हमारे पास हर पल एक पथ होता है, जिस पर चलकर हम उस परम से एक हो सकते हैं। वह सदा सर्वदा उपलब्ध है। हम स्वभाव वश, संस्कार वश या अपने प्रारब्ध के अनुसार कहीं और चल देते हैं। वह हमसे कभी बिछुड़ा नहीं, उसे अपने से जुदा मान लेते है, फिर व्यर्थ ही अन्धेरों में ठोकर खाते हैं। ध्यान की वह ज्योति नित्य निरंतर भीतर है। कर्मशील मन हो तो उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।जीवन में कैसी भी परिस्थति हो, ईश्वर का वरदान है। जैसे कुम्हार मिट्टी के पात्र को आकार देते समय कभी सहलाता है कभी आहत करता है; ईश्वर भी ‘स्वयं’ को गढ़ने के लिए हर उपाय अपनाता है। वह ‘स्वयं’ को अपने सुंदरतम रूप में देखना चाहता है। कोई उसके साथ सहयोग करता है तो उसे फूलों के पथ से ले जाता है और जो विरोध करता है उसे काँटों के पथ से ! मंज़िल पर दोनों मिल जाते हैं, क्योंकि लक्ष्य सभी का एक ही है। एक न एक दिन सभी को वह लक्ष्य पाना है।
Friday, January 12, 2024
Monday, October 3, 2022
निज स्वभाव में जो टिक जाए
Tuesday, March 22, 2022
चक्र व्यूह से बाहर हुआ जो
आज का दिन सृष्टि के इस क्रम में पहली बार आया हो या अनेक बार दोहराया गया हो, हमारे लिए नया है; क्योंकि सृष्टि की गति रैखिक नहीं है, यह एक चक्र है; सुबह, दोपहर, शाम व रात के बाद फिर सुबह आती है और समय का चक्र चलता रहता है। इस चक्र में हर प्राणी घूम रहा है, जो इससे बाहर हो गये वे मुक्ति का अनुभव करते हैं। मन भी एक च्ग्क्र में बँधा गोल-गोल घूमा करता है, कभी कहीं पहुँचता नहीं। सुबह के समय मन में सात्विक भाव उठते हैं, दिन ढलते-ढलते वे खो जाते हैं। राजस और तमस अपना प्रभाव डालने लगते हैं। जब हम आदतों में बंधकर कार्य करते हैं, जानते हुए भी कि यह आदत ठीक नहीं है, तब हम तमस के प्रभाव में होते हैं। जो करणीय है वह कभी छूट ना जाए जैसे सृजन, सेवा और ध्यान, मनन, चिंतन और स्वास्थ्य के लिए व्यायाम, प्राणायाम आदि। साधना की प्रक्रिया सतत चलने वाली है। यदि स्वयं तथा अन्यों के कल्याण की भावना से कोई कृत्य किया जाता है तो वह भी सेवा है। ऐसा कृत्य परमात्मा से जुड़े होकर ही हो सकता है। हमारा मूल स्वभाव शांति, आनंद, और प्रेम है, इस बात को याद रखते हुए तथा परमात्मा का हाथ सदा सिर पर है, इसे स्मरण रखते हुए हर दिन का स्वागत ही नहीं उसे विदा भी सात्विक भाव में रहकर करना है।
Sunday, November 21, 2021
सुख-दुःख के जो पार मिलेगा
जीवन सुख-दुःख का मिश्रण है, पर इसको देखने वाला मन यदि इसके पार जाने की कला सीख ले तो जीवन एक खेल बन जाता है। अनादि काल से न जाने कितने लोग इस भूमि पर जन्मे और चले गए। प्रतिक्षण नए सितारों के जन्म हो रहे हैं और कुछ काल के गाल में समा रहे हैं। थोड़ा सा समय और कुछ ऊर्जा हमें मिली है कि अपने भीतर उस स्रोत को पा लें जो सुख-दुःख के पार है। मन यदि स्वयं में संतुष्ट होना सीख जाए तो खुद के परे जाने की हिम्मत कर सकता है, जो मन अभी तृप्त नहीं हुआ, वह तो संसार को पाने की उधेड़बुन में ही लगा रहेगा। मन यदि रिक्तता का अनुभव करेगा तो उसे भोजन, धन, वस्तुएँ, यश आदि से भरना चाहेगा, इस भरने में वह कभी सफल नहीं हो सकता क्योंकि ख़ाली होना मन का स्वभाव है। उसे शून्य के अतिरिक्त किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता। इच्छाओं की पूर्ति के द्वारा न अतीत में न ही भविष्य में कोई सुख-दुःख के पार जा सकता है। ध्यान-साधना के द्वारा मन के इस स्वभाव को जानना है और अपने भीतर आनंद के स्रोत का अनुभव करना है, जो सुख-दुःख दोनों के पार है।