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Monday, June 29, 2020

जाग गया है जो भी जग में


बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो उन्हें प्रफ्फुलित और आभावान देखकर एक व्यक्ति ने पूछा, क्या आप कोई देवता हैं ? क्या आप गन्धर्व हैं ? क्या आप मानव हैं ? हर बार उन्होंने इंकार किया, आखिर उसने पूछा, आप कौन हैं ? बुद्ध ने कहा मैं जागा हुआ हूँ, मैं जागृत हूँ ! उस व्यक्ति ने कहा होगा, मैं भी इस समय जगा हूँ, सो तो नहीं रहा, आप यह किस जागरण की बात कर रहे हैं? युग-युग से सभी सन्त व शास्त्र इसी जागरण की बात कहते आ रहे हैं, जिसमें व्यक्ति सौ प्रतिशत वर्तमान में ही रहता है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह प्रतिपल सचेत रहता है. वह सत्य के प्रति भी सदा जागृत है अर्थात निरन्तर परिवर्तनशील इस जगत को नाशवान मानता है. वह जानता है कि इस जगत में सभी कुछ एकदूसरे पर आश्रित है. देह व मन की गहराई में स्थित शून्य अवस्था का भी उसे ज्ञान है. उसकी प्रज्ञा जग गयी है, वह घटनाओं के पीछे छिपे कारण को भी देख लेता है, इसलिए उनसे प्रभावित नहीं होता. व्यक्तियों के व्यवहार के पीछे कारण को भी समझने वाला वह किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से सुखी-दुखी होना छोड़ देता है. वस्तुओं के संग्रह की उसे आवश्यकता नहीं, जितना और जब आवश्यक हो उतना ही ग्रहण करने की आशा वाला वह लोभ को त्याग देता है. देह को साध्य नहीं साधन मानकर वह ध्यान के लिए उसे स्वस्थ रखता है.  

Tuesday, April 14, 2020

आशावादी मन जो होगा


उन्नीस दिनों में लिए सरकार ने लॉक डाउन की अवधि को बढ़ा दिया है. यह अभूतपूर्व काल है, पिछले सौ वर्षों के इतिहास में मानव इतनी भीषण महामारी से पहली बार जूझ रहा है. कोई इसे संकट काल  कहेगा और अवसाद से घिर जायेगा, कोई इसे अनुशासन पर्व कहेगा और जीवन को उन्नत बनाएगा. समय की कमी का बहाना  करके जो कार्य हम वर्षों तक टालते रहे हैं उनके आरंभ के लिए यह सुवर्ण काल है. गहन चिंतन, मनन और श्रवण के लिए एक साधक को जितना एकांत और समय चाहिए उसका प्रबन्ध प्रकृति ने इस प्रकोप के बहाने कर दिया है. कुदरत भी इस समय स्वयं को सेहतमंद कर रही है, तो हमारा भी कर्त्तव्य बनता है कि इस समय को सुंदर बनाएं. हमारा वर्तमान अतीत के कर्मों का फल है और भविष्य आज के कृत्यों का फल होगा. यदि आज मन में निराशा, हताशा या अस्वीकार की भावना प्रमुख रही तो कल भी इससे भिन्न परिणाम लेकर नहीं आएगा. जीवन तो सबको एक जैसा ही मिलता है उसे देखने वाली दृष्टि भिन्न -भिन्न होती है. आशावादी दृष्टिकोण से देखें तो हर घटना के पीछे छिपे बोध पर हमारी नजर जाएगी. घटना बाहर रहेगी और वह बोध हमें उसके असर से अछूता ही छोड़ देगा. 

Friday, June 14, 2019

समता एक साधना ही है



किसी भी व्यक्ति, घटना अथवा वस्तु को गलत कहते ही हम अपने भीतर द्वेष भाव उत्पन्न कर लेते हैं. जिसका फल दुःख के रूप में हमें ही प्राप्त होता है. कोई भी व्यक्ति जैसा है वैसा होने के लिए उसे न जाने कितने कर्मों का प्रवाह ले आया है. इसमें वह स्वाधीन नहीं है. हम स्वाधीन हैं अपने अंतर की समता बनाये रखने में, क्योंकि वही आत्मा में रहना है. हम तभी भूल जाते हैं जब अहंकार वश स्वयं को कर्त्ता मानते हैं. अतीत का भय हमें तभी सताता है जब भविष्य में हम कुछ पाना चाहते हैं. वर्तमान का क्षण निर्दोष है जिसमें न कोई भय है न पश्चाताप, क्योंकि अतीत में जो हुआ वह उन क्षणों की उपज था, भविष्य में जो होगा वह वर्तमान के कार्यों का परिणाम होगा. वर्तमान में हम नये कर्म नहीं बाँध रहे क्योंकि समता में रहना आ गया है, तो भविष्य सुधरने ही वाला है.

