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Friday, July 29, 2022

जीवन कैसे सरल बनेगा

हम सब यह जानते हैं कि संकल्पों से सृष्टि का निर्माण होता है। हर किसी के ज्ञान के अनुसार संकल्प उसके मन में उठते हैं।कभी-कभी हम विपरीत संकल्प भी उठा लेते हैं, कई बार अपने ही संकल्प को काट देते हैं। अहंकार वश अपने लिए हानिकारक संकल्प भी उठा लेते हैं क्यों कि मन पर हमारा वश नहीं है। सागर में निरंतर उठती लहरों की तरह वे उठते ही रहते हैं। अनजाने में हम अस्तित्त्व से विपरीत धारा में बहने लगते हैं और वहीं संघर्ष है, द्वंद्व है।सत्य क्या है हम नहीं जानते,  कल्पनाओं से अपने-अपने भगवान भी लोगों  ने गढ़ लिए हैं और उसी के नाम पर एक-दूसरे से लड़ते हैं। समर्पण, उत्साह व आनंद किसी भी भाव में हम रहें, सबमें सजगता आवश्यक है। सजग होकर ही हम सही संकल्प का चुनाव अपने लिए कर सकते हैं। होश में जीना ही आत्मा में  होना है, वही स्थितप्रज्ञता है। होश में होना ही अपने आप में होना है,  बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने भीतर संकल्प को उठते हुए देखना यदि आ जाए तो जीवन बहुत सरल और निर्दोष बन जाता है। 


Tuesday, November 23, 2021

शुभता का जो वरण करे

सृष्टि परमात्मा के संकल्प से उपजी है। यहाँ जो कुछ भी सुंदर है, कल्याणकारी है, किसी के शुभ विचारों का परिणाम है और जो कुछ भी असुंदर है, विनाशकारी है, वह भी किन्हीं  अशुभ संकल्पों का परिणाम है। जीवन में जो भी घटता है, वह किसी न किसी क्षण में भीतर उठे विचारों से ही प्रकट हुआ है। विचारणा सूक्ष्म कर्म है जो अंतत: स्थूल रूप में प्रकट होता है। इसीलिए कहा गया है कि हम आत्मा में रहकर शुभ संकल्प ही करें, मन की यह आदत है कि वह तात्कालिक सुख की लालसा में अपना भला-बुरा नहीं सोचता, वह प्रेय मार्ग का पथिक है। मन एक पुराने ढर्रे पर ही चलता है, जिसपर चलकर उसने पहले कष्ट भी उठाए हों, तब भी वह उस लीक को चुन लेता है। आत्मा में रहने का अर्थ है सदा वर्तमान में रहना, वह श्रेय पथ पर चलने का मार्ग है, अर्थात् श्रेष्ठ को चुनने का मार्ग, जो स्वयं के साथ साथ जगत के लिए भी शुभता ही लाता है।

Wednesday, September 2, 2020

सजग हुआ जो भीतर देखे

 संकल्प से ही सृष्टि का निर्माण होता है. सृष्टि परमात्मा की सुंदर कल्पना है. प्रकृति का सौंदर्य जहाँ-जहाँ अक्षुण्ण है, वहां देवों का वास है. मानव ने जिसे कुरूप कर दिया है वहाँ दानव बसते हैं. मन जब सुकल्पना के प्रांगण में विचरता है, मोर की तरह नृत्य करता प्रतीत होता है, उसके सौंदर्य की झलक भी मन में मिलती है. मोर जिनकी सवारी है वह देव क्या स्वतः ही वहां प्रकट नहीं हो जाते होंगे. जहाँ मन चिंताओं और कटुता  से भर जाता है, भूत-प्रेत वहाँ अड्डा जमा लेते हैं. सुंदर कल्पनाएं और भाव आत्मा की ही शक्ति है. भाषा का जन्म आत्मा की गहराई में होता है फिर शब्दों का चुनाव मन पर निर्भर करता है. वहां क्रोध भी है और करुणा भी, वहां असजगता भी है और जागरूकता भी. साधक को भीतर जाकर देखना होगा और चुनना होगा करुणा को अपने लिए , छोड़ देना होगा क्रोध. अनेक जन्मों में उसे ही तो चुना था और अपने लिए कर्मों का जाल बुना था. 


