Showing posts with label स्वभाव. Show all posts
Showing posts with label स्वभाव. Show all posts

Friday, January 12, 2024

उसके पथ का राही है जो

हमारे पास हर पल एक पथ होता है, जिस पर चलकर हम उस परम से एक हो सकते हैं। वह सदा सर्वदा उपलब्ध है। हम स्वभाव वश, संस्कार वश या अपने प्रारब्ध के अनुसार कहीं और चल देते हैं। वह हमसे कभी बिछुड़ा नहीं, उसे अपने से जुदा मान लेते है, फिर व्यर्थ  ही अन्धेरों में ठोकर खाते हैं। ध्यान की वह ज्योति नित्य निरंतर भीतर है। कर्मशील मन हो तो उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।जीवन में कैसी भी परिस्थति हो, ईश्वर का वरदान है। जैसे कुम्हार मिट्टी के पात्र को आकार देते समय कभी सहलाता है कभी आहत करता है; ईश्वर भी ‘स्वयं’ को गढ़ने के लिए हर उपाय अपनाता है। वह ‘स्वयं’ को अपने सुंदरतम रूप में देखना चाहता है। कोई उसके साथ सहयोग करता है तो उसे फूलों के पथ से ले जाता है और जो विरोध करता है उसे काँटों के पथ से ! मंज़िल पर दोनों मिल जाते हैं, क्योंकि लक्ष्य सभी का एक ही है। एक न एक दिन सभी को वह लक्ष्य पाना है।


Monday, October 3, 2022

निज स्वभाव में जो टिक जाए

तीनों गुणों, प्रकृति, काल, कर्म और इस जगत से परे जाकर हमें अपने जीवन को पवित्र बनाना है. भोर में उठकर पहला विचार मांगलिक हो, रात्रि में सोने से पूर्व स्वयं में स्थित होकर सहज होकर  सोएँ. इस जगत में जहाँ हर क्षण सब कुछ बदल रहा है, जहाँ हमें कितने प्रभावों का सामना करना पड़ता है. कभी-कभी शोक के क्षण जो बना माँगे ही हमें मिलते रहते हैं क्या वे पूर्व कृत्यों का फल नहीं हैं ? हमारी प्रकृति कैसी है, सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक, इस पर भी कर्म निर्भर करते हैं, जिस गुण की प्रधानता हो वैसा ही स्वभाव हम धर लेते हैं, जिस वातावरण में हम रहते हैं पूर्व संस्कारों के अनुसार वही भाव दशा हमारे मन की हो जाती है. लेकिन हमें इन सारे प्रभावों से पार जाना है, अपने स्वभाव में लौटना है. प्रेम करना हमारा स्वभाव है, आनन्द हमारा स्वभाव है ! जब हमें किसी वस्तु का अभाव खटके तो भी हम स्वभाव से हट गये हैं. स्वभाव में तो पूर्णता है, वहाँ कोई कमी है ही नहीं. तो हमें प्रतिपल इस बात का ध्यान रखना होगा, कि अंतःकरण कैसा है, हम स्वभाव में हैं या नहीं, सुख तब कहीं खोजना नहीं पड़ेगा, परमात्मा स्वयं उसे लेकर आएगा.

