संतजन कहते हैं, जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने ‘स्व’ का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं. एक मात्र ईश्वर ही हमारे प्रेम का केन्द्र हो, जो कहना है उसे ही कहें. अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी के प्रति प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब हम पर बरसती है तो अपने ही अंतर से बयार बहती है. तब अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं. अंतर की खुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है. ऐसा प्रेम अपनी सुगन्धि अपने आप बिखेरता है. दुनिया का सौंदर्य जब उसके सौंदर्य के आगे फीका पड़ने लगे, उस “सत्यं शिवं सुन्दरं” की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये, उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पडेगा. अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर अपने कदम रखे बिना रह ही न पाए. रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होता है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.
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Friday, March 8, 2024
Saturday, July 18, 2020
सत्यं शिवं सुंदरं
ईश्वर को सत्य, शिव और सुंदर नाम दिए गए हैं, इसका अर्थ हुआ जो सत्य है वही कल्याणकारी है और वही सुंदर है. व्यवहारिक जीवन में भी हम इन तीनों तत्वों के महत्व और उपयोगिता को नित्यप्रति अनुभव करते हैं. असत्यभाषी पर कोई विश्वास नहीं करता, जो अपनी बात पर कायम नहीं रहता ऐसे व्यक्ति को जीवन में असफलता ही हाथ लगती है. सौंदर्य के प्रति हर मानव के भीतर सहज ही आकर्षण होता है. सुंदरता किसे नहीं भाती। शिशु के मुखड़े पर छायी मुस्कान उसकी आंतरिक सुंदरता को दर्शाती है, धीरे-धीरे रोष, लालसा, दुःख आदि के भाव भी चेहरे पर झलकने लगते हैं और एक वयस्क व्यक्ति का चेहरा वैसा सहज और सुंदर नहीं रह जाता. संतों के चेहरे पर वृद्धावस्था में भी एक अलौकिक सौंदर्य दिखाई देता है. नन्हा बालक सत्य में स्थित होता है, अभी उसे असत्य का बोध ही नहीं. सन्त सदा जगत के कल्याण की बात करते हैं, इसीलिए दोनों में सौंदर्य के दर्शन होते हैं।
Wednesday, October 3, 2018
सत्यं शिवं सुन्दरम्
३ अक्तूबर २०१८
ईश्वर सत्य है, शिव है और सुंदर है, हम सबने यह सुना है. सत्य का
जो अर्थ शास्त्र बताते हैं, वह है - जो सदा है और एक सा है, वही सत्य है. जो पुष्प
आज सुंदर है, कल मुरझा जायेगा, उसका सौन्दर्य क्षणिक है, अतः वह सत्य नहीं है. जो
अस्तित्त्व उसे सत्ता दे रहा है, उसमें सौन्दर्य भर रहा है, वह कल भी रहेगा, किसी
और फूल को खिलायेगा, वही सत्य है. शिव का अर्थ है, निराकार कल्याणमयी सत्ता. जो
होकर भी नहीं जैसा है, उसकी सुन्दरता कभी घट नहीं सकती. उसकी सुन्दरता को महसूस
करना हो तो ध्यान में उतरना पड़ेगा. बुद्ध या महावीर के चेहरे पर जो शांत सौन्दर्य
दिखाई पड़ता है, वह उसी एकरस निराकार सत्ता का है. योग का अंतिम लक्ष्य उसी शांति को
स्वयं के भीतर अनुभव करना है.
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अस्तित्त्व,
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Saturday, December 7, 2013
तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो
हम जिसका चिंतन करते हैं
वैसे ही हो जाते हैं. यदि हम कृष्ण का चिन्तन करते हैं तो धीरे-धीरे उसके गुणों को
धारण करने लगते हैं. कृष्ण को सात्विक भोजन पसंद था, पसंद है और पसंद रहेगा, उसे
संगीत से प्रेम है, वह निडर है, प्रेमी है, नटखट है, विनोदी है, वह सुन्दरता का
सिरमौर है. वह क्या नहीं है, ऐसा होने पर भी हमसे दूर नहीं जाता, निकटस्थ है,
भक्तों के हृदय में स्वयं को प्रकट कर देता है. वह आत्मा का सखा है, गुणात्मक रूप
से आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं. मन व बुद्धि सीमित हैं जो उसे नहीं जान पाते,
लेकिन मन द्वारा किया गया उसका चिन्तन मन को शुद्ध बनाता है, शुद्ध मन में आत्मा
की झलक मिलती है. तब मानव यह जानने लगता है जो दिख रहा है वह अस्थिर है, जो अदृश्य
है वही वास्तविक है. आत्मा की ही सत्ता से मन व बुद्धि कार्य कर रहे हैं, प्रमुख
वही है और यह आत्मा, परमात्मा का अंश है सो सभी कुछ उसी का ही हुआ !
Monday, July 23, 2012
निज स्वभाव ही धर्म है
अनुकूलता व प्रतिकूलता का नाम ही सुख-दुःख है, जो निरंतर परिवर्तनशील है. अंतर्मन तक
यदि न सुख की शीतलता पहुँचे न दुःख का ताप, तो समता की स्थिति सिद्ध माननी चाहिए.
आत्मा सुख-दुःख से परे है यह मानने से ही काम नहीं चलेगा, और न जानने से ही, यदि
जानना केवल बुद्धि के स्तर पर हो, अनुभूति के स्तर पर जानना ही धर्म है. धर्म को
उपलब्ध हुए बिना दुखों का अंत नहीं होता. एक बार जब हम अपने अंतर्मन में निज
स्वभाव का अनुभव कर लेते हैं तो बुद्धि स्थिर हो जाती है, उस दीपक की तरह जिसे ओट
मिली है. जीवन तब सत्यं, शिवं, सुन्दरं की परिभाषा को सत्य सिद्ध करता है
Wednesday, February 22, 2012
चेतनत्व बिखरा चहुँ ओर
दिसंबर २००२
कभी किसी डाली से लगे फूल को सहला कर देखें तो लगता है वह हमारे स्पर्श को महसूस कर रहा है. जीवन कितना अद्भुत है...हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना का सभी में स्पंदन है. हम वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सब कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग, मिट्टी से सना अनपढ़ बच्चा भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार...हमारा शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा से बंधे हों, पर हमारी आत्मा यानि जो हम वास्तव में हैं, वह अपरिमित है. उसके सान्निध्य में हम भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !
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