जनवरी २००४
हमारे जीवन में अगले पल क्या घटने वाला है इसकी खबर हमें नहीं होती, हम घटनाओं के
साक्षी मात्र होते हैं, पर इस बात से हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते. यदि
उस क्षण हम सजग नहीं रहे जहां से घटनाओं का क्रम बदलने वाला था तो बात हमारे हाथ
से निकल जाती है, पछताने के सिवाय फिर कुछ नहीं रहता. मूलतः हम सभी एक ही वस्तु के
पीछे भाग रहे हैं, वह है चित्त की प्रसन्नता और विश्रांति ! वह हमें अपने घर में
ही मिलती है, अध्यात्म हमारा घर है. पर जैसे हम सफर से लौटते हैं तो पहले घर को
स्वच्छ करते हैं, वैसे ही साधना द्वारा चेतना की शुभ्र नीलिमा को जागृत करना है.
जैसे घर की जमीन में कोई खजाना मिले तो उस पर हमारा ही अधिकार होता है, वैसे ही
भीतर के आनंद पर हमारा सहज ही अधिकार है, जिसके मिलने पर सजगता स्वभाव का अंग हो
जाती है.