मानवीयता के सारे उपकरण जन्मजात मानव को मिले हैं, उसके भीतर ही हैं पर जैसे कोई अपना धन कहीं रखकर भूल जाये वैसे ही हम उन्हें भुला बैठे हैं. मानवीय भावनाएं प्रेम, आनंद, सुख, शांति, करुणा, पवित्रता, सत्विकता आदि खोजने तो जाना नहीं है, ये हरेक के भीतर हैं, नानक कहते हैं सबके भीतर वे हैं कोई घर इनसे खाली नहीं है. एक उंगली के सहारे ही हृदय की वीणा झंकृत हो सकती है. नन्हा बालक या बालिका जिन असीम सम्भावनाओं के साथ इस जग में आते हैं, जरा सा सहारा मिले तो वे खिल कर ऊपर आ सकती हैं। किन्तु आज के मानव के पास फुरसत ही नहीं है, वह अपनी ही धुन में चल जा रहा है। समय की निधि चुकती जाती है और जीवन संध्या निकट आ जाती है। संत कहते हैं हर देह में शक्ति के केंद्र हैं, जिन्हें योग और ध्यान से जगाया जा सकता है। मानसिक, दैहिक और आत्मिक शक्ति के द्वारा ही कोरोना जैसी आपदाओं का हम सामना कर सकते हैं।
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Tuesday, December 15, 2020
Sunday, July 19, 2020
कोरोना से जो बचना चाहे
वर्तमान समय, जीवन जब एक तरफ कोरोना के कारण आपदा में घिरा है तो दूसरी ओर मानवीय शक्ति और क्षमता को परखने का स्वर्ण काल भी है. जीवन को किस तरह बचाएं इसके लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्य कर रहे हैं. कम साधनों में किस तरह जीवन चलाएं इसके प्रति भी लोग सजग हो रहे हैं. भौतिकता को त्याग सादा जीवन उच्च विचार की परिपाटी पर चलने का समय भी यही है. कितने ही व्यवसाय बन्द हो चुके हैं, साथ ही कार्य के नए - नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. निराश होकर उदास होने का समय नहीं है, यह सजग और सतर्क रहकर जीवन को इस प्रकार जीने का समय है कि कम से कम ऊर्जा की खपत हो और अधिक से अधिक साधन बचाये जा सकें. वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना काल अभी लम्बा खिंचने वाला है. देश को अधिक दवाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों व अस्पतालों की जरूरत होगी, साथ ही देशवासियों को अधिक मनोबल और मानसिक शक्ति की भी जरूरत होगी. नियमित जीवनशैली अपना कर, जिसमें योग, ध्यान हो, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार हों तथा समाज व देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की ललक हो तो हम इस विपदा काल में भार नहीं बनेंगे बल्कि भार वाहक बन सकते हैं.
Monday, May 25, 2020
तू ही बिगाड़े तू ही संवारे
समय सदा एक सा नहीं रहता. हर सुबह पिछली सुबह से अलग होती है और हर मौसम पिछले बार से कम या ज्यादा गर्म या ठंडा. हमारे इर्दगिर्द का सब कुछ जब बदल रहा हो तब भी हम कई मामलों में स्थायित्व की कामना करते हैं. हमारा खुद का मन भी दिन के हर प्रहर में बदल जाता है, भोर में जो सहज ही शांत था, दोपहर होते-होते उसकी भावदशा बदल जाती है. इस परिवर्तन को यदि हम स्वीकार कर लेते हैं तो अपनी ऊर्जा को बचा लेते हैं. यदि विरोध करते हैं तो भीतर द्वंद्व उतपन्न हो जाता है जिसमें ऊर्जा का अपव्यय तो होता ही है, आसपास का वातावरण भी बदल जाता है. जीवन को वह जैसा-जैसा मिलता है वैसा ही स्वीकारने से हम विराट के साथ एक समन्वय स्थापित कर लेते हैं, हमारे भीतर और बाहर में एक संतुलन स्थापित हो जाता है. यदि कोई भीतर से किसी बात को अस्वीकार करता हो और बाहर से किसी विवशता के कारण मान लेता हो तो उसके मन में एक दरार पड़ जाती है. जगत के साथ उसका संबंध अपनेपन का नहीं रहता. भक्त की महिमा इसीलिए शास्त्रों में गायी गयी है, वह अस्तित्त्व के आगे अपनी इच्छा को प्रमुखता नहीं देता, यदि उसकी और अस्तित्व की कामना एक है तो वह उसे प्रभु की कृपा मानता है और यदि उनमें विरोध है तो वह उसे उनकी दया मानता है. इस तरह वह निर्भार होकर जीने की कला सीख लेता है.
