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Thursday, September 22, 2022

जीवन इक उपहार अनोखा

सेवा के रूप में किए गए कृत्य हमें वर्तमान में बनाए रखते हैं क्योंकि हमें उनसे भविष्य में कुछ भी पाने की चाह नहीं होती। जब हम जीवन को साक्षी भाव से देखते हैं तो चीजें स्पष्ट दिखायी देती हैं। जितना हम सामान्य बातों से ऊपर उठ जाते हैं तो वे बातें जो पहले बड़ी लगती थीं, अपना महत्व खो देती हैं। हमें यह जीवन उपहार स्वरूप दिया गया है, मन में इसके लिए अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता जगे तो कभी किसी अभाव का अनुभव नहीं होता। नियमित साधना, सेवा तथा जाप करने से मन तृप्त रहता है। जितना-जितना हम साधना के लिये समर्पित होंगे, आंतरिक ऊर्जा बढ़ती रहेगी और सहज उत्साह बना रहेगा। ऐसी स्थिति में हमारा हर कार्य भीतर के आनंद की अभिव्यक्ति के लिए होगा न कि भविष्य में आनंद पाने की लालसा में किया गया होगा। इसके लिए समय का उचित प्रबंधन और हर क्षेत्र में संयमित रहना है। संबंधों में मधुरता तभी बनी राह सकती है जब वे प्रेम बाँटने के लिए बने हों न कि प्रेम की माँग करने के लिए। 


Monday, January 17, 2022

शरण में जो भी आए उसकी

अस्तित्त्व हमें शुद्ध देखना चाहता है। व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति विशेष के प्रति मोह ही मन की अशुद्धि है।शुद्ध अंतर्मन में ही परमात्मा का वास होता है, वह स्वयं उसमें विराजना चाहते हैं। पूर्ण परमात्मा हरेक जीवात्मा को पूर्णता की ओर ले जाना चाहता है। इसी कारण जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता है जिनसे हम कुछ सीख सकें। जगत के प्रति हमारी आसक्ति छूट सके इसी कारण रिश्तों में अस्थिरता और नश्वरता का बार-बार अनुभव कराया जाता है। मोह के कारण ही अनेक दुःख आते हैं, इसलिए मोहभंग करने के उपाय भी परमात्मा करता है। भोजन के प्रति गहन आसक्ति को तोड़ने के लिए ही रोग आते हैं ताकि हम सचेत होकर देखें कि जीवन देह के पार भी है. जब जो घटे उसे स्वीकार करना वैराग्य है और हर हाल में मन की समता बनाए रखना शरणागति। मन जहाँ-जहाँ बँधा हुआ है, वहाँ-वहाँ से उसे मुक्त करना है तथा एकमात्र परमात्मा के चरणों में लगाना है।

Thursday, December 17, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

 भक्त कहता है हम मरुथल सा रूखा-सूखा दिल लेकर तेरे द्वार पर आये थे, देखते ही देखते तूने वहाँ हरियाली के अंबार लगा दिए। तेरा नाम भर सुना था, तुझे जानते भी नहीं थे पर जो  खाली दामन साथ लाये थे, उसे भर दिया. जो दिखाई नहीं देते पर जिनकी चमक से मन में ज्योति छा गयी है, वैसे मधुर भावों के अनेक हीरे-मोती तू लुटाता है. दो बूँद ही प्रेम की इस उर ने चाही थी पर कितना कृपालु है तू कि प्रेम के  दरिया बहा दिए. कितने विकारों से भरा था मन, अहंकार के हाथी पर चढ़ कर आया था, पर तू पावन करने वाला है. सारे संबंध  तुझसे ही पनपे हैं, तू पिता बनकर पालता है, माँ बनकर संवारता है, गुरू बनकर राह दिखाता है, मित्र बनकर स्नेह लुटाता है, भाई या बहन बनकर जीवन पथ को सुंदर बनाता है. यह सारी सृष्टि तुझसे ही उपजी है. भक्त को किसी दर्शन, किसी वाद, ता किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है, उसे समाधि भी नहीं साधनी है, उसे तो भीतर उमड़ते उस प्रेम को एक दिशा देनी है, उस अनंत पर लुटाना है. प्रेम का आदान-प्रदान ही एकमात्र वह कृत्य है जो उसे अस्तित्त्व से जोड़ता है. 


