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Tuesday, January 16, 2024

श्रद्धावान लभते ज्ञानम

संत कहते हैं, मन में श्रद्धा स्थायी हो जाये तो आनंद स्वभाव में बस जाता है.  मीरा के पैरों में ही घुंघरू नहीं बंधे थे, उसके दिल के भीतर भी बजे थे। सागर की गहराई में एक ऐसी दुनिया है जहाँ सौंदर्य बिखरा हुआ है, हमें उस पर यक़ीन नहीं होता। आश्चर्य की बात है कि इतने संतों और सद्गुरुओं रूपी गोताखोरों को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उसकी तलाश में भीतर जाता है, जबकि भीतर जाना अपने हाथ में है, अपने ही को तो देखना है, अपने को ही तो बेधना है परत दर परत जो हमने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. हम नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो सदा सहजता ही है। हम सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर सन्त कहते हैं भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है हमें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है एक साथ दो मार्गों पर हम चल नहीं सकते. बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग भीतर का मार्ग है, समर्पण का मार्ग, स्वयं हो जाने का मार्ग !  


Monday, June 8, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

नारद भक्ति सूत्रों के अनुसार पराशर मुनि कहते हैं, पूजा में अनुराग होना ही भक्ति है. शांडिल्य के अनुसार किसी भी प्रकार के  विरोध के बिना अपने भीतर स्थित हो जाना ही भक्ति है. भीतर द्वंद्व हो तो भक्ति संभव नहीं है. एक अन्य आचार्य के अनुसार आत्मा में जब रति होती है तो भीतर जो मस्ती होती है वह भक्ति है. नारद के अनुसार सभी आचरणों को उसे समर्पित कर देना ही भक्ति है. दूसरे के व्यवहार को लेकर उन्हें समझाना भी हो तो भीतर क्रोध या ग्लानि नहीं होनी चाहिए. स्वयं के दोष देखकर भी आत्मग्लानि न हो तभी भक्ति टिक सकती है. कर्म करने से पहले विश्राम तथा कार्य करने के बाद समर्पण कर देना चाहिए. अच्छा करने का अभिमान  होता है, इसलिए सभी कुछ समर्पण कर देना चाहिए. हम जब भी व्याकुल होते हैं तो जान लेना चाहिए कि हम उसे भूल गए. प्रेम और आदर जहाँ  दोनों हों वहीं भक्ति पनपती है. स्वयं के प्रति या अन्य के प्रति आदर न हो तो प्रेम धीरे-धीरे सूख जाता है, व्यक्ति के भीतर आत्मग्लानि का जन्म होता है. प्रेम एक ऊर्जा है, आत्मसम्मान से भरा व्यक्ति ही सम्मान करना जानता है. सम्मान पाने की लालसा जब तक भीतर है प्रेम का प्रस्फुरण नहीं होता. जहाँ दिखावा है वहाँ निकटता द्वेष को जन्म देती है. प्रेम देने की कला है, पूर्णरूप से निछावर होना भक्ति का लक्षण है. 

Tuesday, July 2, 2019

एक यात्रा है अनंत की



भगवद् गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का उपदेश देते हैं. अभ्यास समर्पण का और वैराग्य सांसारिक सुखों से. हमारा समर्पण बार-बार खंडित हो जाता है, और जगत से वैराग्य भी नहीं सधता. जरा सी प्रतिकूलता आते ही भीतर संदेह भर जाता है, अल्प सुख के लिए हम जगत के पीछे निकल पड़ते हैं. गुरु कहते हैं, हजार बार भी टूटे फिर भी समर्पण किये बिना अंतर की शांति को अनुभव नहीं किया जा सकता. इसी तरह एक दिन साधक सुख के पीछे जाना छोड़ देता है क्योंकि उसका सुख बार-बार दुःख में बदल गया है. वह असत्य की राह भी त्यागता है क्योंकि उस पथ पर कांटे ही कांटे मिले. अनुभवों से सीखकर ही हम आगे बढ़ते हैं. साधना का पथ एक अंतहीन यात्रा पर हमें ले जाता है. परमात्मा अनंत है, हमारे सारे प्रयास अल्प हैं, किंतु संतों का जीवन देखकर भीतर भरोसा जगता है, वे भी इसी तरह पग-पग चल कर ही इस अनंत शांति और आनंद  के भागी हुए हैं.

