भगवान बुद्ध कहते हैं हमें धरती से सीखना चाहिए. चाहे मानव इस पर सुगन्धित द्रव्य डालें या दुर्गंधित कचरा कूड़ा, धरती बिना किसी राग-द्वेष के दोनों को स्वीकारती है. जब मन में अच्छे या बुरे विचार आएं तो किसी में भी उलझना नहीं है, उनके गुलाम नहीं बनना है. हम जल से भी सीख सकते हैं, जल से जब गन्दे वस्त्रों या वस्तुओं को धोते हैं तो यह उदास नहीं होता. अग्नि पवित्र या अपवित्र दोनों पदार्थों को बिना किसी भेदभाव के जलाती है. हवा सुगन्ध या दुर्गन्ध दोनों को ही ग्रहण करती है. इन्हीं पांच तत्वों से हमारी देह बनी है. इसी प्रेममयी करुणा से हमें क्रोध को जीतना है. यही करुणा बदले में बिना किसी मांग के दूसरों को ख़ुशी प्रदान करने का साधन हो सकती है. दयालुता से भरा आनंद ही द्वेष को दूर कर सकता है. जब हम दूसरों की ख़ुशी में खुश होते हैं और उनकी सफलता चाहते हैं तभी यह आनंद हमारे भीतर पैदा होता है.
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Wednesday, September 30, 2020
Tuesday, March 5, 2019
राग-द्वेष से मुक्त हुआ जो
अविद्या अथवा मोह हमें यथार्थ ज्ञान से वंचित रखता है. सुख
का प्रलोभन हमें रागी बनाता है और दुःख का भय द्वेषी. यदि हमारे कर्म राग, द्वेष
अथवा मोह से परिचालित होंगे तो कर्मों के बंधन से हमें कोई बचा नहीं सकता. इसके
विपरीत यदि हम सहज भाव से अपने नियत तथा कर्त्तव्य कर्म आदि करते हैं तो उसका कोई कर्माशय
नहीं बनता, जिसका फल हमें बाद में भोगना पड़े. राग और द्वेष ही वे दो असुर हैं
जिनके साथ एक साधक को अपने भीतर युद्ध लड़ना होता है. यदि कोई भी प्रवृत्ति राग
प्रेरित होगी तो उसका संस्कार और गहरा हो जायेगा और बाद में उससे मुक्त होने के
लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा. इसी प्रकार यदि दुःख से बचने के लिए हम उद्यम
से द्वेष करते हैं तो प्रमाद का संस्कार गहरा होता जाता है. कृष्ण कहते हैं, राग और द्वेष
मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु है, जो प्रत्येक इंद्रिय के
प्रत्येक विषय में स्थित रहते हैं, इनसे से ही काम-क्रोध की
उत्पत्ति होती है, जो समस्त विकारों के मूल हैं। जिसके
मन में कामना है, वह कभी सच्चे
अर्थ में सुखी नहीं हो सकता। कामना की पूर्ति में एक बार सुख की लहर-सी आती है, पर कामना ऐसी
अग्नि है, जो प्रत्येक अनुकूलता
को आहूति बनाकर अपना महत्व बढ़ाती रहती है। जितनी कामना की पूर्ति होती है, उतनी यह अधिक बढ़ती
है। कामना अभाव की स्थिति का अनुभव कराती है। जहां अभाव है, वहीं प्रतिकूलता
है और प्रतिकूलता ही दुख है। कामना कभी पूर्ण होती ही नहीं, इसलिए मनुष्य कभी
दुख से मुक्त हो ही नहीं सकता। इसलिए साधक को इन काम-क्रोध के मूल राग-द्वेष का
त्याग करना है.
