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Monday, June 27, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं, यह तो दिल में सम्भाल कर रखने जैसा क़ीमती रत्न है। प्रेम पूँजी है। प्रेम एक बीज की तरह है जिसे कोमल भावनाओं से सिंचित मन की भूमि चाहिए, जिसमें क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ के खर-पतवार न उगे हों। जहाँ भक्ति की शीतल पवन बहती हो और ज्ञान का सूरज भी अपनी किरणें बिखेरता हो। ऐसे मन में ही  प्रेम का वृक्ष पनपता है जो स्वयं को और अपने इर्द गिर्द अन्यों को भी छाया देता है। हम प्रेम को पाकर इतराते हैं और उसे ही अभिमान में बदल देते हैं तो वह बीज सूखने लगता है। प्रेम ऐसा कोमल है जो भाषा की रुक्षता भी सह नहीं पाता, जो ओस की बूँद की तरह नाज़ुक है जो द्वेष की हल्की सी रेखा से भी मलिन हो जाता है। इस अनमोल वरदान को जो हमें जन्म से ही मिलता है, जगत की आपाधापी में गँवा न दें। मिथ्या कठोरता का आवरण ओढ़कर हम उसे बचाए रख सकते हैं, ऐसा हम सोचते हैं पर वह किसी के काम नहीं आएगा। पहले पश्चाताप के आंसुओं में उस आवरण को गलाना होगा,पत्थर जैसे हो गए हृदय को पिघलना होगा फिर उसमें अंकुर फूटेगा जो प्रेम की अनेक शाखा प्रशाखाओं को जन्म देगा जो हमें जीवन की धूप से बचाएँगी तथा औरों को भी विश्रांति देंगी।  


Monday, April 18, 2022

प्राण ऊर्जा बहे अबाध जब


आयुर्वेद के अनुसार शरीर के सभी अंगों में प्राण-ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीस घण्टे होता है,पर हर समय एक सा प्रवाह नहीं होता. प्रायः जिस समय जो अंग सर्वाधिक सक्रिय हो उस समय उससे सम्बन्धित कार्य करने से हम उसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. प्रातः तीन बजे से पांच बजे तक फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक रहता है, इसी कारण ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने अथवा  प्राणायाम आदि करने से शरीर स्वस्थ बनेगा. सुबह पांच बजे से सात बजे तक ऊर्जा बड़ी आंत में जाती है, जो व्यक्ति इस समय सोये रहते हैं व शौच क्रिया नहीं करते उन्हें कोई न कोई पेट का रोग हो सकता है. इस समय योगासन व व्यायाम करना चाहिए. सात से नौ बजे तक सर्वाधिक ऊर्जा आमाशय में रहती है इसलिए सुबह का नाश्ता जल्दी कर लेना चाहिए. नौ से ग्यारह बजे तक तिल्ली और पैंक्रियाज की सक्रियता का समय है, यदि दोपहर का भोजन ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद कर लें तो पाचन अच्छा हो सकता है. दिन में ग्यारह से एक बजे तक हृदय में विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है. हृदय हमारी संवेदनाओं, दया, करुणा तथा प्रेम का प्रतीक है, इस समय लेखन या रूचि का कोई काम अच्छा हो सकता है. दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक छोटी आंत में पोषण का कार्य होता है, इसलिए दोपहर का भोजन देर से नहीं करना चाहिए. शाम को पांच से सात बजे तक किडनी में ऊर्जा का प्रवाह होता है. शाम का भोजन सात बजे तक कर लेना चाहिए. सात से नौ बजे तक ऊर्जा मस्तिष्क में जाती है, यह समय अध्ययन के लिए उत्तम है. नौ से ग्यारह बजे तक रीढ़ की हड्डी में सर्वाधिक ऊर्जा होती है, यह समय सोने के लिए उत्तम है. रात्रि ग्यारह से एक बजे तक पित्ताशय में ऊर्जा प्रवाहित होने से मानसिक गति विधियों पर नियंत्रण होता है, इस समय जगे रहने से पित्त तथा नेत्र के रोग हो सकते हैं. रात्रि एक से तीन बजे तक लिवर में ऊर्जा का परवाह सर्वाधिक होता है, इस समय गहरी नींद आवश्यक है. लिवर से पुनः ऊर्जा फेफड़ों में चली जाती है और एक नए दिन का आरम्भ होता है. 

(गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण में प्रकाशित एक लेख से साभार )

Tuesday, December 15, 2020

सब कुछ भीतर बाहिर नाहीं

 मानवीयता  के सारे उपकरण जन्मजात मानव को मिले हैं, उसके भीतर ही हैं पर जैसे कोई अपना धन कहीं रखकर भूल जाये वैसे ही हम उन्हें भुला बैठे हैं. मानवीय भावनाएं प्रेम, आनंद, सुख, शांति, करुणा, पवित्रता, सत्विकता आदि खोजने तो जाना नहीं है, ये हरेक के भीतर हैं, नानक कहते हैं सबके भीतर वे हैं कोई घर इनसे खाली नहीं है. एक उंगली के सहारे ही हृदय की वीणा झंकृत हो सकती है. नन्हा बालक या बालिका जिन असीम सम्भावनाओं के साथ इस जग में आते हैं, जरा सा सहारा मिले तो वे खिल कर ऊपर आ सकती हैं। किन्तु आज के मानव  के पास फुरसत ही नहीं है, वह अपनी ही धुन में चल जा रहा है। समय की निधि चुकती जाती है और जीवन संध्या निकट आ जाती है। संत कहते हैं हर देह में शक्ति के केंद्र हैं, जिन्हें योग और ध्यान से जगाया जा सकता है। मानसिक, दैहिक और आत्मिक शक्ति के द्वारा ही कोरोना जैसी आपदाओं का हम सामना कर सकते हैं। 


Tuesday, September 22, 2020

दिल का जो रखेगा ध्यान

 हम सुबह से शाम तक न जाने कितनी अच्छी बातें पढ़ते और सुनते हैं. व्हाट्सएप पर  ही जीवन को सुंदर बनाने के लिए संदेश भेजते और प्राप्त करते हैं, किन्तु अपने में व आस-पास अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता. मन सूचनाओं को एकत्र कर लेता है और सोचता है उसे आवश्यक जानकारी हो गयी. इस तरह हमें जानने का अहंकार बढ़ जाता है पर भीतर का वातावरण वैसा ही रहता है. आज ही एक सन्देश पढ़ा, “हृदय एक ऐसी मशीन है जो बिना रुके जीवन भर चलती रहती है, इसे प्रसन्न रखें, यह चाहे अपना हो या दूसरों का”. हृदय प्रसन्न रहे इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम सहजता में रहें, सबके साथ सामंजस्य बना कर समझदारी से आगे बढ़ें. किसी भी प्रकार का दुराग्रह या दूसरों का विरोध हमारे हृदय पर असर डालने ही वाला है. हृदय की गहराई में प्रेम और सहृदयता की जो भावनाएं सुप्त हैं, उन्हें जगाएं तो अन्यों के हृदयों को भी सहज ही प्रसन्न रख सकेंगे.

Friday, April 3, 2020

प्रेम की डोर ने बाँधा सबको



जीवन का सार है प्रेम, यह सारा ब्रह्मांड जिस एक तत्व के कारण अस्तित्त्व में आया है वह प्रेम ही है, धरती सूर्य की परिक्रमा करती है, चाँद धरती के चक्कर लगाता है, किस शक्ति के कारण, वैज्ञानिक उसे जो भी नाम दें वह आकर्षण शक्ति प्रेम का ही एक स्वरूप है. हमने प्रेम को एक कृत्य मान लिया था, हाथ मिलाना, गले लगाना, मस्तक या गाल चूमना और उपहार पकड़ाना ही प्रेम के पर्याय हो गए थे, अब इनमें से कुछ भी सम्भव नहीं है, किन्तु क्या दुःख की इस घड़ी में अब मानवीय संवेदना पहले से ज्यादा नहीं बढ़ गयी है. प्रेम कोई कृत्य नहीं है यह तो मानव के हृदय की उस संवेदना का नाम है जो वह अन्यों के प्रति अपने अंतर में महसूस करता है. दूसरे का सुख जब अपना सुख बन जाये उसका दुःख जब हमारी आँखों में अश्रु ले आए उसे ही प्रेम कहते हैं. इस आपदा काल में हम सभी भारतवासी एक ऐसी डोर से बंधे हुए हैं जो यद्यपि पहले भी हम सबको जोड़े हुए थी पर अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे हम एक-दूसरे से दूर ही थे. इस आपदा का सामना हम सभी को मिलकर करना है, हमारे भाग्य एक हैं, हमारे कर्म भी यदि एक लक्ष्य को समर्पित हो जायँ तो इस आपदा से मुक्ति हमें शीघ्र ही मिल सकती है.