Tuesday, July 21, 2020

दृष्टि मिले जब हमें ध्यान की


किसी भी वस्तु को ठीक से देखने के लिए एक समुचित दूरी पर रखना होता है. आँख के बहुत नजदीक रखी वस्तु भी नजर नहीं आती और बहुत दूर रखी वस्तु भी. जीवन भी कुछ ऐसा ही है जब हम उसमें इतना घुस जाते हैं तब चीजें धुंधली होने लगती हैं और जब उससे दूर निकल जाते हैं तब वह हमारे हाथ से फिसलता हुआ नजर आता है. कभी अतीत के स्वप्न हमें वर्तमान से दूर ले जाते हैं तो कभी भविष्य की व्यर्थ आशंका हमारी ऊर्जा को बहा ले जाती है. ध्यान ही हमारे भीतर वह दृष्टि पैदा करता है जिससे जीवन जैसा है वैसा नजर आता है. वर्तमान के क्षण में जब मन टिकना सीख जाता है तभी वह अस्तित्त्व से प्राप्त अपार क्षमता को देख पाता है. यह ऐसा ही है जैसे कोई आँखें बंद करके कमरे से बाहर निकलने का प्रयास करे और दरवाजे के निकट आते ही अपना मुख मोड़ ले और विपरीत दिशा में चलने लगे. यदि ऐसा हर बार होने लगे तो वह यह निर्णय कर लेगा इस कमरे में दरवाजा है ही नहीं. ऐसा व्यक्ति जीवन के मर्म से वंचित ही रह जाता है. 

Friday, April 3, 2020

प्रेम की डोर ने बाँधा सबको



जीवन का सार है प्रेम, यह सारा ब्रह्मांड जिस एक तत्व के कारण अस्तित्त्व में आया है वह प्रेम ही है, धरती सूर्य की परिक्रमा करती है, चाँद धरती के चक्कर लगाता है, किस शक्ति के कारण, वैज्ञानिक उसे जो भी नाम दें वह आकर्षण शक्ति प्रेम का ही एक स्वरूप है. हमने प्रेम को एक कृत्य मान लिया था, हाथ मिलाना, गले लगाना, मस्तक या गाल चूमना और उपहार पकड़ाना ही प्रेम के पर्याय हो गए थे, अब इनमें से कुछ भी सम्भव नहीं है, किन्तु क्या दुःख की इस घड़ी में अब मानवीय संवेदना पहले से ज्यादा नहीं बढ़ गयी है. प्रेम कोई कृत्य नहीं है यह तो मानव के हृदय की उस संवेदना का नाम है जो वह अन्यों के प्रति अपने अंतर में महसूस करता है. दूसरे का सुख जब अपना सुख बन जाये उसका दुःख जब हमारी आँखों में अश्रु ले आए उसे ही प्रेम कहते हैं. इस आपदा काल में हम सभी भारतवासी एक ऐसी डोर से बंधे हुए हैं जो यद्यपि पहले भी हम सबको जोड़े हुए थी पर अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे हम एक-दूसरे से दूर ही थे. इस आपदा का सामना हम सभी को मिलकर करना है, हमारे भाग्य एक हैं, हमारे कर्म भी यदि एक लक्ष्य को समर्पित हो जायँ तो इस आपदा से मुक्ति हमें शीघ्र ही मिल सकती है.

Thursday, October 3, 2019

मौन से ही वह द्वार खुलेगा



संत कहते हैं, शब्दों का इतना ही कार्य है कि भीतर मौन को उत्पन्न कर दे. मौन लक्ष्य है, शब्द साधन हैं. जैसे यदि कोई व्यक्ति एक प्रश्न पूछता है, फिर जवाब की प्रतीक्षा में रुक जाता है, उस क्षण भीतर मौन है. जवाब देने वाला व्यक्ति शब्दों के माध्यम से ही उत्तर देता है, पर सुनने वाला यदि उत्तर से संतुष्ट नहीं होता, तो भीतर एक अन्य प्रश्न का जन्म होता है, मौन खंडित हो जाता है. यदि उत्तर उसे स्वीकार्य है तो फिर एक क्षण के लिए मौन का अनुभव उसे हो सकता है. मौन का यह क्षण इतना छोटा होता है कि हम उसे चूक ही जाते हैं. उस मौन से ही अस्तित्त्व का द्वार खुलता है. शास्त्रों का प्रयोजन इतना ही है कि हमें भीतर के उस मौन से परिचित करा दे, विचार का जन्म किसी न किसी इच्छा के कारण होता है, इसीलिए मन से इच्छाओं के त्याग पर इतना जोर दिया गया है. भीतर जब मौन होता है, तब मन खो जाता है, चेतना केवल अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहती है.

