हमारे जीवन की बागडोर हमने विवेक के हाथों में सौंपी है या मन के, इसकी खबर हमें तब मिलती है, जब जीवन में व्यर्थ के कष्ट आते हैं। दिनचर्या यदि सुव्यवस्थित नहीं रखी, अनुशासन का पालन नहीं किया, स्वाद के वशीभूत होकर अखाद्य पदार्थों का सेवन किया। रात्रि को देर तक जागरण किया। समय को व्यर्थ गँवाया। अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं किया। अपनी ख़ुशी के लिए संसार से उम्मीदें रखीं, जो पूरी नहीं हुईं तो उसका अफ़सोस किया। ये सब बातें विवेक के विपरीत हैं। हम अपने आप को भूले न रहें। देह, मन, बुद्धि आदि की सेवा में ही न लगे रहें, बल्कि ऐसा विवेक जगायें जो आत्मा के सानिध्य में ले जाये। विवेक का अर्थ है यह ज्ञान कि संसार उसी का नाम है जो निरंतर बदल रहा है। जो नित्य-अनित्य, सांत-अनंत में भेद करना सिखाये वही विवेक है।नित्य और अनंत के साथ एकत्व का अनुभव किए बिना कोई मुक्त नहीं हो सकता।
Saturday, July 15, 2023
Monday, March 14, 2022
नीर-क्षीर-विवेके हंस
कौआ चला हंस की चाल तो भूला अपनी भी और हुआ हाल-बेहाल, यह कहावत तो हमने कई बार सुनी है और इसका सामान्य अर्थ भी सभी जानते हैं; यदि इसका आध्यात्मिक अर्थ जानना हो तो हम मन की तुलना कौए से कर सकते हैं और हंस की आत्मा से। हंस को नीर-क्षीर विवेकी कहा जाता है, वह जल मिले दूध से जल को छोड़कर केवल दूध ग्रहण कर लेता है। मन के पास यह विवेक नहीं होता। अक्सर हम मन की इच्छा को आत्मा की पुकार समझकर मन के बहकावे में आ जाते हैं। मन का झुकाव नकारात्मकता की ओर अधिक होता है, यदि कोई दस अच्छे काम करे पर एक ग़लत तो मन उस एक पर ही अपना ध्यान केंद्रित करता है, निरंतर कौए की तरह राग अलापता है पर उसमें कोई सार नहीं होता। आत्मज्ञानी बुरे से बुरे व्यक्ति में भी कोई न कोई अच्छाई ढूँढ लेता है, क्योंकि उसका ध्यान सदा सकारात्मकता की ओर ही होता है, वह हंस की तरह शांत रहता है और ज्ञान के मोती चुनता है।मन से की गयी भक्ति और श्रद्धा डोलती रहती है, विपत्ति आने पर वह मंदिरों के चक्कर लगाता है पर सुख के समय सब भूल जाता है। आत्मा सहज प्रेम स्वरूप है, उसमें टिकना ही भक्ति है। मन द्वंद्व का दूसरा नाम है, जहाँ दो हैं, वहाँ चुनाव भी होगा और संघर्ष भी, इसलिए भौतिकतावादी लोग जीवन को एक संघर्ष मानते हैं। आत्मा में एक ही है, वहाँ अद्वैत है, इसलिए आत्मज्ञानी जीवन को उत्सव कहते हैं।
Thursday, April 4, 2019
समाधान जब मिल जाएगा
Wednesday, March 27, 2019
ज्ञान के पथ पर चलता है जो
Tuesday, January 22, 2019
दो के पार वही बसता है
Friday, October 13, 2017
मन को अपना मीत बनाएं
Thursday, April 9, 2015
हर दुःख मिटता ज्ञान से
Wednesday, June 11, 2014
बिन विवेक नहीं होए प्रतीति
Sunday, July 7, 2013
दुनिया रंग रंगीली माधो...
लोभ सूक्ष्म रूप से हम पर आक्रमण करता है, हम सोचते हैं कि निष्काम कर्म कर रहे हैं, अथवा तो सेवा कार्य कर रहे हैं, पर उसके मूल में लोभ ही होता है, सम्मान का लोभ, सुविधा का लोभ, अपनी नजरों में अच्छा बनने का लोभ. साधक को इसके जाल से बचना होगा. लोभ की हल्की सी रेखा मानस को दूषित कर देती है. अपने मन का चैन गंवा कर यदि कोई कुछ पा भी ले तो व्यर्थ है, यह जगत एक स्वप्न है, इसकी अनुभूति हो जाने के बाद भी वह हमें भरमा लेता है, एक खिलौना दिखाकर जैसे हम बालक को भ्रमित कर देते हैं, उसी तरह. बाहर का सम्मान, लाभ हमारे भीतर के लोभ का ही मूर्त रूप है, वास्तव में बाहर जो भी हमारे साथ साथ घटता है, भीतर का प्रतिफलन ही है. जिस कार्य को किये बिना, जिस वाक्य को सोचे बिना, जिस जिस बात को बोले बिना हमारा काम चलता हो उसे न करना, न सोचना, न बोलना ही अच्छा है. अपने विवेक का आश्रय लेकर हर घटना से कुछ न कुछ सीखते हुए आगे बढ़ना है, ताकि अपना लक्ष्य और निकट आ जाये. वह जो निकट से भी निकटतम है, वही कभी दूर हो जाता है.