Sunday, August 27, 2017
घट-घट पावन प्रेम छुपा है
२८ अगस्त २०१७
हर आत्मा प्रेम से
उपजी है, प्रेम ने उसे सींचा है और प्रेम ही उसकी तलाश है. माता-पिता शिशु की देह
को जन्म देते हैं, आत्मा उसे अपना घर बनाती है. शिशु और परिवार के मध्य प्रेम का
आदान-प्रदान उस क्षण से पहले से ही होने लगता है जब बालक बोलना आरम्भ करता है. अभी
उसमें अहंकार का जन्म नहीं हुआ है, राग-द्वेष से वह मुक्त है, सहज ही प्रेम उसके
अस्तित्त्व से प्रवाहित होता है. बड़े होने के बाद जब प्रेम का स्रोत विचारों,
मान्यताओं, धारणाओं के पीछे दब जाता है, तब प्रेम जताने के लिये शब्दों की
आवश्यकता पडती है. जब स्वयं को ही स्वयं का प्रेम नहीं मिलता तो दूसरों से प्रेम
की मांग की जाती है. दुनिया तो लेन-देन पर चलती है इसलिए पहले प्रेम को दूसरे तक पहुँचाने
का आयोजन किया जाता है. यह सब सोचा-समझा हुआ नहीं होता, अनजाने में ही होता चला
जाता है. प्रेम पत्रों में कवियों और लेखकों के शब्दों का सहारा लिया जाता है.
दूसरे के पास भी तो प्रेम का स्रोत भीतर छिपा है, उसे भी तलाश है. जीवन तब एक
पहेली बन जाता है.
Sunday, July 16, 2017
नित नूतन जब जग लगता है
१७ जुलाई २०१७
हम जो भी करते हैं, सोचते हैं या कहते हैं, वह निन्यानवे प्रतिशत बासी होता है.
हम पुराने को ही दोहराते रहते हैं. सुबह अलार्म सुनकर बिस्तर छोड़ते ही यह
प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. अभ्यास वश ही पैर चप्पल तलाशते हैं, फिर अभ्यास वश ही
ब्रश आदि, देह को जिन कामों का अभ्यास हो गया है, वह मशीन की तरह करता जाती है.
फिर कोई विचार उड़ता हुआ सा मन में आ जाता है, उसके प्रति प्रतिक्रिया भी पूर्व के
अनुसार ही होती है. हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी होता है वह भी तो दोहराता है स्वयं
को. एक चक्र की भांति हम उसमें ऊपर-नीचे होते रहते हैं, कहीं पहुँचते नहीं. कुछ नया
हो तभी मानव बुद्धि की सार्थकता है. प्रतिदिन या फिर प्रतिपल नया होने के लिए प्रकृति
को क्या कुछ विशेष करना पड़ता है, इतना ही तो कि परिवर्तन का वह प्रतिरोध नहीं करती.
जीवन को जिस रूप में वह आता है सहज स्वीकारने से नयापन बना ही रहता है. जब कोई पूर्वाग्रह,
पूर्व मान्यता न हो, अपनी या दूसरों की विशेष इमेज के प्रति कोई राग न हो तब हर पल
कुछ नया भी होगा तो वह सहज स्वीकार्य होगा.
Thursday, April 20, 2017
मुक्त हुआ मन कब डोले
२१ अप्रैल २०१७
शास्त्रों के अनुसार अनंत जन्मों के हमारे संचित कर्मों में से थोड़ा सा
प्रारब्ध कर्म लेकर हम इस दुनिया में आते हैं. जिनके अनुसार जन्म, आयु, सुख-दुःख आदि हमें मिलते
हैं. जब तक यह ज्ञान नहीं होता कि मनसा,
वाचा, कर्मणा हर कर्म का फल
मिलने ही वाला है, हम नये-नये कर्म बांधते चले जाते हैं, जिनका हिसाब चुकाना ही होगा.
एक बार यह ज्ञान हो जाने के बाद हमें केवल पुराने कर्मों का हिसाब पूरा करना है. स्वयं
को सदा मुक्त अनुभव करने के लिए कर्मों के जाल से छूटना ही एक मात्र उपाय है. जीवन
में कैसी भी परिस्थिति आये मन को समता भाव में रहकर उससे पार हो जाना ही कर्मों से
छूटना है, अन्यथा भविष्य के लिए एक नया बीज बो दिया जायेगा. जिस किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के
साथ राग अथवा द्वेष का भाव मन में रहता है, उसका सही मूल्यांकन हम कभी
नहीं कर सकते. राग अथवा द्वेष बुद्धि को धूमिल कर देते हैं और हम अनजाने ही नई
रस्सियों में जकड़े जाते हैं.