Tuesday, March 24, 2020
एक भोर फिर अनुपम होगी
आज समय जैसे ठहर गया है, आपदाएं पहले भी आती थीं, पर किसी दूसरे देश में, या किसी अन्य राज्य में, शेष जगह जीवन अपनी रफ्तार से चलता ही रहता था. सुनामी आयी, कई लोग प्रभावित हुए, शेष ने सहायता भी की, पर उस दर्द का अनुभव नहीं किया जो भुक्तभोगी कर रहे थे. लेकिन आज हमारी इस पृथ्वी पर कैसा संकट आया है जिससे कोई भी अछूता नहीं है, इतने सारे देशों में एक साथ एक वायरस ने आतंक फैला दिया है. किन्तु रात कितनी भी अँधेरी हो सवेरा होकर ही रहता है. यह समय जो आज ठहरा हुआ लग रहा है, एक दिन तरल होकर बहने लगेगा. जीवन फिर अपनी रफ्तार चलेगा, हाँ, एक अंतर होगा, शायद तब तक प्रकृति पहले से ज्यादा निर्मल हो जाये, वाहनों का प्रदूषण कम होगा, नदियों में रसायन नहीं बहेंगे. जंगल नहीं कटेंगे. मानव का चन्द हफ्तों का विश्राम प्रकृति के लिए वरदान बन सकता है. यह आपदा हमारे जीवन में अवश्य ही कुछ बदलाव देकर जाएगी, अवश्य ही हम इसमें से ज्यादा सबल होकर निकलेंगे.
Tuesday, January 21, 2020
जीवन का जो लक्ष्य साध ले
सन्त और शास्त्र हमें समझाते हैं कि मन को विकारों से मुक्त करें, परमात्मा का नाम भजें और जिस काम के लिए मानव जन्म मिला है उसे करने में अपना समय लगाएं. सुबह से शाम तक हमारा समय नौकरी करने, भोजन करने, विश्राम करने में ही निकल जाता है. जो समय हाथ में रहता है वह टीवी, अख़बार, मोबाईल आदि में चला जाता है. कभी घूमने में तो कभी सिनेमा आदि देखने में या रिश्तेदारों और मित्रों से मिलने में चला जाता है. इन सब कार्यों में कितनी बार अनचाहा होता है तो मन उदास होता है, क्रोध से भर जाता है, कभी झुंझलाहट से और कभी द्वेष से. मन जब पूरी तरह प्रसन्न होता है ऐसे क्षण भी आते हैं पर वे टिकते नहीं. इसी तरह जीवन गुजरता जाता है और एक दिन जीवन की साँझ आ जाती है. परमात्मा से जिसने नाता जोड़ा ही नहीं उसे उसके नाम स्मरण में कैसे आनन्द आएगा, जिसने कभी मन को समझा ही नहीं, वह मन के पार जाकर शांति का अनुभव कैसे कर पायेगा, इसीलिए वृद्धावस्था आते ही रोग पकड़ लेते हैं. अधिकांश रोगों का संबंध मन से होता है, मन यदि सहज रूप से प्रसन्न रहना नहीं जानता, वह तनावपूर्ण स्थिति में रहता है, तनाव से ही देह में जहरीले रसायनों का जन्म होता है और शरीर भी अस्वस्थ हो जाता है. बचपन से ही यदि हम बच्चों और युवाओं को ध्यान, स्मरण आदि से जुड़ना सिखाएं तो उनका जीवन अंतिम श्वास तक खुशियों से भर रह सकता है.
Wednesday, October 2, 2019
शब्दों के वह पार मिलेगा
समय परिवर्तन का ही दूसरा नाम है.
