अब जबकि यह तय हो ही चूका है कि ताला बंदी की अवधि बढ़ायी जाएगी तो हमें भी भविष्य के लिए तैयार हो जाना चाहिए. अपने समय का सदुपयोग उसमें सबसे पहली प्राथमिकता है. घर में जो भी सामान समाप्त हो रहा हो उसकी सूची बनाकर अगले एक महीने के लिए एक साथ लेकर रख लेना भी ठीक रहेगा. सुबह उठकर नियमित योग-साधना और घर में थोड़ा सा भ्रमण भी अति आवश्यक है. पूजा के समय रामायण, भगवद गीता या किसी अन्य धर्म ग्रन्थ अथवा किसी सन्त की वाणी का एक पृष्ठ पढ़ने की आदत भी दिन भर मन को सजग और प्रफ्फुलित बनाये रखने के लिए अच्छी है. भोजन बनाते समय यह ध्यान रखना है कि सुपाच्य हो यानि ज्यादा भारी न हो, व ताजा हो. गर्मी का मौसम है इसलिए भुने जीरे के साथ रोज मठ्ठे का सेवन लाभदायक है. कोई न कोई पुस्तक पढ़ना या पढ़कर बच्चों को सुनाना, बोर्ड गेम खेलना और हास्य कार्टून या फिल्म देखना भी इस कठिन समय में मन को खुश रखने में सहायक है. कोरोना से बचकर रहने के लिए घर में रहना ही जब एकमात्र उपाय है तो क्यों न हम अपने घर में ही वह सब आयोजन कर लें जिसके लिए बाहर जाते हैं. सबसे पहले तो घर के सारे पर्दे धो डालें, कुशन कवर, चादरें सब अच्छी वाली बिछाएँ, जैसे मेहमानों के आने पर बिछाते हैं. हॉल के एक कोने में स्कूल, एक में लाइब्रेरी, एक में थियेटर बना लें. किचन को ही आलीशान रेस्ट्रां और छत, आंगन या बरामदे को ही बगीचा. संभाल कर रखी हुई अच्छी क्राकरी और बर्तन भी निकालें, हर दिन नए तरीके से भोजन परोसें. अब अगले कुछ हफ्तों या कौन जाने महीनों तक हमारा घर ही हमारा संसार रहने वाला है, सो आइये इस घर को इस तरह सजाएं और सँवारे कि बाहर जाने का मन ही न करे.
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Monday, April 13, 2020
Wednesday, April 8, 2020
साध सके जो मन का मौन
आज जबकि हम घरों में बंद हैं, एक कार्य जो हमारे शास्त्र, आचार्य और संत कहते आये हैं, बखूबी कर सकते हैं. वह कार्य है मौन की साधना. दिन भर में चाहे एक घन्टा ही सही, यदि हम पुरे मौन का पालन करें, तो अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा सकते हैं. उस एक घण्टे में हमें न केवल किसी अन्य से वार्तालाप नहीं करना है वरन अपने आप से भी नहीं करना है. जो मन सदा ही कुछ न कुछ योजना बनाता है अथवा पुरानी बात को सामने लाकर उस पर टीका-टिप्पणी करता है, उसे पूरा मौन करना सिखाना है. जो बात वह कई बार सोच चुका है, उसे जुगाली करने की उसकी आदत को तोड़ना है. किसी अप्रिय बात को स्मरण करके जो वह झुंझला जाता है, उसे भी छोड़ना है. वास्तव में अतीत में गया मन एक छाया के सिवा कुछ भी नहीं है, छाया को यदि मिटाना है तो प्रकाश की तरफ आना होगा, वर्तमान के प्रकाश में सारी छायाएं मिट जाती हैं. जो कहीं है ही नहीं हम उससे परेशानी खड़ी कर लेते हैं. जो अभी घटा ही नहीं उसकी आशंका मन जगाये तो फिर उसे वर्तमान में ले आना है और उसका सबसे सरल उपाय है, अपनी श्वास पर ध्यान देना. श्वास सदा वर्तमान में रहती है, वह परमात्मा से जोड़े रखने वाली डोरी है. डोरी भी ऐसी कि यदि श्वास एकतार हो जाये तो परमात्मा की सुवास उसमें से बहकर आने लगती है. शांति का एक बादल हमारे चारों ओर छाने लगता है. हाथ में आये इस समय में से नियमित मौन का अभ्यास करके हम आने वाले दिनों के लिए स्वयं को तैयार रख सकते हैं.
