हम सुबह से शाम तक न जाने कितनी अच्छी बातें पढ़ते और सुनते हैं. व्हाट्सएप पर ही जीवन को सुंदर बनाने के लिए संदेश भेजते और प्राप्त करते हैं, किन्तु अपने में व आस-पास अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता. मन सूचनाओं को एकत्र कर लेता है और सोचता है उसे आवश्यक जानकारी हो गयी. इस तरह हमें जानने का अहंकार बढ़ जाता है पर भीतर का वातावरण वैसा ही रहता है. आज ही एक सन्देश पढ़ा, “हृदय एक ऐसी मशीन है जो बिना रुके जीवन भर चलती रहती है, इसे प्रसन्न रखें, यह चाहे अपना हो या दूसरों का”. हृदय प्रसन्न रहे इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम सहजता में रहें, सबके साथ सामंजस्य बना कर समझदारी से आगे बढ़ें. किसी भी प्रकार का दुराग्रह या दूसरों का विरोध हमारे हृदय पर असर डालने ही वाला है. हृदय की गहराई में प्रेम और सहृदयता की जो भावनाएं सुप्त हैं, उन्हें जगाएं तो अन्यों के हृदयों को भी सहज ही प्रसन्न रख सकेंगे.
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Tuesday, September 22, 2020
Sunday, August 4, 2013
उसी एक का सकल पसारा
दिसम्बर २००४
कितना कुछ हर क्षण हमारे आस-पास घटता रहता है, पल-पल कर
समय आगे बढ़ता है, दिन बीतते हैं, वर्ष सदियाँ और युग बीतते हैं, हम वहीं के वहीं
खड़े हैं, यह सब जो बदल रहा है उसे देखते हैं. हमारा तन बदला, मन बदला, भाव भी
बदलते हैं, पर जहाँ कोई परिवर्तन नहीं, जो सदा से एक सा है, वह जो साक्षी है, वह
चैतन्य जो हमारे भीतर भी है वही जो कण-कण में समाया है, उसकी उपस्थिति का भान यदि
होने लगे तो समाधान मिलने लगता है, हमारा होना ही पर्याप्त होता है, तब न कहीं
जाना है न आना है, न खोना है, यह जड़ता नहीं है, सहजता है, सहज होकर सारे कार्य
अपने-आप होने लगते हैं, तब कर्तापन का अहंकार शेष नहीं रहता. हम प्रकृति के सहयोगी
बन जाते हैं, विरोध में ऊर्जा क्षय है, द्वंद्व है. हमें द्वन्द्वातीत होना है,
जहाँ कोई भेद नहीं रहता, संसार और स्वयं में भी कोई भेद नहीं रहता क्योंकि सब एक
से ही उत्पन्न हुआ है. अपने ही हाथ से अपना विरोध कैसा ?
Wednesday, January 16, 2013
प्रेम से प्रकट होए मैं जाना...
जनवरी २००४
हमारी जीवन शैली हिंसात्मक है या अहिंसात्मक इसका पता हमें दो-तीन बातों से लग जाता
है, हम स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं या परतंत्रता का, सापेक्षता का अथवा
निरपेक्षता का, अशांति का अथवा शांति का. हमारा मन यदि क्षोभ से भर जाता है तो हम
हिंसा के शिकार हैं, हम विरोध करते हैं, द्वंद्व का शिकार होते हैं तो भी हिंसा
अपना कार्य कर रही है, हम असंवेदनशील हो रहे हैं, क्षमा नहीं कर पाते तो हिंसा ही है. यही वह सूक्ष्म पर्दा है
जो हम परमात्मा से अलग करता है. हम उसके प्रति प्रेम तो अनुभव करते हैं पर स्थिर
नहीं रख पाते क्योंकि अब तक मन विरोध के भाव में आ चुका है. प्रेम में कोई विरोध
नहीं होता, प्रेम सभी कुछ स्वीकारता है, अच्छा-बुरा सभी कुछ, विष-अमृत सभी कुछ !
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