Tuesday, March 22, 2022

चक्र व्यूह से बाहर हुआ जो

आज का दिन सृष्टि के इस क्रम में पहली बार आया हो या अनेक बार दोहराया गया हो, हमारे लिए नया  है; क्योंकि सृष्टि की गति रैखिक नहीं है, यह एक चक्र है; सुबह, दोपहर, शाम व रात के बाद फिर सुबह आती है और समय का चक्र चलता रहता है। इस चक्र में हर प्राणी घूम रहा है, जो इससे बाहर हो गये वे मुक्ति का अनुभव करते हैं। मन भी एक च्ग्क्र में बँधा गोल-गोल घूमा करता है, कभी कहीं पहुँचता नहीं। सुबह के समय मन में सात्विक भाव उठते हैं, दिन ढलते-ढलते वे खो जाते हैं। राजस और तमस अपना प्रभाव डालने लगते हैं। जब हम आदतों में बंधकर कार्य करते हैं, जानते हुए भी कि यह आदत ठीक नहीं है, तब हम तमस के प्रभाव में होते हैं। जो करणीय है वह कभी छूट ना जाए जैसे सृजन, सेवा और ध्यान, मनन, चिंतन और स्वास्थ्य के लिए व्यायाम, प्राणायाम आदि। साधना की प्रक्रिया सतत चलने वाली है। यदि स्वयं तथा अन्यों के कल्याण की भावना से कोई कृत्य किया जाता है तो वह भी सेवा है। ऐसा कृत्य परमात्मा से जुड़े होकर ही हो सकता है। हमारा मूल स्वभाव शांति, आनंद, और प्रेम है, इस बात को याद रखते हुए तथा परमात्मा का हाथ सदा सिर पर है, इसे स्मरण रखते हुए हर दिन का स्वागत ही नहीं उसे विदा भी सात्विक भाव में रहकर करना है। 


Sunday, November 21, 2021

सुख-दुःख के जो पार मिलेगा

जीवन सुख-दुःख का मिश्रण है, पर इसको देखने वाला मन यदि इसके पार जाने की कला सीख ले तो जीवन एक खेल बन जाता है। अनादि काल से न जाने कितने लोग इस भूमि पर जन्मे और चले गए। प्रतिक्षण नए सितारों के जन्म हो रहे हैं और कुछ काल के गाल में समा रहे हैं। थोड़ा सा समय और कुछ ऊर्जा हमें मिली है कि अपने भीतर उस स्रोत को पा लें जो सुख-दुःख के पार है। मन यदि स्वयं में संतुष्ट होना सीख जाए तो खुद के परे जाने की हिम्मत कर सकता है, जो मन अभी तृप्त नहीं हुआ,  वह तो संसार को पाने की उधेड़बुन में ही लगा रहेगा। मन यदि रिक्तता का अनुभव करेगा तो उसे भोजन, धन, वस्तुएँ, यश आदि से भरना चाहेगा, इस भरने में वह कभी सफल नहीं हो सकता क्योंकि ख़ाली होना मन का स्वभाव है। उसे शून्य के अतिरिक्त किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता। इच्छाओं की पूर्ति के द्वारा न अतीत में न ही भविष्य में कोई सुख-दुःख के पार जा सकता है। ध्यान-साधना के द्वारा मन के इस स्वभाव को जानना है और अपने भीतर आनंद के स्रोत का अनुभव करना है, जो सुख-दुःख दोनों के पार है। 


Thursday, May 7, 2020

स्वयं को जिसने जान लिया है


आज बुद्ध पूर्णिमा है. भारत के इतिहास में बुद्ध का आगमन एक अभूतपूर्व घटना है. अपने जीवन और उपदेशों से उन्होंने लाखों लोगों को जीवन का मार्ग दिखाया और आज भी दिखा रहे हैं. वह अपने साधकों से कहते थे, स्वयं को जानो, देह किन तत्वों से बनी है उन्हें भी जानो. मनसा, वाचा और कर्मणा अपने कर्मों के प्रति सजग रहो, अर्थात मन, वाणी अथवा शरीर से जो भी कार्य उनसे दिन भर में होते हैं, वे करने योग्य थे या नहीं, इसकी परीक्षा करते रहो. अपने हृदय को क्रोध, राग-द्वेष और आसक्ति से दूर रखो. नेत्र, नासिका, कर्ण, त्वचा जिह्वा तथा मन को व्यर्थ शक्ति का अपव्यय न करने दो. ज्ञान की शक्ति के द्वारा उन्हें नियंत्रित करके अपने साथियों को भी प्रेरित करो. धन, यश और इन्द्रियों के सुख के पीछे मत भागो. ध्यान के अभ्यास द्वारा उस आंतरिक सुख और शांति का अनुभव करो जो तुम्हारा स्वभाव है. 

Tuesday, October 1, 2019

थम कर पल भर बैठा हो जो



हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है, उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.

