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Tuesday, June 27, 2023

जिसने भेद स्वयं का जाना

संत व शास्त्र कहते हैं, विद्यामाया  विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म ईश्वर की उपाधि  ग्रहण करता है और अविद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म जीव की उपाधि ग्रहण करता है। जीव और ईश्वर का एकत्व उनके ब्रह्म होने में है और भेद विद्या और अविद्या के कारण है। ईश्वर माया का अधिपति है और जीव माया का सेवक है। ईश्वर योगमाया  का उपयोग करके जगत का कल्याण करता है, जीव महामाया के वशीभूत होकर विकारों से ग्रस्त हो जाता है। ईश्वर सदा अपने चैतन्य स्वरूप को जानता है, जीव स्वयं को जड़ देह और मन आदि मान लेता है। जिस क्षण जीव को अपने ब्रह्म होने का भान हो जाता है, वह ईश्वर से जुड़ जाता है।  


Thursday, September 29, 2022

सोहम का जो मर्म जानता

 हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को  जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।   

Friday, September 23, 2022

खुद को जिसने चेतन जाना

हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को  जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।   


Monday, June 18, 2018

तोरा मन दर्पण कहलाये


१८ जून २०१८ 
मन जल की तरह है, तभी तो वह जिस वस्तु में प्रवेश करता है उसी का आकार धारण कर लेता है. मन यदि कठोर हो जाये तो बर्फ जैसा हो जाता है, और क्रोधित हो जाये तो वाष्प जैसा. दोनों ही स्थितियों में वह अपना स्वभाव खो देता है. मन में यदि कोई विकार आ जाये तो भी वह अपनी सहजता खो देता है. जल नीचे की और बहता है, मन यदि अमानी होकर रहे तो स्वभाव में टिका रहेगा, अन्यथा असहज हो जायेगा. सम्मान की कामना ही मन को स्वभाव से दूर कर देती है, जबकि स्वभाव में ही विश्राम है. जल जीवन का प्रतीक है. इसी तरह चेतन सत्ता का जब प्रकृति के साथ संयोग होता है, मन के रूप में ही उसकी उपस्थिति का ज्ञान होता है, अर्थात जीवन की अभिव्यक्ति मन के द्वारा ही होती है. मन को समझ कर जो इसके पार देखने में सक्षम हुआ वही इसे सदा दर्पण की भांति चमकता हुआ देखना चाहता है.

Thursday, February 8, 2018

जिन डूबा तिन पाइयाँ

९ फरवरी २०१८ 
संत कहते हैं, चिन्मय होते हुए मनुष्य स्वयं को मृण्मय मान बैठा है. असीम होते हुए सीमा में बंध गया है, सुख स्वरूप होते हुए सुख की कामना में दौड़ रहा है. यदि कोई संतों की इस बात पर विचार करे और उसका अनुभव भी कर ले तो उसका जीवन कितना सुंदर हो जायेगा. आत्मा यदि सागर है तो मन की उपमा लहरों से दी जाती है, किन्तु सागर हो या लहरें, वास्तव में तो दोनों जल ही हैं. इसी प्रकार आत्मा हो या मन वास्तव में दोनों परमात्मा ही हैं. जैसे लहरों ने सागर को ढक लिया है, हम लहरों को देखकर ही सागर को देख लिया मान लेते हैं, सागर की अतल गहराई का उसके विशाल विस्तार का हमें ज्ञान ही नहीं होता, नाम और रूप हमें इस तरह प्रभावित कर लेते हैं कि जल को तो हम देखते ही नहीं. ऐसे ही मन को देखकर ही हम व्यक्ति को देख लिया मान लेते हैं. आत्मा की अतल गहराई का हमें ज्ञान ही नहीं होता. जिस चेतन तत्व से वे बने हैं, उस परमात्मा को तो हम देखते ही नहीं. यदि दृष्टि जल पर हो तो सागर, लहरों, बुदबुदों और फेन में एक ही सत्ता दिखेगी. यदि परमात्मा पर दृष्टि हो तो आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार सबके पीछे एक ही सत्ता दिखेगी. सबके भीतर एक ही तत्व को देखते ही सारा भेद मिट जाता है और वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सहज ही जग जाता है.  

Tuesday, March 31, 2015

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ

सितम्बर २००८ 
परमात्मा से हमारे मिलन में सबसे बड़ा बाधक हमारा ज्ञान है. परमात्मा प्रकृति के सौन्दर्य में झलकता है, पवित्रता में झलकता है. यह अस्तित्व जो इतना निकट है, इतना प्यारा है, पर हम अपने तथा कथित ज्ञान के कारण उसे सराहते नहीं, उस पर न्योछावर नहीं होते. हम जीवित हैं यही अहसास हमें परमात्मा के साथ एक कर सकता है. हम चेतन हैं, वह भी चेतन है. हम प्रेम चाहते हैं, प्रेम करते हैं, वह भी प्रेम स्वरूप है. हम आनंद चाहते हैं वह आनंद ही है. यह ज्ञान ही है जो सहज आनंद को भी ढक लेता है. अहंकारी बना देता है. सौभाग्यशाली हैं वे जो अज्ञानी होने का सुख अनुभव कर लेते हैं.

