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Saturday, July 15, 2023

जब विवेक सधे जीवन में

हमारे जीवन की बागडोर हमने विवेक के हाथों में सौंपी है या मन के, इसकी खबर हमें तब मिलती है, जब जीवन में व्यर्थ के कष्ट आते हैं। दिनचर्या यदि सुव्यवस्थित नहीं रखी, अनुशासन का पालन नहीं किया, स्वाद के वशीभूत होकर अखाद्य पदार्थों का सेवन किया। रात्रि को देर तक जागरण किया। समय को व्यर्थ गँवाया। अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं किया। अपनी ख़ुशी के लिए संसार से उम्मीदें रखीं, जो पूरी नहीं हुईं तो उसका अफ़सोस किया। ये सब बातें विवेक के विपरीत हैं। हम अपने आप को भूले न रहें। देह, मन, बुद्धि आदि की सेवा में ही न लगे रहें, बल्कि ऐसा विवेक जगायें जो आत्मा के सानिध्य में ले जाये। विवेक का अर्थ है यह ज्ञान कि संसार उसी का नाम है जो निरंतर बदल रहा है। जो नित्य-अनित्य, सांत-अनंत में भेद करना सिखाये वही विवेक है।नित्य और अनंत के साथ एकत्व का अनुभव किए बिना कोई मुक्त नहीं हो सकता। 


Monday, March 14, 2022

नीर-क्षीर-विवेके हंस

कौआ चला हंस की चाल तो भूला अपनी भी और हुआ हाल-बेहाल, यह कहावत तो हमने कई बार सुनी है और इसका सामान्य अर्थ भी सभी जानते हैं; यदि इसका आध्यात्मिक  अर्थ जानना हो तो हम मन की तुलना कौए से कर सकते हैं और हंस की आत्मा से। हंस को नीर-क्षीर विवेकी कहा जाता है, वह जल मिले दूध से जल को छोड़कर केवल दूध ग्रहण कर लेता है। मन के पास यह विवेक नहीं होता। अक्सर हम मन की इच्छा को आत्मा की पुकार समझकर मन के बहकावे में आ जाते हैं। मन का झुकाव नकारात्मकता की ओर अधिक होता है, यदि कोई दस अच्छे काम करे पर एक ग़लत तो मन उस एक पर ही अपना ध्यान केंद्रित करता है, निरंतर कौए की तरह राग अलापता है पर उसमें कोई सार नहीं होता। आत्मज्ञानी बुरे से बुरे व्यक्ति में भी कोई न कोई अच्छाई ढूँढ लेता है, क्योंकि उसका ध्यान सदा सकारात्मकता की ओर ही होता है, वह हंस की तरह शांत रहता है और ज्ञान के मोती चुनता है।मन से की गयी भक्ति और श्रद्धा डोलती रहती है, विपत्ति आने पर वह मंदिरों के चक्कर लगाता है पर सुख के समय सब भूल जाता है। आत्मा सहज प्रेम स्वरूप है, उसमें टिकना ही भक्ति है। मन द्वंद्व का दूसरा नाम है, जहाँ दो हैं, वहाँ चुनाव भी होगा और संघर्ष भी, इसलिए भौतिकतावादी लोग जीवन को एक संघर्ष मानते हैं। आत्मा में एक ही है, वहाँ अद्वैत है, इसलिए आत्मज्ञानी जीवन को उत्सव कहते हैं। 


Thursday, April 4, 2019

समाधान जब मिल जाएगा


योग के साधक का लक्ष्य समाधि अवस्था प्राप्त करना है, समाधि अर्थात समाधान !  जब-जब हम कुछ जानते हैं, उस समय समाधान अवस्था में होते हैं. यह चित्त का वह धर्म है जो उसकी सभी भूमियों में रहता है. चित्त का अर्थ है, अंतःकरण यानि मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार ! मन से तर्क-वितर्क करते हैं, बुद्धि से निर्णय लेते हैं, यहाँ चित्त से तात्पर्य है स्मृति. संस्कार भी चित्त में रहते हैं,  तथा अहंकार से अहंता का बोध होता है. चित्त की पांच भूमियाँ होती हैं, क्षिप्त, मूढ़, एकाग्र, विक्षिप्त और निरुद्ध. क्षिप्त चंचल अवस्था है जिसमें मन में रजो व तमो दोनों गुण होते हैं. इसमें विवेक की कमी होती है. मूढ़ अवस्था में तमोगुण अधिक होता है. यह आलस्य, तंन्द्रा से भरी विवेक शून्य अवस्था है. विक्षिप्त अवस्था में मन एक विषय में रुक जाता है, रजोगुण तथा तमोगुण बने रहते हैं. एकाग्र अवस्था में सतोगुण बढ़ जाता है, मन एक ही विषय पर स्थिर रहता है. निरुद्ध अवस्था में चित्त स्थिर हो जाता है. पूरी तरह से वृत्तियाँ रुक जाती हैं




