नारद भक्ति सूत्रों के अनुसार पराशर मुनि कहते हैं, पूजा में अनुराग होना ही भक्ति है. शांडिल्य के अनुसार किसी भी प्रकार के विरोध के बिना अपने भीतर स्थित हो जाना ही भक्ति है. भीतर द्वंद्व हो तो भक्ति संभव नहीं है. एक अन्य आचार्य के अनुसार आत्मा में जब रति होती है तो भीतर जो मस्ती होती है वह भक्ति है. नारद के अनुसार सभी आचरणों को उसे समर्पित कर देना ही भक्ति है. दूसरे के व्यवहार को लेकर उन्हें समझाना भी हो तो भीतर क्रोध या ग्लानि नहीं होनी चाहिए. स्वयं के दोष देखकर भी आत्मग्लानि न हो तभी भक्ति टिक सकती है. कर्म करने से पहले विश्राम तथा कार्य करने के बाद समर्पण कर देना चाहिए. अच्छा करने का अभिमान होता है, इसलिए सभी कुछ समर्पण कर देना चाहिए. हम जब भी व्याकुल होते हैं तो जान लेना चाहिए कि हम उसे भूल गए. प्रेम और आदर जहाँ दोनों हों वहीं भक्ति पनपती है. स्वयं के प्रति या अन्य के प्रति आदर न हो तो प्रेम धीरे-धीरे सूख जाता है, व्यक्ति के भीतर आत्मग्लानि का जन्म होता है. प्रेम एक ऊर्जा है, आत्मसम्मान से भरा व्यक्ति ही सम्मान करना जानता है. सम्मान पाने की लालसा जब तक भीतर है प्रेम का प्रस्फुरण नहीं होता. जहाँ दिखावा है वहाँ निकटता द्वेष को जन्म देती है. प्रेम देने की कला है, पूर्णरूप से निछावर होना भक्ति का लक्षण है.
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Monday, June 8, 2020
Friday, July 6, 2018
देना जिसने सीख लिया है
६ जुलाई २०१८
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः! इस छोटे से सूत्र में कितनी गहरी सच्चाई छुपी है. बादल जल
का ग्रहण करते हैं फिर त्याग देते हैं, धरती बीजों को धारण करती है फिर हजार गुना
करके लौटा देती है. सूर्य तो लाखों वर्षों से प्रकाश का दान कर ही रहा है. पुष्प
बाँट रहे हैं, मधु लेकर जाती हुई मधुमक्खी पुनः उसे लौटा देती है. प्रकृति में सभी
त्याग भाव से ही भोग कर रहे हैं. पहले मानव भी इसी रीति को अपनाता था, अन्न दान,
वस्त्र दान, ज्ञान दान तथा अन्य प्रकार के दान जीवन का एक सहज अंग थे. पहली रोटी गाय
की, दूसरी कुते की, तीसरी चिड़िया की और फिर अपने लिए. जब देने का भाव भीतर जगता है
देवत्व भी साथ-साथ ही पल्लवित होता है, आत्मा का सहज स्वभाव है प्रसन्नता को
बांटना, बांटने से ही वह बढ़ती है. अहंकार सब कुछ खुद के लिए संभाल कर रखना चाहता
है, इसलिए दुखी होता है. किसी संत कवि ने कितना सही कहा है, ‘जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम, दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम’.
Thursday, October 29, 2015
सुख का सागर लहराता है
ऐसे तो हर
कोई सुख की खोज में लगा है पर जो सचेतन होकर सुख की तलाश में निकलता है वह एक दिन
स्वयं को सुख के सागर में पाता है. सुख की तलाश जब सजग होकर की जाती है तो उसका
पता पूछना होगा, जो भी ऐसे कारण हैं जो सुख को दूर करते हैं उन्हें मिटाना होगा.
सजगता ही वह सूत्र है जो किसी को भी मंजिल तक पहुंचा सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण
है कि सुख को बनाना नहीं है वह तो मौजूद है, अनंत मात्रा में मौजूद है, जरूरत है
उसका पता पूछकर उस दिशा में कदम बढ़ाने की.
Wednesday, May 14, 2014
मित्र वही जो बने सहायक
मार्च २००६
जीवन
में कोई एक मंत्र हो, एक मित्र हो और एक सूत्र हो जो हमारी रक्षा करे. मंत्र, मित्र
तथा सूत्र तीनों एक भी हो सकते हैं, एक ही सद्गुरु में समा सकते हैं जो हमारी
रक्षा करता है. आत्मा भी एक मंत्र है, मित्र भी वह है, और सूत्र तो वह है ही. जो
आत्मा में वास करता है सदा उसकी रक्षा होती है. ईश्वर भी हमारा मित्र है, उसका नाम
मंत्र है, उसका ‘ध्यान’ ही सूत्र है. हमारा नेत्र भी मंत्र, मित्र तथा सूत्र हो
सकता है. हमारी दृष्टि जितनी पवित्र होगी उतनी ही हमारी रक्षा होती रहेगी.
दृष्टिकोण सकारात्मक हो, भाव उच्च हों तो हमारा अनिष्ट कैसे हो सकता है. हमारी
दृष्टि जब धूमिल हो जाती है, चीजों को हम उनके सही रूप में नहीं देखते तभी हमारा
अंतःकरण मलिन होता है. मूल रूप में सब पवित्र है. हमारा जीवन आनंद के लिए है,
प्रभु को प्रेम करते करते त्याग करते हुए ग्रहण करने के लिए है न कि संसार के पीछे
भागकर दुखी होके जीने के लिए.
Sunday, October 13, 2013
मौन हुआ जब मन का पंछी
“मने
मने थाके” अर्थात please keep quite कितना सुंदर सूत्र है यह, पर हमसे बिना बोले
नहीं रहा जाता. हमारी ऊर्जा सबसे अधिक बोलने में ही खर्च होती है. हम बेवजह बोलते
हैं, बढ़ा -चढ़ा कर बोलते हैं, कुछ का कुछ बनाकर बोलते हैं तथा अपने अहंकार को पोषने
के लिए बोलते हैं. हम ज्यादातर समय सुने हुए को दोहराते हैं अथवा तो बोले हुए को
भी दोबारा बोलते हैं. वाणी का यदि सदुपयोग हो तो हमारे वचनों में जान आ जाये, बल आ
जाये, सत्य का बल. चुप रहने में ही सबसे बड़ा सुख है, कम बोलने वाला कभी मुसीबत में
नहीं फंसता. संतजन भी कहते हैं, जब भीतर ईश्वरीय प्रेम की महक भरी हो तो उसे भीतर
ही भीतर जज्ब होने दो, जैसे इत्र का ढक्कन धीरे से खोला जाता है फिर बंद कर दिया
जाता है. वैसे ही मुंह का ढक्कन जब जरूरी हो तभी खोलना चाहिए, वरना सारी महक उड़
जाएगी तथा संसार की गंध उसमें भर जाएगी. साधक को विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है.
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