Friday, September 20, 2019

तू ही जाननहार जगत में



जगत में दो ही तो हैं एक नाम-रूप का अनंत विस्तार और दूसरा उसे जानने वाला, एक दृश्य दूसरा दृष्टा. हम यदि दृश्य के साथ एक होकर स्वयं को देखते हैं तो सदा विचलित रहते हैं, क्योंकि दृश्य सदा ही बदल रहा है. साथ ही जानने वाले से हम विलग ही रह जाते हैं. यदि द्रष्टा के साथ एक होकर रहते हैं तो दृश्य हम पर प्रभाव नहीं डालता, पर दृश्य की असलियत को हम जान लेते हैं. जो सदा बदलने वाला है उसकी मैत्री हमें कठिनाई में डाल दे इसमें कैसा आश्चर्य?. जिसका स्वभाव ही अचल है उसका सान्निध्य पाना ही योग में स्थित रहना है.

Wednesday, July 10, 2019

पल पल सजग रहे जो मन



मन सदा ही परिचित मार्गों पर जाना चाहता है. नयापन उसे डराता है अथवा तो उसकी उस जड़ता को तोड़ता है, जिसकी मन को आदत हो गयी है. किसी दार्शनिक ने कहा है, मनुष्य आदतों का पुतला है. हम बहुत कुछ केवल स्वभाव वश ही करते हैं, जो आदतें हमारे लिए हानिकारक भी हैं, जिनका हमें ज्ञान भी है, फिर भी हम उन्हें त्यागना नहीं चाहते. जो आदतें अच्छी हैं उनको भी हम यदि असजग होकर दोहराते रहते हैं तो जितना लाभ मिलना चाहिए उतना नहीं ले पाते. जैसे किसी को यदि सुबह उठकर गीता पाठ करने का नियम है और वह बिना भाव के या अर्थ समझे ही उसका नित्य पाठ करता रहे, तो यह अच्छी आदत होते हुए भी उसके जीवन में विशेष परिवर्तन नहीं ला सकती. हम जो भी करते हैं उसकी पूरी जिम्मेदारी हमारी है, उसका जो भी फल मिलेगा उसका भागीदार हमें ही होना है. असजगता हमें अपने शुद्ध स्वरूप से दूर ले जाती है, अथवा तो जब भी हम अपने मूल स्वभाव से दूर होते हैं, असजग होते हैं. योग का अर्थ है, स्वयं के शुद्ध स्वरूप से जुड़े रहना, इसी योग की साधना हमें करनी है.

Friday, November 23, 2018

भीतर ही वह सागर मिलता


२४ नवम्बर २०१८ 
जो ‘है’ वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता, जो ‘नहीं’ है उसके कहने का कोई अर्थ नहीं. किन्तु इतना कहना भी कुछ कहने में ही आता है. संत कहते हैं, परमात्मा को जाना नहीं जा सकता, उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता हाँ, उसके साथ एक हुआ जा सकता है, उसके होने को अनुभव किया जा सकता है. उसकी उपस्थिति को उसी तरह दूसरे को नहीं दिखाया जा सकता जैसे कोई दूर बैठे मित्र को अपने मुल्क की हवा का स्पर्श नहीं करा सकता, सूरज की किरणों की नरमाई-गरमाई को नहीं भेज सकता, उसके लिए तो उसे स्वयं ही आना पड़ेगा. इसी तरह हरेक को अपने भीतर स्वयं ही जाना पड़ेगा, जो भीतर जायेगा वही वापस नहीं आएगा, क्यों कि जो आयेगा वह भी कुछ कह नहीं पायेगा. अध्यात्म का पथ कितना रहस्यमय है इसलिए ही इसका आकर्षण भी इतना अधिक है. यहाँ जो गया वह जगत में रहकर भी निज स्वभाव में ही बना रह सकता है.

