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Thursday, May 30, 2024

जीवन में जब लय आती है

सत्य का अनुभव हो जाना सरल है, पर उस पर टिके रहना उतना ही कठिन। मन पुराने संस्कारों को आसानी से पकड़ लेता है और साधक को जो एक बहुमूल्य वस्तु मिली थी, उससे वह वंचित हो जाता है। वास्तव में प्रत्येक मनुष्य हर तरह के दुखों से मुक्ति चाहता है, किंतु जो कर्म उससे होते हैं, वे विपरीत फल देने वाले निकलते हैं। जब तक हम ध्यान के द्वारा मन के पार जाकर उस स्थान पर टिकना नहीं सीख लेते, मन नीचे ले जाने का हर प्रयास करता है। देह और मन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। स्वस्थ रहने का अर्थ है, रोग रहित देह, पीड़ा रहित मन और सदा कुछ नया सीखने को उत्सुक बुद्धि। स्वास्थ्य के लिए नियमित व्यायाम और सात्विक भोजन, मन के लिए सत्संग और बुद्धि के लिए स्वाध्याय यदि मिलता रहे तो तीनों आनंदित रह सकते हैं। देह में यदि कोई रोग हो गया है तो तुरंत उसका समाधान खोजना चाहिए। उसका इलाज करना चाहिए। मन यदि अवसाद से ग्रस्त है तो ध्यान सीखकर मन को शांत रखने का उपाय खोजना होगा और नवीन विषयों की जानकारी लेते हुए बुद्धि को भी उसकी खुराक देनी होगी। चेतना की ऊर्जा को यदि समुचित मार्ग नहीं मिलता तो वह भटक जाती है और जीवन जो आनंद का एक स्रोत बन सकता था, एक पहेली बनकर रह जाता है। 

Saturday, March 2, 2024

पावन हो हर कर्म हमारा

हम देखते हैं कि व्यवहार क्षेत्र में पहले मन में विचार या भाव जगता है फिर क्रिया होती है; पर अध्यात्म क्षेत्र में यदि पहले कोई भी पवित्र क्रिया की जाये तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है. इंद्रदेव हाथ के देवता हैं, सो हमारे कर्म पवित्र हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी शुभ हो. मानव तन एक वेदिका के समान है जिसमें प्राण अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो रहे हैं।प्राणाग्नि बनी रहे इसलिए प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं.  देह रूपी वेदी दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक आहार ही लेना उचित है. मन का समता में ठहरना अर्थात अतियों का निवारण ही योग है. ऐसा योग साधने से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. शरणागति से बढ़कर मुक्ति का कोई दूसरा साधन नहीं है।


Saturday, July 15, 2023

जब विवेक सधे जीवन में

हमारे जीवन की बागडोर हमने विवेक के हाथों में सौंपी है या मन के, इसकी खबर हमें तब मिलती है, जब जीवन में व्यर्थ के कष्ट आते हैं। दिनचर्या यदि सुव्यवस्थित नहीं रखी, अनुशासन का पालन नहीं किया, स्वाद के वशीभूत होकर अखाद्य पदार्थों का सेवन किया। रात्रि को देर तक जागरण किया। समय को व्यर्थ गँवाया। अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं किया। अपनी ख़ुशी के लिए संसार से उम्मीदें रखीं, जो पूरी नहीं हुईं तो उसका अफ़सोस किया। ये सब बातें विवेक के विपरीत हैं। हम अपने आप को भूले न रहें। देह, मन, बुद्धि आदि की सेवा में ही न लगे रहें, बल्कि ऐसा विवेक जगायें जो आत्मा के सानिध्य में ले जाये। विवेक का अर्थ है यह ज्ञान कि संसार उसी का नाम है जो निरंतर बदल रहा है। जो नित्य-अनित्य, सांत-अनंत में भेद करना सिखाये वही विवेक है।नित्य और अनंत के साथ एकत्व का अनुभव किए बिना कोई मुक्त नहीं हो सकता। 