Friday, January 12, 2018

देवों का आशीष सदा है

१२ जनवरी २०१८
संत कहते हैं, जैसे कोई सिंह शावक बाल्यावस्था में भेड़ों के मध्य चला गया हो और स्वयं को भेड़ ही मानता रहे, वैसे ही मानव देव होने की क्षमता रखते हुए भी असुरों के मध्य चला जाता है और स्वयं को असुर मानने लगता है. देव होने का अर्थ है स्वयं को परमशक्ति के प्रति समर्पित मानना, सदा देने की भावदशा में रहना, आनंद और शांति के साथ सबके सुख की कामना करते हुए जीना. असुर स्वयं को असुरक्षित मानता है, फिर भी समर्पण नहीं करता. उसे अपने लिए ही कम पड़ता है, देने का ख्याल कहाँ से आएगा और स्वार्थपूर्ति के लिए वह अन्यों को दुःख भी पहुँचा सकता है. मानव यदि देवत्व को जगाने की कामना करता है तो सारी देव शक्तियाँ उसकी सहायता के लिए आ खड़ी होती हैं. आसुरी भाव में जीने वाला व्यक्ति आसुरी शक्तियों के प्रभाव में और भी दुर्बल हो जाता है.

Tuesday, April 28, 2015

दर्पण सा जब मन हो जाये

जनवरी २००९ 
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ अदृश्य के प्रति विश्वास ही श्रद्धा है, जो हम जानते हैं वह बहुत थोड़ा है उससे जो हम नहीं जानते. उस अव्यक्त का हमारे जीवन पर असीम प्रभाव पड़ता है. श्रद्धा का अर्थ है पूर्ण समर्पण, जो कुछ भी हमारे साथ हो चुका है, हो रहा है, अथवा भविष्य में घटने वाला है, सभी को पूर्ण स्वीकार करते हुए साक्षी भाव में, समता में टिके रहने का नाम ही पूर्ण समर्पण है. असंतुष्ट व्यक्ति श्रद्धा नहीं रख सकता. वह परम विश्रांति को भी उपलब्ध नहीं हो सकता. जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं, साक्षी को प्राप्त हुए चित्त पर उनकी कोई छाप नहीं पडती ! वह दर्पण की भांति सभी कुछ अपने ऊपर से गुजर जाने देता है. वह कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं ठहरने देता, सदा वर्तमान में ही रहता है. वास्तव में वह होता ही नहीं, जैसे एक वृक्ष है, वह होकर भी नहीं है. वैसे ही हम भी प्रकृति के साथ एक होकर जी सकते हैं. निर्भार, निर्द्वंद्व और पूर्ण आनंद में. श्रद्धा हृदय की वस्तु है, तर्क मस्तिष्क की उपज है. तर्क तनाव से  भर देता है, श्रद्धा प्रेम से भर देती है, जीवन को ऊंचा उठाती है ! 

Monday, January 5, 2015

मिटकर ही जीवन खिलता है

अगस्त २००७ 
मैं निर्गुणिया गुण नहीं जाना
एक धनी के हाथ बिकाना
मैं कायर मेरा सद्गुरु सूरा
मैं ओछा मेरा सद्गुरु पूरा
मैं मूरख सद्गुरु सयाना
एक धनी के हाथ बिकाना

जब तक साधक अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो हजार गुना होकर वापस आता है. समर्पण इसी को कहते हैं, जो वह करवाए वही करना. जो वह चाहे उसी में हाँ मिलानी ही सच्चा समर्पण है. सद्गुरु को जब साधक समर्पित हो जाते हैं तो जीवन से सारा विषाद चला जाता है. इसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! नया दृष्टिकोण, नई विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसे भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है ! 

Monday, May 26, 2014

तेरी शरण में आये हैं हम

मार्च 2006
प्रार्थना में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं, कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.