Sunday, June 16, 2019

योग रखे निरोग



अनादि काल से सृष्टि का आयोजन चल रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा. हमारा जीवन इसकी तुलना में कितना छोटा है, साठ, सत्तर, अस्सी या अधिकम से अधिक सौ वर्ष हम जीने वाले हैं. हमारे जन्म से पहले भी दुनिया थी, अच्छी-खासी चल रही थी, और हमारे जाने के बाद भी इसी तरह चलती रहेगी. कुछ लोग कुछ समय तक हमें याद करेंगे, लेकिन उससे हमें कोई अंतर नहीं पड़ेगा. संत कहते हैं, इस क्षण भंगुर जीवन में क्या हम दुखी होने के लिए आये हैं, अस्तित्त्व में हर तरफ उल्लास है, उसकी मंशा हमें आनंदित करने की तो लगती है, उदास करने की नहीं. नीला आकाश, हरे मैदान, रंग-बिरंगे फूल, चहकते हुए पंछी, फुदकते हुए शावक और वर्षा की बौछारें इनका सान्निध्य हमें सहज ही मिल सकता है, पर हम इनकी ओर ध्यान ही नहीं देते. हम वही कार्य करते हैं जिसका कोई प्रत्यक्ष भौतिक लाभ होता दिखाई देता है. सात्विक आहार, समुचित योग और व्यायाम, सादगी और सरलता मानव को स्वस्थ रखने का बिना पैसे का नुस्खा है. आज पचास वर्ष के ऊपर शायद ही कोई हो जिसे किसी न किसी प्रकार की नियमित दवाई की जरूरत न पड़ती हो. इस योग दिवस पर हम सभी मिलकर यह संकल्प लें तो कितना अच्छा हो, कि नियमित योग करेंगे और करवाएंगे, भारत को एक स्वस्थ राष्ट्र बनायेंगे.

Wednesday, October 3, 2018

सत्यं शिवं सुन्दरम्


३ अक्तूबर २०१८ 
ईश्वर सत्य है, शिव है और सुंदर है, हम सबने यह सुना है. सत्य का जो अर्थ शास्त्र बताते हैं, वह है - जो सदा है और एक सा है, वही सत्य है. जो पुष्प आज सुंदर है, कल मुरझा जायेगा, उसका सौन्दर्य क्षणिक है, अतः वह सत्य नहीं है. जो अस्तित्त्व उसे सत्ता दे रहा है, उसमें सौन्दर्य भर रहा है, वह कल भी रहेगा, किसी और फूल को खिलायेगा, वही सत्य है. शिव का अर्थ है, निराकार कल्याणमयी सत्ता. जो होकर भी नहीं जैसा है, उसकी सुन्दरता कभी घट नहीं सकती. उसकी सुन्दरता को महसूस करना हो तो ध्यान में उतरना पड़ेगा. बुद्ध या महावीर के चेहरे पर जो शांत सौन्दर्य दिखाई पड़ता है, वह उसी एकरस निराकार सत्ता का है. योग का अंतिम लक्ष्य उसी शांति को स्वयं के भीतर अनुभव करना है.    

Friday, October 27, 2017

तेरा तुझको अर्पण


सारा अस्तित्त्व एक अनाम आकर्षण में बंधा हुआ है, आकाशीय नक्षत्र आपस में जिस बल के कारण गति कर रहे हैं वह अवश्य ही प्रेम जैसा कोई तत्व होगा. प्राणियों का परस्पर मेल-मिलाप भी उसी का परिणाम है. हर आत्मा में प्रेम का तत्व उसी तरह गर्भित है जैसे फूल में सुरभि. फूल के खिलने पर ही सुगंध का ज्ञान होता है. इसी तरह प्रेम जब अपनी परम अवस्था को प्राप्त होता है, तब भक्ति कहलाता है. प्रेम उन मूल तत्वों में से एक है जिनसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ है. अंतर को जो सुवास से भर देता है. प्राणों में जो गति का संचरण करता है. मन में कोमल भावनाओं का सृजन कर जीवन का मर्म बता देता है, ऐसे अस्तित्त्व के प्रति आत्मा झुके नहीं तो क्या करे.  

