Thursday, May 30, 2024
जीवन में जब लय आती है
Saturday, March 2, 2024
पावन हो हर कर्म हमारा
हम देखते हैं कि व्यवहार क्षेत्र में पहले मन में विचार या भाव जगता है फिर क्रिया होती है; पर अध्यात्म क्षेत्र में यदि पहले कोई भी पवित्र क्रिया की जाये तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है. इंद्रदेव हाथ के देवता हैं, सो हमारे कर्म पवित्र हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी शुभ हो. मानव तन एक वेदिका के समान है जिसमें प्राण अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो रहे हैं।प्राणाग्नि बनी रहे इसलिए प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं. देह रूपी वेदी दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक आहार ही लेना उचित है. मन का समता में ठहरना अर्थात अतियों का निवारण ही योग है. ऐसा योग साधने से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. शरणागति से बढ़कर मुक्ति का कोई दूसरा साधन नहीं है।
Saturday, July 15, 2023
जब विवेक सधे जीवन में
हमारे जीवन की बागडोर हमने विवेक के हाथों में सौंपी है या मन के, इसकी खबर हमें तब मिलती है, जब जीवन में व्यर्थ के कष्ट आते हैं। दिनचर्या यदि सुव्यवस्थित नहीं रखी, अनुशासन का पालन नहीं किया, स्वाद के वशीभूत होकर अखाद्य पदार्थों का सेवन किया। रात्रि को देर तक जागरण किया। समय को व्यर्थ गँवाया। अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं किया। अपनी ख़ुशी के लिए संसार से उम्मीदें रखीं, जो पूरी नहीं हुईं तो उसका अफ़सोस किया। ये सब बातें विवेक के विपरीत हैं। हम अपने आप को भूले न रहें। देह, मन, बुद्धि आदि की सेवा में ही न लगे रहें, बल्कि ऐसा विवेक जगायें जो आत्मा के सानिध्य में ले जाये। विवेक का अर्थ है यह ज्ञान कि संसार उसी का नाम है जो निरंतर बदल रहा है। जो नित्य-अनित्य, सांत-अनंत में भेद करना सिखाये वही विवेक है।नित्य और अनंत के साथ एकत्व का अनुभव किए बिना कोई मुक्त नहीं हो सकता।
Friday, January 20, 2023
माया के जो पार हुआ है
Tuesday, December 27, 2022
दो का भेद जानता है जो
जीवन दो से बना है। यहाँ दिन के साथ रात, सुख के साथ दुःख भी है। देह से जो सुख लिया है, उसकी क़ीमत दुःख से चुकानी पड़ती है। आँखों ने सुंदर दृश्य दिखाए, एक वक्त आता है जब नयन धुंधला जाते हैं। नासिका ने हज़ारों सुगंधियों की खबर दी है, किसी वक्त वह खबर देने से मना कर सकती है, बंद-बंद रहती है। स्वाद चखे होंगे अनेक जिह्वा से, पर कभी कोई स्वाद ही नहीं आता या बिगड़ ही जाता है ज़ायक़ा मुख का। घुटनों ने भी जवाब देना है एक दिन, दाँतों ने भी गिर कर साथ छोड़ना है। कर्ण ऊँचा सुनने लगते हैं। दिल है कि रह-रहकर धड़कता है। पूछता है, यह क्या हो रहा है ? किंतु आत्मा तब भी साक्षी बनी देखती है। वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करती, उसे एक उपकरण मिला था, जो अब पुराना हो रहा है, जिसमें टूट-फूट हो रही है, वह रहेगी जब तक सम्भव होगा, फिर त्याग जाएगी मुक्त पंछी की तरह ! देह के माध्यम से मन व्यक्त होता है, स्थूल का आश्रय लिए बिना सूक्ष्म व्यक्त नहीं हो सकता। बिजली के बल्ब के बिना प्रकाश कैसे होगा, तार में लाख बिजली दौड़ती रहे। वृक्ष हुए बिना फूल कैसे खिलेंगे, लाख जीवन शक्ति छिपी रहे बीज में। हाथों के बिना कैसे ग्रंथ लिखे जाएँगे, विद्वान मन में कितना विचार मंथन करते रहें। सूक्ष्म की अभिव्यक्ति स्थूल से संभव है। विचार स्थूल है, भाव सूक्ष्म; दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। सूर्य की धूप बाहर बिखरी हो पर कमरे के भीतर गर्मी के लिए हीटर चाहिए। परमात्मा हर जगह मौजूद है पर उसकी कृपा को अनुभव करने के लिए मन चाहिए। आत्मा मन से भी सूक्ष्म है, उसके गुण मन में प्रकट होते हैं और बाहर तरंगों के रूप में शांति का प्रसाद मिलता है। जीवन दोनों का समन्वय है।
Thursday, December 22, 2022
एक तलाश सभी के भीतर
जाने-अनजाने हम सभी अपनी नियति की ओर बढ़ रहे हैं । नियति जो हमने खुद गढ़ी है; हमारे अपने कर्मों द्वारा, कर्म जो हमरी कामनाओं का परिणाम हैं। इस देह, मन, बुद्धि में जो शक्ति निहित है उसे जगाकर आत्मस्वरूप शिव से मिलना एक साधक की नियति है। हमारे भीतर जो ईश्वरीय चेतना है वह अपने मूल स्वरूप से जुड़ना चाहती है। प्रेम की तलाश इसी के कारण है, आनंद, शांति व पूर्णता की तलाश इसी के कारण है। हर व्यक्ति कुछ न कुछ पाना चाहता है ताकि वह पूर्ण हो सके, यह अधूरापन उसे सालता है। यह तलाश तब तक पूरी नहीं होती जब तक आत्मशक्ति अनंत से एकाकार न हो सके। दूसरे अंशों में अनंत का एक अंश होने के कारण हर आत्मा स्वयं की मुक्तता का अनुभव करना चाहती है, जो अभी देह व मन की सीमाओं में रहने के कारण बँधा हुआ महसूस करती है। यदि वह अपने निर्णय पूर्व संस्कारों के कारण न ले, आदतों के कारण न ले, विकारों के कारण न ले, मित्रों, परिवार व समाज के दबाव में न ले, बल्कि अपने कल्याण की भावना से स्वयं के लिए हितकर मार्ग पर चलने का साहस जुटा पाए तो वह अपने लक्ष्य को पा सकती है। अनंतता उसका लक्ष्य है और सीमा उसकी वर्तमान अवस्था, इसे तोड़कर वह अपने पूर्ण सामर्थ्य का अनुभव कर सकती है।
