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Tuesday, January 22, 2019

दो के पार वही बसता है


२२ जनवरी २०१९  
परमात्मा हमें दोनों हाथों से दे रहा है, विवेक और वैराग्य ही उसके दो हाथ हैं. विवेक के द्वारा हमें सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य, चिन्मय-मृण्मय में भेद करना सिखाता है. वैराग्य के द्वारा वह हमें अपने घर में लौटा लेना चाहता है. अभी हम असत्य में जी रहे हैं, अनित्य के प्रति हमारे मन में राग है, मृण्मय देह को ही हमने अपना सर्वस्व मान लिया है. वैराग्य के अभाव में हम अपने घर से बहुत दूर निकल आये हैं. जगत हमें लुभाता है पर उसके कारण कितने दुखों का सामना हमें करना पड़ता है. चिन्मय के प्रति प्रेम ही वैराग्य का परिणाम है. वही सत्य और नित्य है. स्वयं परमात्मा सारे द्वन्द्वों से परे है, पूर्ण विश्राम वहीं है.

Thursday, April 9, 2015

हर दुःख मिटता ज्ञान से

दिसम्बर २००८ 
साधक वही है जो विवेक का उपयोग करके अपने भीतर व बाहर को हर दुःख से सुरक्षित करना चाहता है. दुःख के दो ही कारण हैं पहला अज्ञान दूसरा इच्छा. मन से पार जो परम तत्व है उसमें स्थित हो जाना ही ज्ञान है, परम विवेक है. विवेक नित्य-अनित्य में भेद करना सिखाता है. अनित्य के पीछे भागना मानो परछाई के पीछे भागना है, जिसमें दुःख ही मिलता है. नित्य की तलाश में जाना भी नहीं पड़ता, अनित्य को छोड़कर जो शेष रहता है वही ‘वह’ है. जिस क्षण हमें लगे कि इस जग में कुछ भी पाने योग्य नहीं रह गया है तो जो भाव भीतर बचे वही परमात्मा है. जिस क्षण लगे कि इस जग में सभी कुछ अनित्य है, परिवर्तनशील है, अनित्य पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना ही है. विश्वास केवल उस एक तत्व पर किया जा सकता है जो नित्य है, शाश्वत है, जिसकी झलक ध्यान में मिलती है, जो हर वक्त हमारे साथ है, तो उससे मुलाकात हो गयी.

Monday, August 4, 2014

उठत बैठत वही उठाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने

जनवरी २००७ 
श्रद्धा, विश्वास, प्रेम और आस्था यदि जीवन में न हों तो जीवन अधूरा है बल्कि जीवन है ही नहीं, उसका भ्रम है. प्रेम तो इस जगत का कारण ही है, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु भी प्रेम से भरे हैं. ईश्वर जो कण-कण में व्याप्त है वह भी प्रेम से प्रकट हो जाता है. ऐसा प्रेम जीवन में तब आता है जब मन में करुणा का भाव जगे, जीवन में मंत्र मिले, जो व्यथा का नाश करता है दिव्य आभा जगाता है. ऐसा मंत्र ज्ञान भी हो सकता है और भक्ति भी. ज्ञान का अर्थ है नित्य-अनित्य, सत्य-असत्य का बोध और श्रेय-प्रेय का भेद, इनमें से एक का त्याग करना है एक को प्रेम. भक्ति का अर्थ है यह सारी सृष्टि जिसने बनायी है वह यदि हमारे प्रेम का पात्र है तो जगत भी उसी का बनाया होने के कारण हमारे प्रेम का पात्र हुआ. साधक का अंतर गुरु के बताये पथ पर सारे ही फूल समेटने में लगा रहता है, जिसमें ज्ञान भी है, योग-प्राणायाम भी, कीर्तन और सेवा भी. जो भी सहज प्राप्त कार्य सम्मुख आता है उसे करने के अलावा शेष समय उसी की याद में गुजरता है जो छिपा रहता है फिर भी नजर आता है.