Monday, December 26, 2016

खिले ध्यान का कुसुम जहाँ

२६ दिसम्बर २०१६ 
इस जगत में आने से पूर्व हम अकेले थे और यहाँ से जाने के बाद भी अकेले होंगे, इस जगत में भी नींद में हम अकेले होते हैं. ध्यान इसी अकेले होने की किंतु परम के साथ होने की कला है. नींद में हम अनजाने में अस्तित्त्व के साथ होते हैं, हमें उसकी उपस्थिति का भान नहीं होता, बस जगने के बाद भीतर ताजगी का अनुभव होता है. ध्यान में बोधपूर्वक हम अस्तित्त्व के साथ हो सकते हैं और तब हमें सारी सीमाएं टूटती हुई लगती हैं. भीतर एक अचलता का पता चलते ही भय मात्र से मुक्ति का अनुभव होता है. 

Monday, December 12, 2016

पल पल साथ बना है जिसका

 १३ दिसम्बर २०१६ 
अस्तित्त्व ने हमें सब कुछ दिया है, यह सुंदर सृष्टि उसने हमारे लिए ही बनाई है. इस जाते हुए वर्ष के अंतिम दिनों में एक बार रुककर हम भी यह क्यों न पूछें कि  वह हमसे क्या चाहता है, उसके प्रति हमारा क्या देय है. हम उसे क्या उपहार दे सकते हैं. शायद वह इतना ही चाहता है कि हम उससे जुड़े रहें, उससे अपने दिल का हाल  कहें, पल-पल घटने वाले उसके चमत्कारों को आश्चर्य भरे भाव से निहारें। वर्तमान में चलते हुए हमारी नजरें सुखद भविष्य की ओर लगी रहें, जो हम भावी पीढ़ी के लिए छोड़ जाने वाले हैं.

Tuesday, May 5, 2015

मन जब उपवन बन जाता

जनवरी 2009
जिसके भीतर अस्तित्त्व उतरता है, उसके भीतर फूल खिलते हैं, महोत्सव उतर आता है. ऐसे अपूर्व महोत्सव से कोई बुद्ध बरसने निकल पड़ता है, महावीर बांटने को निकल पड़ता है. उसकी नजर दूसरे पर नहीं, वह भीतर अपने केंद्र पर टिका है. वह जान लेता है, दूसरों को न तो सुख दे सकते हैं न दुःख दे सकते हैं. दूसरों पर साधक की नजर रहती ही नहीं, वह तो अपने होने को साधता है, वह करने न करने से ऊपर उठ जाता है.


Thursday, January 29, 2015

मिटकर ही आकाश मिलेगा

जनवरी २००८ 
साधक यदि चाहे तो स्वयं का कल्याण कदम-कदम पर कर सकता है. हर क्षण हमारे सम्मुख है ख़ुशी का आकाश, अंतहीन आकाश ! पर हम हर बार धरा को चुन लेते हैं, डरते हैं कहीं आकाश में गुम न हो जाएँ, पर गुम हुए बिना क्या कोई अपने को पा सका है. एक बार तो मरना ही होता है, खोना ही होता है, सहना ही होता है नितांत अकेलापन ! जिसके बाद मिलता है निरंतर सहचरी का भाव, उस परमात्मा से एकता का अभिन्नता का अपार भाव ! वह अस्त्तित्व जो हर पल हमारा साथी है, पर अभी मौन है, तब मुखर हो उठता है ! हम जो भीतर कटुता छिपाए हैं, छल, वंचना तथा ईर्ष्या छिपाए हैं वह तब प्रकट हो जाती है. हम उसे अपने से भिन्न देखते हैं जैसे कोई अपने को देखे और अपने कपड़ों को, जिन पर मेल लगी है, वैसे ही हम अपने मन को देखें और मन पर लगे धब्बों को. वह परमात्मा हमें उसके साथ ही कबूल करता है. वह हमें चाहता है, उसके साथ हमारे सम्बन्ध में कोई छल न हो बस वह यही चाहता है.    