Sunday, May 22, 2022
गुह्यतम ज्ञान सुनाये कान्हा
देह देवालय है, देह में आत्मरूप से वही परमात्मा विद्यमान है. हम अहंकार के वशीभूत होकर इस सच से आँखें मूँदे रहते हैं. सदगुरू इस राज से पर्दा उठाते हैं और एक नयी दुनिया में हम कदम रखते हैं. जहाँ प्रेम का ही साम्राज्य है, जहाँ एक की ही सत्ता है, जहां अद्वैत मात्र सिद्धांत नहीं वास्तविकता है. जहाँ अपूर्व शांति है जहाँ जीवन अपने कोमलतम शुद्ध रूप में आँखें खोलता है. वह अनुपम लोक जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ नेति-नेति कहकर ही शास्त्र इशारा करते हैं. ऐसा एक लोक हमारे भीतर है, सदगुरू इसका भेद बताते हैं. कृष्ण इसे ही गुह्यतम ज्ञान कहते हैं.
Wednesday, April 6, 2022
कला ध्यान की सीखी जिसने
Friday, March 11, 2022
प्रेम गली अति सांकरी
Monday, January 10, 2022
ज्योति एक ही हर अंतर में
प्रमाद, अकर्मण्यता और सुविधाजीवी होना हमारे लिए त्यागने योग्य है। प्रमाद का अर्थ है जानते हुए भी देह, मन व आत्मा के लिए हितकारी साधनों को न अपनाना तथा अहितकारी कार्यों को स्वभाव के वशीभूत होकर किए जाना। अकर्मण्यता अर्थात अपने पास शक्ति व सामर्थ्य होते हुए भी कर्म के प्रति रुचि न होना तथा दूसरों पर निर्भर रहना। सुविधजीवी होने के कारण हम देह को अधिक से अधिक विश्राम देना चाहते हैं, पर इसका परिणाम दुखद होता है जब एक दिन देह रोगी हो जाती है। स्वयं के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान न होने के कारण आत्मा का पोषण करने की बजाय हम उसके विपरीत चलना आरम्भ कर देते हैं। आत्मा सभी के भीतर समान रूप से व्याप्त है, उसमें अपार शक्तियाँ छिपी हैं। हर किसी को उसके किसी न किसी पक्ष को उजागर करना है। साधक को हर क्षण सजग रहकर ऐसा प्रयत्न करना होगा कि ईश्वर का प्रतिनिधित्व उसके माध्यम से हो सके। वह ईश्वर के प्रकाश को अपने माध्यम से फैलने देने में बाधक ना बने।
Wednesday, January 5, 2022
ध्यान का जो अभ्यास करे
देह में रहते हुए देहातीत अवस्था का अनुभव ही ध्यान है। स्थूल इंद्रियों से स्थूल जगत का अनुभव होता है, सूक्ष्म इंद्रियों से स्वप्न अवस्था का अनुभव होता है। गहन निद्रा में स्थूल व सूक्ष्म दोनों का भान नहीं रहता। ध्यान उससे भी आगे का अनुभव है, जब निद्रा भी नहीं रहती, चेतना केवल अपने प्रति सजग रहती है। ध्यान के आरम्भिक काल में इस अवस्था का अनुभव नहीं होता है, पर दीर्घकाल के अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। एक बार इसका अनुभव होने के बाद भीतर स्मृति बनी रहती है। इसे ही भक्त कवि सुरति कहते हैं। इस अवस्था में गहन शांति का अनुभव होता है, मन में यदि कोई विचार आता है तो चेतना उसकी साक्षी मात्र होती है। देह में होने वाले स्पंदन और क्रियाएँ भी अनुभव में आती हैं, किंतु साक्षी भाव बना रहता है। जब विचार भी लुप्त हो जाएँ और देह का भान ही न रहे इसी अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि के अनुभव से सामान्य बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है। मन में स्पष्टता और आनंद का अनुभव होता है।
Tuesday, November 16, 2021
भीतर जब प्रकटेगी सहजता
बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर को छोडकर मन और इन्द्रियों रूपी संकरी नहरों में आ जाती है तो उसका संबंध सागर से छूट जाता है और वह व्याकुल हो उठती है. जब वह पुनः आत्मा के सागर में पहुँच जाती है तो सुखी हो जाती है.... ईश्वर से हमारा संबंध वैसा ही है जैसा बूंद या लहर का सागर से. प्रियजनों के स्नेह में जो आनंद झलकता है वह हमारी आत्मा का ही प्रकाश है. आत्मा का पूर्ण उद्घाटन ही मानव का साध्य है. राग-द्वेष अर्थात आसक्ति व विरक्ति मन के कार्य हैं, स्वास्थ्य-रोग आदि देह के, जो सुख-दुःख के रूप में हमें मिलते हैं. लेकिन वह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है. सहजता के प्राकट्य में आनंद है और उसी में हमारी शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव है.