Monday, January 6, 2014

एक वही पाने योग्य है

जून २००५ 
शास्त्रों में लिखा है सूर्य नाड़ी चलती हो तब भोजन करें तो शीघ्र पचता है और पेय पदार्थ तब लें जब चन्द्र नाड़ी चलती हो. जगत का सार शरीर है, शरीर का सार इन्द्रियां हैं, इन्द्रियों का सार मन है, मन का सार प्राण है, प्राण का सार आत्मा है. सन्त जन सचेत करते हैं और व्यर्थ के कार्य-कलापों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने से रोकते हैं, जो उस आत्मा की प्राप्ति में सहायक हो उसे ही करना है, अन्यथा जो सहज कर्त्तव्य रूप में सामने आता जाये. जब तक संसार से सुख पाने की वांछा बनी रहेगी, तब तक पूर्ण सत्य का पता नहीं चलेगा. कृष्ण ने कहा है जिस भाव से कोई मुझे भजता है मै उसी भाव से उससे मिलता हूँ. यदि समपर्ण पूर्ण नहीं है तो अनुभव भी पूर्ण नहीं होगा. 

Wednesday, June 6, 2012

लगन लगायी जिसने उससे


अप्रैल २००३ 
हमारे जीवन में प्रेम नित नवीन होता रहे, निरंतर उसमें वृद्धि हो, उसकी बन्दगी भी हम बढाते रहें, समर्पण को द्विगुणित करते चलें तो जीवन में अन्य कोई रह ही नहीं सकता सिवाय उस एक राम के जो रोम-रोम में बसता है. उस कृष्ण के जो हर क्षण हमें अपनी ओर आकर्षित करता है, उस जगन्माता के जो हमारा पोषण करती है, उस शिव के जो सदा हमारा कल्याण करता है, उस गणपति के जो हमारे जीवन से विघ्न-बाधाओं को हटाता है, और जब हमारा हृदय उस परमब्रह्म का घर हो जाता है तो हृदय से सारे चोर निकलते लगते हैं, मुक्ति का आनंद ही हमें भक्ति करने को प्रेरित करता  है. हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं और अपनी आत्मा की झलक पाकर विस्मित भी हो जाते हैं, परम की सुंदरता अपरिमेय है, हमारा अंतर्मन भगवद्शक्ति का आश्रय लेकर सहज प्राप्त कर्त्तव्य निभाता है, कर्मों के बंधन नहीं बाँधते, पुराने संस्कार नष्ट हुए लगते है. शांति का एक आवरण हमारे चारों ओर छाने लगता है, जिसको भेद कर संसार का कोई दुःख हमें छू नहीं सकता उस परम प्रिय का प्रेम एक कवच बन कर हमारे साथ रहता है.  


Saturday, December 10, 2011

सहज आनंद


जुलाई २००२ 
परमात्मा सब कारणों का कारण है, यह बात जब हमें पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है तभी पूर्ण समर्पण संभव है. और तब हमारी कोई निजी इच्छा नहीं रह जाती. हमारे निज का सुख-दुःख, राग-द्वेष अर्थात पसंद-नापसंद का कोई महत्व नहीं रह जाता. हम उसी की इच्छा को सर्वोपरि मानते हैं, और उसकी इच्छा क्या है इसका पता भी वही हमें बताता है, कोई भी ऐसा कार्य जिससे हमारे सहज सुख, स्वाभाविकता में अंतर आये वह उसके विपरीत है. अपने सहज आनंद में रहते हुए हम उसके साथ रहते हैं. जब भी हम अपनी इच्छा पूर्ति में लग जाते हैं नीचे के स्तर पर आ जाते हैं और इसी से क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार बन जाते हैं. तो जीवन मुक्ति का अर्थ हुआ कामनाओं से मुक्ति, जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे कोई दुःख नहीं दे सकता, मान की इच्छा, सुख की इच्छा, स्नेह पाने की इच्छा में यदि अवरोध आये तो क्रोध का जन्म होता है. ईश्वर को यदि हृदय में बसाना है तो मन को शुद्ध सत्व में रखना ही होगा. निरंतर परमात्मा से जुड़े रहकर हम उसी के स्तर पर जीते हैं, जहाँ कोई भय नहीं, भय भी कामना से ही होता है. द्वन्द्वातीत और गुणातीत होना है तो मूल से जुडना होगा. शेष वह स्वयं ही कर लेता है.