Wednesday, May 8, 2013

दीप जला है घट घट सुंदर


सितम्बर २००४ 
इस जगत में हम चाहे कितनी ही उपलब्धियाँ हासिल कर लें, यदि भीतर तृष्णा बनी हुई है तो वे सभी व्यर्थ हैं, हम यदि धन होने पर भी अभाव का अनुभव करें, शिक्षित होकर भी अज्ञान का प्रदर्शन करें, आस्तिक होके भी दुखी हों, तो हमारा धन, विद्वता, तथा धर्म सत्य नहीं हैं, कहीं न कहीं कोई भूल हो रही है. भीतर एक पूर्ण तृप्ति का अहसास ही एक मात्र ऐसी उपलब्धि है, जो पाने योग्य है. जीवन एक अनुपम उपहार है, जिसका हर क्षण आनंद का स्रोत बन सकता है. वह परम अस्तित्त्व, हमारा अपना आप अंतर में दीप जलाकर प्रतीक्षा रत है, हम बाहर से निरत होकर जैसे ही भीतर झांकते हैं, वह हमें बाहें फैलाये खड़े दीखता है. जिस क्षण उससे परिचय होता है, तत्क्षण एक अनोखी शांति बरसने लगती है. 

Tuesday, March 26, 2013

मुक्त करे आनंद



अस्तित्त्व हमें बोलने, सुनने, देखने, सूँघने, व छूने की शक्ति प्रदान करता है ताकि हम उसके आनंद में भागीदार हो सकें. वह जब अपने आनंद को बांटना चाहता है तो इस सुंदर जगत का निर्माण करता है, अपने से ही वह इसे गढ़ता है, फिर जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है, फिर उसे स्नेह देती है और स्नेह पाती है, वैसे ही वह भी आनंद का आदान-प्रदान करता है. मोह वश जैसे कभी सन्तान ही दुःख भी पाती व देती है, वैसे ही हम भी अपने कृत्यों के कारण दुःख पाते हैं, व उसे दुःख देते हैं, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी पूजा प्रसन्न चित्त रहना है. चित्त जब निर्मल हो, प्रसन्न हो, समता में हो तब हम उसके निकट हैं और लेन-देन चल रहा है.

Wednesday, March 6, 2013

जो तुझ भावे सो भली


मई २००४ 
विद्या माया से अविद्या माया तो नष्ट हो जाती है, पर सत्वगुण विद्या माया में ही छिपा है, उसे नष्ट करने के लिए ज्ञान पर्याप्त नहीं है, वह केवल ईश्वर की शरण में जाकर ही नष्ट हो सकती है, उसकी कृपा हम पर हर क्षण बरस रही है. हमारे मन में न जाने कितने-कितने संस्कार दबे हैं, जो वक्त आने पर प्रकट होते हैं यदि हम शरणागत हैं तो प्रारब्ध को हँसते-हँसते स्वीकार करते हैं. स्वीकार करते ही उसका अहैतुक, निस्वार्थ प्रेम हमें छू जाता है. धर्म के अनुभव का एक ही अर्थ है कि परमात्मा है और हमसे बहुत प्रेम करता है, यह अस्तित्त्व हमारा अपना है, सदा हमें प्रसन्न देखना चाहता है. प्रतिपल जीवन उत्सव तभी बन सकता है, जब यह सारा जगत अपना लगता है. 

Friday, March 1, 2013

एक उसी की खोज सभी को


अप्रैल २००४ 
अस्तित्त्व आनंद स्वरूप है, वह प्रेम तथा ज्ञान स्वरूप है, वह आनन्दित होकर प्रतिक्षण अपना प्रसाद बांट रहा है. पर मानव के पास समय नहीं है कि उस आनंद को पाने के लिए जरा सा प्रयत्न भी करे. जब हम पर विपत्ति के बादल मंडराते हैं तो हम ईश्वर के निकट जाते हैं, हमारा लक्ष्य तब विपत्ति से छुटकारा मात्र होता है न कि उसके आनंद को पाना. वह अकारण दयालु है, वह हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करता है कि हम उसके निकट आयें. यदि इतने पर भी हम नहीं समझते तो मृत्यु का झटका लगता है, पुनः जन्म होता है और पुनः मरण...अंततः हम स्वयं ही कह उठते हैं, कभी इसका अंत भी होगा...क्यों हम व्यर्थ ही दुःख उठा रहे हैं, अरे, इस जीवन का कोई प्रयोजन भी है या फिर यूँही यह आना-जाना लगा हुआ है. तब अस्तित्त्व जान लेता है कि यह वक्त उचित है कि इसे अपना आनंद प्रदान किया जाये. वह भीतर से सद्प्रेरणायें भेजने लगता है, जीवन के रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है. तब भीतर प्रेम जगता है, आनंद मिलता है. सद्गुरु का इसमें बड़ा हाथ है उनके प्रेम का आश्रय लेकर साधक ईश्वर की ओर चल पड़ता है.