Tuesday, April 18, 2017
जीवन का जो मर्म जान ले
१९ अप्रैल २०१७
यह संसार हमें मिला
है ताकि हम त्रिविध दुखों से बच सकें. आदिभौतिक, आदिदैविक व आध्यात्मिक दुखों से
पूर्ण मुक्ति के लिए ही यह जीवन हमें मिला है. जब तक यह ज्ञान हमें नहीं है, तब तक
हम नये-नये दुखों का निर्माण करते रहते हैं. पतंजलि के अनुसार अविद्या, अस्मिता,
राग, द्वेष तथा अभिनिवेश इन पंच क्लेशों से घिरे रहकर हम कभी भी दुखों से मुक्त
नहीं हो सकते. अविद्या का अर्थ है अनात्म को आत्म मानना, अर्थात जो हम नहीं हैं
उसे अपना स्वरूप मानना. अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध मानना, दुःख को सुख
मानना भी अविद्या है. अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। दूसरे शब्दों में अविद्या
भ्रांत ज्ञान है. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को अर्थात् अहंकार बुद्धि और
आत्मा को एक मान लेना. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और
उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग है. चौथा क्लेश द्वेष है। दु:ख या
दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है।
क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को अनुचित अथवा
अपने प्रतिकूल मान लेते हैं। जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश सभी को समान रूप से होता
है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरंजीवी रहे। इसी जिजीविषा
के वशीभूत होकर हम न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करते है और विचार न कर पाने के कारण
नित्य नए क्लेशों में बँधते जाते हैं।
Sunday, June 29, 2014
एक ऊर्जा भीतर पलती
दिसम्बर २००६
संतजन
कहते हैं, मनोरंजन पर आत्म रंजन का, भोग पर योग का, राग पर विराग का तथा अज्ञान पर
ज्ञान का अंकुश रहना चाहिए. अंकुश ढीला पड़ भी जाये तो बस उतनी देर जितनी देर एक
लहर पानी में उठे और गिरे. आत्मा के स्तर पर सभी प्राणी एक दूसरे से जुड़े ही हैं,
यह बात जब एक बार अनुभव के स्तर पर जान ली जाती है तो सदा के लिए शांति की एक
कुंजी हमारे हाथ लग जाती है. इस ज्ञान के बाद आत्म रंजन, योग और विराग स्वत ही मिल
जाते हैं. हम जब किसी न किसी उद्देश्य पूर्ण कार्य में लगे रहते हैं तो भीतर एक
ऊर्जा स्वयं ही निर्मित होती है, और जब जीवन में कोई ध्येय न हो तो वह ऊर्जा मंद पड़
जाती है. यही ऊर्जा योग है.
Sunday, December 22, 2013
खुल जाये हर गाँठ
मई २००५
हमारे
मन के चार खंड हैं. संज्ञा मानस का पहला खंड है, अर्थात कोई वस्तु सम्मुख आने पर
उसकी प्रतीति होना, दूसरा खंड पहचान करने का काम करता है, तीसरा खंड है संवेदना
जगाने का, चौथा खंड है प्रतिक्रिया करने का, तभी राग-द्वेष का जन्म होता है. ऊपर-ऊपर
से लगता है किसी बाहरी कारण से राग-द्वेष जगता है पर सच्चाई यह है कि इन्हें हम
स्वयं जगाते हैं. भोक्ता भाव जब तक भीतर है गांठें बंधती ही रहेंगी, साक्षी होकर
उन्हें देखते ही वे खुलनी शुरू हो जाती हैं. हर संवेदना क्षण भंगुर है, नष्ट हो ही
जाने वाली है फिर क्यों उसके प्रति राग जगाना या द्वेष जगाना. ऐसा करना सीखने पर
कर्म संस्कार नहीं बनते, और यही तो साधक का लक्ष्य है.