Friday, October 26, 2018

सब कुछ भीतर बाहर नाहीं


 २६ अक्तूबर २०१८ 
हमें जो भी चाहिए पहले से ही मिला हुआ है, इसीलिए हमारी नजर उस तरफ नहीं जाती. जो प्रचुरता में उपलब्ध हो उसकी कीमत घट जाती है, जो दुर्लभ हो वह बेशकीमती बन जाता है. शिशु को जन्म के साथ सहज ही आनंदित रहने की सौगात मिलती है, किन्तु माँ-पिता जब उसे खिलौना लाकर देते हैं, उसे खुश होने का अभिनय करना सिखाते हैं. कुछ बड़ा होने पर छोटे से कृत्य पर ही उसे पुरस्कार देते हैं, लोभी बनाते हैं. व्यर्थ के गीतों पर उसे नृत्य करना सिखाते हैं, उसका सहज नृत्य खो जाता है. प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उसे भागना सिखाते हैं. जीवन को बनावटी बनाने के सारे उपाय किये जाते हैं. किशोर होते-होते बालक की सारी स्वाभाविकता खो जाती है. कठिनाई यह है कि उनके माता-पिता ने भी कुछ ऐसा ही उनके साथ किया था. शास्त्र व गुरू हमें स्वभाव की ओर वापस ले जाते हैं. सहजता व सजगता से जीना सिखाते हैं. जीवन की परिपूर्णता का अनुभव करवाते हैं. जिस प्रेम की खोज में लोग जीवन भर भटकते हैं और निराशा ही हाथ लगती है, वे उस प्रेम को हमारे ही अंतर्मन की गहराई से पुष्प की सुगंध की तरह जग में बिखराने की कला सिखाते हैं.


Monday, October 15, 2018

भाव जगे जब निज स्वरूप का


१५ अक्तूबर २०१८ 
संत कहते हैं, “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो, मात्र निज स्वभाव में रहो” यह छोटा सा सूत्र जीवन में परिवर्तन लाने के लिए अति सहायक सिद्ध हो सकता है. शांति, प्रेम, आनंद, पवित्रता, उत्साह, उदारता, सृजनात्मकता, कृतज्ञता, सजगता आदि हमारे सहज स्वाभाविक गुण हैं, जब हम इनमें या इनमें से किसी के भी साथ होते हैं, हमें न कोई अभाव प्रतीत होता है, न ही किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का प्रभाव हम पर पड़ता है. अभाव का अनुभव करते ही हम तत्क्षण स्वभाव से दूर चले जाते हैं. इसी प्रकार किसी के गुणों, वैभव आदि से प्रभावित होते ही भीतर हलचल होने लगती है, शांति खो जाती है. शास्त्र हमें समझाते हैं, हमारा निज स्वभाव अनंत शांति से भरा है, वह परमात्मा से अभिन्न है. हर जीव उसी परमशक्ति का अंश है, उसे भला किस वस्तु का अभाव हो सकता है. देह एक साधन है, जिसे बनाये रखने के लिए पर्याप्त संपदा हमें प्राप्त है. जिन्हें भोजन, वस्त्र और निवास प्राप्त हैं, उन्हें यदि कोई अभाव सताता है तो यह अज्ञान से ही उत्पन्न हुआ है.


Monday, March 26, 2018

साधो सहज समाधि भली


२६ मार्च २०१८ 
हम अपने आंतरिक जीवन से जिस विश्वास से मिलते हैं, बाह्य जीवन भी उसी विश्वास से हमारा स्वागत करता है. वास्तव में हमारा स्वयं के साथ जितना और जैसा संबंध है, वैसा ही बाहर के जगत में हमारे साथ घटित होता है. यदि कोई भय से ग्रस्त है तो उसे अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियों से दोचार होना पड़ सकता है जिसमें उसे भय का सामना करना पड़े. सभी के मूल में एक ही सत्ता है, पर हर व्यक्ति अपनी मान्यताओं, धारणाओं और भावनाओं के अनुसार ही उसे अभिव्यक्त करता है. ध्यान में जब शंकालु, चंचल मन शांत हो जाता है, तब कुछ क्षणों के लिए सहज प्राप्त निजता का अनुभव होता है. यह सहजता स्वयं का स्वभाव बन जाये इसी लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है.