Monday, February 18, 2013

यह जग सुंदर हो जाये


अप्रैल २००४ 
अस्तित्त्व ने हमें जीवन का अमूल्य उपहार दिया है, यह सुंदर प्रकृति उसी की अध्यक्षता में काम करती है, बदले में हम प्रभु को क्या दे सकते हैं? इतना ही की उसके इस सुंदर विश्व को कुरूप न बनाएँ, बल्कि और सुंदर बनाएँ, अपने आसपास सौंदर्य बिखराएँ, मन का सौंदर्य भी और भौतिक सौंदर्य भी, सभी अन्ततः भीतर से ही उपजता है, इस जगत में सभी कुछ उस परम के प्रकाश से ही उपजा है. वह हर पल हमारी खबर रखता है, हमें उसकी खबर नहीं रहती जब मन संसार में उलझा होता है. चित्त जब खाली होता है, तभी उसको जानने की प्यास भीतर जगती है. चित्त की शुद्धि के लिए साधना की तत्परता भी चाहिए और समर्पण भी. सृजन की क्षमता का विकास होता है जब मन एकाग्र हो, बिखरा हुआ मन स्वयं भी अतृप्त रहता है और दूसरों को भी अतृप्त बनाता है. मन जब उस विराट के चरणों में झुका होता है तो उसके कुछ गुण तो इसके भीतर आएंगे ही और वह प्रभु तो मानो इसी की प्रतीक्षा कर रहा है, वह हमारी और प्रेम भरी नजरों से निहार रहा है, उसको जानने का छोटा सा प्रयास भी विफल नहीं जाता.

Tuesday, July 31, 2012

छूटें जब आग्रह तब वह आता है


जून २००३ 
देह को जन्मने के बाद जो नाम दिया गया है, वह तो बदला जा सकता है लेकिन तन के भीतर जहाँ से खुद के होने की सत्ता का भान होता है, वह अपरिवर्तनीय है. वही वास्तव में हम हैं, और वह सभी के भीतर है. सभी के भीतर वही चैतन्य है. उस का अनुभव करने के लिये ही हम शरण में जाते हैं, उसका अनुभव होने के बाद एक मदहोशी एक सात्विक मस्ती का अनुभव होता है, शरण में जाने का अर्थ है कोई आग्रह न रखना, अस्तित्त्व ने जो हमारे लिये तय किया है उसे स्वीकार करना, वैसे भी हम जो चाहते हैं, वह सभी होता कहाँ है और जो होता है वह भाता नहीं, जो भाता है वह टिकता नहीं फिर जो नहीं भाता वह भी नहीं टिकेगा तो अप्रिय को देखकर हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. सारे आग्रह जब छूट जाते हैं तो जीवन सहज हो जाता है, भीतर की गाठें खुलने लगती हैं, प्रकाश हो जाता है.    

Friday, June 15, 2012

जब वह अपना सा लगता है


अप्रैल २००३ 
यह सारा अस्तित्त्व हमारा अपना है और जहाँ अपनत्व होता है वहीं प्रेम होता है. सुख-सुविधा और सम्पत्ति के लिये तो जन्मों-जन्मों प्रयत्न किये पर कहीं नहीं पहुँचे, अध्यात्म की दिशा में किया छोटा सा प्रयत्न हमें ऊँचाई पर ले जाता है. जहाँ श्रद्धा होती है, मन व बुद्धि उसी ओर जाते हैं. एक बार यदि मन पर चढ़ जाये तो भक्ति का रंग इतना पक्का होता है कि शेष सारे रंग उड़ जाते हैं और तब शाश्वत ज्ञान, शाश्वत आनंद व शाश्वत शांति हमारे मन में उदित होते हैं. विवेक जागृत होता है, कर्मयोग सधने लगता है. साधना के पथ पर मंत्र, गुरु व ईष्ट तीन दिखते हैं, पर वास्तव में वे एक ही हैं. उनमें से किसी एक से भी यदि प्रेम हो जाये तो साधना फूल सी हल्की व सरल हो जाती है. जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उन बातों पर हँसी आती है जिनके लिये पहले बेचैन रहते थे, भ्रमित थे, मुक्ति की पहली श्वास हम तभी लेते हैं जब वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में प्रकट होने लगती हैं, हृदय निर्मल हो जाता है, वहाँ सिवाय शुद्ध प्रेम के कुछ भी नहीं रहता. अमनी भाव सधने लगता है.