प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं, यह तो दिल में सम्भाल कर रखने जैसा क़ीमती रत्न है। प्रेम पूँजी है। प्रेम एक बीज की तरह है जिसे कोमल भावनाओं से सिंचित मन की भूमि चाहिए, जिसमें क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ के खर-पतवार न उगे हों। जहाँ भक्ति की शीतल पवन बहती हो और ज्ञान का सूरज भी अपनी किरणें बिखेरता हो। ऐसे मन में ही प्रेम का वृक्ष पनपता है जो स्वयं को और अपने इर्द गिर्द अन्यों को भी छाया देता है। हम प्रेम को पाकर इतराते हैं और उसे ही अभिमान में बदल देते हैं तो वह बीज सूखने लगता है। प्रेम ऐसा कोमल है जो भाषा की रुक्षता भी सह नहीं पाता, जो ओस की बूँद की तरह नाज़ुक है जो द्वेष की हल्की सी रेखा से भी मलिन हो जाता है। इस अनमोल वरदान को जो हमें जन्म से ही मिलता है, जगत की आपाधापी में गँवा न दें। मिथ्या कठोरता का आवरण ओढ़कर हम उसे बचाए रख सकते हैं, ऐसा हम सोचते हैं पर वह किसी के काम नहीं आएगा। पहले पश्चाताप के आंसुओं में उस आवरण को गलाना होगा,पत्थर जैसे हो गए हृदय को पिघलना होगा फिर उसमें अंकुर फूटेगा जो प्रेम की अनेक शाखा प्रशाखाओं को जन्म देगा जो हमें जीवन की धूप से बचाएँगी तथा औरों को भी विश्रांति देंगी।
Monday, June 27, 2022
Monday, April 18, 2022
प्राण ऊर्जा बहे अबाध जब
आयुर्वेद के अनुसार शरीर के सभी अंगों में प्राण-ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीस घण्टे होता है,पर हर समय एक सा प्रवाह नहीं होता. प्रायः जिस समय जो अंग सर्वाधिक सक्रिय हो उस समय उससे सम्बन्धित कार्य करने से हम उसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. प्रातः तीन बजे से पांच बजे तक फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक रहता है, इसी कारण ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने अथवा प्राणायाम आदि करने से शरीर स्वस्थ बनेगा. सुबह पांच बजे से सात बजे तक ऊर्जा बड़ी आंत में जाती है, जो व्यक्ति इस समय सोये रहते हैं व शौच क्रिया नहीं करते उन्हें कोई न कोई पेट का रोग हो सकता है. इस समय योगासन व व्यायाम करना चाहिए. सात से नौ बजे तक सर्वाधिक ऊर्जा आमाशय में रहती है इसलिए सुबह का नाश्ता जल्दी कर लेना चाहिए. नौ से ग्यारह बजे तक तिल्ली और पैंक्रियाज की सक्रियता का समय है, यदि दोपहर का भोजन ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद कर लें तो पाचन अच्छा हो सकता है. दिन में ग्यारह से एक बजे तक हृदय में विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है. हृदय हमारी संवेदनाओं, दया, करुणा तथा प्रेम का प्रतीक है, इस समय लेखन या रूचि का कोई काम अच्छा हो सकता है. दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक छोटी आंत में पोषण का कार्य होता है, इसलिए दोपहर का भोजन देर से नहीं करना चाहिए. शाम को पांच से सात बजे तक किडनी में ऊर्जा का प्रवाह होता है. शाम का भोजन सात बजे तक कर लेना चाहिए. सात से नौ बजे तक ऊर्जा मस्तिष्क में जाती है, यह समय अध्ययन के लिए उत्तम है. नौ से ग्यारह बजे तक रीढ़ की हड्डी में सर्वाधिक ऊर्जा होती है, यह समय सोने के लिए उत्तम है. रात्रि ग्यारह से एक बजे तक पित्ताशय में ऊर्जा प्रवाहित होने से मानसिक गति विधियों पर नियंत्रण होता है, इस समय जगे रहने से पित्त तथा नेत्र के रोग हो सकते हैं. रात्रि एक से तीन बजे तक लिवर में ऊर्जा का परवाह सर्वाधिक होता है, इस समय गहरी नींद आवश्यक है. लिवर से पुनः ऊर्जा फेफड़ों में चली जाती है और एक नए दिन का आरम्भ होता है.
Tuesday, December 15, 2020
सब कुछ भीतर बाहिर नाहीं
मानवीयता के सारे उपकरण जन्मजात मानव को मिले हैं, उसके भीतर ही हैं पर जैसे कोई अपना धन कहीं रखकर भूल जाये वैसे ही हम उन्हें भुला बैठे हैं. मानवीय भावनाएं प्रेम, आनंद, सुख, शांति, करुणा, पवित्रता, सत्विकता आदि खोजने तो जाना नहीं है, ये हरेक के भीतर हैं, नानक कहते हैं सबके भीतर वे हैं कोई घर इनसे खाली नहीं है. एक उंगली के सहारे ही हृदय की वीणा झंकृत हो सकती है. नन्हा बालक या बालिका जिन असीम सम्भावनाओं के साथ इस जग में आते हैं, जरा सा सहारा मिले तो वे खिल कर ऊपर आ सकती हैं। किन्तु आज के मानव के पास फुरसत ही नहीं है, वह अपनी ही धुन में चल जा रहा है। समय की निधि चुकती जाती है और जीवन संध्या निकट आ जाती है। संत कहते हैं हर देह में शक्ति के केंद्र हैं, जिन्हें योग और ध्यान से जगाया जा सकता है। मानसिक, दैहिक और आत्मिक शक्ति के द्वारा ही कोरोना जैसी आपदाओं का हम सामना कर सकते हैं।
Tuesday, September 22, 2020
दिल का जो रखेगा ध्यान
हम सुबह से शाम तक न जाने कितनी अच्छी बातें पढ़ते और सुनते हैं. व्हाट्सएप पर ही जीवन को सुंदर बनाने के लिए संदेश भेजते और प्राप्त करते हैं, किन्तु अपने में व आस-पास अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता. मन सूचनाओं को एकत्र कर लेता है और सोचता है उसे आवश्यक जानकारी हो गयी. इस तरह हमें जानने का अहंकार बढ़ जाता है पर भीतर का वातावरण वैसा ही रहता है. आज ही एक सन्देश पढ़ा, “हृदय एक ऐसी मशीन है जो बिना रुके जीवन भर चलती रहती है, इसे प्रसन्न रखें, यह चाहे अपना हो या दूसरों का”. हृदय प्रसन्न रहे इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम सहजता में रहें, सबके साथ सामंजस्य बना कर समझदारी से आगे बढ़ें. किसी भी प्रकार का दुराग्रह या दूसरों का विरोध हमारे हृदय पर असर डालने ही वाला है. हृदय की गहराई में प्रेम और सहृदयता की जो भावनाएं सुप्त हैं, उन्हें जगाएं तो अन्यों के हृदयों को भी सहज ही प्रसन्न रख सकेंगे.