Showing posts with label कर्म. Show all posts
Showing posts with label कर्म. Show all posts

Monday, August 10, 2026

जीवन एक यात्रा सुंदर

जीवन एक यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जिसमें हर पड़ाव पर कुछ बोझ हल्का होता जाता है। कितना सारा सामान उठाकर यात्री घर से निकलता है, पर मार्ग में उसे जिन-जिन वस्तुओं की ज़रूरत पड़ती जाती है, वे समाप्त होती जाती हैं और धीरे-धीरे गठरी हल्की होने लगती है। जिस स्थान पर यात्री को जाना है, वहाँ सब कुछ है, वहाँ कुछ भी ले जाने की ज़रूरत नहीं है। जो भी उसे चाहिए, केवल रास्ते के लिए है। अन्तिम लक्ष्य आने से पहले न जाने कितने पड़ावों से होकर उसे गुजरना है। बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था, पढ़ाई, विवाह, नौकरी, सेवा निवृत्ति, धर्म, अध्यात्म, सेवा, रुचियाँ, कलाएँ, संगीत, मनोरंजन, भक्ति, प्रेम, घृणा, ईर्ष्या, सत्य, असत्य, जागरण, निद्रा, स्वप्न, कर्म, ज्ञान, अध्ययन, प्रयत्न, व्यायाम, विश्राम, ध्यान, योग और भी न जाने कितने पड़ाव उसके जीवन में आते हैं। हर जगह अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वह देर-सेवर पहुँचता है, अपनी सामर्थ्य और रुचि के अनुसार हर पड़ाव पर नये कर्म करता है, नये कर्मफल बाँधता है। जो आगे की यात्रा में उसके काम आयेंगे। कर्मफलों की गठरी बाँधे वह चलता रहता है। जब तक इनकी समाप्ति नहीं होगी, यात्रा जारी रहेगी। इनका निपटारा ही यात्रा का अंत है। यह जन्मों-जन्मों की यात्रा है। यदि नये कर्म न करे, पुराने कर्मों के फलों को अनासक्त भाव से सह ले। हर सुख-दुख को साक्षी भाव से देखकर आगे बढ़ जाये तो धीरे-धीरे उनका बोझ कम होता जाता है, वह हल्का हो जाता है, ख़ाली हो जाता है और यही तो घर जाना है! 

Saturday, March 2, 2024

पावन हो हर कर्म हमारा

हम देखते हैं कि व्यवहार क्षेत्र में पहले मन में विचार या भाव जगता है फिर क्रिया होती है; पर अध्यात्म क्षेत्र में यदि पहले कोई भी पवित्र क्रिया की जाये तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है. इंद्रदेव हाथ के देवता हैं, सो हमारे कर्म पवित्र हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी शुभ हो. मानव तन एक वेदिका के समान है जिसमें प्राण अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो रहे हैं।प्राणाग्नि बनी रहे इसलिए प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं.  देह रूपी वेदी दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक आहार ही लेना उचित है. मन का समता में ठहरना अर्थात अतियों का निवारण ही योग है. ऐसा योग साधने से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. शरणागति से बढ़कर मुक्ति का कोई दूसरा साधन नहीं है।


Monday, July 25, 2022

जैसे नदी मिले सागर से

मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार  का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है। 