Tuesday, December 13, 2016

सहज हुआ मन है संतोषी

१४ दिसम्बर २०१६ 
किसी भी बात अथवा घटना को देखने के कम से कम दो नजरिये होते हैं, अधिक से अधिक तो अनेक हो सकते हैं. इसका अर्थ हुआ यदि  दो व्यक्तियों में आपस में विवाद हो रहा हो तो दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं. अपनी बात रखते हुए कोई यदि इस सत्य को भी स्मरण कर ले तो एक पल में उसके भीतर सहजता का जन्म हो जाता है और यही सहजता धीरे-धीरे संतोष में बदलने लगती है. संतोष ध्यान को जन्म देता है और ध्यान पुनः हमें सहज बनाता है और यह  सहजता इस जगत के प्रति अटूट विश्वास को जन्म देती है.

Friday, February 7, 2014

तोरा मन दर्पण कहलाये

जुलाई २००५ 
हमारा मन वास्तव में दर्पण है जो भीतर उठने वाले हर विचार को प्रतिबिम्बित करता है. हमारे अंतः करण का निर्माण प्रतिक्षण होता रहता है, कोई भी घटना जो भीतर घटी हो अथवा बाहर, प्रतिक्रिया जगाती है, यह प्रतिक्रिया राग या द्वेष दोनों में से ही कोई होती है. दोनों ही हमें बांधते हैं, यह जानते हुए भी हम स्वभाव वश प्रतिक्रिया करते हैं, अंतः करण को मैला करते हैं, वही हमारे मन में झलकता है और उसका संस्कार भी भीतर बन जाता है. जो भी घट रहा है उसे साक्षी भाव से देखने पर ही मन शांत रहता है और कोई बीज नहीं पड़ता. जिस व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति हम प्रतिक्रिया जगाते हैं अनजाने में हम उसके जैसे होने लगते हैं, अपने पद से नीचे गिर जाते हैं. साधना के पथ पर दो कदम आगे चले नहीं कि तीन कदम पीछे आ गये, तभी तो लक्ष्य दूर ही रहता है. मन में छाई हल्की सी धूमिल रेखा भी साधक को मान्य नहीं, वह प्रतिक्षण सहजावस्था में रहना चाहता है.  

Sunday, November 3, 2013

कौन सदा है संग सभी के

मार्च २००५ 
श्रीमद्भागवत में कृष्ण कहते हैं, ‘जब भक्त मेरा भजन करते-करते थक जाता है, तब मैं उसका भजन करने लगता हूँ’. कृष्ण कितने अनोखे हैं, वे परम अराध्य हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, परमब्रह्म परमेश्वर हैं. हमारा श्रद्धाभाव जितना दृढ होगा उतना ही हम प्रभु को करीब से जानने लगते हैं. उसकी कृपा से ही संशय दूर होते हैं, इच्छाएं उठने से पूर्व ही पूर्ण होने लगती हैं. राधा उनकी आह्लादिनी शक्ति है, वही कृष्ण की बंसी की मधुरता है, वही उनके भीतर का शुद्ध हास्य है, वही उनका प्रेम है. वह सदा ही हमारे मन के मन्दिर में विराजते थे पर हमें ही इसका पता नहीं चलता था, हमारे भीतर ईश्वर के प्रति सहज स्वाभाविक प्रेम सुप्तावस्था में रहता है, सद्गुरु की कृपा से वह प्रकट हो जाता है, उसका प्राकट्य एक अद्भुत घटना है जो अंधकार न जाने कब से भीतर बना होता है, वह पल में समाप्त हो जाता है. भीतर ज्योति भर जाती है, जैसे रोम-रोम दिव्यता से भर गया हो. परमात्मा सदा हमारे साथ है.