Tuesday, July 2, 2019

शुभता का जब कुसुम खिलेगा



यदि कोई सत्य की राह में चलता है तो उसे अस्तित्त्व से अपने आप मार्ग मिलने लगता है. यदि कोई सिर बन्दगी में झुकता है तो आशीर्वाद उसी तरह अपने आप बरसने लगते हैं, जैसे खाली जगह देखकर हवा कहीं से चली ही आती है. इस सृष्टि में हरेक के लिए अवसर है. इस जीवन से हम क्या चाहते हैं, यह भर हमें तय करना है. हृदय की गहराई से निकली हर चाह अपनी पूर्ति के लिए ऊर्जा साथ लेकर ही उत्पन्न होती है. जैसे एक बीज में फूल बनकर खिलने का पूरा सामर्थ्य है वैसे ही हर शुभ इच्छा एक बीज ही है जो एक न एक दिन खिलने वाली है. हमारा आज वही तो है जो कल हमने चाहा था, आने वाला कल भी हमें एक खाली कैनवास की तरह मिला है, जिसमें रंग भरने की हमें पूरी आजादी है.

Sunday, August 19, 2018

पल-पल सजग रहेंं जीवन में


२० अगस्त २०१८ 
जीवन हर क्षण एक सा है, एक रस, सदा जीवंत, सदा भरपूर, उस सागर की तरह जो सदा ही जल से छलकता रहता है, कभी खाली नहीं होता. हमारा पात्र कितना बड़ा है, और हम उससे क्या चाहते हैं, यह तय करता है, कि जीवन हमारे लिए कैसा है. हमें पल-पल इसे गढ़ना है, पल-पल इसे संवारना है. इसकी देने की क्षमता अपार है, पर हमारी चाह छोटी सी है. विशाल हृदय हो तभी कोई अटल जी की तरह विरोधियों के मध्य रहकर भी अपना नाम अमर कर जाता है. हर घड़ी एक अनंत को अपने भीतर छिपाए है, जैसे अति सूक्ष्म परमाणु में अपरिमित शक्ति है, बिलकुल वैसे ही. अपने सामान्य जीवन की आपाधापी में हम इस सत्य को भुला बैठते हैं, और उस अनंत से वंचित रह जाते हैं. मन सीमित से संतुष्ट नहीं होता, उसे विस्तृत हुए बिना चैन नहीं मिलता, तभी आकाश की अनंतता उसे लुभाती है. जीवन से नजर मिलनी है तो वर्तमान क्षण की गहराई में उतरना होगा और मन के प्रांगण को उसके लिए खाली कर देना होगा.

Wednesday, May 16, 2018

अंतर में जब बोध जगेगा


१७ मई २०१८ 
बुद्धिगत ज्ञान हमें कहीं पहुंचाता नहीं है, एक ही चक्र में उलझाये रखता है. आजकल प्रतिदिन सुबह व्हाट्सएप पर कितनी सुंदर ज्ञान की बातें पढ़ने को मिलती हैं. एक पल के लिए हृदय में कुछ शुभ अनुभूति होती है और जुगनू की चमक की तरह अगले ही पल खो जाती है. समाचारपत्र में या फेसबुक पर भी हम सुंदर संदेश पढ़ते हैं पर कुछ मिनटों में ही मन उसे भुला देता है. शास्त्र कहते हैं,  सुनना या पढ़ना अति आवश्यक है पर उससे भी अधिक आवश्यक है, पढ़े हुए पर चिंतन करना, और सबसे अधिक आवश्यक है उसे वास्तविक जीवन में उपयोग में लाने का प्रयत्न. उदाहरण के लिए आज सुबह ही एक संदेश मिला, जीवन आश्चर्य और विस्मय से भरा है, देखने की नजर चाहिए. पढ़कर अच्छा लगा, सोचा, संसार में इतने दुखों के बावजूद, इतनी जनसंख्या के बावजूद हर नया शिशु अपने भीतर वही उल्लास और प्रेम लिए जन्मता है, माँ-पिता के लिए वह किसी राजकुमार या राजकुमारी से कम नहीं होता. बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज आयी तो उसे जाकर चुप कराया और कुछ खाने को दिया. आँसुओं के मध्य उसकी मुस्कान किसी आश्चर्य से कम नहीं थी. बाहर फूलों पर तितलियाँ थीं और पेड़ों पर पंछी, जिन्हें किसी चुनाव के परिणाम और किसी तूफान का भय नहीं था. समझ में आया, जीवन हर पल अपनी पूरी भव्यता के साथ प्रकट हो ही रहा है, बस देखने की नजर चाहिए.