Friday, January 20, 2023

माया के जो पार हुआ है

जब भीतर हलचल हो मानना होगा कि कोई चाह सिर उठा रही है। चाह कुछ पाने की, कुछ बनने की या कुछ पकड़ने की; अर्थात; ‘मैं’ अहंकार से जुड़ गया है। आत्मा को न कुछ पाना है, न कुछ बनना है, न कुछ पकड़ना है, वह पूर्ण है।देह कुदरत से उपहार में मिली है।उसे अपना कर्त्तव्य निभाना है, देखने, सुनने आदि का कार्य, भोजन पचाने, श्वास लेने और चलने-फिरने का हर कार्य देह में प्रकृति द्वारा किया जा रहा है। मन समाज ने दिया है, बचपन से जो भी देखा, सुना, पढ़ा, सीखा, उसी का जोड़ मन है। मन, बुद्धि को अपने अपना नियत कर्म करना है; अर्थात  अपने समय व ऊर्जा का सही उपयोग हो सके इसका चिंतन व मनन करके निर्णय लेना है। बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वही स्वयं को ‘मैं’ मानकर एक स्वतंत्र सत्ता का निर्माण कर लेता है।वास्तव में ‘मैं’ जैसा कुछ नहीं है।इस तरह यदि सभी अपना-अपना कार्य ठीक से करें अहंकार का कोई स्थान ही नहीं है। अहंकार सदा अभाव का अनुभव करता है, जो है, उसे न देखकर जो नहीं है। उसकी कल्पना में मन को लगाता है। किंतु यदि उसे सारे संसार का वैभव भी प्राप्त हो जाए तो भी वह अभाव का अनुभव ही करेगा, क्यंकि वह कुछ है ही नहीं। आत्मा के साथ जुड़ने से मैं पूर्णता का अनुभव करता है। हर अभाव एक माया है और हर पूर्णता एक सत्य !  

Tuesday, December 27, 2022

दो का भेद जानता है जो

जीवन दो से बना है। यहाँ दिन के साथ रात, सुख के साथ दुःख भी है। देह से जो सुख लिया है, उसकी क़ीमत दुःख से चुकानी पड़ती है। आँखों ने सुंदर दृश्य दिखाए, एक वक्त आता है जब नयन धुंधला जाते हैं। नासिका ने हज़ारों सुगंधियों की खबर दी है, किसी वक्त वह खबर देने से मना कर सकती है, बंद-बंद रहती है। स्वाद चखे होंगे अनेक जिह्वा से, पर कभी कोई स्वाद ही नहीं आता या बिगड़ ही जाता है ज़ायक़ा मुख का। घुटनों ने भी जवाब देना है एक दिन, दाँतों ने भी गिर कर साथ छोड़ना  है। कर्ण ऊँचा सुनने लगते हैं। दिल है कि रह-रहकर धड़कता है। पूछता है, यह क्या हो रहा है ? किंतु आत्मा तब भी साक्षी बनी देखती है। वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करती, उसे एक उपकरण मिला था, जो अब पुराना हो रहा है, जिसमें टूट-फूट हो रही है, वह रहेगी जब तक सम्भव होगा, फिर त्याग जाएगी मुक्त पंछी की तरह ! देह के  माध्यम से मन व्यक्त होता है, स्थूल का आश्रय लिए बिना सूक्ष्म व्यक्त नहीं हो सकता। बिजली के बल्ब के बिना प्रकाश कैसे होगा, तार में लाख बिजली दौड़ती रहे। वृक्ष हुए बिना फूल कैसे खिलेंगे, लाख जीवन शक्ति छिपी रहे बीज में। हाथों के बिना कैसे ग्रंथ लिखे जाएँगे, विद्वान मन में कितना विचार मंथन करते रहें। सूक्ष्म की अभिव्यक्ति स्थूल से संभव है। विचार स्थूल है, भाव सूक्ष्म; दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं।  सूर्य की धूप बाहर बिखरी हो पर कमरे के भीतर गर्मी के लिए हीटर चाहिए। परमात्मा हर जगह मौजूद है पर उसकी कृपा को अनुभव करने के लिए मन चाहिए। आत्मा मन से भी सूक्ष्म है, उसके गुण मन में प्रकट होते हैं और  बाहर तरंगों के रूप में शांति का प्रसाद मिलता है। जीवन दोनों का समन्वय है। 


