किसी भी वस्तु को ठीक से देखने के लिए एक समुचित दूरी पर रखना होता है. आँख के बहुत नजदीक रखी वस्तु भी नजर नहीं आती और बहुत दूर रखी वस्तु भी. जीवन भी कुछ ऐसा ही है जब हम उसमें इतना घुस जाते हैं तब चीजें धुंधली होने लगती हैं और जब उससे दूर निकल जाते हैं तब वह हमारे हाथ से फिसलता हुआ नजर आता है. कभी अतीत के स्वप्न हमें वर्तमान से दूर ले जाते हैं तो कभी भविष्य की व्यर्थ आशंका हमारी ऊर्जा को बहा ले जाती है. ध्यान ही हमारे भीतर वह दृष्टि पैदा करता है जिससे जीवन जैसा है वैसा नजर आता है. वर्तमान के क्षण में जब मन टिकना सीख जाता है तभी वह अस्तित्त्व से प्राप्त अपार क्षमता को देख पाता है. यह ऐसा ही है जैसे कोई आँखें बंद करके कमरे से बाहर निकलने का प्रयास करे और दरवाजे के निकट आते ही अपना मुख मोड़ ले और विपरीत दिशा में चलने लगे. यदि ऐसा हर बार होने लगे तो वह यह निर्णय कर लेगा इस कमरे में दरवाजा है ही नहीं. ऐसा व्यक्ति जीवन के मर्म से वंचित ही रह जाता है.
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Tuesday, July 21, 2020
Tuesday, June 11, 2019
सृष्टि स्वयं से निर्मित होती
हम सबने सुना है, 'जैसी
दृष्टि वैसी सृष्टि' इसका एक अर्थ तो यह है कि जगत को हम जिस नजरिये से देखते हैं,
जगत हमें वैसा ही नजर आता है. यदि एक डाक्टर की नजर से देखें तो लोग रोगी या निरोगी दिखेंगे. अध्यापक की नजर से
बुद्धू या होशियार. संत की नजर से देखें तो उसे सभी परमात्मा स्वरूप ही दिखेंगे.
धन की दृष्टि से देखें तो अमीर या गरीब. कवि या गायक की दृष्टि से देखें तो उसे हर
कहीं श्रोता ही नजर आयेंगे. लेकिन इस बात का एक और अर्थ भी है, हम स्वयं को और जगत
को जैसा देखना चाहते हैं, अपने इर्द-गिर्द का वातावरण जैसा देखना चाहते हैं, वैसा
ही दृष्टिकोण हमें अपनाना होगा. अपने विचारों और भावों का सृजन उसके अनुकूल ही
करना होगा. यह सूक्ति हमें पूर्णरूप से आत्मनिर्भर होना सिखाती है. इसके अनुसार हर
कोई जहाँ विचरता है, उस सृष्टि का निर्माण स्वयं ही करता है. एक ही बगीचे में
भिन्न-भिन्न लोग भिन्न उद्देश्यों के लिए आते हैं. वहाँ के सौन्दर्य का दर्शन भी
वे अपनी क्षमता के अनुसार ही करते हैं. परमात्मा की कैसी अद्भुत महिमा है, वह किसी
के लिए बाल-गोपाल बन जाता है, तो किसी का पिता, माता भी वही है और मित्र भी. एक
तरह से यह जगत उस परमात्मा की निरंतर चलती हुई कथा ही तो है. इसीलिए तो कवि कहते
हैं, हरि अनंत, हरि कथा अनंता..
Friday, January 11, 2019
नये वर्ष में खुद को जानें
११ जनवरी २०१९
कहने को नया वर्ष आया
है, पर गहराई से देखें तो जीवन हर क्षण नया है. हर सुबह पहले से अलग, हर रात्रि
पूर्व से भिन्न. नेत्रों के सामने यहाँ दृश्य निरंतर बदल रहे हैं, पंछियों के सुर
भोर में अलग होते हैं और दोपहरी में कुछ और. संत कहते हैं, दृश्य को देखने वाला
कभी नहीं बदलता, उसी द्रष्टा में ठहरना सीख लिया तो जगत की धूप-छाँव प्रभावित नहीं
करेगी, दोनों में मन एकरस रह सकता है. वह द्रष्टा कहाँ है, कौन है, उस तक कैसे
पहुंचा जा सकता है, इसे जानना ही साधना का लक्ष्य है. हम मन व बुद्धि से ही जगत को
देखते हैं. मन पूर्व धारणाओं का समूह है और बुद्धि आजतक प्राप्त हुए ज्ञान का. यदि
उसी चश्मे से जगत को देखा तो हम उसके वास्तविक रूप को कभी जान ही नहीं सकते. आश्चर्य
तो इस बात का है कि असल में हम ही द्रष्टा हैं, पर इस बात को भुला बैठे हैं. स्वयं
को जाने बिना जगत को जाना भी कैसे जा सकता है. जितनी बार भी इस बात को दोहराया
जाये कम है. मंजिल तक पहुँचने से पहले तो खुद को याद दिलाते ही रहना है.