Friday, April 20, 2018

प्रीत बिना जग सूना सूना


जिसका अंतर प्रेम से भीग-भीग जाता हो, फिर वह प्रेम चाहे प्रकृति के प्रति हो, देश के प्रति हो या स्वजनों के प्रति, वही परम की राह का राही हो सकता है. मरुथल जैसा हृदय ‘उसके’ किसी काम का नहीं, ‘जो’ रस से ही बना है. हानि-लाभ की भाषा में सोचने वाली बुद्धि हमें मस्त होने ही नहीं देती. बुद्धि का अति प्रयोग ही हमें बच्चों जैसी सहज मुदिता से दूर ले जाता है. भावना से युक्त मन ही उस अनुराग का अधिकारी होता है, जो राग का विरोधी नहीं बल्कि उसे पूर्णता प्रदान करता है. संसार के प्रति राग हो हम द्वेष से बच ही नहीं सकते, क्योंकि यहाँ सब कुछ जोड़े में ही मिलता है, पर परम के प्रति अनुराग हो तो उसका कोई विरोधी नहीं. इस परम को किसी हद में नहीं बाँधा जा सकता, हर किसी के लिए वह निजी हो सकता है, जो एक साथ ही सबका है. जैसे हर बच्चे का माँ से विशेष प्रेम होता है और माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं. वह एक साथ सबके लिए उपलब्ध है, पर हममें से जो उसे अपना मान लेगा, उसे ही वह प्राप्त होगा. 

Thursday, January 25, 2018

दिल है छोटा सा

२५ जनवरी २०१८ 
कितना छोटा सा है मानव का हृदय और उसमें वह अनंत समा जाता है जैसे कितना छोटा सा है मोबाइल फोन और उसमें सारा जहाँ समा गया है. सूक्ष्म में स्थूल समाया है या स्थूल में सूक्ष्म, यह पहेली हल नहीं होती. देह स्थूल है, मन सूक्ष्म, बुद्धि मन से भी सूक्ष्म और आत्मा बुद्धि से, परमात्मा आत्मा से भी परे है, यानि उससे भी सूक्ष्म. वह अति सूक्ष्म सत्ता हर जड़-चेतन का आधार है. उसमें सतत् वास करने से ही आत्मा समता को प्राप्त होती है, वरना मन तो पीपल के पते की तरह डोलता ही रहता है. मन चाह जगाता है, फिर उसे पूर्ण करने के लिए प्रयत्न करता है, सफल या असफल होने पर सुख-दुःख का अनुभव करता है, यश अथवा अपयश का भागी भी बनता है. एक चक्र पूरा होने पर दूसरी चाह...मन कभी थकता नहीं. आत्मा सदा तृप्त है. उसे विश्राम मिल गया है. वह उस पुष्प की तरह सुगंध फैलाती है जिसे न खिलने की चाह है न मुरझाने का भय, जिसका स्वभाव ही है खिलना. 

Thursday, August 17, 2017

सतरंगी यह जीवन सुंदर

१७ अगस्त २०१७ 
जीवन बहुआयामी है. विविधताओं से भरा है. प्रकाश की श्वेत किरण जैसे सात रंगों से बनी है, जीवन भी प्रेम, सुख, शांति, शक्ति, पवित्रता, आनंद और ज्ञान सप्त गुणों से ओतप्रोत है. इन गुणों का विकास ही साधक के लिए नित्य साधना है. प्रेम ही परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को एक सूत्र में बाँधता है. सुख की तलाश विज्ञान को नई खोजें करने की प्रेरणा देती है. शांति के वातावरण में ही संगीत आदि कलाओं का सृजन सम्भव है. शक्तिशाली तन और मन ही बदलते हुए समय में स्वयं को स्वस्थ रख सकता है. जीवन जब मर्यादाओं में रहकर आगे बढ़ता है तो दो तटों के मध्य बहती धारा की तरह एक पवित्रता का निर्माण करता चलता है. यही पावनता दिव्यता को जन्म देती है जो आनंद के रूप में मानव के भीतर प्रस्फुटित होती है. हृदय जब आनंदित हो तो सहज ही ऐसा अंतर्ज्ञान उपजता है जिसको पाने के बाद  हर समस्या का समाधान मिलने लगता है.

