संत व शास्त्र कहते हैं कि व्यायाम व भोजन की तरह दैनिक जीवन में ध्यान के जुड़ने से हमारे भीतर चैतन्य की एक ऐसी अवस्था का भान होता है जिसे ब्रह्मांडीय चेतना कहा जाता है। इस अवस्था में साधक सम्पूर्ण ब्रह्मांड को स्वयं के भाग के रूप में मानता है। जब हम जगत को अपने अंश के रूप में देखते हैं, तो जगत और हमारे मध्य कोई भेद नहीं रह जाता, हवा, सूरज, जल, आदि पंच तत्व हमें अपने अंश की रूप में सहायक प्रतीत होते हैं। अंतर का प्रेम जगत के प्रति दृढ़ता से बहता हुआ प्रतीत होता है। यह प्रेम हमें विरोधी ताकतों और हमारे जीवन की परेशानियों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है। क्रोध, चिंता और निराशा क्षणिक व विलीन हो जाने वाली क्षणभंगुर भावनाएँ बन जाती हैं और हीन अपने भीतर मुक्ति की पहली झलक मिलती है।
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Saturday, February 25, 2023
Thursday, June 29, 2017
ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत
२९ जून २०१७
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है,
उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी
के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते
हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान
बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति
वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक
अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर
बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा.
Monday, March 20, 2017
कौन यहाँ किसकी खातिर है
२० मार्च २०१७
हमने कितनी बार ये शब्द सुने हैं - 'कोई जीने के लिए आहार लेता है कोई खाने के लिए ही जीता है'. इसी तरह कोई कहता है आत्मा देह के लिए है और कोई कह सकता है देह आत्मा के लिए है. यदि हम यह मानते हैं कि भोजन देह धारण के लिए है तो हमारा भोजन संतुलित होगा, देह को आलस्य से नहीं भरेगा, स्वस्थ रखने में सहायक होगा. यदि हम भोजन के लिए ही जीते हैं तो सारा ध्यान भोजन के स्वाद पर होगा, आवश्यकता से अधिक भी खाया जा सकता है. इसी तरह यदि हम यह मानते हैं देह आत्मा के लिए है तो हम आत्मा को पुष्ट करने वाले सात्विकआहार ही देह को देंगे, आहार में पाँचों इन्द्रियों से ग्रहण करने वाले सभी विषयों को लिया जा सकता है. अर्थात देखना, सुनना, खाना, सूँघना, स्पर्श करना सभी आत्मा का हित करने वाले होंगे. दूसरी ओर जब आत्मा को देह के लिए मानते हैं तो मन व इन्द्रियों को तुष्ट करना ही एकमात्र ध्येय रह जाता है. आत्मा की सारी ऊर्जा देह को सुखी करने में ही लगती रहती है और हम आत्मा के सहज गुणों को अनुभव ही नहीं कर पाते,
Thursday, March 13, 2014
मधुर अति है सन्त की बानी
अक्तूबर २००५
भोजन
के समय, भजन के समय, प्रातः काल उठते समय, रात को सोते समय तथा घर से निकलते समय
कभी क्रोध नहीं करना चाहिए. आज ये बातें सन्त मुख से सुनीं. सारे भेद भावों से ऊपर
उठे हुए सद्गुरु की यही तो निशानी है, उसकी नजर आत्मा पर होती है, वह एक को ही
देखता है, भेद-भाव तो हम करते हैं. हमारी दृष्टि भी यदि गुण ग्राहक हो जाये तो एक
ही क्षण भी न लगे हमें तरने में. ऊपरी भेद तो मिथ्या हैं, सभी के भीतर एक ही
परमात्मा आसीन है, हमें उसी पर दृष्टि रखनी है. अपने भीतर भी उसी शुद्ध चेतना के
दर्शन करने हैं.
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