Thursday, December 22, 2022

एक तलाश सभी के भीतर

जाने-अनजाने हम सभी अपनी नियति की ओर बढ़ रहे हैं । नियति जो हमने खुद गढ़ी है; हमारे अपने कर्मों द्वारा, कर्म जो हमरी कामनाओं का परिणाम हैं। इस देह, मन, बुद्धि  में जो शक्ति निहित है उसे जगाकर आत्मस्वरूप  शिव से मिलना एक साधक  की  नियति है। हमारे भीतर जो ईश्वरीय चेतना है वह अपने मूल स्वरूप से जुड़ना चाहती है। प्रेम की तलाश इसी के कारण है, आनंद, शांति व पूर्णता की तलाश इसी के कारण है। हर व्यक्ति कुछ न कुछ पाना चाहता है ताकि वह पूर्ण हो सके, यह अधूरापन उसे सालता है। यह तलाश तब तक पूरी नहीं होती जब तक आत्मशक्ति अनंत से एकाकार न हो सके। दूसरे अंशों में अनंत का एक अंश होने के कारण हर आत्मा स्वयं की मुक्तता का अनुभव करना चाहती है, जो अभी देह व मन की सीमाओं में रहने के कारण बँधा हुआ महसूस करती है। यदि वह अपने निर्णय पूर्व संस्कारों के कारण न ले, आदतों के कारण न ले, विकारों के कारण न ले, मित्रों, परिवार व समाज के दबाव में न ले, बल्कि अपने कल्याण की भावना से स्वयं के लिए हितकर मार्ग पर चलने का साहस जुटा पाए तो वह अपने लक्ष्य को पा सकती है। अनंतता उसका लक्ष्य है और सीमा उसकी वर्तमान अवस्था, इसे तोड़कर वह अपने पूर्ण सामर्थ्य का अनुभव कर सकती है। 


Sunday, May 22, 2022

गुह्यतम ज्ञान सुनाये कान्हा

 देह देवालय है, देह में आत्मरूप से वही परमात्मा विद्यमान है. हम अहंकार के वशीभूत होकर इस सच से आँखें मूँदे रहते हैं. सदगुरू इस राज से पर्दा उठाते हैं और एक नयी दुनिया में हम कदम रखते हैं. जहाँ प्रेम का ही साम्राज्य है, जहाँ एक की ही सत्ता है, जहां अद्वैत मात्र सिद्धांत नहीं वास्तविकता है. जहाँ अपूर्व शांति है जहाँ जीवन अपने कोमलतम शुद्ध रूप में आँखें खोलता है.  वह अनुपम लोक जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ नेति-नेति कहकर ही शास्त्र इशारा करते हैं. ऐसा एक लोक हमारे भीतर है, सदगुरू इसका भेद बताते हैं. कृष्ण इसे ही गुह्यतम ज्ञान कहते हैं. 