जब मन थम जाता है, भीतर एक शांति और स्थिरता का अनुभव होता है, लगता है समय ठहर गया
है. सारी सृष्टि मन से ही उत्पन्न होती है. मन में विचार जब तेजी से चल रहे हों,
लगता है समय भी भाग रहा है. मन द्वारा किया गया परमात्मा का चिंतन हमें परमात्मा
से दूर ही करता है, उसके निकट जाना हो तो हर चिंतना का त्याग करना होगा. शब्दों से
जिसे जाना ही नहीं जा सकता ऐसा वह परम अस्तित्त्व है. इसीलिए वह समयातीत भी है और
शब्दातीत भी, और उसका होना या न होना शब्दों द्वारा सिद्ध भी नहीं किया जा सकता और
खंडित भी नहीं किया जा सकता.
Tuesday, March 26, 2019
यज्ञ बने यह जीवन अपना
समय की धारा अपनी
सहज गति से बहती जाती है. कोई उसके तट पर बैठ कर भी प्यासा रहे तो यह उसकी भूल है.
जीवन का हर पल अपने भीतर एक सम्भावना को व्यक्त करने की क्षमता रखता है. कभी हम उस
पल को पहचान लेते हैं और स्वयं के भीतर उस तृप्ति को महसूस करते हैं जो मन को
अभीप्सित है. अक्सर हम समय को व्यर्थ ही गुजर जाने देते हैं. ऐसा नहीं है कि वह
तृप्ति कोई ऐसी वस्तु है जिसे हम सहेज कर रख सकते हैं, पर जो पल हम सजगता के साथ
जीते हैं वे भविष्य के लिए एक थाती बनकर हमारे साथ हो लेते हैं. जो समय यूँही चला
जाता है वह खुले हुए नल से नाली में बहते पानी की तरह ही बह जाता है, उसका कोई प्राप्य
नहीं है. सृष्टि में प्रतिपल कुछ न कुछ घट रहा है, मानव को छोड़कर सभी एक यज्ञ में
अपनी आहुतियां डाल रहे हैं. हमें भी अपने हिस्से का योगदान इसमें करना है, यह भाव
बना रहे तो प्रकृति उसके लिए साधन जुटा ही देती है.
Thursday, August 2, 2018
हर पल बने सार्थक अपना
३ जुलाई २०१८
सुबह से शाम तक सभी को समय एक जैसा मिला है, कोई उन्हीं क्षणों
में कितना कुछ कर जाता है और कोई समय की कमी का रोना रोता रहता है. समय अति
बहुमूल्य है, यह जानते हुए भी हम कितना समय व्यर्थ के कामों में गंवा देते हैं. वास्तव
में जब तक हमारे द्वारा जीवन में प्राथमिकतायें तय नहीं होतीं, हमारा समय यूँही
व्यय होता रहेगा. देह को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम और मन को स्वस्थ रखने के लिए
ध्यान उसी तरह आवश्यक है, जैसे देह बनाये रखने के लिए भोजन, जब तक यह हम पूर्णतया
स्वीकार नहीं कर लेते तब तक साधना के लिए समय निकालना जरूरी नहीं लगेगा. इसी तरह
यदि कोई तय कर ले कि लेखन यदि प्रतिदिन नहीं किया जाता तो विचारों का प्रवाह रुक
जाता है, उसमें सहजता नहीं रहती, तब वह उसे भी प्राथमिकता देना आरम्भ कर देगा. मात्र
हमारा भौतिक अस्तित्त्व बना रहे, इतना ही तो पर्याप्त नहीं है. इस होने में निरंतर
प्रज्ञा का विकास हो तभी अपने स्वरूप में हम बने रह सकते हैं.
