संत व शास्त्र कहते हैं, विद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म ईश्वर की उपाधि ग्रहण करता है और अविद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म जीव की उपाधि ग्रहण करता है। जीव और ईश्वर का एकत्व उनके ब्रह्म होने में है और भेद विद्या और अविद्या के कारण है। ईश्वर माया का अधिपति है और जीव माया का सेवक है। ईश्वर योगमाया का उपयोग करके जगत का कल्याण करता है, जीव महामाया के वशीभूत होकर विकारों से ग्रस्त हो जाता है। ईश्वर सदा अपने चैतन्य स्वरूप को जानता है, जीव स्वयं को जड़ देह और मन आदि मान लेता है। जिस क्षण जीव को अपने ब्रह्म होने का भान हो जाता है, वह ईश्वर से जुड़ जाता है।
Tuesday, June 27, 2023
Thursday, September 29, 2022
सोहम का जो मर्म जानता
Friday, September 23, 2022
खुद को जिसने चेतन जाना
हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।