Wednesday, September 5, 2018

चलें योग के पथ पर सब मिल

 ६ सितम्बर २०१८ 
यम और नियम योग का आधार हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, जुड़ने के लिए दो की आवश्यकता है, जुड़ने के बाद भले ही वे दो न रहकर एक हो जाएँ. जैसे दूध और पानी का योग होने के बाद उन्हें अलग-अलग देखना सम्भव नहीं, हाँ किसी उपाय के द्वारा उन्हें अलग अवश्य किया जा सकता है. मन का योग होने का अर्थ है उसके सभी विचार जुड़ जाएँ, अनेक की जगह एक ही विचार शेष रहे, तो मन योगयुक्त हुआ मान सकते हैं. बुद्धि योग का अर्थ हुआ जब बुद्धि एक ही निर्णय दे, संकल्प के विपरीत कोई विकल्प न उठाये. अत्मयोग का अर्थ हुआ जब ‘स्वयं’ मात्र शेष रहे, केवल एक उपस्थिति मात्र, एक शांतिपूर्ण अवस्था, जिसमें कोई संकल्प भी न उठे. परमात्मा योग का अर्थ हुआ जब स्वयं का भी भान न रहे, उस अवस्था को संतों ने अवर्णनीय कहा है, क्योंकि उसमें न कोई देखने वाला है न अनुभव करने वाला. आमतौर पर योग का अर्थ हम आसन और प्राणायाम से ही लगाते हैं, ये दोनों योग के पथ पर चलने के साधन हैं.

Friday, December 30, 2016

संग संग वह हर पल रहता

३० दिसम्बर २०१६ 
परमात्मा सदा ही हमारे साथ है. किन्तु जैसे सूर्य उदित होने पर भी यदि हम घर के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करके बैठे रहें तो उसका ताप व प्रकाश अनुभव में नहीं आता, वैसे ही परमात्मा और हमारे मध्य जब मन अथवा संसार रूपी दीवार आ जाती है तो उसका अनुभव नहीं होता. ध्यान में जब उसमें विश्राम करते हैं तब जगत का लोप हो जाता है. पुनः मन, बुद्धि में आने पर भी उसकी स्मृति बनी रहती है. वह तो तब भी हमें देख रहा होता है. उससे ही हमारा हर श्वास चलता है, उससे ही हर भाव उत्पन्न होता है, वह हमसे पूर्व ही उसे जानता है. चित्त जब केन्द्रित होता है उसकी ही शक्ति समाहित हो रही होती है, जब व्यर्थ के संकल्प-विकल्प उठाता है तब उसी की ऊर्जा व्यर्थ बह रही होती है. जैसे किसी घट में छेद हो तो पानी नहीं टिकता, वैसे ही अस्थिर मन में ध्यान नहीं टिकता. नये वर्ष में क्यों न हम नियमित ध्यान करें.

Tuesday, May 26, 2015

शरण में उसकी जाना होगा


जो हम बोते हैं, वही हम काटते हैं. हमारे द्वारा हर पल कर्मों के बीज बोये जा रहे हैं. अहंकार से ग्रसित होकर जो कर्म हम करते हैं, उसमें तो खर-पतवार ही उगता है, उसमें कोई फल-फूल नहीं लगते. हमें अपने मन की भूमि पर ध्यान और साधना के बीज बोने हैं तब जो फसल मिलेगी वह शांति, प्रेम व आनंद के फूल खिलाएगी. ऐसी खेती के लिए संकल्प व श्रद्धा का होना आवश्यक है. कोई भी विकार मन में दुःख के कांटे उगाने के लिए सक्षम है, एक बार यदि संकल्प कर लिया कि इसके बस में नहीं होना है तो उससे मुक्त हुआ जा सकता है. जैसे सख्त जमीन को हल के द्वारा नर्म किया जाता है, शरणागति रूपी हल से मन की धरती को तैयार करना होगा. सद्गुरु के चरणों में झुका हुआ शिष्य ही अपने भीतर निरहंकार हो सकता है.