Monday, October 9, 2017
अपने घर बैठा पर भूला
६ अक्तूबर २०१७
कबीर कहते हैं, हरि का घर खाला
का घर नहीं है, उनका अर्थ यह नहीं है कि उसके घर जाना कठिन है बल्कि यह कि वह तो
अपना ही घर है, खाला के घर भी जाना हो तो कुछ देर लगेगी. पर यहाँ तो अपने ही घर
में बैठे हैं, बस नेत्र बंद हैं. सपना देख रहे हैं कि संसार में हैं. जीवन एक
संघर्ष है ऐसा मान लिया है तो संघर्ष की तैयारी में लगे हैं. संत कहते हैं सत्य के
प्रति जागना ही उससे मिलन का एक मात्र उपाय है
Monday, December 5, 2016
मन है छोटा सा
६ दिसम्बर २०१६
जैसे हम अपने घर में वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं, न केवल आवश्यक वस्तुओं का बल्कि कई बार तो ऐसी वस्तुओं का भी जिनकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ती अथवा तो पुरानी वस्तुएं जिनकी उपयोगिता भी नहीं रही ; उसी तरह हम मन में विचारों का भी संग्रह करते चले जाते हैं, मन जो एक उपवन बन सकता था उसे अस्त-व्यस्त जंगल बना देते हैं जहाँ यादों के जाल हैं और मान्यताओं और विश्वासों के कैक्टस भी. जहाँ फूल खिलने के लिए सूर्य की रौशनी को पहुँचने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. आस-पास का वातावरण खुला-खुला हो, जरूरतें कम हों तो मन भी हल्का रहता है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि इस दुनिया से रुखसत करते समय हमें अल्प पीड़ा होगी क्योंकि जो छूट रहा होगा वह थोड़ा सा ही होगा।
Monday, June 1, 2015
उसका सुमिरन जब होगा
अप्रैल २००९
दुनिया का कोई
ऐसा सुख नहीं है जो अपने पीछे दुःख को न छिपाए हो. परमात्मा का सुख ही ऐसा है जो
विपरीत से जुड़ा नहीं है. ज्ञान है तो परमात्मा है. ज्ञान के कारण कोई परमात्मा के
मार्ग पर नहीं चलता, दुःख के कारण चलता है. दुखों में सबसे बड़ा दुःख तो मरण का है.
मरण को याद रखके ही कोई परमात्मा को याद करता है. बेअंत की याद उसी को आएगी जो
अपने अंत को याद करता है. अकाल को वही पा सकता है जो काल को याद करता है. तन का घट
मिट्टी का है, प्रकृति एक दिन उसे अपने तत्वों से जोड़ देती है. मन का घट परमात्मा
का है. मन ज्योति स्वरूप है. तन को प्रकृति अपने घर पहुंचा देती है, मन को अपने घर
खुद जाना है. संसार हर समय याद आता है पर हजार प्रयत्न करने पर भी परमात्मा याद
नहीं आता. जिसे याद आता है, वह महा आनंद को पाता है, उसे भूल जाना ही दुःख है.
Tuesday, January 22, 2013
अपने ही घर जाना है
जनवरी २००४
हमारे जीवन में अगले पल क्या घटने वाला है इसकी खबर हमें नहीं होती, हम घटनाओं के
साक्षी मात्र होते हैं, पर इस बात से हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते. यदि
उस क्षण हम सजग नहीं रहे जहां से घटनाओं का क्रम बदलने वाला था तो बात हमारे हाथ
से निकल जाती है, पछताने के सिवाय फिर कुछ नहीं रहता. मूलतः हम सभी एक ही वस्तु के
पीछे भाग रहे हैं, वह है चित्त की प्रसन्नता और विश्रांति ! वह हमें अपने घर में
ही मिलती है, अध्यात्म हमारा घर है. पर जैसे हम सफर से लौटते हैं तो पहले घर को
स्वच्छ करते हैं, वैसे ही साधना द्वारा चेतना की शुभ्र नीलिमा को जागृत करना है.
जैसे घर की जमीन में कोई खजाना मिले तो उस पर हमारा ही अधिकार होता है, वैसे ही
भीतर के आनंद पर हमारा सहज ही अधिकार है, जिसके मिलने पर सजगता स्वभाव का अंग हो
जाती है.
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