Tuesday, July 4, 2017

मन तू अपना मूल पिछान

५ जुलाई २०१७ 
साधना के पथ पर चलते समय इस बात का निरंतर ध्यान रखना होगा कि हम अपने मूल स्वभाव की और जा रहे हैं या नहीं. ऐसा नहीं कि स्वयं को विशेष मानकर अथवा तो औरों को अपने पथ में बाधा मानकर हम मन में विकार जगा लें. हमारी दिशा सही होनी चाहिए. अध्यात्म के पथ पर जो धैर्यवान है, वह एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँचेगा. जब तक हम अपन शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते, परमात्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकते. शांति, प्रेम, आनंद आदि आत्मा का स्वभाव है, हमें इनका उपयोग करना है. ऐसा करने से सबसे पहले उसका लाभ स्वयं को मिलता है तथा बाद में औरों को मिलता है. 

Saturday, June 17, 2017

खोज मूल की होगी जब

१८ जून २०१७ 
हमारा मूल स्वभाव शांति, प्रेम और आनंद है, किसी को भी अशांत रहना पसंद नहीं, कोई उससे नफरत करे यह भी कोई नहीं सह सकता और दुःख से बचने की सहज ही हरेक के भीतर प्रवृत्ति होती है. नन्हा शिशु सहज ही प्रसन्न होता है, उसके प्रति अपने-पराये सभी का प्रेम उमड़ता है और छोटा सा दुःख आने पर वह रो-रोकर उससे छुटकारा पाने के लिए गुहार लगता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर अशांत होना सीख जाते हैं, प्रेम का अर्थ हर समय दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना मानने लगते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए वस्तुओं का आश्रय लेने लगते हैं. समय के साथ-साथ हमारा मूल स्वभाव कहीं नीचे दब जाता है, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से ये चीजें मिल ही नहीं सकतीं, इसका ज्ञान जब तक होता है तब तक तो हम अपने स्वभाव को भूल ही चुके होते हैं. अब शांति, प्रेम, आनंद के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं. जीवन में सत्य की खोज आरम्भ होती है. 

Wednesday, January 4, 2017

एक तलाश परम पद की

४ जनवरी २०१७ 
 हम सब सफल होना चाहते हैं. सबसे आगे भी रहना चाहते हैं. मानव  स्वभाव में ही यह गुंथा हुआ है कि वह थोड़े से संतुष्ट नहीं होता. सब कुछ पाकर भी उसे ऐसा लगता है कि कुछ अधूरा सा है. ऐसे में क्या जरूरी नहीं है कि हम थोड़ी देर थमकर गहराई से इसका कारण सोचें. जब हमसे काफी आगे वाला भी संतुष्ट नहीं है तो  वहाँ पहुच कर क्या हम संतुष्ट हो जायेंगे. इसका उत्तर भीतर से ही मिलेगा. संत कहते हैं हमारी तलाश तब तक जारी रहेगी जब तक हम उस पद को नहीं पा लेते जहाँ पूर्ण संतुष्टि है. वह पद अनंत है जिस पर हर कोई हर वक्त बैठ सकता है, उस की अभीप्सा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. किन्तु हम उस मार्ग को नहीं जानते जिससे वहाँ जाया जा सकता है. ध्यान ही वह मार्ग है, इस मार्ग पर चलने वाला यात्री किसी से आगे जाना नहीं चाहता वह अपनी यात्रा भीतर ही भीतर करता है और उस तक पहुँच जाता है. 

Monday, December 5, 2016

जब जैसा तब तैसा रे

५ दिसम्बर २०१६ 
जीवन हमें नित नए रूप में मिलता है. यदि हमारा मन सीमाओं में बंधा है, मान्यताओं में जकड़ा है तो हम इसकी नवीनता को अनदेखा कर देते हैं और एक ही ढर्रे में जिए चले जाते हैं. यदि हर पल को वह जिस रूप में मिलता है वैसा ही स्वीकार करने का स्वभाव बना लिया जाए तो मन फूल की तरह ताजा बना रहेगा और निर्भार भी. 