Saturday, September 20, 2014

उससे मिलना जब हो जाये

मार्च २००७ 
हम व्यर्थ ही मन में संकल्पों का जाल बुनते हैं और व्यर्थ ही विपदाओं को मोल लेते हैं. प्रभु के भक्त के लिए एक क्षण के लिए भी उसका विस्मरण विपदा के समान ही तो है, आत्मा का सूर्य जब पल भर के लिए भी संकल्प रूपी बादल से ढक जाये तो कैसी छटपटाहट सी होती है, कोई भीतर से हमें कुरेदता है. जितना हम उससे प्रेम करते हैं उससे कहीं ज्यादा वह हमसे प्रेम करता है. वह भी तो इस बात के लिए प्रतीक्षित रहता है कि कोई उसे पुकारे. हम जिस क्षण असजग हो जाते हैं तभी अभाव सताता है, वास्तव में अभाव उसी का होता है जिसे भरना हम बाहरी वस्तुओं से चाहते हैं. 

Sunday, August 3, 2014

जहाँ दूसरा हो न कोई

जनवरी २००७ 
योग वशिष्ठ अद्वैत ज्ञान का अद्भुत ग्रन्थ है. जिसके अनुसार आत्मा का अनुभव ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है, ज्ञान जब तक परिपक्व नहीं होगा तब तक अन्य साधनों द्वारा किया गया अनुभव टिकेगा नहीं. यह सारा जगत ब्रह्म ही है अथवा तो आत्मसत्ता ही जगत का आभास देती है. आदि में इस जगत के होने का कारण नहीं था केवल चिन्मय तत्व था उसमें संवेदन हुआ और धीरे-धीरे यह सब संकल्प रूप से प्रकट हुआ. हमारे संकल्प ही बाहर सत्य होकर दिखते हैं. यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है, सब आभास मात्र है. हम वास्तव में चेतन हैं जड़ का संयोग होने से हम स्वयं को जड़ जगत की तरह मानने लगे. मन जब पूरी तरह खाली हो जाता है तभी चैतन्य का अनुभव होता है. 

Wednesday, June 11, 2014

बिन विवेक नहीं होए प्रतीति

अप्रैल २००६ 
चंचल बालक की तरह मन संकल्प-विकल्प करता है पर समझदार माँ की तरह बुद्धि उसे सम्भालती है, मन एक निरंकुश अश्व की तरह छलांगे मरना चाहता है पर सवार की तरह बुद्धि उसे सही रास्ते पर लाकर नियमित चाल से चलना सिखाती है. साधक अपने मन अथवा विचारों का ही तो प्रतिबिम्ब है. मन एक आईने की तरह होता है जिसमें विचार झलकते हैं, यदि बुद्धि का साथ हो तो मन का दर्पण उजला रहता है अथवा वह धुंधला जाता है और वह अपने आप को ही नहीं पहचान पाता, सब अस्पष्ट हो जाता है. और ऐसा मन लिए वह नये संकल्प करता है और धीरे-धीरे एक ऐसे कुचक्र में फँसता जाता है जिसमें से निकलना कठिन होता जाता है, विवेक को प्रश्रय दिए बिना उद्धार नहीं होता.   

Friday, September 13, 2013

सुख का सागर भीतर बहता


हम सभी के भीतर सद्वासना, असद्वासना तथा मिश्रित वासना है. सद्वासना सभी का कल्याण करती है, असद्वासना सदा दुःख को जन्म देती है, मिश्रित वासना कभी सुख कभी दुःख का कारण होती है. इस संसार में वही स्वस्थ हैं, यानि स्व में स्थित हैं जिन्हें किसी भी प्रकार की वासना नहीं सताती है, जिनके सारे आरम्भ नष्ट हो गये हैं, सहज प्राप्त कर्मों को जो करते हैं, और ऐसे कर्म उन्हें बांधते नहीं हैं. इच्छा न होने से मन में संकल्प-विकल्प भी नहीं उठते, तभी वे आत्मा में स्थित रहते हैं, आत्मा का सदा एक सा सुख भीतर से मिलता रहता है, वह सुख जो सीधे ईश्वर से आता है, उसका कोई और कारण नहीं है, जगत का सुख किसी कारण से ही होगा और जितना सुख होगा उतना ही दुःख भी उसके साथ जुड़ा होगा. आत्मा का सुख शुद्द है, अनंत है, प्रेम से परिपूर्ण है, उसमें जोई छिपाव नहीं है, वह इस जगत के दांवपेंच से परे है, वह  अछूता है, वह सात्विक है. 