Sunday, December 21, 2014

झूठा है हर बंधन

जुलाई २००७ 
जब जड़ व चेतन मिलते हैं तभी अहंकार उत्पन्न होता है, जब यह ज्ञान हो गया कि दोनों कभी मिले ही नहीं, मिलने का भ्रम मात्र होता है तो अहंकार कैसे उत्पन्न होगा. अहंकार के न रहने पर न कोई कर्ता है न भोक्ता है. जो कुछ हो रहा है वह होना था किन्हीं कारणों वश, जैसे प्रकृति में सारे काम हो रहे हैं, वैसे ही इन्द्रियां अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं. मन अपना काम कर रहा है, बुद्धि अपना, फिर व्यर्थ ही स्वयं को बंधन में क्यों मानें.

Friday, October 31, 2014

नष्टो मोहा स्मृति लब्ध्वा...

अप्रैल २००७ 
यह जीवन क्या है ? सन्त कहते हैं इसका राज जानना है तो खाली होना है. तथाकथित ज्ञान से खाली होना है. बुद्धि के छोर पर जीने वाला हृदय से दूर ही रह जाता है. हृदय के द्वार पर जाने वाला कभी प्रेम से दूर नहीं रहता. प्रेम तभी आता है जब ज्ञान शून्य हो जाते हैं. प्रेम में दो और दो चार नहीं होते. ज्ञान की चरम स्थिति है ज्ञान से मुक्ति ! यह जीवन हमें इसलिए मिला है ताकि हम आत्मा के गुणों को जगत में प्रकाशित कर सकें. जीवन सतत साधना है. हम जीवित हैं क्योंकि आत्मा चैतन्य है, परमात्मा का अंश है. उसका स्वभाव ही जीवित रहना है. वह चेतन है, मरना उसका स्वभाव ही नहीं. अग्नि जैसे अग्नि है, गर्म है. आत्मा वैसे जीवित है. सुना हुआ ज्ञान मन में पूर्ण रूप से समा जाये यही उसकी सार्थकता है. सत्संग में ही इतना उच्च ज्ञान सुनने को मिलता है. बुद्धि के बल पर अर्जित किया गया ज्ञान संसार में सफलता दिला सकता है पर तृप्ति तो वही ज्ञान दे सकता है जो भीतर से उपजा है. वही आत्मा के द्वार पर ले जाने वाला है. यदि हम शाश्वत हैं, नित्य हैं, चेतन है तो हमें  दुःख क्यों होता है, जब हम अपने इस स्वभाव को भुला देते हैं तभी न ! 

Saturday, May 17, 2014

एक भरोसा राम का

मार्च २००६ 
साधक को संदेह से अवश्य बचना चाहिए, हर कीमत पर बचना चाहिए, हम संदेह तो जल्दी कर लेते हैं पर भरोसा करने में बहुत देर लगा देते हैं, जिनको हम प्रेम करते हैं उन्हीं पर जब हम संदेह करते हैं तो हम स्वयं पर ही अविश्वास कर रहे होते हैं. एक बार जिसे अपने हृदय का स्वामी बना लिया, तब उस पर संदेह करना अपने हृदय पर संदेह करना ही हुआ. सत्य को कभी सिद्ध करना ही नहीं होता, जिसे परीक्षा से गुजरना पड़े वह सत्य नहीं है. सत्य तो स्वयं सिद्ध है और जब यह भीतर प्रकटता है तो सारे भ्रम मिट जाते हैं, एक सजगता भीतर रहती है जो किसी विवाद को प्रश्रय नहीं देती, तब सहज ही समाधान होने लगता है. साधक की दृष्टि चेतन पर होती है, तब स्वयं पर भरोसा होने लगता है, सभी के भीतर उसी सत्य को देख पाने की दृष्टि भी जगती है. जगत पर तब प्रेम ही उमड़ता है, दोष नहीं दीखता, तब जगत लीला के रूप में खुलता जाता है.

Sunday, March 17, 2013

कबिरा गरब न कीजिये


मई २००४ 
यदि कोई समर्थ होकर भी अभिमानी नहीं है तो उसके जीवन में सद्गुरु है अथवा उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त है. उसके आस-पास एक पवित्र वातावरण बन जाता है, उसके भीतर कोई आक्रामकता नहीं रहती, वह शांत, सौम्य और द्वेष रहित होता है. इस जगत में हर क्षण हजारों जीवन जन्मते और मरते हैं, बहुत कुछ बनता व बिगड़ता है, लेकिन ईश्वर उससे प्रभावित नहीं होता, प्रकृति से जो बना है वह नष्ट होने ही वाला है, यह प्रकृति का नियम है, पर पुरुष उससे अलग है, हमारा तन-मन प्रकृति से बना है पर हम परम से बने हैं, हमारे भीतर एक केन्द्र है जो इतने सारे तूफानों के बीच भी अडोल रहता है, जो देखने वाला है, उसके साथ पहचान करना ही सारी साधना का लक्ष्य है, उसके साथ पहचान होते ही अभिमान विदा हो जाता है. तब किसका अभिमान करें जो बदलना वाला है, स्थिर नहीं है उसका कैसे करें और जो सदा एक सा है वह तो स्वयं परमात्मा का अंश है, उसमें हमारा क्या ? सभी के भीतर एक ही चेतन शक्ति है, जो ज्ञानमयी, आनन्दमयी तथा शांतिमयी है.