Monday, May 29, 2017

स्रोत छुपा है भीतर एक

२९ मई २०१७ 
जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति आ जाये, कितना भी अँधेरा छा जाये, ऐसा लगे सब रास्ते बंद हो गये हैं, जीवन तब भी भीतर ही भीतर महकता रहता है. यदि मन में इस का पूर्ण विश्वास हो तो आशा की एक छोटी सी किरण उस तक ले जाती है. मन कितने भी प्रश्न खड़ा करता रहे, आत्मा हर क्षण एक मधुर मुस्कान बिछाये प्रतीक्षारत है. आत्मा का स्रोत वह अनंत प्रेम स्वरूप परमात्मा है, जो सदा हितैषी है, सुहृद है. जगत में सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है, यहाँ अच्छा काल भी टिकने वाला नहीं है और बुरा काल भी. हर अनुभव आत्मा को परिपक्व कर सकता है, उसे जीवन के निकट ले जा सकता है यदि कोई हृदय में परम के प्रति आस्था का अखंड दीपक जलाये रखे.    

Monday, May 15, 2017

भाव भरा जब अंतर होगा

१५ मई २०१७ 
ऋषि कहते आये हैं भाव यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी. 

Friday, June 24, 2016

खोलें दिल का द्वार

२४ जून २०१६  
हम जीवन में जो चाहते हैं वह पा सकते हैं बशर्ते हमें यह स्पष्ट हो कि हम चाहते क्या हैं ? स्वयं को जाने बिना हम यह जान ही नहीं पाते कि हमारी वास्तविक मांग क्या है, और स्वयं हुए बिना स्वयं को जाना नहीं जा सकता. स्वयं होने के लिए हृदय का द्वार खटखटाना होगा. बुद्धि पर भरोसा छोड़कर भाव जगत में प्रवेश करना होगा. कुछ पलों के लिए हानि-लाभ की भाषा त्यागकर जीवन को उसके सच्चे स्वरूप में जानना होगा.

Monday, June 15, 2015

हृदय कोष में ही वह रहता

जनवरी २०१० 
बुद्धि की सीमा जहाँ समाप्त होती है, हृदय का आरम्भ होता है ! लेकिन हम अपनी बुद्धि पर हद से ज्यादा भरोसा करते हैं, हर कोई दूसरे को कम तथा स्वयं को अधिक बुद्धिमान समझता है. छोटी से छोटी बात में भी हम चाहते हैं कि लोग जानें. अहंकार कि जड़ इसी बुद्धि में ही है जो हमें पश्चाताप के सिवा कुछ देकर नहीं जाती. जो यह मान लेता है कि कुछ पा लिया है, जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है ! हृदय में प्रवेश होते ही बुद्धि का चश्मा उतर जाता है, तब कोई छोटा-बड़ा नहीं रहता.  

Tuesday, April 28, 2015

दर्पण सा जब मन हो जाये

जनवरी २००९ 
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ अदृश्य के प्रति विश्वास ही श्रद्धा है, जो हम जानते हैं वह बहुत थोड़ा है उससे जो हम नहीं जानते. उस अव्यक्त का हमारे जीवन पर असीम प्रभाव पड़ता है. श्रद्धा का अर्थ है पूर्ण समर्पण, जो कुछ भी हमारे साथ हो चुका है, हो रहा है, अथवा भविष्य में घटने वाला है, सभी को पूर्ण स्वीकार करते हुए साक्षी भाव में, समता में टिके रहने का नाम ही पूर्ण समर्पण है. असंतुष्ट व्यक्ति श्रद्धा नहीं रख सकता. वह परम विश्रांति को भी उपलब्ध नहीं हो सकता. जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं, साक्षी को प्राप्त हुए चित्त पर उनकी कोई छाप नहीं पडती ! वह दर्पण की भांति सभी कुछ अपने ऊपर से गुजर जाने देता है. वह कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं ठहरने देता, सदा वर्तमान में ही रहता है. वास्तव में वह होता ही नहीं, जैसे एक वृक्ष है, वह होकर भी नहीं है. वैसे ही हम भी प्रकृति के साथ एक होकर जी सकते हैं. निर्भार, निर्द्वंद्व और पूर्ण आनंद में. श्रद्धा हृदय की वस्तु है, तर्क मस्तिष्क की उपज है. तर्क तनाव से  भर देता है, श्रद्धा प्रेम से भर देती है, जीवन को ऊंचा उठाती है ! 