Tuesday, November 23, 2021

शुभता का जो वरण करे

सृष्टि परमात्मा के संकल्प से उपजी है। यहाँ जो कुछ भी सुंदर है, कल्याणकारी है, किसी के शुभ विचारों का परिणाम है और जो कुछ भी असुंदर है, विनाशकारी है, वह भी किन्हीं  अशुभ संकल्पों का परिणाम है। जीवन में जो भी घटता है, वह किसी न किसी क्षण में भीतर उठे विचारों से ही प्रकट हुआ है। विचारणा सूक्ष्म कर्म है जो अंतत: स्थूल रूप में प्रकट होता है। इसीलिए कहा गया है कि हम आत्मा में रहकर शुभ संकल्प ही करें, मन की यह आदत है कि वह तात्कालिक सुख की लालसा में अपना भला-बुरा नहीं सोचता, वह प्रेय मार्ग का पथिक है। मन एक पुराने ढर्रे पर ही चलता है, जिसपर चलकर उसने पहले कष्ट भी उठाए हों, तब भी वह उस लीक को चुन लेता है। आत्मा में रहने का अर्थ है सदा वर्तमान में रहना, वह श्रेय पथ पर चलने का मार्ग है, अर्थात् श्रेष्ठ को चुनने का मार्ग, जो स्वयं के साथ साथ जगत के लिए भी शुभता ही लाता है।

Sunday, July 11, 2021

जैसे कर्म करेगा मानव

प्रारब्ध ने हमें जो भी दिया है उसे सहर्ष स्वीकार करके हम जीवन को जीते हैं तो कई मुश्किलों से सहज ही बचे रहते  हैं। जो भी बीज हमने अतीत में बोए हैं उनकी फसल हमें ही काटनी होगी। जिस मन में राग जगाया था, उसी में द्वेष की दीवार भी अपने आप खड़ी हो जाती है, जिसे हमें ही पाटना होगा। कोई भी कर्म देर-सवेर अपना फल दिए बिना नहीं मिटता है। जो भी हमें मिला है यदि उसे सबके साथ साझा करने की मंशा के साथ जीवन को जिएँ तो यह स्वतः ही सुंदर बन जाता है। एक परम शक्ति जो परम ज्ञानमयी भी है सदा ही इस सृष्टि का लालन-पालन कर रही है, उसका हाथ सदा ही हमारे सिर पर है, वह हमसे दूर नहीं है, इतना भरोसा मन में रखकर यदि हम जीवन के पथ पर कदम रखते हैं तो हर बाधा अपने आप ही मिट जाती है। अपने अंतर की गहराई में जाकर ही सच्चे जीवन से परिचय होता है और तब यह ज्ञान होता कि दुःख के बीज बोना या सुख के बीज बोना हमारे अपने हाथ में है। सजग होकर जीने की कला जिसने सीख ली है वही योग को प्राप्त हो सकता है।   

Saturday, July 3, 2021

कर्म यदि निष्काम हो सकें

 जब हम अपने भीतर शक्ति के स्रोत से जुड़ जाते हैं तब हमसे सहज ही ऐसे कर्म होते हैं जिनमें कर्ता भाव नहीं होता. निष्काम कर्म अथवा सेवा कर्म ऐसे ही कर्मों को कहते हैं. जगत को सुंदर बनाने के लिए अथवा किसी की सहायता के लिए किये गए ऐसे कर्मों से कोई कर्म बन्धन नहीं होता. आत्मा की शक्ति अनायास ही हमें ऐसे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करती है. श्रम की महत्ता को समझकर हम कामगारों व मजदूरों के प्रति सम्मान की भावना भी जगाते हैं. ध्यान के द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरूप का परिचय पाना साधना की पहली सीढ़ी है. इसके बाद जगत कल्याण के लिए उस ऊर्जा का उपयोग अगला पड़ाव है. इससे हम प्रारब्ध से मिलने वाले सुख के प्रभाव से अछूते रह जाते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं. सृष्टि के आयोजन में परमात्मा के साथ मिलकर हम भी अपना योगदान दे रहे हैं ऐसी भावना हमें सदा प्रसन्नचित्त रखती है. 