Monday, October 14, 2013
सांसों की माला में
मार्च २००५
‘ईश्वर
को उसकी कृपा के बिना नहीं पाया जा सकता’. ध्यान में जब हम श्वास को देखते हैं,
देखते-देखते वह सूक्ष्म हो जाती है, सूक्ष्मतर होती जाती है, उसे देखने वाला मन भी
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है. नासिका के अग्रभाग पर आती-जाती हुई श्वास एक
पतले धागे की तरह प्रतीत होती है, बहुत सूक्ष्म धागे की नाईं वह भीतर वह बाहर आती
जाती है. मन में कोई विचार उठा तो श्वास
पर उसका प्रभाव होता है. अप्रिय विचार हो तो ऊष्मा का, गर्मी का, जलन का अहसास
होता है, सुखद विचार हो तो ठंडक या सुख का अहसास होता है. मन में उठने वाले
विचारों के साथ-साथ श्वास की गति भी बदल जाती है. वह सम नहीं रह जाती, कभी तेज हो
जाती है, कभी कठोर हो जाती है. मन पर कोई आघात होते ही उसका पहला भाग सजग हो जाता
है, दूसरा भाग यह जानना चाहता है कि यह क्या है, तीसरा भाग उसके प्रति राग-द्वेष
जगाता है, चौथा भाग उस राग-द्वेष के प्रति संवेदना जगाता है. हम देखते हैं कि देह
में कुछ भी स्थूल नहीं है सब कुछ तरंग मय है, मन के विचार भी आते हैं और नष्ट हो
जाते हैं. यदि पहले कदम पर ही हम सजग हो जाएँ कि जो भी सूचना बाहर से मिली है, उस
पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है तो हम दुखों से सदा के लिए बच सकते हैं.
Thursday, September 26, 2013
सुख-दुःख स्वयं जगाता है मन
मार्च २००५
ज्यादातर
समय हमारा मन अतीत व भविष्य की उधेड़बुन में लगा रहता है, संतजन कहते हैं जो मन को
साक्षी भाव से देख सकता है, उसके मन में स्थिरता आती है. शरीर की संवेदनाओं के
प्रति सजग होते होते साधक को पता चलता है की स्थूलपना खत्म होता जा रहा है, तरंगे
बनती हैं फिर खत्म होती हैं. क्रोध, लोभ आदि विकार भी स्थायी नहीं हैं, शरीर, मन,
बुद्धि सभी बदल रहे हैं. कान में ध्वनि तरंग पड़ते ही भीतर भी एक तरंग उठती है. आंख
में जब देखते हैं तो भीतर एक तरंग उठती है. यदि दृश्य सुखद हुआ तो मन उसे पसंद
करने की तरंग जगाता है, यदि दुखद हुआ तो
दुखद संवेदनाएं जगाता है. ऊपर से लगता है हम दुखद या सुखद घटना के प्रति
प्रतिक्रिया जगाते हैं पर वास्तव में संवेदनाओं के प्रति ही प्रतिक्रिया करते हैं.
गहराई में जाकर हम देखते हैं कि दुःख या सुख हम अपनी प्रतिक्रियाओं के कारण ही
अनुभव करते हैं, जब हम यह देखते हैं की ये संवेदनाएं क्षणभंगुर हैं तो हम
राग-द्वेष से मुक्त होने लगते हैं. हम जानने लगते हैं कि विकार जगते ही मन की
शांति भंग होती है, तब हम विकार से मुक्त होने लगते हैं.
Wednesday, September 11, 2013
समता मन में बनी रहे
फरवरी २००५
हमारा अंतर्मन अथवा तो अंतःकरण हर क्षण
निर्मित होता रहता है, शरीर पर होने वाली सूक्ष्म संवेदनाओं को ग्रहण करता हुआ यह
कभी राग जगाता है, तो कभी द्वेष जगाता है. पल-पल हम संस्कार एकत्र करते जाते हैं,
कर्मों के बीज बोते जाते हैं. ध्यान में हमारे संस्कार शुद्ध होते हैं कुछ व्यर्थ
के संस्कार नष्ट भी होते हैं. पुनः हमें संसार में आना है, नये-नये संस्कार बनेंगे,
पर जब हम सजग रहते हैं, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितयों में सम रहते हैं, अंतःकरण का
निर्माण हमारे ही हाथों में रहता है. इसी पर हमारा भविष्य टिका है.