Wednesday, March 27, 2019

ज्ञान के पथ पर चलता है जो


संत कहते हैं जैसे एक ही धातु से भिन्न भिन्न आकार व क्षमता वाले उपकरण बनाये जा सकते हैं,  एक धातु से ही भगवान की मूर्ति भी बन सकती है और हथियार भी गढ़े जा सकते हैं. उसी प्रकार चेतना शक्ति एक ही है उसी से प्रेम भी प्रकट हो सकता है और नफरत भी. अक्षर वही हैं, एकता  का संदेश भी दे सकते हैं और वैमनस्य की आग भी फैला सकते हैं. सुर और असुर एक ही ऋषि की संताने हैं. यह हमारे ज्ञान पर निर्भर करता है कि हम किसे चुनते हैं और किस वस्तु का प्रयोग किस प्रकार करते हैं. अंततः अज्ञान ही सारे क्लेशों के मूल में है और विवेक ज्ञान द्वारा ही इस अज्ञान को मिटाया जा सकता है. अनुभव के स्तर पर होने वाला ज्ञान ही वास्तव में विवेक है, जो सत्य-असत्य, सही-गलत, नित्य-अनित्य का भेद करना सिखाता है. ऐसा ज्ञान ही वक्त पड़ने पर हमारे काम आता है.

Tuesday, January 22, 2019

दो के पार वही बसता है


२२ जनवरी २०१९  
परमात्मा हमें दोनों हाथों से दे रहा है, विवेक और वैराग्य ही उसके दो हाथ हैं. विवेक के द्वारा हमें सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य, चिन्मय-मृण्मय में भेद करना सिखाता है. वैराग्य के द्वारा वह हमें अपने घर में लौटा लेना चाहता है. अभी हम असत्य में जी रहे हैं, अनित्य के प्रति हमारे मन में राग है, मृण्मय देह को ही हमने अपना सर्वस्व मान लिया है. वैराग्य के अभाव में हम अपने घर से बहुत दूर निकल आये हैं. जगत हमें लुभाता है पर उसके कारण कितने दुखों का सामना हमें करना पड़ता है. चिन्मय के प्रति प्रेम ही वैराग्य का परिणाम है. वही सत्य और नित्य है. स्वयं परमात्मा सारे द्वन्द्वों से परे है, पूर्ण विश्राम वहीं है.

Friday, October 13, 2017

मन को अपना मीत बनाएं

१३ अक्तूबर २०१७ 
संतजन कहते हैं, हमारे सारे दुःख स्वयं के ही बनाये हुए हैं. हमारा मन विरोधी इच्छाओं का जन्मदाता है. मन स्वयं ही स्वयं के विपरीत मार्ग पर चलता है और स्वयं ही स्वयं को दोषी ठहराता है. कितना अच्छा हो कि बुद्धि में विवेक जागृत हो और मानव सदा अपने हित में ही निर्णय ले. वह श्रेय के मार्ग का पथिक हो. प्रेय के मार्ग पर चलकर स्वयं अपनी ही हानि करते हुए हम न जाने कितनी बार वही-वही भूलें करते हैं, जो हमें स्वधर्म से दूर ले जाती हैं. अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए हम मन को शुद्ध बना सकते हैं. निर्मल मन में ही आत्मा की झलक मिलती है. आत्मज्ञान होने के बाद ही व्यक्ति का वास्तविक जीवन आरम्भ होता है. 