Monday, June 7, 2021

शुभता का जो वरण करेगा

 आज तक हमने जो भी किया उसका फल तो हमें मिलने ही वाला है, वह हमारा भाग्य बन गया है जो एक न एक दिन सम्मुख आएगा, किन्तु इस क्षण के बाद हम मनसा, वाचा, कर्म जो भी करने वाले हैं, वह अभी हमारे हाथ में है. हम यदि चाहें तो अपने कर्मों के प्रवाह को शुभ की तरफ मोड़ सकते हैं और अपने भाग्य को अपने अनुकूल गढ़ सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा सहायक है भीतर का अखण्ड विश्वास और सत्य को जानने का अभिलाषा. परमात्मा परम शुभता का प्रतीक है, वह शांति, आनंद और प्रेम का अनंत सागर है, यदि हम उसका स्मरण मात्र करते हैं तो अंतर को उतनी देर के लिए उसके गुणों से भर लेते हैं. धीरे-धीरे कर्मों को करते समय भी उसका स्मरण बना रह सकता है. मन क्रोध या लोभ का शिकार नहीं होता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की अग्नि में नहीं जलता. सदा स्वयं को औरों से बेहतर बताने की संसारी प्रवृत्ति अपने आप छूटने लगती है. मन सात्विक बल और साहस से भर जाता है और पुराने किसी कर्म का प्रतिकूल फल आने पर भी वह भीतर समता भाव बनाये रखता है. उपासना ऐसा कर्म है जो करते समय व भविष्य में भी सुख से भर देने वाला है. 


Sunday, April 4, 2021

जब आवै संतोष धन

 कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा  सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है. 


Monday, March 29, 2021

सत की नाव खेवटिया सदगुरू

हर वह कर्म जो निज सुख की चाह में किया जाता है, हमें बांधता है. जो स्वार्थ पर आधारित हों वे संबंध हमें दुःख देने के कारण बनते हैं. जब हम अपना सुख भीतर से लेने लगते हैं तब स्वार्थ उसी तरह झर जाता है जैसे पतझड़ में पत्ते, तभी जीवन में सेवा और प्रेम की नयी कोंपलें फूटती हैं. जब संबंधों का आधार प्रेम हो तभी उनकी ख़ुशबू जीवन को महका देती है. रजस हमें अपने ही सुख की चिंता करना सिखाता है, तमस उसके लिए असत्य का सहारा लेने से भी नहीं झिझकता. सत का पदार्पण ही ज्ञान की मशाल लेकर वास्तविकता का परिचय कराता है. जीवन में सत्व की वृद्धि करनी हो तो सत्संग उसकी पहली सीढ़ी है. शास्त्रों का अध्ययन व नियमित साधना उसके सिद्ध  मार्ग हैं. सत्व हमें अपने आप से जोड़े रखता है. यह अनावश्यक कर्मों से हमने बचाता है और कर्म हीनता से भी दूर रखता है. सत ही आत्मबल और मेधा को बढ़ाता है. 


Tuesday, February 23, 2021

सुख की जिसे न रहे कामना

हमारे कर्म बांधने वाले न हों, इसके लिए आवश्यक है कि हम उनसे न फल की आशा रखें और न ही उनका कोई संस्कार मन पर पड़ने दें। दो ही तरह से कर्म बंधनकारी है यदि वह भविष्य में कोई फल दे या बाध्य  होकर हमें पुन: उस कर्म को करना पड़े। उदाहरण के लिए यदि हमने किसी अखाद्य पदार्थ का सेवन किया तो उसका परिणाम रोग के रूप में मिलेगा तथा उसकी छाप मन पर पड़ जाएगी तथा भविष्य में हम पुन: उसे ग्रहण करने के लिए लालायित होंगे। यदि हमारी आदतें आज दुख का कारण हैं तो हमने ही उन्हें करते समय सुख की कामना की थी और इससे उनका संस्कार गहरा हो गया था। वास्तव में बांधती है सुख की कामना। यदि कोई चीनी का कण कहे, मुझे मीठा खाना है, तो कोई क्या कहेगा ? यदि कोयल कहे, मुझे पंचम राग सीखना है तो ? यदि फूल कहे मुझे खिलना है तो ? जो मिठास है वही तो चीनी है, जो पंचम सुर में गा सकती है वही तो कोयल है। पर हम सुख स्वरूप हैं इसे भुलाकर हमें सुख चाहिए का राग अलापते हैं। आत्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है और इसके उसके दो मीठे बोलों की कामना करती रहती है। यदि कोई न दे तो हम अपमानित महसूस करते हैं। यह अपमानित महसूस करना ही कर्म का बंधन है जो हमने किसी से मीठे बोल बोलते समय अपने हृदय पर बांधा था। जबकि हृदय में प्रेम का सागर भरा है, पर उस बंधन के कारण वह गहराई में ही रह जाता है और हम जीवन के उत्सव में शामिल होने से वंचित ही रह जाते हैं। 