Saturday, June 23, 2018
वृद्ध वही जो पूर्ण तृप्त हो
२३ जून २०१८
समय की धारा निरंतर बह रही है. जो आज अंकुर है, कल पौधा बनेगा,
परसों वृक्ष और एक न एक दिन काल के गाल में समा जायेगा. किन्तु उससे पूर्व कितने
फल-फूल उसकी शोभा बनेंगे, अनगिनत पंछियों का आश्रयस्थल वह वृक्ष बनेगा. कितने घरों
के द्वार दरवाजे उसकी लकड़ी से आकार ग्रहण करेंगे. उससे उत्पन्न बीज नये अंकुर
बनेंगे, और एक चक्र पूर्ण हो जायेगा. मानव का जीवन भी एक वृक्ष की भांति ही होता
है, शिशु रूप में जो कोमल है, युवा होकर वही कितने उत्तरदायित्व सम्भालता है. अपने
इर्द-गिर्द के वातावरण को विभिन्न रूपों से प्रभावित करता है. उसके सम्पर्क में
आने वाले अनेकों व्यक्तियों को चाहे वे परिवार के सदस्य हों अथवा मित्र, या कार्यक्षेत्र
के सहकर्मी सभी से विचारों और भावनाओं का आदान-प्रदान करता है. प्रौढ़ावस्था को पार
करके एक दिन वही वृद्ध हो जाता है और जो सबको आश्रय देता था स्वयं को शक्तिहीन समझने
लगता है. वृद्धावस्था में भी जो व्यक्ति नियमित दिनचर्या को अपनाकर, कुछ न कुछ
शारीरिक और मानसिक श्रम करके स्वयं को व्यस्त बनाये रखता है और सदा प्रसन्न रहता
है, उसका मन बालवत् हो जाता है. बालक कुछ न कुछ नया सीखने को उत्सुक रहता है, जीवन
का हर दिन उसके लिए नई उम्मीद और नई चुनौती लेकर आता है. वृद्ध भी यदि अंत तक अपने
भीतर के बालक को जीवित रखे और स्वयं को आने वाले भविष्य के लिए तैयार करता रहे तो उसकी
यह अवस्था उसके लिए आनंद पूर्ण बन जाएगी.
Thursday, December 28, 2017
हीरा जनम अमोल है
२९ दिसम्बर २०१७
जीवन का हर पल अनंत सम्भावनाएं छिपाए है. अगले पल क्या घटने
वाला है, कोई नहीं जानता. हर घड़ी एक नया अवसर लेकर हमारे सम्मुख आती है. हम क्या
चुनते हैं, यह हम पर निर्भर है. समय की धारा तो बही जा रही है. उसमें कुछ सूखे हुए
पुष्प हैं तो कुछ नव कुसुमित कमल भी, कुछ बासी मालाएं हैं तो कुछ सूर्य की नव रश्मियाँ
भी, हमारी दृष्टि किस पर है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है. कोई यूँही सोये-सोये
भोर गंवा देता है तो कोई निकल पड़ता है, सुबह की लालिमा और हवा की स्नेह भरी छुअन
को समेटने, परमात्मा को धन्यवाद देने अथवा तो ध्यान, सुमिरन में डूबने, जिससे ऊर्जा
के उस महत स्रोत से वह जुड़ जाये और अपने भीतर ही तृप्ति का महासागर उसे मिल जाये.
जीवन अनमोल है इसका मर्म जाने बिना इसका कीमत का अंदाजा नहीं होता. आने वाले वर्ष
में अन्य लक्ष्यों के साथ इस एक खोज को भी जोड़ लें तो नया वर्ष कभी बीतेगा ही
नहीं.
Friday, October 13, 2017
मन को अपना मीत बनाएं
१३ अक्तूबर २०१७
संतजन कहते हैं, हमारे सारे
दुःख स्वयं के ही बनाये हुए हैं. हमारा मन विरोधी इच्छाओं का जन्मदाता है. मन स्वयं
ही स्वयं के विपरीत मार्ग पर चलता है और स्वयं ही स्वयं को दोषी ठहराता है. कितना
अच्छा हो कि बुद्धि में विवेक जागृत हो और मानव सदा अपने हित में ही निर्णय ले. वह
श्रेय के मार्ग का पथिक हो. प्रेय के मार्ग पर चलकर स्वयं अपनी ही हानि करते हुए हम
न जाने कितनी बार वही-वही भूलें करते हैं, जो हमें स्वधर्म से दूर ले जाती हैं.
अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए हम मन को शुद्ध बना सकते हैं.
निर्मल मन में ही आत्मा की झलक मिलती है. आत्मज्ञान होने के बाद ही व्यक्ति का
वास्तविक जीवन आरम्भ होता है.
Friday, August 11, 2017
अभी-अभी वह यहीं कहीं हैं
११ अगस्त २०१७
समय की धारा प्रतिपल अविरत गति से आगे बढ़ती जा रही है. यह पल जो अभी-अभी उगा था
खो गया है. पलक झपकते ही पल खो जाता है. संत कहते हैं जो इस पल में जाग गया, वह
जिंदगी से उसी तरह मिल सकता है जैसे कोई प्रेम के क्षणों में अपने प्रिय से मिलता
है. जब किसी के निकट होना ही पर्याप्त होता है, उससे कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि
उस क्षण को साथ-साथ जीने के लिए, उसी तरह समय के एक नन्हे पल के पीछे छिपे अनंत से
मिलना होता है. परमात्मा की मौजूदगी का अनुभव सदा ही एक क्षण में होगा, वह क्षण
कौन सा होगा यह कोई नहीं कह सकता पर जिसने कभी क्षण में ठहरना नहीं सीखा वह उस पल
को भी खो देगा.