Monday, May 24, 2021
ज्योतिपुंज है कोई भीतर
शास्त्रों में ईश्वर की तुलना आकाश से, आत्मा की सूर्य से, मन की चंद्रमा से और देह की पृथ्वी से की गई है। जिसमें सब कुछ टिका है, पर जो किसी पर आश्रित नहीं है, जब कुछ भी नहीं था तब भी जो था और कुछ नहीं होगा जो तब भी रहेगा वही आकाश है । जैसे कोई भव्य इमारत यदि खड़ी हो जाए तो आकाश की सत्ता जस की तस रहती है और गिर जाए तो भी कोई परिवर्तन नहीं होता। सूर्य के होने से ही धरती पर जीवन संभव है, इसी प्रकार आत्मा से ही देह में चेतनता है। जैसे चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है, मन, आत्मा का ही प्रतिबिंब है। मन बाहरी परिस्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। कभी कभी सूर्य के सामने बादल आ जाते हैं और धरती पर अंधकार छा जाता है। अहंकार ही वह बादल है जो देह को आत्मा के प्रकाश से वंचित रखता है। यदि मन सदा समता में रहे तो आत्मजयोति उसमें एक सी प्रकाशित होगी और देह भी उस ज्योति से वंचित नहीं होगी।
Sunday, April 18, 2021
'है' को जो मन स्वीकार करे
जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।
Wednesday, November 25, 2020
मुक्त हुआ है जो प्रमाद से
बुद्ध कहते हैं, प्रमाद मृत्यु है। प्रमाद अर्थात जानते हुए भी कि यह अनुचित है उससे छूटने का प्रयास न करना और जानते हुए भी कि यह सही है, उसे न करना। हम सभी जानते हैं रात्रि में जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, सात्विक और हल्का भोजन, स्वाध्याय, सेवा, सत्संग, नियमित व्यायाम और ध्यान; शारीरिक और मानसिक आरोग्य के लिए जरूरी है, पर क्या इसका पालन करते हैं। मृत्यु के क्षण में जब देह जड़ हो जाती है और चेतन शक्ति बाहर से उसे जरा सा भी हिला नहीं पाती, तब उसे वे पल स्मरण हो आते हैं जब जीवित रहते हुए इस देह को हिलाया जा सकता था, तब श्रम से बचते रहे। जब पैरों में दौड़ने की ताकत थी, हाथों में काम करने की शक्ति थी, मन में चिंतन का बल था, अब यह देह पत्थर की हो गई है, पर उस वक्त जब देह में स्पंदन था, मन को कितनी बार पत्थर सा नहीं बना लिया था, जिससे कोमल भाव झर सकते थे, जिससे मैत्री और करुणा के गीत फूट सकते थे, उससे द्वेष और रोष को उगने दिया था। मृत्यु के बाद वह सब याद आता है जो करना शेष रह जाता है, जो अभी किया जा सकता है, उस सबके प्रति जागना ही प्रमाद से मुक्त होना है।
Thursday, August 20, 2020
ध्यान का फूल खिले जीवन में
ध्यान हमें सिखाता है कि मन व्यर्थ के संकल्प-विकल्प करके अपनी ऊर्जा न गंवाए. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव शरीर और मन दोनों पर ही होता है जो बाद में रोग का रूप ले सकता है. ध्यान में हम मन के साथ अपने तादात्म्य को तोड़ते हैं और उसे निर्देशित करने में संभव होते हैं. इससे हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और मन में स्पष्टता का अनुभव होता है. ध्यान के बाद एकाग्रता बढ़ जाती है जिसका अच्छा प्रभाव हमारे सभी कार्यों पर पड़ता है. ध्यान हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ाता है. देह को स्वस्थ रखने के लिए जैसे व्यायाम आवश्यक है वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए मन का पूर्ण विश्राम आवश्यक है, जो ध्यान में ही मिल सकता है.