 

Tuesday, January 5, 2021

कर्ताभाव का त्याग करे जो

भगवद्गीता में एक जगह अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है, ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या है ? कृष्ण कहते हैं जो परम है अर्थात सर्वश्रेष्ठ है; जो  अक्षर है अर्थात अविनाशी है; वही ब्रह्म है. हम अपने आसपास वस्तुओं को नित्य बनते-नष्ट होते देखते हैं, लोगों को जन्मते व मरते देखते हैं, क्या ऐसा कुछ है जो कभी नष्ट नहीं होता. वास्तव में वस्तुएं अपना रूप बदल लेती हैं, बीज नष्ट होता है तो वृक्ष बन जाता है, वृक्ष नष्ट हो जाता है तो अंततः खाद बनकर मिट्टी में ही मिल जाता है. विज्ञान में हमने पढ़ा है कि ऊर्जा और पदार्थ न बनाये जा सकते हैं न नष्ट किये जा सकते हैं, केवल उन्हें परिवर्तित किया जा सकता है. ब्रह्म ऐसा पदार्थ या ऊर्जा है जो सदा एक सा है. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कृष्ण कहते हैं, स्वभाव ही अध्यात्म है. हर प्राणी का मूल स्वभाव जो शिशु जन्म से अपने साथ लेकर आता है, अध्यात्म है. जब तक बच्चा भाषा नहीं सीख लेता वह स्वभाव से ही संवाद करता है, प्रकृति में सभी जीव उसी मूल स्वभाव से जुड़े हैं, एक बिल्ली अथवा कुत्ते को कैसे ज्ञात हो जाता है कि उसे स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए कौन सा पत्ता खाना है. संत मौन से ही वृक्षों के साथ संवाद कर लेते हैं क्योंकि वह निज स्वभाव में रहते हैं. कर्म की परिभाषा में कृष्ण कहते हैं, भूतों के भाव का त्याग ही कर्म है, अर्थात जब हम अपने मूल स्वभाव से हट हो जाते हैं तो कर्ता भाव में आ जाते हैं. कितने ही साधक कहते हैं साधना काल में मन शांत रहता है पर कर्म करते समय मन विचलित हो जाता है. इसका अर्थ है कि हम अध्यात्म से नीचे उतर गए. इसीलिए कृष्ण निष्काम कर्म करने के लिए कहते हैं जो आत्मा में स्थित रहकर किया जा सकता  है तथा जिसका कोई बन्धन नहीं होता. 

 

Tuesday, October 27, 2020

पल-पल सजग रहे जो मन

अतीत में जो भी अच्छे-बुरे कर्म  हमसे हुए हैं, उसके संस्कार मन पर पड़े हैं तथा उनके फल सुख-दुख के रूप में हमें प्राप्त हो रहे हैं। सुख आने पर यदि हम गर्वित न हों, दुख आने पर व्यथित न हों तो अतीत हम पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। यदि दुख में दुखी होना और सुख में अभिमान से भर जाना हमारे लिए स्वाभाविक है तो भविष्य भी ऐसा ही होने वाला है। अतीत जब पत्थर बन कर राह में आ जाए तो वर्तमान का दर्शन हमें होता ही नहीं। संत कहते हैं भूख-प्यास और नींद के अलावा वर्तमान में कौन सा दुख है, सारे मानसिक दुख व चिंता अतीत के ही हैं, और यदि हमारा मन किसी भी कारण से परेशान रहता है तो अतीत के हाथों वह जकड़ा हुआ है। वर्तमान का क्षण निर्दोष है, परमात्मा की कृपा का अनुभव सदा वर्तमान में ही होता है। आज यदि हम हर कर्म को सजग होकर करते हैं तो पुराने संस्कार क्षीण पड़  जाएंगे और शुभ कर्मों के संस्कार पड़ेंगे, यही मुक्ति का मार्ग है।