Saturday, October 27, 2012

शिव ही सुंदर है


सितम्बर २००३ 
मन आखिर है क्या, कुछ संकल्प-विकल्प, कुछ आशाएं, कुछ विरोध, कुछ इच्छाएं, सब मिला-जुला कर मन बन जाता है. थोड़ा गहराई से देखें तो मन कुछ है ही नहीं, इच्छाओं को हटाते जाएँ तो संकल्प-विकल्प भी नहीं बचते, किसी से कोई विरोध रहता ही नहीं, जब सभी कुछ इसी क्षण हमारे पास है तो भावी की कोई योजना भी नहीं रहती. भूत तो मृत है और समय कितनी तेजी से व्यतीत हो रहा है, हर नया क्षण आते ही पूर्व क्षण मृत हो जाता है, केवल वर्तमान का क्षण हमारे सम्मुख है तो मन कहाँ गया, मन अमनी भाव में चला जाता है, जो शेष बचा वह शांति है, परम शांति, परम आनंद, क्योंकि मन ही माया का वह पर्दा है जो हमारे असली स्वरूप और हममें दूरी बनाये हुए है. पर्दा हटते ही आत्मा का सूर्य अपने पूरे वैभव के साथ चमचमा उठता है, उसमें हजारों बिंब उभरते हैं, अनेकों स्वर्ण रश्मियाँ तथा बिंदु उभरते हैं, उन रंग-बिरंगे बिम्बों के मध्य कई आकृतियाँ बनती हैं. उस सौंदर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता जैसे कोई फिल्म की रील चल रही हो, ऐसे अनेकों दृश्य आते हैं जाते हैं, जगत भी ऐस ही है यहाँ हर क्षण जल के बुदबुदों की तरह कितने प्राणी जन्मते हैं फिर नष्ट होते हैं. बनना, बिगडना और कुछ क्षणों के लिए स्थित रहना यही जीवन है. यह अस्थायी है पर स्थायी प्रतीत होता है, इस अस्थायीरूप को यदि हम सत्य मान लें तो हिस्से में दुःख भी आएंगे सुख के पीछे-पीछे. मन के पार ही परम सुख है.

Tuesday, October 16, 2012

एक राज है जीवन सारा


सितम्बर २००३ 
मुक्ति को पाना कितना सहज है. मन खाली हो तो मुक्त है. कोई चाह नहीं, कोई संकल्प-विकल्प नहीं उठते तो मन रहता ही नहीं. मन जो व्यर्थ ही हम पर शासन करता है. हम गुलाम बन के रह जाते हैं, और झूठा जीवन जीते हैं जबकि सच्चाई हर वक्त हमारे साथ होती है. वह परम सत्य, परमेश्वर हमारी आत्मा का नित्य संगी है. पर मन हमारे व उसके बीच एक पर्दा डाले रहता है. हम व्यर्थ ही स्वयं को खपाते, रुलाते और सताते, तपाते हैं. हम जीवन के मर्म को जाने बिना ही जीवन जीते हैं. तत्व को जाने बिना मुक्ति नहीं, विकारों से मुक्ति, कुविचारों से मुक्ति, सुविचारों से भी अन्ततः मुक्ति, कोई द्वंद्व नहीं, केवल सहज भाव से अपने होने का अनुभव, कितना विचित्र है यह अनुभव, कितना प्रेम भरा, नित्यता की खोज हमें प्रेम तक पहुंचाती है. हमारी साधना का लक्ष्य प्रेम ही तो है, ईश्वरीय प्रेम, जो हमें उसकी हर वस्तु से प्रेम करना सिखाता है. पुलक फिर रग-रग में भर जाती है और जीवन का रहस्य हथेली पर रखे आंवले सा समझ में आने लगता है.

Tuesday, October 9, 2012

भीतर एक शांति अनुपम


सितम्बर २००३ 
मौन में जो आनंद है, वह अन्यत्र नहीं है, चुपचाप बैठकर भीतर-बाहर मधुर संगीत को सुनने का अनुभव अनुपम है. ध्यान की गहन शांति मोहती है. मौन में एक अनोखा आकर्षण है. मन जब भीतर से खाली हो जाता है, संकल्प-विकल्प, आशा-निराशा, सुख-दुःख के द्वंद्वों से अतीत तब भीतर जो गूंज उठती है उसका संग-साथ प्रेरणास्पद है. वह आश्वासन भरा मौन है, वह हम सहज करने वाला है, वह हमें प्रेम से भर देने वाला है, प्रेम भी ऐसा, जो निःशब्द है, जो हित चाहता है, जो मुक्त करता है, जो प्रश्न नहीं करता, जो बस है, न ही वह प्रमाण देता है. ओढ़ा गया मौन हम असहज बना सकता है. पर जो मौन भीतर से आता है वह अडोल है, जिसे कोई बाहरी व्यवधान भंग नहीं कर सकता. मानो पूरे ब्रह्मांड में साधक अकेला हो, पर इसमें कोई भय नहीं है, यह एकांत परम के सामीप्य में रहने का अवसर देता है, यह सुखद है.