Friday, April 7, 2017
सारा जग अपना लागे जब
७ अप्रैल २०१७
'विभिन्नता में एकता' का सूत्र जितना हमारे देश की मूल भावना को दर्शाता है उतना ही मानव और प्राणी जगत की आंतरिक एकता को भी. ऊपर-ऊपर से जितना भेद दिखाई देता है, भीतर-भीतर उतना ही साम्य छिपा है. जैसे एक वृक्ष है उसकी डालियाँ और तना निकट के वृक्ष से पृथक हैं पर धरती के भीतर दोनों की जड़ें आपस में किस तरह घुल-मिल जाती हैं कि कोई भेद नजर नहीं आता. साथ ही जो हवा और प्रकाश एक की पत्तियां ग्रहण करती हैं दूसरे की भी वही. उनमें एक तरह की समानता सदा ही है, मनुष्य -मनुष्य के मध्य भी सूक्ष्म स्तर पर देखा जाये तो हवा और प्रकाश के साथ-साथ विचार की तरंगे बिना रोक-टोक एकदूसरे में प्रवेश करती हैं. चेतना का गुण-धर्म एक जैसा ही है, चाहे वह किसी के भीतर ही क्यों न हो. ध्यान में जब इसका अनुभव साधक को हो जाता है एक आत्मीयता की भावना भीतर भर जाती है. एक अपनापन जो जगत के प्राणीमात्र के प्रति प्रकट होने लगता है.
Friday, April 24, 2015
जागो जागो माँ
जनवरी २००९
हम असत्य
में ही जन्मते हैं, असत्य में ही जीते हैं और असत्य में ही मर जाते हैं. कामना
हमारे जन्म का कारण है, वासना हमारे जीते चले जाने का कारण है और वासना ही हमारी
मृत्यु का कारण है. असत्य हमारे स्वभाव में इस तरह घुलमिल गया है कि उसका भास तक
हमें नहीं होता. इस मामले में हम बड़े वीर बन गये हैं. समय बीतता जा रहा है और हम
व्यर्थ के कामों में लगे रहते हैं. श्वासें घट रही हैं, मृत्यु सिर पर नाच रही है
और हम अब भी नहीं चेते. यह देह जो एक दिन आग की भेंट चढ़ जाने वाली है उसे तो रोज
हम नहलाते-धुलाते हैं, और हम जो स्वयं बच जाने वाले हैं उसकी कोई फ़िक्र नहीं.
पाँचों इन्द्रियों के घाट पर हम रहते आये हैं और वहीं रहने का इरादा कर लिया है.
जिव्हा अपनी ओर खींचती है, कान मधुर सुनने को आतुर हैं. इन पर तो चलो नियन्त्रण कर
भी लें, मन जो मनमानी करता है उसका क्या, बुद्धि जो मन के पीछे दौड़-दौड़ कर अपना
अपमान करने से भी बाज नहीं आती. हजार बार ठोकर खाने के बाद भी हम सचेत नहीं होते.
आखिर एक दिन तो जगना ही होगा.
Tuesday, January 6, 2015
एक प्रकाश छिपा है भीतर
अगस्त २००७
सद्गुरु
तो एक पल में झोली भर देता है, हमारे भीतर जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए ! जब
गुरुकृपा से भीतर परमात्मा प्रकट हो जाता है तो हर पल, हर घड़ी साधक प्रकाशमान हो
जाते हैं, रहते हैं. हर घटना तब शुभ ही होती है, तब बाहरी वातावरण का कोई प्रभाव
नहीं पड़ता. जिधर भी देखें परमात्मा ही नजर आता है, मन जैसे खो जाता है, अहम विगलित
हो जाता है, भीतर कुछ द्रवित होता है, सारा ठोसपना खत्म हो जाता है. प्रेम का
अनुभव होता है तो सारा जगत एक उसी का रूप दिखाई देता है. भीतर-बाहर एक ही सत्ता का
दर्शन होता है, वह दर्शन चौबीस घंटे होता है. अब न कोई दिन है न रात है. आज हुई न
कल है, न स्थान न समय के सापेक्ष है वह दर्शन. वह तो गुरू का प्रसाद है, एक जगी
हुई आत्मा ही दूसरी आत्मा को जगा सकती है. एक जला हुआ दीपक ही दूसरी ज्योति जल
सकता है. जब मन शुद्ध होता है तो परमात्मा उस मन का हरण कर लेता है, उसे परमात्मा
के सिवाय कुछ भी नहीं भाता और उसे खोजने निकल पड़ता है. सद्गुरु ऐसे में परमात्मा
के दूत बनकर आते हैं और भीतर ही उस तत्व का दर्शन करा देते हैं ! सद्गुरु के रूप
में परमात्मा ही आते हैं. एक ही चेतना है, वही तो सबके भीतर भी है. !