Monday, July 15, 2013

तुझ बिन सूना सारा जीवन

अक्तूबर २००४ 
परमात्मा आकाश की नाईं खाली है और सागर की भांति भरा. उसकी ऊर्जा इस ब्रह्मांड के जर्रे-जर्रे में है, सब कुछ उसी ऊर्जा में ओतप्रोत है. वह आनन्द मय है,  ज्ञान मय और प्रेम मय है. हम भी उसके गुणों को धारण करते हैं, ध्यान में जब हम देह के पार होकर शुद्ध चैतन्य का अनुभव करते हैं, तब उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं. हमें अपनी शाश्वतता का अनुभव होता है. हम भी उसी की भांति ज्योति स्वरूप हैं. वह नित्य है, सदा एकरस है, बल्कि उसका रस बढ़ता ही जाता है. उससे मिले बिना हमारा जीवन अपूर्ण है. कभी-कभी कुछ ऐसा होता है पल भर को हम देहातीत हो जाते हैं और उसकी झलक हमें मिलती है, उसकी याद बनी रहती है, पर संसार में उलझे रहकर वह स्मृति क्षीण हो जाती है. खुद से दूर हम बेबस की नाईं भीतर तपते हैं, फिर सत्संग से पुरानी स्मृति लौट आती है और हम परमात्मा की निकटता से उत्पन्न शीतलता का अनुभव करते हैं.     

Wednesday, October 10, 2012

जग वैसा जैसा हम देखें


जब तक हमारे भीतर विकार है तभी तक हमारी दृष्टि दूसरों में विकार देखती है. जब हमारा चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाता है तो दुनिया में कहीं भी कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती. संतों का ऐसा कहना है. यदि दिखाई दे भी तो उसके प्रति द्वेष नहीं जगता बल्कि स्नेह से उसे दूर करने का प्रयास अथवा तो शक्ति वह जगत को देता है. हम दोष देखकर स्वयं को ही पीड़ित करते हैं, और अपनी ऊर्जा का ह्रास करते हैं. हमें प्रतिक्रिया व्यक्त न करके उसके लिए कुछ करना होगा. यदि हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं तो अपने मन की शांति तो बनाये रख ही सकते हैं, उतना ही पर्याप्त होगा. यह जगत वैसा ही दिखाई पड़ता है जैसा हम इसे देखना चाहें, यह जगत उस प्रभु का ही तो उपहार है, वह स्वयं भी इसके कण-कण में ओत-प्रोत है. “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मुरति देखि तिन तैसी”. हम अपने अपने स्वभाव, रूचि और मन स्थिति के अनुसार एक कल्पना गढ़ लेते हैं और अस्तित्त्व की आवाज को अनसुना करते हैं, जो मन की कल्पनाओं से परे है, वह आनन्दमय, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनंत है. आकाश की तरह वह सभी कुछ अपने में समेटे हुए है अच्छा-बुरा उसके लिए समान है, वह राग-द्वेष से परे है. उसके सान्निध्य में रहकर हृदय में कोई अशुभ विचार टिक नहीं सकता, तत्काल भीतर से एक संदेश आता है और कोई सद्वचन जैसे हवा के झोंके की तरह आकर उस नकारात्मकता को अपने साथ लिए जाता है. 