Thursday, May 9, 2013
भाव पुष्प से होती पूजा
सितम्बर २००४
साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है
और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का
पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ
कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो
श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर
प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई
फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस
चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को
ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प, श्रद्धा का दीपक, आस्था का तिलक लगा
कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती
है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.
Wednesday, October 10, 2012
जग वैसा जैसा हम देखें
जब तक हमारे भीतर विकार है तभी
तक हमारी दृष्टि दूसरों में विकार देखती है. जब हमारा चित्त पूरी तरह निर्मल हो
जाता है तो दुनिया में कहीं भी कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती. संतों का ऐसा कहना है.
यदि दिखाई दे भी तो उसके प्रति द्वेष नहीं जगता बल्कि स्नेह से उसे दूर करने का
प्रयास अथवा तो शक्ति वह जगत को देता है. हम दोष देखकर स्वयं को ही पीड़ित करते
हैं, और अपनी ऊर्जा का ह्रास करते हैं. हमें प्रतिक्रिया व्यक्त न करके उसके लिए
कुछ करना होगा. यदि हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं तो अपने मन की शांति तो
बनाये रख ही सकते हैं, उतना ही पर्याप्त होगा. यह जगत वैसा ही दिखाई पड़ता है जैसा हम
इसे देखना चाहें, यह जगत उस प्रभु का ही तो उपहार है, वह स्वयं भी इसके कण-कण में
ओत-प्रोत है. “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मुरति देखि तिन तैसी”. हम अपने अपने
स्वभाव, रूचि और मन स्थिति के अनुसार एक कल्पना गढ़ लेते हैं और अस्तित्त्व की आवाज
को अनसुना करते हैं, जो मन की कल्पनाओं से परे है, वह आनन्दमय, नित्य, शुद्ध, बुद्ध
और अनंत है. आकाश की तरह वह सभी कुछ अपने में समेटे हुए है अच्छा-बुरा उसके लिए
समान है, वह राग-द्वेष से परे है. उसके सान्निध्य में रहकर हृदय में कोई अशुभ
विचार टिक नहीं सकता, तत्काल भीतर से एक संदेश आता है और कोई सद्वचन जैसे हवा के
झोंके की तरह आकर उस नकारात्मकता को अपने साथ लिए जाता है.
Friday, July 1, 2011
बुद्धि कैसी हो
मैं, मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन करने वाली बुद्धि अनर्थकारिणी है. परमार्थ तत्व को मानने वाली, विवेक व वैराग्य उत्पन्न करने वाली, ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसंधान करने वाली, प्रकृति के रहस्यों को समझने व सराहने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है. ईश्वर का ऐश्वर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है, ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और उस पर स्थित बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, जंगल के रूप में और उसका वैभव फलों के मधुर रस, पंछियों की मधुर बोली, और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है, इस अनंत ईश्वरीय प्रसाद की कद्र करने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है.
Tuesday, June 28, 2011
सहज सुख
जुलाई २०००
धर्म जब जीवन में बढ़ता है तो इच्छाओं पर लगाम लगती है, वे मर्यादित होती हैं. कोई सीख दे तो फौरन प्रतिकार करने की इच्छा होती है, इसी तरह कोई गलती करे तो टोकने की इच्छा होती है, जो अनावश्यक है. चुप रह जाने की इच्छा बोलने की इच्छा से ज्यादा श्रेष्ठ है. अंतःकरण को शुद्ध व शांत रखने के लिये अनावश्यक इच्छाओं का पोषण नहीं करना चाहिए. मन जब शांत रहेगा तो सामर्थ्य बढ़ता है, हम सारे कार्य थोड़े से प्रयास से ही कर पाते हैं, कार्य बोझ नहीं लगता, थके बिना सहज ही हम अपने कर्तव्य को निभाते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिर्वचनीय अनुभूति होती है, सुख की अनुभूति... वह सुख इच्छा पूर्तिवाला क्षणिक सुख नहीं है, वह निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपनेआप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है... फिर न कोई अपना रह जाता है न पराया, न द्वेष न राग, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है, कहीं कोई संशय बाकी नहीं रहता.
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