Sunday, January 5, 2014
तेरा तुझको अर्पण
जून २००५
ईश्वर
प्राप्ति के लिए हमारे मन में जब दृढ़ता नहीं रहती, तभी नियम में हम स्थिर नहीं हो
पाते. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा रहेगा. मोह-ममता मिटाने के
लिए ईश्वर हमारे जीवन में कई परिस्थितयों का निर्माण करते हैं. हमें अपने मन की
समता बनाये रखनी है, हर सुख-दुःख को समर्पित करना है. तीनों तापों से बचने का यही
उपाय है. जो अपने भीतर संतुष्ट रहता है, उसकी समस्त कामनाओं का स्वतः ही परिमार्जन
हो जाता है अर्थात अनावश्यक जीवन से झर जाता है. वह इस जीवन में फिर सहज हुआ प्रारब्ध
के अनुसार अपना समय बिताता है. उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है, कुछ करने व पाने की
आशा उसे अब नचाती नहीं. वह जीते जी मुक्त हो जाता है. उसका न कोई शत्रु है न कोई
मित्र, सारे द्वन्द्वों से पार हुआ वह अपने आप में अर्थात आत्मा में ही तुष्ट रहता
है. जगत उसके लिए स्वप्न वत् अथवा क्रीडांगन हो जाता है. वह जीवभाव से मुक्त होकर
आत्मभाव में निमग्न रहता है.
Sunday, August 4, 2013
उसी एक का सकल पसारा
दिसम्बर २००४
कितना कुछ हर क्षण हमारे आस-पास घटता रहता है, पल-पल कर
समय आगे बढ़ता है, दिन बीतते हैं, वर्ष सदियाँ और युग बीतते हैं, हम वहीं के वहीं
खड़े हैं, यह सब जो बदल रहा है उसे देखते हैं. हमारा तन बदला, मन बदला, भाव भी
बदलते हैं, पर जहाँ कोई परिवर्तन नहीं, जो सदा से एक सा है, वह जो साक्षी है, वह
चैतन्य जो हमारे भीतर भी है वही जो कण-कण में समाया है, उसकी उपस्थिति का भान यदि
होने लगे तो समाधान मिलने लगता है, हमारा होना ही पर्याप्त होता है, तब न कहीं
जाना है न आना है, न खोना है, यह जड़ता नहीं है, सहजता है, सहज होकर सारे कार्य
अपने-आप होने लगते हैं, तब कर्तापन का अहंकार शेष नहीं रहता. हम प्रकृति के सहयोगी
बन जाते हैं, विरोध में ऊर्जा क्षय है, द्वंद्व है. हमें द्वन्द्वातीत होना है,
जहाँ कोई भेद नहीं रहता, संसार और स्वयं में भी कोई भेद नहीं रहता क्योंकि सब एक
से ही उत्पन्न हुआ है. अपने ही हाथ से अपना विरोध कैसा ?
Monday, June 10, 2013
गंगा बहती ही जाती है
अक्तूबर २००४
कभी-कभी ऐसा लगता है, कितना समय यूँ ही बीता जा रहा है, हम वहीं के
वहीं खड़े हैं, सांसें व्यर्थ जा रही है, जिसकी तलाश में हम निकले थे वह अब भी दूर
ही है, शायद यह तलाश कभी खत्म होती भी नहीं, हिमालय से निकल कर गंगा नदी समुद्र से
मिलने के लिए जो रास्ता तय करती है वह कभी नहीं कर पाती, निरंतर बहती ही रहती है.