Tuesday, August 22, 2017
जब जीवन से परिचय होगा
२२ अगस्त २०१७
जीवन की कितनी ही परिभाषाएं कितने ही व्यक्तियों ने गढ़ी हैं लेकिन जीवन इनसे कहीं
अधिक विराट है, वह कभी भी पूरा-पूरा इनमें नहीं समाता. हमारे ऋषियों ने जिस जीवन
को जानने व पाने की प्रार्थना की है, वह अनंत है, असीम है और आनंद से भरा हुआ है.
उस विशालता को महसूस करने के लिए उतना ही बड़ा दिल भी चाहिए, एक नया दृष्टिकोण भी
चाहिए और साथ ही एक गहन आत्मीयता की भावना भी. यदि कोई एक प्रेमी की दृष्टि से इस
सृष्टि को निहारता है तो वह धीरे से अपना घूँघट सरका देती है, रहस्य की एक परत
खुलती है. यह सही है कि हजार परतें अब भी शेष हैं किन्तु जीवन के साथ एक नया संबंध
बनने लगता है, जिसमें कोई भय नहीं है, कोई कामना भी नहीं है, यह केवल साथ होने का
संबंध है. इसमें हर क्षण एक नयेपन की अनुभूति होती है क्योंकि सृष्टि पल-पल बदल
रही है.
Saturday, July 15, 2017
आयेगी जब समता मन में
१६ जुलाई २०१७
‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि’ ये शब्द हम सभी ने न जाने कितनी बार सुने हैं. जब कोई
व्यक्ति हमारे दृष्टिकोण को समझ नहीं पाता, हम अपने को समझा लेते हैं कि उनके पास
वह दृष्टि ही नहीं है जो हमारी बात को समझ सकें. किन्तु इस बोध वाक्य का अर्थ बहुत
गहरा है. यह जगत हमें वैसा दिखाई देता है जैसा हमारा मन होता है. यदि मन उदास है,
नकारात्मक है तो जगत के प्रति शिकायतों से भर जायेगा. शिकायती मन और भी ज्यादा
उदासी से भर जायेगा, क्योंकि परिवर्तन के लिए ऊर्जा शक्ति चाहिए, नकारात्मक भाव
ऊर्जा का हरण शीघ्र कर लेते हैं. यदि प्राण शक्ति बढ़ी हुई है, मन प्रफ्फुलित है तो
जगत सुंदर दिखाई देगा. इस स्थिति में भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकेगा, क्योंकि जब सब कुछ ठीक है तो कैसा परिवर्तन. मन
यदि समता में स्थित है, तब वह जैसा है वैसा ही दिखाई पड़ेगा. जहाँ आवश्यक है परिवर्तन
तब सहज ही होगा, जीवन एक ऊपर की ओर ले जाने वाली यात्रा बन जायेगा.
Thursday, March 30, 2017
तू छुप न सकेगा परमात्मा !
३० मार्च २०१७
आज आकाश ढका है बादलों से, पर बादलों के पार भी जो झांक सकता है, उसके लिए नीला शुभ्र आकाश उतना ही सत्य है जितना यह बदली भरा आकाश, बल्कि इससे भी अधिक सत्य क्योंकि यह बादल तो आज नहीं कल बरस कर रीते हो जायेंगे. इसी तरह जो देह के पीछे छिपे चिन्मय तत्व को देख सकता है उसके लिए देह का रहना या न रहना अर्थहीन हो जाता है, क्योंकि जो सदा है वह उसकी दृष्टि से कभी ओझल ही नहीं होता, जगत का कार्य-व्यवहार उसे क्रीड़ा मात्र ही प्रतीत होता है, और उसके पीछे छिपा निरंजन ही सत्य जान पड़ता है. बादल कितने भी घने हों एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे, इसी तरह भीतर का चैतन्य मन की धारणाओं, वासनाओं और कामनाओं से कितना भी क्यों न छिप गया हो, कभी मिटता नहीं. इस सत्य को स्वीकार करके उसे अपना अनुभव बनाना ही साधक का लक्ष्य है.
Sunday, March 26, 2017
जग जैसा वैसा दिख जाये
२७ मार्च २०१७
जीवन के प्रति हमारा जैसा भाव होगा जीवन उसी रूप में हमें
मिलता है. किसी ने कितना सत्य कहा है “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि”. हमारी धारणाएं व मान्यताएं
ही जीवन में मिलने वाले अनुभवों को परखने का मापदंड बनती हैं. जिस क्षण हमारा मन
किसी भी धारणा से मुक्त होता है जीवन अपने शुद्ध रूप में नजर आता है. सृष्टि की
भव्यता, दिव्यता और विशालता से हमारा परिचय होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर उस
सम्भावना को छिपाए है जो उसे स्वयं के निर्भ्रांत स्वरूप से मिला सकती है. हम अपनी
ही मान्यताओं के कारण जगत को बंधन बनाकर बंधे-बंधे अनुभव करते हैं. जबकि मुक्तता
हमारा सहज स्वभाव है और हमारी मूलभूत आवश्यकता भी.