Thursday, April 9, 2015

हर दुःख मिटता ज्ञान से

दिसम्बर २००८ 
साधक वही है जो विवेक का उपयोग करके अपने भीतर व बाहर को हर दुःख से सुरक्षित करना चाहता है. दुःख के दो ही कारण हैं पहला अज्ञान दूसरा इच्छा. मन से पार जो परम तत्व है उसमें स्थित हो जाना ही ज्ञान है, परम विवेक है. विवेक नित्य-अनित्य में भेद करना सिखाता है. अनित्य के पीछे भागना मानो परछाई के पीछे भागना है, जिसमें दुःख ही मिलता है. नित्य की तलाश में जाना भी नहीं पड़ता, अनित्य को छोड़कर जो शेष रहता है वही ‘वह’ है. जिस क्षण हमें लगे कि इस जग में कुछ भी पाने योग्य नहीं रह गया है तो जो भाव भीतर बचे वही परमात्मा है. जिस क्षण लगे कि इस जग में सभी कुछ अनित्य है, परिवर्तनशील है, अनित्य पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना ही है. विश्वास केवल उस एक तत्व पर किया जा सकता है जो नित्य है, शाश्वत है, जिसकी झलक ध्यान में मिलती है, जो हर वक्त हमारे साथ है, तो उससे मुलाकात हो गयी.

Wednesday, June 11, 2014

बिन विवेक नहीं होए प्रतीति

अप्रैल २००६ 
चंचल बालक की तरह मन संकल्प-विकल्प करता है पर समझदार माँ की तरह बुद्धि उसे सम्भालती है, मन एक निरंकुश अश्व की तरह छलांगे मरना चाहता है पर सवार की तरह बुद्धि उसे सही रास्ते पर लाकर नियमित चाल से चलना सिखाती है. साधक अपने मन अथवा विचारों का ही तो प्रतिबिम्ब है. मन एक आईने की तरह होता है जिसमें विचार झलकते हैं, यदि बुद्धि का साथ हो तो मन का दर्पण उजला रहता है अथवा वह धुंधला जाता है और वह अपने आप को ही नहीं पहचान पाता, सब अस्पष्ट हो जाता है. और ऐसा मन लिए वह नये संकल्प करता है और धीरे-धीरे एक ऐसे कुचक्र में फँसता जाता है जिसमें से निकलना कठिन होता जाता है, विवेक को प्रश्रय दिए बिना उद्धार नहीं होता.   

Sunday, July 7, 2013

दुनिया रंग रंगीली माधो...

अक्तूबर २००४  
लोभ सूक्ष्म रूप से हम पर आक्रमण करता है, हम सोचते हैं कि निष्काम कर्म कर रहे हैं, अथवा तो सेवा कार्य कर रहे हैं, पर उसके मूल में लोभ ही होता है, सम्मान का लोभ, सुविधा का लोभ, अपनी नजरों में अच्छा बनने का लोभ. साधक को इसके जाल से बचना होगा. लोभ की हल्की सी रेखा मानस को दूषित कर  देती है. अपने मन का चैन गंवा कर यदि कोई कुछ पा भी ले तो व्यर्थ है, यह जगत एक स्वप्न है, इसकी अनुभूति हो जाने के बाद भी वह हमें भरमा लेता है, एक खिलौना दिखाकर जैसे हम बालक को भ्रमित कर देते हैं, उसी तरह. बाहर का सम्मान, लाभ हमारे भीतर के लोभ का ही मूर्त रूप है, वास्तव में बाहर जो भी हमारे साथ साथ घटता है, भीतर का प्रतिफलन ही है. जिस कार्य को किये बिना, जिस वाक्य को सोचे बिना, जिस जिस बात को बोले बिना हमारा काम चलता हो उसे न करना, न सोचना, न बोलना ही अच्छा है. अपने विवेक का आश्रय लेकर हर घटना से कुछ न कुछ सीखते हुए आगे बढ़ना है, ताकि अपना लक्ष्य और निकट आ जाये. वह जो निकट से भी निकटतम है, वही कभी दूर हो जाता है.

Saturday, July 14, 2012

एक रहस्य सबके भीतर


साधक को किसी भी बात पर परेशानी होती ही नहीं, आनंद का स्रोत यदि भीतर मिल गया हो तो छोटी-छोटी बातों का असर नहीं होता, हम किसी महान उद्देश्य को पाने के लिये यहाँ भेजे गए हैं. वह रहस्य हमारे भीतर है, उसके ही निकट हमें जाना है, जीवन के हर पल का उपयोग उस परम सत्य की खोज में हो सके तो ही जीवन सफल है. हमारा रोजमर्रा का कार्य भी उसी ओर इंगित करे, हमारे विचार, हमारा आचरण भी वही दर्शाये, हम जो भी अनुभव करें, सच्चे मन से करें, सजग होकर करें,  विवेक को जगाएं. मिथ्या अहं को त्याग कर जीवन को एक विराट परिदृश्य में देखें. हम सभी श्वास के द्वारा एक दूसरे से जुड़े हैं, हमारी चेतना परम चेतना का ही अंश है. हम अपरिमित शक्ति के स्वामी हैं !


