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Monday, December 28, 2020

नया वर्ष शुभ हो सबके हित

 इस वर्ष को समाप्त होने में मात्र दो दिन और चंद घंटे ही बाकी हैं, फिर पल भर को पर्दा गिरेगा,  विदा होगा वर्तमान वर्ष और आगत वर्ष मंच पर कदम धरेगा. खुशामदीद कह कर कुछ लोग नाचेंगे, कुछ  उठायेंगे खुशी का जाम और दुआ करेंगे कि उनकी  जिंदगी में रोशनी आए। कुछ नए वादे किए जाएंगे खुद से, लोग एक दूजे को  मुबारकबाद देगें। नए का स्वागत हो यह रीत है दुनिया की। आने वाला वक्त खुशहाली का सबब बने, यह सबकी चाहत है. फिजायें महक उठें, हर कोई तरक्की करे. न हो खौफ कोई महामारी का, उसका नाम भी न बचे. जाते हुए उस नामुराद को साथ ले जाए, यही तो सब के दिल की पुकार है।  जाते हुए मुसाफिर से यही गुजारिश करते हैं सभी कि सुकून से जी सकें जो जिंदा  हैं. जो चले गए, गम उनके अपनों को न सताये। नया साल भी एक दिन बाद ही पुराना हो जाता है और जीवन अपने उसी पुराने क्रम से चलने लगता है। हर साल हम नए वर्ष से कितनी उम्मीदें बांधते हैं, कुछ ख्वाब पूरे होते हैं कुछ खो जाते हैं, फिर हम उन्हें भूल ही जाते हैं। 2020 ने चाहे कितनी ही मायूसी से दो-चार कराया हो आदमी को, पर एक बात अवश्य हुई है कि सभी को   जिंदगी की अहमियत का पता चल गया है, किसी भी पल छिन सकती हैं श्वासें, यह अहसास जिंदा रहे हो तो हर पल की कदर की जा सकती है। इसलिए अच्छा तो यही है, न करें कोई वायदे, न लें या दें कोई वचन, बस हर दिन को परमात्मा का एक तोहफा कुबूल करके उसे जितना हो सके सजगता से गुजारें। सत्संग यानि सत्य का संग न छोड़ें, साधना अर्थात योग-प्राणायाम को नियमित करें, सेवा अर्थात किसी न किसी रूप में अपना शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग अन्यों के लिए निस्वार्थ भाव से हो और स्वाध्याय यानि स्वयं को पढ़ें, शास्त्र या किसी न किसी श्रेष्ठ साहित्य को नियमित पढ़ें। सेवा, सत्संग, साधना और स्वाध्याय के चार स्तंभों पर टिका जीवन का भवन किसी भी आपदा का सामना अविचलित रहकर कर सकता है। 


Sunday, August 4, 2013

उसी एक का सकल पसारा

दिसम्बर २००४ 
कितना कुछ हर क्षण हमारे आस-पास घटता रहता है, पल-पल कर समय आगे बढ़ता है, दिन बीतते हैं, वर्ष सदियाँ और युग बीतते हैं, हम वहीं के वहीं खड़े हैं, यह सब जो बदल रहा है उसे देखते हैं. हमारा तन बदला, मन बदला, भाव भी बदलते हैं, पर जहाँ कोई परिवर्तन नहीं, जो सदा से एक सा है, वह जो साक्षी है, वह चैतन्य जो हमारे भीतर भी है वही जो कण-कण में समाया है, उसकी उपस्थिति का भान यदि होने लगे तो समाधान मिलने लगता है, हमारा होना ही पर्याप्त होता है, तब न कहीं जाना है न आना है, न खोना है, यह जड़ता नहीं है, सहजता है, सहज होकर सारे कार्य अपने-आप होने लगते हैं, तब कर्तापन का अहंकार शेष नहीं रहता. हम प्रकृति के सहयोगी बन जाते हैं, विरोध में ऊर्जा क्षय है, द्वंद्व है. हमें द्वन्द्वातीत होना है, जहाँ कोई भेद नहीं रहता, संसार और स्वयं में भी कोई भेद नहीं रहता क्योंकि सब एक से ही उत्पन्न हुआ है. अपने ही हाथ से अपना विरोध कैसा ?