Monday, September 15, 2014
कुछ देना न लेना मगन रहना
मार्च २००७
जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि दिखाई पडती है. परमात्मा का नशा शेष
सारे नशों को तोड़ देता है, इसका लक्षण है जागरण. परमात्मा को पाने की स्थिति कोई
रूखी-सूखी नहीं है. यह प्रेम से भरी है. यह हरी-भरी है. यहाँ नाद है, गुंजन है. यह
संपदा इतनी बड़ी है कि अहोभाग व्यक्त करना भी ओछा लगता है. तब मौन ही एक मात्र
सहारा रह जाता है. यह मौन अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए है. यह उदासीनता नहीं है, यह
पूर्ण तृप्ति है. अब कुछ कहना शेष नहीं रह गया, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं,
कुछ जताना भी नहीं. बस गूंगे की मिठाई की तरह भीतर ही भीतर उस रस का अनुभव करते
जाना. यह जग नहीं समझता क्योंकि जिसने पाया है वही तो जानेगा.
Friday, September 5, 2014
कैसा है यह जाल पसारा
फरवरी २००७
ज्ञान और भक्ति साथ-साथ चलते हैं. जब हमें आत्मा का ज्ञान होता
है तो हृदय प्रेम से भर जाता है. आनन्द को कोई आनन्द से ही तो पूज सकता है. यह
सारी प्रकृति उसी का रूप है जो हमें दिन-रात आनन्दित करने की चेष्टा करता है. वह
स्वयं आनन्द स्वरूप है और आनन्द ही बिखेर रहा है. लेकिन हम अपने बनाये जाल में
इतने मगन हैं कि उसकी ओर दृष्टि ही नहीं करते, वह हमें दुःख भी इसलिए देता है कि
हम उससे उकता कर उसे देखें पर हमारी मूढ़ता की कोई सीमा नहीं है हम दुःख में ही
सुकून ढूँढ़ लेते हैं. एक अजीब सी बेहोशी में सारा जगत डूबा हुआ है, जागकर देखता भी
नहीं कि असल समस्या कहाँ हैं ?
Thursday, March 13, 2014
मधुर अति है सन्त की बानी
अक्तूबर २००५
भोजन
के समय, भजन के समय, प्रातः काल उठते समय, रात को सोते समय तथा घर से निकलते समय
कभी क्रोध नहीं करना चाहिए. आज ये बातें सन्त मुख से सुनीं. सारे भेद भावों से ऊपर
उठे हुए सद्गुरु की यही तो निशानी है, उसकी नजर आत्मा पर होती है, वह एक को ही
देखता है, भेद-भाव तो हम करते हैं. हमारी दृष्टि भी यदि गुण ग्राहक हो जाये तो एक
ही क्षण भी न लगे हमें तरने में. ऊपरी भेद तो मिथ्या हैं, सभी के भीतर एक ही
परमात्मा आसीन है, हमें उसी पर दृष्टि रखनी है. अपने भीतर भी उसी शुद्ध चेतना के
दर्शन करने हैं.
Wednesday, December 11, 2013
सागर छल छल छलके भीतर
अप्रैल २००५
हमें
सूक्ष्म दृष्टि का विकास करना होगा, तब सत्य हमारे मन, कर्म तथा वाणी में
प्रकटेगा. सूक्ष्म को देखने की शक्ति हमारे भीतर है पर उस शक्ति से हम परिचित नहीं
है. बाहर की दुनिया में प्रतिस्पर्धा, लोभ, उत्तेजना के अनेक अवसर हैं, अहंकार को
पोषित किया जाता है. हम सत् से असत् की ओर बढ़ते हैं. भीतर के संसार में इतनी गहराई
है कि उसका कोई अंत नहीं है पर भीतर की दुनिया के साथ हमारा सम्पर्क नहीं होता, बाहर
से हमें भीतर की ओर जाना है, तो असत् से सत् की ओर चलना होगा. सत् के प्रति प्रेम
ही हमारे आत्मा की प्यास है. इसे दुनियावी वस्तुओं से बहलाया नहीं जा सकता. वह
केवल और केवल उसी सागर को चाहती है जो अनंत प्रेम, शांति और आनन्द का स्रोत है.
न जाने कितने शरीर हमने धारण किये हैं, सदा आत्मा की उपेक्षा करके मन को प्रमुखता
दी है जिस कारण हम ढगे गये हैं. रेगिस्तान के मरुस्थल जैसा जीवन जीया है पर भीतर
की यात्रा हमें उस सागर तक ले जाती है.
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