Thursday, July 9, 2020

सत्व गुण जब बढ़ेगा मन में


पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ और मन ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियां हैं. श्रवण करते समय कान, शब्द तथा मन ये तीन उपस्थित होते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा विषय अनुभव करते समय विषय, मन और इन्द्रिय तीन की उपस्थिति रहती है.  शब्द का आधार कान है और कान का आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है. इसी प्रकार त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, स्वाद, रूप और गंध का आश्रय तथा अपने आधार पवन, अग्नि, पृथ्वी और जल के स्वरूप हैं. इन सबका अधिष्ठान है मन. इसलिए सबके सब मन स्वरूप हैं. इनमें मन कर्ता है, विषय कर्म है और इन्द्रिय करण है. ये कर्ता, कर्म और करण रूपी तीन प्रकार के भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं. इनमें से एक-एक के सात्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं. अनुभव भी तीन प्रकार के ही हैं. हर्ष, प्रीति, आनंद, सुख और चित्त की शांति का होना सात्विक गुण का लक्षण है. असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ तथा अमर्ष -ये किसी कारण से हों या अकारण, रजोगुण के चिह्न हैं. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य -ये किसी भी तरह क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं. प्रत्येक साधना का लक्ष्य सत्वगुण को बढ़ाते जाना है और रजोगुण व तमोगुण को कम करना है. 

Friday, June 26, 2020

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

सन्त कहते हैं यह जीवन ही धर्मक्षेत्र है. धर्म का अर्थ है जो धारण करता है, क्षेत्र का अर्थ है खेत. जीवन इसी में स्थित है. यह देह ही कुरुक्षेत्र है, जहाँ हमें कर्मों के बीज बोने हैं. हमें अपने मन की गहराई में स्थित उस परम जीवन, उस चैतन्य आत्मा रूपी जीवन में ही कर्म रूपी यज्ञ करना है. वही बीज बाहर हमारे जीवन में सुख-दुःख रूपी फलों को प्रदान करते हैं. साधना के द्वारा जब हम स्वयं को परम से एक कर लेते हैं तब हमारे बीज उस परम अग्नि में  जलकर भस्म हो जाते हैं और कोई फल नहीं देते. तभी हम मुक्ति का अनुभव करते हैं. 

Thursday, June 25, 2020

सद्विचार जब सोचेगा मन

विचारों से कर्म, कर्म से आदत, आदत से चरित्र और चरित्र से भाग्य का निर्माण होता है. इसका अर्थ हुआ हमारे भाग्य के निर्माता हमारे विचार हैं. जैसा विचार मन में होगा वैसा ही भाग्य निर्मित होगा. अब देखने वाली बात यह है कि कोई सकारात्मक विचारों को प्रमुखता देता है और कोई नकारात्मक बातों को, ऐसा क्यों होता है. यह भी तो विचार का ही फल है, जो अच्छी पुस्तके पढ़ेगा, शास्त्रों का अध्ययन करेगा, सन्तों, महापुरुषों की वाणी पढ़े, सुनेगा उसके भीतर वैसे ही विचार आएंगे. जो केवल अपने ही मन की सुनेगा वह नकारात्मकता का शिकार हो सकता है, क्योंकि मन का यह स्वभाव है वह नकार को जल्दी पकड़ लेता है, मन पानी की तरह है नीचे बहना  उसके लिए सरल है, यदि उसे ऊपर ले जाना है तो भाप बनाना पड़ेगा, जो तप से ही होगा. इसीलिए शास्त्रों में तप की महत्ता गायी गयी है. जीवन में अनुशासन हो तो वही तप है. वाणी पर संयम हो तो वह वाणी का तप है. तप से ही मन स्वभाव को बदल कर ऊँचा उठने लगता है, उसे अग्नि का साथ मिल जाता है, अग्नि सदा ऊपर ही उठती है. 