Thursday, June 21, 2012

जीवन सरस बनाये योग


अप्रैल २००३ 
जब हम विवेक का आश्रय लेते हैं तो योग अपने आप सधने लगता है. पहले जीवन में कर्मयोग आता है, क्योंकि हमारे कर्म तब स्वार्थ वश नहीं होते, सहज प्राप्त कर्म ही करते हैं. और सिर्फ कर्म करने के लिये कर्म न कि फल की इच्छा के लिये. निष्काम भाव से किया गया कर्म बांधता नहीं है. तब भक्ति का उदय होता है, क्योंकि हृदय यदि शुद्ध हो तभी ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है. भक्ति से हृदय में सहज ज्ञान होने लगता है, कृष्ण ने कहा है कि वह अपने भक्त का बुद्धियोग करा देते हैं. ज्ञान हमें निर्देशित करे तो मन नियंत्रण में रहेगा. हंस की नीर-क्षीर विवेकी दृष्टि हमें तीनों तापों से बचा लेती है. तब असार को तज हम सार को ग्रहण करते हैं, व्यर्थ के चिंतन से, व्यर्थ की चर्चा से, व्यर्थ के आहार से भी सहज ही बुद्धि बचा लेती है. तब जीवन सरस व सरल होगा, कमियों को दूर करते हुए धैर्यवान और क्षमाशील बनने की ओर सहज ही प्रवृत्ति होगी.

Monday, October 24, 2011

विवेक और संयम


जून २००२ 
माया रूपी रात्रि में संयम रूपी ब्रेक और विवेक रूपी लाइट लगी जीवन की गाड़ी यदि हम चलायें तो दुर्घटना से बचेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अविचल रहेगी. कामनाओं के वेग को जो रोक सके और क्रोध को जो सही सही देख सके वही सुख-दुःख के पार आनंद को उपलब्ध हो सकता है. हमारी चेतना का विस्तार भी तभी होता है... अभी तो हम मन के छोटे से हिस्से में जीते हैं, अचेतन मन में क्या चल रहा है हमें पता ही नहीं होता तभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसे हमने करना नहीं चाहा था. मन की गहराई में जितना-जितना प्रवेश होगा, भीतर प्रकाश बढ़ेगा अर्थात विवेक रूपी टार्च हमें मिल जायेगी.

Friday, July 15, 2011

यथार्थ और आदर्श

जनवरी २००१ 
मानव के पास भाव, विचार, और विवेक का बल है, लेकिन वह उसका सदुपयोग नहीं कर पाता. अपने बाहरी व्यक्तित्व को सजाने- संवारने का प्रयत्न तो करता है किन्तु भावनात्मक, बौद्धिक और आत्मिक व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास नहीं करता, सो आडम्बर और पाखंड पूर्ण जीवन जीता है. भीतर से हम जितना सत्य के निकट होंगे, यथार्थ का सामना करेंगे, वास्तविकता को पहचानेगें उतना ही आंतरिक व्यक्तित्व व्यक्त होगा, अन्यथा दोहरी जिंदगी जीने को विवश होंगे. हमें अपने आदर्शों को  मूर्त रूप देना होगा तथा उसे जीवन में यथासम्भव उतरना होगा. सच्चा आनंद, मन की शांति का अनुभव हमें तभी होता है जब हम आदर्शों के निकट होते हैं.

Friday, July 1, 2011

बुद्धि कैसी हो


मैं, मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन करने वाली बुद्धि अनर्थकारिणी है. परमार्थ तत्व को मानने वाली, विवेक व वैराग्य उत्पन्न करने वाली, ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसंधान करने वाली, प्रकृति के रहस्यों को समझने व सराहने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है. ईश्वर का ऐश्वर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है, ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और उस पर स्थित बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, जंगल के रूप में और उसका वैभव फलों के मधुर रस, पंछियों की मधुर बोली, और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है, इस अनंत ईश्वरीय प्रसाद की कद्र करने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है.