Tuesday, June 12, 2012

सहज स्वभाव सहज ही मिलता


अप्रैल २००३ 

सहज स्वभाव हमारे जीवन की मांग है, धर्म इस मांग की पूर्ति करता है. सहज स्वभाव हमारे तीनों तापों को हर लेता है मन के संकल्पों-विकल्पों को हर लेता है, इच्छाओं को शुद्ध करता है, विचारों को ऊपर के केन्द्रों में स्थित करता है. भीतर सौम्य मन का जन्म होता है और ऐसे मन से जो वचन निकलता है उसमें पूरा बल होता है. स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जीने का बल सहज स्वभाव ही देता है. हमें अपने नित्य स्वरूप से परिचित कराता है. यदि हम चेतन हैं तो जड़ के गुलाम क्यों हों, अनित्य की प्रवाह क्यों करें, नश्वर को क्यों चाहें, उस एक को पाकर हम अमूल्य बन जाते हैं, उसमें जो स्वतंत्रता है वही पाने योग्य है. जड़ वस्तुओं के गुलाम बन कर हम अपना मूल्य घटाते हैं. सारी प्रतिकूलताएं तभी तक हैं जब तक हम उससे दूर हैं. एक बार उसका पता मिलने पर हम आनंद के उस सागर में डूबते उतराते हैं, जहाँ प्रेम-भक्ति के सुख-सामर्थ्य के मोती-माणिक पड़े हैं, जो सहज ही हमारे हो जाते हैं. ईश्वर भी हमसे मिलने को उतना ही आतुर है जितना हम उससे मिलने को, हमारे एक कदम के जवाब में वह हजार कदम बढ़ाकर हमें थाम लेता है और एक बार थाम लिया तो फिर छोड़ता नहीं, सहज स्वभाव बन जाता है.

Tuesday, January 10, 2012

निर्विकार साक्षी


सितम्बर २००२ 
ईश्वर पुरातन है, आदि है, अनादि है, शाश्वत है और अनंत है. सारी सृष्टि का वही अध्यक्ष है, वह कण-कण में व्याप्त है. हमें अपने अंदर उसकी उपस्थिति का अहसास करना है. उसको अपने जीवन का केन्द्र बना लें तो जीवन शांतिमय, सुखमय और रसमय हो जाता है. पानी जैसे तापमान के बदलने पर अपनी अवस्था बदलता रहता है वैसे ही हमारा मन बाहरी परिस्थितियों के बदलने पर बदलता रहता है, लेकिन इसको देखने वाला निर्विकार रहता है. जो अचल है, शुद्ध है, नित्य है, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम व पूर्ण आनंद है. हम हर क्षण किसी न किसी कर्म में रत हुए इसका अनुभव नहीं कर पाते. कर्मों के बंधन को तोड़ने के लिये हमें कर्म फल में आसक्ति का त्याग करना होगा. तब हमें लाभ-हानि की चिंता नहीं होगी. कोई कामना या वासना पूर्ति हमारे कर्मों का उद्देश्य नहीं रहता. वैराग्य यदि हममें दिखाई दे तो मानना चाहिए कि भक्ति का उदय हो रहा है. निष्काम भक्ति से ही भीतर ज्ञान प्रकट होता है.

Sunday, November 20, 2011

मन व संसार


जुलाई २००२ 

जिस संसार के बारे में हम सुनते हैं कि यह असार है, अस्थिर है, पल पल बदलता है, वह कहीं बाहर नहीं हमारा अपना मन ही है. क्योंकि इस बाहरी जगत को हम अपने मन के माध्यम से ही जानते हैं जिसका जैसा स्वभाव है गुण हैं प्रकृति है संसार उसे वैसा ही नजर आता है. मन जिसे अपना मानता है उसे सुखी देखना चाहता है ताकि मन को खुशी मिले. मन जो करता है अपनी तुष्टि के लिये करता है. इसी मन को यदि अपने भीतर विवेक द्वारा नित्य-अनित्य का ज्ञान होता है तब यही मन भीतर जाने लगता है यानि संसार से परे सन्यास की यात्रा आरम्भ होती है. बाहर सब कुछ वैसा ही रहता है पर भीतर एक नया द्वार खुल जाता है. तब स्वयं की तुष्टि के लिये नहीं प्रेम के लिए प्रेम होने लगता है. क्योंकि इस तथ्य का ज्ञान होता है कि जो सदा आनंद में है वही आत्मा वह स्वयं है.