भी है और मिलन का उल्लास भी, वह जीवन को अर्थ प्रदान करता है. जब हम सत्य के निकट होते है, होते जाते हैं, अथवा होना चाहते हैं तो सत्य भी हमारे निकट आना चाहता है, वह स्वयं को उसी अनुपात में प्रकट कर देता है जिस अनुपात में हमारी चाहना होती है. जब हम असत्य के पुजारी बने रहते हैं तो हमारी पुकार अनसुनी भी हो सकती है, पर सत्य के पुजारी की निःशब्द पुकार भी व्यर्थ नहीं जाती, हम चाहे मौन रहें अथवा मुखर होकर पुकारें, सत्य तक हमारी आवाज तत्क्षण  पहुंचती है और हम उतना ही उसकी निकटता का अनुभव करते हैं.