Wednesday, April 6, 2022

कला ध्यान की सीखी जिसने

संत कहते हैं आत्मा कर्ता नहीं है, तब पाप, पुण्य कैसे उसे बांध सकते हैं। आत्मा द्रष्टा व ज्ञाता है। मन, वाणी व देह प्रकृति में हैं, वे प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं। सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जाते हैं और आत्मा उनके साथ जाता हुआ प्रतीत होता है। आकाश का चंद्रमा जैसे झील में हिलता हुआ लगता है पर वास्तव में वह सदा स्थिर है। जैसे अग्नि का संग पाकर लोहा अग्नि का रूप धर लेता है पर संग छूटते ही शीतल होकर अपने रूप में आ जाता है, वैसे ही देह व मन आत्मा की निकटता से चेतन प्रतीत होते हैं। गहरी नींद में न देह को अपना भान रहता है न ही  मन को, आत्मा फिर भी रहता है और जाग कर वही कहता है रात को नींद अच्छी आयी। ध्यान में जागते हुए देह और मन के पार जाकर आत्मा का अनुभव किया जा सकता है।

Friday, March 11, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

 सन्त कहते हैं, प्रेम ही वह सूत्र है जिसे पकड़कर हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.  तभी हम जान पाते हैं कि सभी प्राणी अस्तित्त्व का ही अंश हैं, इससे किसी का कोई विरोध नहीं है. जब कोई  प्रेमपूर्ण हो जाता है तो ध्यान पूर्ण भी हो जाता है. जब वह आँख भर कर अपने को देखता  है तो पाता है कि वह ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं. अपने को मिटाने पर अपने में ही यह पता चलता है कि वह नहीं है और वैसे ही पता चलता है कि केवल परमात्मा है. वह भौतिक देह है यह सोचना ही आँखों पर पड़ा पर्दा है. ध्यान में वही मिटता है जो है ही नहीं. जो है वह कभी मिटता ही नहीं. जब तक मन अशांति से ऊबे नहीं तब तक झूठ-मूठ ही खुद को बनाये रखना चाहता है, अहंकार की यात्रा जब तक तृप्त नहीं होती तब तक सीमित ‘मैं’ नहीं मिटता !

Monday, January 10, 2022

ज्योति एक ही हर अंतर में

प्रमाद, अकर्मण्यता और सुविधाजीवी होना हमारे  लिए त्यागने योग्य है। प्रमाद का अर्थ है जानते हुए भी देह, मन व आत्मा के लिए हितकारी साधनों को न अपनाना तथा अहितकारी कार्यों को स्वभाव के वशीभूत होकर किए जाना। अकर्मण्यता अर्थात अपने पास शक्ति व सामर्थ्य होते हुए भी कर्म के प्रति रुचि न होना तथा दूसरों पर निर्भर रहना। सुविधजीवी होने के कारण हम देह को अधिक से अधिक विश्राम देना चाहते हैं, पर इसका परिणाम दुखद होता है जब एक दिन देह रोगी हो जाती है। स्वयं के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान न होने के कारण आत्मा का पोषण करने की बजाय हम उसके विपरीत चलना आरम्भ कर देते हैं। आत्मा सभी के भीतर समान रूप से व्याप्त है, उसमें अपार शक्तियाँ छिपी हैं। हर किसी को उसके किसी न किसी पक्ष को उजागर करना है। साधक को हर क्षण सजग रहकर ऐसा प्रयत्न करना होगा कि ईश्वर का प्रतिनिधित्व उसके माध्यम से हो सके। वह ईश्वर के प्रकाश को अपने माध्यम से फैलने देने में बाधक ना बने। 


Wednesday, January 5, 2022

ध्यान का जो अभ्यास करे

देह में रहते हुए देहातीत अवस्था का अनुभव ही ध्यान है। स्थूल इंद्रियों से स्थूल जगत का अनुभव होता है, सूक्ष्म इंद्रियों से स्वप्न अवस्था का अनुभव होता है। गहन निद्रा में स्थूल व सूक्ष्म दोनों का भान नहीं रहता। ध्यान उससे भी आगे का अनुभव है, जब निद्रा भी नहीं रहती, चेतना केवल अपने प्रति सजग रहती है। ध्यान के आरम्भिक काल में इस अवस्था का अनुभव नहीं होता है, पर दीर्घकाल के अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। एक बार इसका अनुभव होने के बाद भीतर स्मृति बनी रहती है। इसे ही भक्त कवि सुरति कहते हैं। इस अवस्था में गहन शांति का अनुभव होता है, मन में यदि कोई विचार आता है तो चेतना उसकी साक्षी मात्र होती है। देह में होने वाले स्पंदन और क्रियाएँ भी अनुभव में आती हैं, किंतु साक्षी भाव बना रहता है। जब विचार भी लुप्त हो जाएँ और देह का भान ही न रहे इसी अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि के अनुभव से सामान्य बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है। मन में स्पष्टता और आनंद का अनुभव होता है। 