Friday, June 19, 2020

भक्ति जब कर्मों में झलके


आगे नारद जी कहते हैं, कर्म और ज्ञान से भक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि वह दोनों में ओतप्रोत है. भक्ति कर्म का भी आधार है. कर्मयोगी अति संवेदनशील होता है.. कर्म के आरंभ  में निष्ठा के रूप में भक्ति है, कर्म करते समय आनंद के रूप में भक्ति है और कर्म का लक्ष्य यदि शांति है तो उस रूप में भी भक्ति का अनुभव ही कर्मयोगी करता है. इसी तरह जिस विषय के प्रति लगाव नहीं है उसका ज्ञान भी कैसे प्राप्त करेंगे. ज्ञान में रूचि के रूप में भक्ति है. जिस ज्ञान से हम विस्मित नहीं होते, वह ज्ञान भी ज्ञान नहीं है, विस्मय आनंद देता है, इसलिए ज्ञान के लक्ष्य पर भी भक्ति है. भक्ति के बिना ज्ञान अंधा हो जाता है, कर्म लँगड़ा हो जाता है. 

Tuesday, June 2, 2020

चेतन अंश जीव अविनाशी

नारद भक्ति सूत्र प्रवचन श्रृंखला का आज दूसरा दिन है. नारद मुनि कहते हैं हृदय में कामना रखकर सामाजिक और धार्मिक कार्यों में लगा हुआ व्यक्ति भक्ति का अधिकारी नहीं है. व्यक्ति को  परमात्मा से अपने सहज संबंध को स्मरण मात्र करना है, केवल उसके प्रति सजग होना है. यदि हमारे धार्मिक कृत्य कुछ न कुछ पाने की आशा से किये जाते हैं तो हम उस परम् रस के अधिकारी कैसे हो सकते हैं. यह सही है कि हमें कुछ न कुछ कर्म करना ही है, कर्म यदि इस भाव से किये जाते हैं कि उनसे हमारा मन शुद्ध होगा और किसी का कल्याण होगा तब एक दिन हम भक्ति के अधिकारी बन सकते हैं. साथ ही यह भी सत्य है कि यह सिद्धि समय सापेक्ष नहीं है, यदि इसी क्षण हम अपनी कामनाओं को छोड़ सकें तो इसी समय परम् रस का अनुभव कर सकते हैं. भक्ति का एक और लक्षण है अनन्यभाव, जब हम परमात्मा से प्रेम करते हैं और उसे स्वयं से भिन्न नहीं मानते तो अनन्य भाव का अनुभव होता है. 