Monday, September 26, 2016

नित नूतन हो ज्ञान हमारा

२६ सितम्बर २०१६ 
शिशु जन्मता है और इक्कीस वर्ष की आयु तक उसके शरीर का विकास होता रहता है, किन्तु बुद्धि के विकास की कोई सीमा नहीं है. एक सामान्य व्यक्ति व्यस्क होने तक जिस ज्ञान को अपनाता है, उसी के आधार पर सारा जीवन बिता देता है. वह कभी भी रुककर अपने स्वभाव, अपनी आदतों, मान्यताओं, धारणाओं तथा पूर्वाग्रहों की जाँच नहीं करता, और बेवजह दुःख उठाता रहता है. भूतकाल में लिए गये जो निर्णय वर्तमान में गलत साबित हो रहे हैं, यदि महज स्वभाव वश हम उन्हें दोहराए चले जाते हैं तो भविष्य के लिए भी दुःख के बीज बो रहे हैं. साधक होने का अर्थ यही है कि हम सजग होकर स्वयं का निरंतर आकलन करें, और एक सूक्ष्म दृष्टि से मन को भेदकर सही-गलत का निर्णय करें और किसी भी क्षण जीवन में फेरबदल करने में पल भर भी न झिझकें.

Friday, July 15, 2016

टिक जाएँ निज स्वभाव में


सतयुग में कोई ध्यान नहीं करता क्योंकि कोई मानसिक रूप से बेचैन नहीं होता। कोई ईश्वर की पूजा नहीं करता क्योंकि किसी को कोई भी अभाव नहीं होता।  ज्ञान की साधना नहीं होती क्योंकि कोई अज्ञानी नहीं होता। कोई संत नहीं होता क्योंकि कोई असंत नहीं होता। आज समाज में जितना ज्ञान बढ़ रहा है उतना ही पाखंड  भी बढ़ रहा है. जितना लोग होशियार हो रहे हैं उतने ही चालाक भी हो रहे हैं. इसका अर्थ हुआ जब तक कोई द्व्न्द्वों के पार नहीं चला जाता तब तक उनसे मुक्त नहीं हो सकता। अच्छे बने रहने का आग्रह बुरे से पीछा छुड़ाने देता।  मन के पार आत्मा में स्थित रहकर ही  कोई दोनों के पार जा सकता है. स्वभाव में टिकना आ जाये तो ही सुख-दुःख दोनों से मुक्त हुआ जा सकता है.

Thursday, June 11, 2015

जरा जाग कर जो देखेगा

नवम्बर २००९ 
हमारी मूर्छा इतनी सघन है कि हमें पता ही नहीं चलता हमारे भीतर आनंद का एक ऐसा स्रोत है जो अनंत है. हमारी अंतरात्मा पर कर्म का पर्दा पड़ा है, हमारे दुखों का कारण कर्म ही हैं, मनसा, वाचा और कर्मणा जो भी हमने किया है वही सामने आता है. दिन भर में न जाने कितने विचार हमरे मनों में आते हैं, भीतर कर्म का एक व्यक्तित्व है, हमारे स्वभाव को बनाने वाली सत्ता भीतर ही तो है, जब तक उसकी निर्जरा नहीं होगी तब तक स्वभाव नहीं बदलेगा और हम वही-वही दोहराते चले जायेंगे. 

Monday, January 19, 2015

होश बने स्वभाव हमारा

सितम्बर २००७ 
सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात या शैवाल भीतर रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है और यह होश हमें मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है, इच्छा गति है, इच्छा भविष्य में है, हम तभी वर्तमान में आते हैं जब कोई इच्छा नहीं रहती. इच्छा काल पर आधारित है. हम वर्तमान में नहीं रहते, समय को बांटते रहते हैं. इच्छा ही भविष्य है और स्मृति ही भूत है. समय केवल वर्तमान में है. हम कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. इच्छा हमें अपने आप से दूर कर देती है.