Tuesday, November 16, 2021

भीतर जब प्रकटेगी सहजता

बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर को छोडकर मन और इन्द्रियों रूपी संकरी नहरों में आ जाती है तो उसका संबंध सागर से छूट जाता है और वह व्याकुल हो उठती है. जब वह पुनः आत्मा के सागर में पहुँच जाती है तो सुखी हो जाती है.... ईश्वर से हमारा संबंध वैसा ही है जैसा बूंद या लहर का सागर से. प्रियजनों के स्नेह में जो आनंद झलकता है वह हमारी आत्मा का ही प्रकाश है. आत्मा का पूर्ण उद्घाटन ही मानव का साध्य है. राग-द्वेष अर्थात आसक्ति व विरक्ति मन के कार्य हैं, स्वास्थ्य-रोग आदि देह के, जो सुख-दुःख के रूप में हमें मिलते हैं. लेकिन वह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है. सहजता के प्राकट्य में आनंद है और उसी में हमारी शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव है. 


Monday, May 24, 2021

ज्योतिपुंज है कोई भीतर

 शास्त्रों में ईश्वर की तुलना आकाश से, आत्मा की सूर्य से, मन की चंद्रमा से और देह की पृथ्वी से की गई है। जिसमें सब कुछ टिका है, पर जो किसी पर आश्रित नहीं है, जब कुछ भी नहीं था तब भी जो था और कुछ नहीं होगा जो तब भी रहेगा वही आकाश है । जैसे कोई भव्य इमारत यदि खड़ी हो जाए तो आकाश की सत्ता जस की तस रहती है और गिर जाए तो भी कोई परिवर्तन नहीं होता। सूर्य के होने से ही धरती पर जीवन संभव है, इसी प्रकार आत्मा से ही देह में चेतनता है। जैसे चंद्रमा  सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है, मन, आत्मा का ही प्रतिबिंब है। मन बाहरी  परिस्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है।  कभी कभी सूर्य के सामने बादल आ जाते हैं और धरती पर अंधकार छा जाता है। अहंकार ही वह बादल है जो देह को आत्मा के प्रकाश से वंचित रखता है। यदि मन सदा समता में रहे तो आत्मजयोति उसमें एक सी प्रकाशित होगी और देह भी उस ज्योति से वंचित नहीं होगी। 


Sunday, April 18, 2021

'है' को जो मन स्वीकार करे

 जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।  


Wednesday, November 25, 2020

मुक्त हुआ है जो प्रमाद से

बुद्ध कहते हैं, प्रमाद मृत्यु है। प्रमाद अर्थात जानते हुए भी कि यह अनुचित है उससे छूटने का प्रयास न करना और जानते हुए भी कि यह सही है, उसे न करना। हम सभी जानते हैं रात्रि में जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, सात्विक और हल्का भोजन, स्वाध्याय, सेवा, सत्संग, नियमित व्यायाम और ध्यान; शारीरिक और मानसिक आरोग्य के लिए जरूरी है, पर क्या इसका पालन करते हैं। मृत्यु के क्षण में जब देह जड़ हो जाती है और चेतन शक्ति बाहर से उसे जरा सा भी हिला नहीं पाती, तब उसे वे पल स्मरण हो आते हैं जब जीवित रहते हुए इस देह को हिलाया जा सकता था, तब श्रम से बचते रहे। जब पैरों में दौड़ने की ताकत थी, हाथों में काम करने की शक्ति थी, मन में चिंतन का बल था, अब यह देह पत्थर की हो गई है, पर उस वक्त जब देह में स्पंदन था, मन को कितनी बार पत्थर सा नहीं बना लिया था, जिससे कोमल भाव झर सकते थे, जिससे मैत्री और करुणा के गीत फूट सकते थे, उससे द्वेष और रोष को उगने दिया था। मृत्यु के बाद वह सब याद आता है जो करना शेष रह जाता है, जो अभी किया जा सकता है, उस सबके प्रति जागना ही प्रमाद से मुक्त होना है। 