Monday, May 25, 2020

देने की जो कला सीख ले

हमारा आज कल की देन है तो जाहिर सी बात है कि आने वाला कल आज की देन होने वाला है. आज जो हमने पाया है वह जो कल दिया था उसका परिणाम है तो आज जो हम देने वाले हैं उसी का प्रतिदान कल मिलने वाला है. आज यदि हम केवल अभी की चिंता करते रहे और यह सोचकर देने से चूक गए कि अभी तो मौज कर लें तो भविष्य कैसा होगा इसकी कल्पना हम सहज ही कर सकते हैं. इस देने में हमारे वे सारे कर्म सम्मिलित हो जाते हैं जो निष्काम भाव से हम करते हैं. इसमें वह सारा श्रम भी आ जाता है जो हम स्वयं को तथा अपने आसपास के लोगों के उत्तम स्वास्थ्य, समुचित आजीविका तथा स्वच्छता के लिए करते हैं. उस असीम के प्रति की गयी हमारी अर्चना- वंदन तथा ध्यान-पूजा भी इसमें आ जाती है और इसके साथ ही आता है किसी की जरूरतों को समझ कर बिन मांगे ही उसकी सहायता कर  देना. हम देखते हैं कि सुबह से शाम तक हमारा जीवन कितने रूपों में औरों पर निर्भर है. दूध वाला, पेपर वाला, कामवाली, सफाई कर्मचारी, अख़बार वाला, सब्जी वाला, धोबी, आदि तो हमारे सहायक हैं ही, इसके अतिरिक्त किसान, दर्जी, मोची,  बैंक के कर्मचारी और न जाने कितने व्यक्तियों के योगदान से हमारा जीवन चलता है. ऐसे में यदि हमारे समय और ऊर्जा  का थोड़ा सा भाग भी यदि किसी ऐसे कार्य में लगता है जिससे किसी को लाभ हो तो हमारा भविष्य सुंदर होने ही वाला है.         

Wednesday, May 20, 2020

सदा जानने को उत्सुक जो


मानव सुख का आकांक्षी है, किंतु ऐसा सुख वह नहीं चाहता जो बिना किसी श्रम के उसे उपलब्ध हो जाये. वह अपने सुख का निर्माण भी स्वयं ही करना चाहता है. छोटा बच्चा पालने में आराम से पड़ा है, पर वह स्थिर नहीं बैठता, जितना हो सके हाथ-पैर हिलाता है, यदि ऊपर कोई खिलौना लटका हुआ है, उसे पकड़ना चाहता है. कुछ पाने की उसकी दौड़ पालने से ही आरंभ हो जाती है. करवट बदलना आते ही वह बैठना शुरू कर देता है और चलना सीखते ही जल्दी भागने भी लगता है. मानव के भीतर जो चेतना है वह अग्नि की भांति ऊपर ही ऊपर जाना चाहती है. कुछ वैज्ञानिक अंतरिक्ष का रहस्य खोजने में लगे हैं और कई सागर की अतल गहराइयों का. हमारे ऋषि भी एक वैज्ञानिक की भांति वर्षों तक प्रयोग करते थे, उन्होंने भी कई खोजें की, साथ ही वे उस चेतना को भी जानना चाहते थे जो सदा ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी. यही खोज भारत को अन्य राष्ट्रों से अलग करती है. जो हमें चैन से बैठने नहीं देता आखिर भीतर वह क्या है? कौन विचारता है ? कौन चाहता है ? कौन कर्म के लिए प्रेरित करता है ? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए ही सम्भवतः अध्यात्म शास्त्र की रचना हुई होगी.  

Tuesday, May 5, 2020

चाह मिटी चिंता गयी

बुद्ध कहते हैं, तृष्णा दुष्पूर है, अर्थात मन में उठी इच्छा को तृप्त करना असम्भव है. एक इच्छा यदि पूर्ण हो गयी तो तत्क्षण दूसरी सिर उठा लेती है. यह इच्छा किसी भी तरह की हो. धन, यश, संतान, सुख, सुविधा प्राप्ति की अथवा भ्रमण करने, ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा कभी भी तृप्त नहीं की जा सकती. जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, अतृप्त रहना इच्छा का स्वभाव है. मानव इस सत्य को भूल जाता है और इस असंभव कार्य को पूरा करने में अपना सारा जीवन लगा देता है. हमारे भीतर जानने की शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा करने की शक्ति तीनों हैं, हम शेष दो शक्तियों को इस तीसरी के लिए ही लगा देते हैं. जानने की शक्ति से हम सृष्टि का सत्य भी जान सकते हैं, जिसे कृष्ण ज्ञान योग कहते हैं और क्रिया शक्ति को कर्मयोग में बदल सकते हैं.