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Friday, July 6, 2018

देना जिसने सीख लिया है


६ जुलाई २०१८ 
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः! इस छोटे से सूत्र में कितनी गहरी सच्चाई छुपी है. बादल जल का ग्रहण करते हैं फिर त्याग देते हैं, धरती बीजों को धारण करती है फिर हजार गुना करके लौटा देती है. सूर्य तो लाखों वर्षों से प्रकाश का दान कर ही रहा है. पुष्प बाँट रहे हैं, मधु लेकर जाती हुई मधुमक्खी पुनः उसे लौटा देती है. प्रकृति में सभी त्याग भाव से ही भोग कर रहे हैं. पहले मानव भी इसी रीति को अपनाता था, अन्न दान, वस्त्र दान, ज्ञान दान तथा अन्य प्रकार के दान जीवन का एक सहज अंग थे. पहली रोटी गाय की, दूसरी कुते की, तीसरी चिड़िया की और फिर अपने लिए. जब देने का भाव भीतर जगता है देवत्व भी साथ-साथ ही पल्लवित होता है, आत्मा का सहज स्वभाव है प्रसन्नता को बांटना, बांटने से ही वह बढ़ती है. अहंकार सब कुछ खुद के लिए संभाल कर रखना चाहता है, इसलिए दुखी होता है. किसी संत कवि ने कितना सही कहा है, ‘जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम, दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम’.

Thursday, June 29, 2017

ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत

२९ जून २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है, उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा. 

Thursday, March 12, 2015

समरसता हो भीतर बाहर

मई २००८ 
त्याग पर भोग हावी होता रहा तो पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना बहुत कठिन होगा. अनावश्यक भोग भी न हो तथा अनावश्यक कर्म भी न हों, कहीं तो हमें विकास के लिए भी सीमा रेखा खींचनी होगी. जीने का सीधा सरल रास्ता हमें ढूँढ़ निकलना होगा, ऐसा रास्ता जो हमें कल्याण की ओर ले जाये. वह परम सुख ही हमारी मंजिल है. आज हम सब होने के बावजूद हम प्रेम से वंचित रह जाते हैं. प्रेम बाँटने में कंजूसी करते हैं और प्रेम स्वीकारने में भी झिझकते हैं. वास्तव में अहंकार कुछ है ही नहीं, प्रेम का अभाव ही अहंकार है और प्रेम का कभी अभाव होता ही नहीं. जैसे ही हम सजग होते हैं, दूरी मिट जाती है. वातावरण में एक समरसता भर जाती है. सारा जगत तब अपना लगता है, वस्तुओं को भी उपभोग करना छोड़कर उनका उपयोग करना सीखते हैं.  

Monday, August 5, 2013

तृष्णा मिटे से कृष्णा मिले रे

दिसम्बर २००४ 
संयम और त्याग साधना के आवश्यक अंग हैं. संयम का मुल्यांकन हमें सारे दुखों से मुक्त करता है, इच्छाशक्ति अपरिमेय है, एक को पूरा करें तो दूसरी तैयार मिलती है. इनकी पूर्ति में ही समय, धन, परिश्रम चला जाता है. वह आनन्द जो हमें इच्छा पूर्ति से मिलता है क्षणिक होता है, जबकि हम आनन्द के आगार हैं. आनन्द की प्राप्ति के लिए हम संसार सजाते हैं पर अधूरे रह जाते हैं, हर इच्छा पूर्ण होने के बाद हमें और अतृप्त कर जाती है, क्यों कि उसका संस्कार बन जाता है जो बार-बार उस अनुभव की ओर खींचता है, हम दासता का जीवन जीते हैं. जब तक खुद को नहीं जाना तभी तक यह तलाश है, स्वयं के भीतर शांति का अनुभव होते ही सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, फिर जो सहज रूप से प्राप्त हुआ अथवा नैसर्गिक इच्छाएं ही रह जाती हैं, और उनकी पूर्ति अपने आप ही होने लगती है. जब हम स्वयं इच्छाओं को उठाते नहीं और उठ जाएँ तो उन्हें समर्पित करते जाते हैं, तो जो जरूरी है उसकी व्यवस्था प्रकृति अपने आप कर देती है. हम कितने ही धनी हों पर भीतर की तृप्ति का अहसास जब तक नहीं होता तब तक कृपण ही कहलायेंगे. पूर्ण मुक्ति का अनुभव तभी होगा जब मन में किसी तरह का आग्रह न रहे, यह अवस्था सत्संग व साधना से ही आ सकती है.