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Thursday, June 11, 2015

जरा जाग कर जो देखेगा

नवम्बर २००९ 
हमारी मूर्छा इतनी सघन है कि हमें पता ही नहीं चलता हमारे भीतर आनंद का एक ऐसा स्रोत है जो अनंत है. हमारी अंतरात्मा पर कर्म का पर्दा पड़ा है, हमारे दुखों का कारण कर्म ही हैं, मनसा, वाचा और कर्मणा जो भी हमने किया है वही सामने आता है. दिन भर में न जाने कितने विचार हमरे मनों में आते हैं, भीतर कर्म का एक व्यक्तित्व है, हमारे स्वभाव को बनाने वाली सत्ता भीतर ही तो है, जब तक उसकी निर्जरा नहीं होगी तब तक स्वभाव नहीं बदलेगा और हम वही-वही दोहराते चले जायेंगे. 

Sunday, February 1, 2015

प्रेम हमें निर्दोष बना दे

जनवरी २००८ 
जो प्रेम घटता-बढ़ता रहता है, वह आसक्ति है. जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, जिसमें कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है. थोड़ा सा भी मोह यदि भीतर है तो अपेक्षा रहती है, ऐसा प्रेम सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक परमाणु भी यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है. बाहर का संसार जब प्रभावित न करे, क्रोध, मान, माया, लोभ जब न रहें तब हमें सभी निर्दोष दिखते हैं.