Wednesday, April 22, 2015

सोचे सोच न होइए जो सोचे लख वार

 जनवरी २००९ 
परमात्मा से मिलन हृदय से ही होता है बुद्धि से नहीं. बुद्धि शब्दों में उलझी रहती है, शास्त्रों में उलझी रहती है, हृदय तो आतुर होता है. बुद्धि आत्मरक्षा का उपाय खोजती है, हृदय समर्पण है. बुद्धि संसार में कहीं पहुंचा सकती है पर परमात्मा के राज्य में ले जाने में वह समर्थ नहीं है. बुद्धि और हृदय में फासला अधिक नहीं है पर अपनी बुद्धि पर हम जरूरत से ज्यादा भरोसा करते हैं, उसे त्यागना नहीं चाहते, नहीं तो कब का परमात्मा को अपना बना चुके होते. संसार में हम तृप्ति का अनुभव नहीं करते फिर भी डरते हैं उस डगर पर जाने से. जिस क्षण बुद्धि चुप हो जाती है भीतर शांति छा जाती है. परमात्मा तब आमने–सामने होता है. एकांत में भक्त या साधक के पास परमात्मा के सिवा कोई दूसरा नहीं होता. भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाता है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्द्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो वह कहीं छिप जाता है. परमात्मा एकक्षत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई ठहर नहीं सकता. वह रसपूर्ण परमात्मा नित नूतन रस बरसाता है, वह अनंत है, अपार है !

Thursday, January 1, 2015

चलो आत्मलोक में जाएँ

अगस्त २००७ 
आत्म निरीक्षण करने से यह ज्ञात होता है कि जो कुछ हमें मिला है वह समपर्ण के कारण ही मिला है. गुरू अथवा परमात्मा को जब हम सच्चे हृदय से समर्पण करते हैं तब उनकी कृपा का अनुभव होता है. हमरे भीतर दृढ संकल्प जगे कि अगले वर्ष में आत्मा को और ज्यादा उजागर करना है, हमने अपने आप को परमात्मा का सच्चा वारिस बनाना है. मन को शुद्धतर तथा शुद्धतम करते जाना है, नहीं तो आत्मा हमारे पास होते हुए भी हम उससे दूर ही रह जायेंगे. भीतर एक ऐसा स्थान है जहाँ जाकर हमें चैन मिलता है तथा वह शांति व चैन बाहर भी झलकने लगता है. जो बाहर है वही भीतर है पर हम जब तक देह से ऊपर नहीं उठते हमने भिन्नता लगती है. मन, इन्द्रियों के पार जाने पर ही एकता का अनुभव होने लगता है. वहाँ दो नहीं हैं. वही हमारा असली धाम है, जो सच खंड है, सत्य लोक है. आज की भाषा में कहें तो जहाँ मस्ती है, चिल है.

Thursday, September 18, 2014

नित्य निरंतर जो बढ़ता है

मार्च २००७ 
दो तरह का प्रेम होता है एक साधक का, एक सिद्ध का. पहला हमें करना है दूसरा अपने आप होता है. हमारी साधना लौकिक है और यह दूसरा प्रेम दिव्य है, इसे पाने के लिए कीर्तन, स्मरण तथा श्रवण साधनों से भक्ति के द्वारा अंत करण की शुद्धि करनी होगी. तब अहंकार नही रहता, संसार की वस्तुओं की कामना नहीं भी रहती तथा हृदय की समता बनी रहती है, फिर वह दिव्य प्रेम स्वतः ही प्रकट होता है. ऐसा प्रेम जो कभी घटता नहीं, नित्य बढ़ता ही रहता है, ऐसा प्रेम जो दोष नहीं देखता, जो सदा एक के प्रति होते हुए भी सारी सृष्टि के लिए होता है.


Wednesday, July 23, 2014

अति मीठी है कथा प्रभु की

नवम्बर २००६ 
भगवद कथा हमारे मन में जाकर हमें हमारे स्वभाव की ओर लौटा ले जाती है. यह तारक है, रोम-रोम को रसपूर्ण कर देती है. आनंद की ऐसी वर्षा करती है कि हृदय भीतर तक भीग जाता है. भीतर जो आनन्द का सृजन करे वह कथा ही तो है, शब्दों के रूप में उसी की प्रतिमा है. कथा से हमें कितना कुछ मिलता है, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, रस, प्रेरणा और जीने को सही ढंग से जीने की कला भी भगवद कथा सिखाती है.