यदि सारी की सारी नदी एक ही बार में सागर में मिल जाये तो नदी का प्रवाह ही रुक
जाये. ऐसा ही हमारा जीवन है, सदा आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है, हम कुछ भी करें,
सोना, जागना, खाना, पीना, सोचना, लिखना, पढना सभी कुछ उसी एक की खोज में सहायक ही
है. हमारी यात्रा बाहर से भीतर की ओर है, जीवन भर अपने साथ रहते हुए भी हम स्वयं
को नहीं जान पाते, हमारी खोज का केंद्र यद्यपि भीतर ही है, पर विचार, भावनायें,
विकार, अहंकार और क्रोध की परतें उसे हमसे दूर किये रहते हैं. हमारा मिथ्या
व्यक्तित्व उस सच्चे निर्दोष, सहज स्वरूप को ढके रहता है, हम उस निष्पाप सहज
स्वरूप को बाहर लाने से डरते हैं, हम जगत के व्यवहार से परिचित हो चुके हैं, उसका
असर हम पर तभी तक पड़ता है जब तक सत्य का पता नहीं चलता, एक बार मन का दर्पण स्वच्छ
हो जाने पर सारी जिम्मेदारी हमारी है, हम यदि चाहें तो सत्य का साथ दें और चाहें
तो यूँ ही माया जाल में फंसे रहें.
Sunday, December 23, 2012
लो फिर आया नया साल
दिसम्बर २००३
नया साल मनाने का सबसे
बड़ा उद्देश्य क्या यह नहीं कि हम समय के महत्व को जानें, समय बीत रहा है, पल-पल
करके पूरा वर्ष बीत गया और हम अपने लक्ष्य की ओर कितना कम बढ़ पाए ! कितना अच्छा
होगा कि हम नए वर्ष में नए बनें, पुरानी व्यर्थ हो चुकी मान्यताओं को छोड़ते चलें,
जो भी बोझ हमने अपने मन पर यूँ ही ओढ़ रखा है उसे उतार रखें और हल्के हो जाएँ,
क्योंकि जो बीत चुका है, वह मृत है, चाहे वह कितना भी स्वर्णिम क्यों न रहा हो,
लौटने वाला नहीं है, और भविष्य अनिश्चित है, निश्चित केवल हमारा वर्तमान ही उसे
बना सकता है. वर्तमान में रहना आ जाये तो नूतनता कभी साथ छोड़ती नहीं. हमें वर्तमान
में रहकर नित नवीनता का अनुभव करते हैं, संवेदनशील रहते हैं, जागृत रह सकते हैं,
ऊर्जावान रह सकते हैं, ऊर्जा का संरक्षण कर सकते हैं. वर्तमान में हमारे पिछले
कर्मों की गांठ खुलती है, नया वर्ष आकर यही तो सिखाता है.
Friday, October 26, 2012
जिन ढूंढा तिन पाइयाँ
प्रभु अपने भक्तों को अपना दर्शन देते हैं, वे उसको अपना पता बताते हैं जो उनसे
पूछता है. वे उसके लिए अपना भेद खोल देते हैं जो उन्हें प्रेम करता है. वे हमारी
बुद्धि को प्रज्ञा में बदलते हैं. वे ही हमें इस क्रीड़ास्थल पर भेजते हैं और वे ही
इस खेल के नियम भी बतलाते हैं और परिणाम भी. हमें इसे खेल भावना से खेलना है तभी
हम इसका पूरा आनंद ले सकते हैं. लेकिन अन्ततः घर लौटना है, वह घर है उसका सान्निध्य, वहाँ पुष्ट होकर पुनः पुनः
इस जगत में आना होता है, पर जिसका मन इस खेल से भर जाये वह सदा के लिए उनके
सान्निध्य में रह सकता है. इसे ही निर्वाण कहते हैं. निर्वाण का अनुभव इस जगत में
भी हम करते हैं, गहरी नींद में जब हमें अपना भान नहीं रहता, हम प्रायः मृत ही हो
जाते हैं, पुनः जगते हैं अथवा जन्मते हैं. ध्यान में भी जब देह का भान नहीं रहे,
समय का पता न चले तब उसकी झलक पाते हैं. यह सब मौन में ही अनुभव होता है, अत्यंत
सूक्ष्म यह भाव टिकता नहीं पर इसकी स्मृति ही ताजगी से भर देती है.
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