Tuesday, January 22, 2013

अपने ही घर जाना है


जनवरी २००४  
हमारे जीवन में अगले पल क्या घटने वाला है इसकी खबर हमें नहीं होती, हम घटनाओं के साक्षी मात्र होते हैं, पर इस बात से हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते. यदि उस क्षण हम सजग नहीं रहे जहां से घटनाओं का क्रम बदलने वाला था तो बात हमारे हाथ से निकल जाती है, पछताने के सिवाय फिर कुछ नहीं रहता. मूलतः हम सभी एक ही वस्तु के पीछे भाग रहे हैं, वह है चित्त की प्रसन्नता और विश्रांति ! वह हमें अपने घर में ही मिलती है, अध्यात्म हमारा घर है. पर जैसे हम सफर से लौटते हैं तो पहले घर को स्वच्छ करते हैं, वैसे ही साधना द्वारा चेतना की शुभ्र नीलिमा को जागृत करना है. जैसे घर की जमीन में कोई खजाना मिले तो उस पर हमारा ही अधिकार होता है, वैसे ही भीतर के आनंद पर हमारा सहज ही अधिकार है, जिसके मिलने पर सजगता स्वभाव का अंग हो जाती है.

Wednesday, October 17, 2012

जगा हुआ सोया सोया सा


सितम्बर २००३ 
नींद भी प्राकृतिक समाधि ही तो है, नींद में सोया व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह से परे हो जाता है, उसका चेहरा कितना निष्पाप लगता है. वह सारे सुखों-दुखों से परे हो जाता है. ध्यान में भी हम ऐसी ही अवस्था का अनुभव करते हैं किन्तु जागते हुए. ऐसी अवस्था में कई गांठें जो हमारे भीतर बंधी थीं अपने आप खुलने लगती हैं. जो भी घटना भीतर घटेगी वह अपने आप ही होगी, हमारा प्रयास कुछ भी नहीं कर पायेगा, हम जो भी करेंगे वह बुद्धि के स्तर पर ही होगा, पर हमें तो बुद्धि के परे जाना है. बुद्धि के पार प्रज्ञा है जो बुद्धि को तीक्ष्ण और तीक्ष्णतर करते जाने से प्राप्त होती है. भावलोक भी वहीं से प्रारम्भ होता है, वहीं से दिव्यता हमारा हाथ थामकर आगे ले जाती है, वह हमें हमारी क्षमता के अनुसार राह दिखाती है और एक बार मंजिल की झलक भी दिखा देती है. 

Friday, May 18, 2012

एक यात्रा पर जाना है


मार्च २००३ 
कोई भी घटना, व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति हमें आत्मसुख से वंचित करे उसमें इतना बल नहीं है, सुखी अथवा दुखी होना हमारे ही हाथ में है. हम मौन में रहकर जिस आत्मशक्ति का संचय करते हैं, उसे मिथ्या अहंकार वश पल भर में गंवा देते हैं. सुबह साधना करते हैं, शाम को निंदा करते हैं, तो हिसाब-किताब बराबर, और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं. कोई छोटी से छोटी बात हमें हिला जाती है. तूफ़ान में एक पत्ते की तरह हम कांपते हैं. अपने मन को आत्मनिष्ठ बनाना हमारे अपने हाथ में ही है. स्वयं को दुखी होने से बचाना हमारे खुद के हाथ में है. अस्वस्थ हुआ तो शरीर हुआ, कोई दुःख हुआ तो मन को हुआ पर हम न तो शरीर हैं न मन. स्वयं को इन दोनों से पृथक जानना ही होगा. ध्यान यही कला है. जीवन को एक योद्धा की तरह जीना है, सदा सन्नद्ध व सजग, ताकि कोई भीरुता न भीतर घर कर जाये, जीवन एक यात्रा ही तो है, जैसे एक यात्रा में कुछ सामान साथ लेकर  चलना पड़ता है, सजग रहना होता है और मंजिल की ओर ही ले जाये ऐसे कदम बढ़ाने होते हैं वैसे ही जीवन रूपी यात्रा में हमें साहस व श्रद्धा का सामान लेकर आनंद रूपी मंजिल तक जाना है. हम यदि सजग यात्री हैं तो मंजिल स्वयं आयेगी. हमारे संकल्प शुभ होते हैं तो प्रकृति भी हमारा सहयोग करती है. ईश्वर तो अकारण हमारा मित्र है, वह हमसे जितना प्रेम करता है हम शतांश भी नहीं कर सकते.