Tuesday, June 12, 2012

सहज स्वभाव सहज ही मिलता


अप्रैल २००३ 

सहज स्वभाव हमारे जीवन की मांग है, धर्म इस मांग की पूर्ति करता है. सहज स्वभाव हमारे तीनों तापों को हर लेता है मन के संकल्पों-विकल्पों को हर लेता है, इच्छाओं को शुद्ध करता है, विचारों को ऊपर के केन्द्रों में स्थित करता है. भीतर सौम्य मन का जन्म होता है और ऐसे मन से जो वचन निकलता है उसमें पूरा बल होता है. स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जीने का बल सहज स्वभाव ही देता है. हमें अपने नित्य स्वरूप से परिचित कराता है. यदि हम चेतन हैं तो जड़ के गुलाम क्यों हों, अनित्य की प्रवाह क्यों करें, नश्वर को क्यों चाहें, उस एक को पाकर हम अमूल्य बन जाते हैं, उसमें जो स्वतंत्रता है वही पाने योग्य है. जड़ वस्तुओं के गुलाम बन कर हम अपना मूल्य घटाते हैं. सारी प्रतिकूलताएं तभी तक हैं जब तक हम उससे दूर हैं. एक बार उसका पता मिलने पर हम आनंद के उस सागर में डूबते उतराते हैं, जहाँ प्रेम-भक्ति के सुख-सामर्थ्य के मोती-माणिक पड़े हैं, जो सहज ही हमारे हो जाते हैं. ईश्वर भी हमसे मिलने को उतना ही आतुर है जितना हम उससे मिलने को, हमारे एक कदम के जवाब में वह हजार कदम बढ़ाकर हमें थाम लेता है और एक बार थाम लिया तो फिर छोड़ता नहीं, सहज स्वभाव बन जाता है.

Monday, January 9, 2012

चेतना जगानी है


सितम्बर २००२ 
हम चेतन हैं, पर जड़ की ओर हमारा झुकाव है. जब हम अपनी चेतना को परम चेतना के साथ जोड़ते हैं तो सारे कर्म योगमय हो जाते हैं, अन्यथा कर्म बंधन में डालते हैं. कृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को न कुछ पाने की तृष्णा सताती है न कुछ खोने का भय, न उससे किसी को भय होता है न उसे ही किसी से भय रहता है. तब तो सारी सृष्टि हमें मित्रवत ही प्रतीत होगी. जहाँ कहीं भी शुभ है वहीं दृष्टि जायेगी, दोषों पर यदि दृष्टि जाये भी तो कटुता का भाव उदय न होगा.. संसार को उसके दोषों व गुणों सहित हम अपना लेने में समर्थ होंगे.  

Wednesday, May 25, 2011

चैतन्य


मार्च २००० 
“अपने मूल स्वरूप को पहचान कर अंतहीन सुख के साम्राज्य को पा सकने की हममें क्षमता है. संसार बदल रहा है, नश्वर है, लेकिन अपना आप जो चेतन है, नित्य है, अपरिवर्तनशील है, उसी चैतन्य को पाना ही जीवन का ध्येय है”. ये बातें हमें हर जगह सुनने को नहीं मिलतीं लेकिन जीवन को सार्थक ढंग से जीने के लिये, अपने कर्तव्यों का बोध जागृत रखने के लिये, हृदय में सहनशीलता, त्याग व आत्म विसर्जन की उद्दात भावनाओं के स्फुरण के लिये इनको सुनते रहना अति आवश्यक है. ये जहाँ मन को उहापोह से मुक्त रखती हैं, वहीं उसे एकाग्र रखने में भी सहायक हैं.
हमारे पूर्वजों ने जीवन के उद्देश्य, जीने के तरीके और आत्मिक उन्नति के द्वार योग के रूप में खोल दिये हैं. अब यह हम पर निर्भर करता है कि पंक में सने रहें, सांसारिक मोह माया और उलझनों में मानसिक ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट कर दें अथवा मुक्त होकर आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ें, संत जन कहते हैं कि ज्ञानीजनों के अनुभव को अपना अनुभव बना लेने पर ही बंधन कट सकते हैं, तब सुख-दुःख, मान-अपमान, यश-अपयश सभी स्वप्नवत प्रतीत होते हैं. कंस की सेविका जब कृष्ण की सेविका हो जायेगी तभी उसका उद्धार होगा.