Thursday, August 20, 2020

ध्यान का फूल खिले जीवन में

 ध्यान हमें सिखाता है कि मन व्यर्थ के संकल्प-विकल्प करके अपनी ऊर्जा न गंवाए. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव शरीर और मन दोनों पर ही होता है जो बाद में रोग का रूप ले सकता है. ध्यान में हम मन के साथ अपने तादात्म्य को तोड़ते हैं और उसे निर्देशित करने में संभव होते हैं. इससे हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और मन में स्पष्टता का अनुभव होता है. ध्यान के बाद एकाग्रता बढ़ जाती है जिसका अच्छा प्रभाव हमारे सभी कार्यों पर पड़ता है. ध्यान हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ाता है. देह को स्वस्थ रखने के लिए जैसे व्यायाम आवश्यक है वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए मन का पूर्ण विश्राम आवश्यक है, जो ध्यान में ही मिल सकता है.

Sunday, July 12, 2020

निज स्वरूप को जाना जिसने

अविद्या का आवरण हमारे स्वरूप को हमें देखने नहीं देता. देह, मन, बुद्धि को ‘मैं’ मानना ही अविद्या है. हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही अपना स्वरूप हमें प्रतीत होगा. यदि हम देह को ही मैं मानते हैं तो सदा ही भयभीत रहेंगे, क्योंकि देह निरन्तर बदल रही है और एक दिन मिट जाएगी. यदि मन को अपना स्वरूप मानते हैं तो सदा ही कम्पित होते रहेंगे क्योंकि मन भी इस निरंतर बदलते हुए संसार से ही बना है, जैसा वातावरण, जैसे शिक्षा उसे मिलती है वह उसी को सत्य मानकर उसी के अनुसार चलता है. जब हम बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानेंगे तो सदा ही मान-अपमान के द्वंद्व में फंसे रहेंगे क्योंकि अपनी बुद्धि से उपजे विचार, धारणा आदि को ही हम सत्य मानेंगे और दूसरों के विचारों से मतभेद पग-पग पर होता ही रहेगा. इसके साथ-साथ ही देह, मन और बुद्धि से किये गए कार्यों का हमें अभिमान भी बना रहेगा. 

Tuesday, June 30, 2020

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

संत कहते हैं, जब तक हम मन के द्वारा चलाये जाते हैं हम साधक नहीं हैं, जब हम मन को चलाते हैं तब साधक की श्रेणी में आते हैं. मन को चलाने का अर्थ है मन पर कार्य करना. जब हम देह द्वारा कार्य करते हैं, हमारा कार्य व्यायाम नहीं कहा जा सकता, जब देह पर कार्य करते हैं अर्थात भार उठाना, दौड़ना, आसन आदि, उसे ही व्यायाम कहते हैं. देह की शक्ति उसे हिलाने-डुलाने से बढ़ती है पर मन की शक्ति उसे स्थिर और एकाग्र रखने से बढ़ती है. धारणा, ध्यान, चिंतन, मनन, समाधि यह सब मन पर कार्य करने की विधियां हैं. प्रकृति के साथ कुछ समय बिताने से भी मन सहज ही शांति का अनुभव करता है. मंत्र जाप अथवा ध्यान की कुछ मुद्राओं में बैठने मात्र से भी मन एकाग्र होता है. कोई नदी जब शांत हो तो उसकी तलहटी भी दिखाई देती है और जब पानी का बहाव तेज हो तो पानी के अतिरिक्त कुछ भी स्पष्ट नहीं होता. मन भी एक धारा की तरह है, यदि उसका बहाव धीमा होगा तो आत्मा का प्रतिबिम्ब उसमें झलकेगा, जब हम विचारों से घिर जाते हैं तब स्वयं से दूर चले जाते हैं, यही तनाव का कारण बनता है. 

Monday, June 29, 2020

जाग गया है जो भी जग में


बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो उन्हें प्रफ्फुलित और आभावान देखकर एक व्यक्ति ने पूछा, क्या आप कोई देवता हैं ? क्या आप गन्धर्व हैं ? क्या आप मानव हैं ? हर बार उन्होंने इंकार किया, आखिर उसने पूछा, आप कौन हैं ? बुद्ध ने कहा मैं जागा हुआ हूँ, मैं जागृत हूँ ! उस व्यक्ति ने कहा होगा, मैं भी इस समय जगा हूँ, सो तो नहीं रहा, आप यह किस जागरण की बात कर रहे हैं? युग-युग से सभी सन्त व शास्त्र इसी जागरण की बात कहते आ रहे हैं, जिसमें व्यक्ति सौ प्रतिशत वर्तमान में ही रहता है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह प्रतिपल सचेत रहता है. वह सत्य के प्रति भी सदा जागृत है अर्थात निरन्तर परिवर्तनशील इस जगत को नाशवान मानता है. वह जानता है कि इस जगत में सभी कुछ एकदूसरे पर आश्रित है. देह व मन की गहराई में स्थित शून्य अवस्था का भी उसे ज्ञान है. उसकी प्रज्ञा जग गयी है, वह घटनाओं के पीछे छिपे कारण को भी देख लेता है, इसलिए उनसे प्रभावित नहीं होता. व्यक्तियों के व्यवहार के पीछे कारण को भी समझने वाला वह किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से सुखी-दुखी होना छोड़ देता है. वस्तुओं के संग्रह की उसे आवश्यकता नहीं, जितना और जब आवश्यक हो उतना ही ग्रहण करने की आशा वाला वह लोभ को त्याग देता है. देह को साध्य नहीं साधन मानकर वह ध्यान के लिए उसे स्वस्थ रखता है.  

Friday, August 9, 2019

अलख निरंजन भव भय भंजन



प्रकृति और पुरुष दोनों उसी तरह भिन्न हैं जैसे वाहन और उसका चालक. गति वाहन में होती है, चालक में नहीं, इसी तरह सारी क्रिया प्रकृति में है, पुरुष में नहीं. वाहन यदि टूट जाये तो दूसरा लिया जा सकता है, इसी तरह पंचभूतों से बनी देह जो प्रकृति का ही अंश है, यदि नष्ट हो जाये तो पुरुष को कोई अंतर नहीं पड़ता, उसे दूसरी देह मिल जाती है. यदि किसी का वाहन क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो वह व्यक्ति दुखी होकर उसका शोक मनाये ही ऐसा जरूरी नहीं, सुखी या दुखी होना उसकी स्वाधीनता है, इसी तरह यदि देह रोगी हो जाये या वृद्ध हो जाये, अथवा नष्ट हो जाये तो सुख या दुखी होना पुरुष यानि आत्मा की स्वतन्त्रता है. कर्मों का फल सुख या दुःख के रूप में मिलता है पर सुखी या दुखी होना केवल हमारे बोध के ऊपर निर्भर करता है. हर मानव के मन की गहराई में एक स्थान ऐसा है जो निरंतर एकरस है, जो मुक्त है, यदि कोई उसे जुड़ जाये तो कभी अपनी इच्छा के विपरीत सुख-दुःख का अनुभव उसे नहीं होगा, वह सदा साक्षी ही बना रहेगा.