Friday, July 20, 2012

मैं कौन हूँ


 जून २००३ 
‘कोहम्’ का जवाब जब मिल जाये तो परमशांति का अनुभव होता है. निरंतर अभ्यास ही हमें इस पथ पर पहुँचा सकता है. जब संकल्प दृढ़ हो और मन में तितिक्षा हो. आत्मा में जो भी शक्ति है वह परमात्मा की दी हुई है. इसका अनुभव हमें करना है. अर्जुन का सारथि हमारा भी सारथि है. वह हमें उस पथ पर ले जाने को उत्सुक है. हमारी यात्रा में वह सदा हमारे साथ है, मार्ग दर्शक है, वही लक्ष्य भी है. परमशांति भी वही है, अर्थात हमारे मन की ऐसी स्थिरता जो बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं हो. निर्विकल्प अवस्था का अनुभव हो जाने के बाद ही बोध होगा और एक बार बोध हो जाने के बाद संशय का कोई स्थान नहीं रह जाता. न स्वयं पर, न पथ और न पथ का ज्ञान कराने वाले पर. निरंतर प्रयास करने ही हमारे हाथ में है, शेष प्रभु कृपा. वही हमें इस धरा पर लाया है, उसका हमारी प्रगति में पूरा हाथ है, वह हमें आगे बढ़ते देखना चाहता है, वह हमारी प्रतीक्षा में है, बल्कि वह भी हमारी ओर कदम बढ़ा चुका है. देर तो हमारी तरफ से ही होती है.


Tuesday, June 12, 2012

सहज स्वभाव सहज ही मिलता


अप्रैल २००३ 

सहज स्वभाव हमारे जीवन की मांग है, धर्म इस मांग की पूर्ति करता है. सहज स्वभाव हमारे तीनों तापों को हर लेता है मन के संकल्पों-विकल्पों को हर लेता है, इच्छाओं को शुद्ध करता है, विचारों को ऊपर के केन्द्रों में स्थित करता है. भीतर सौम्य मन का जन्म होता है और ऐसे मन से जो वचन निकलता है उसमें पूरा बल होता है. स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जीने का बल सहज स्वभाव ही देता है. हमें अपने नित्य स्वरूप से परिचित कराता है. यदि हम चेतन हैं तो जड़ के गुलाम क्यों हों, अनित्य की प्रवाह क्यों करें, नश्वर को क्यों चाहें, उस एक को पाकर हम अमूल्य बन जाते हैं, उसमें जो स्वतंत्रता है वही पाने योग्य है. जड़ वस्तुओं के गुलाम बन कर हम अपना मूल्य घटाते हैं. सारी प्रतिकूलताएं तभी तक हैं जब तक हम उससे दूर हैं. एक बार उसका पता मिलने पर हम आनंद के उस सागर में डूबते उतराते हैं, जहाँ प्रेम-भक्ति के सुख-सामर्थ्य के मोती-माणिक पड़े हैं, जो सहज ही हमारे हो जाते हैं. ईश्वर भी हमसे मिलने को उतना ही आतुर है जितना हम उससे मिलने को, हमारे एक कदम के जवाब में वह हजार कदम बढ़ाकर हमें थाम लेता है और एक बार थाम लिया तो फिर छोड़ता नहीं, सहज स्वभाव बन जाता है.

Friday, February 3, 2012

नारायण और अष्ट लक्ष्मी-साध्य और साधन



धैर्य लक्ष्मी यदि हमारे पास हो तो आध्यात्मिक मार्ग में हम विचलित नहीं होते. विद्या, धन, धैर्य, धान्य, राज, साहस, भाग्य व संकल्प ये आठ लक्ष्मियाँ हैं, हममें से सभी के पास जिनका कुछ न कुछ अंश रहता ही है. किन्तु लक्ष्मी लक्ष्य नहीं है, नारायण तक पहुंचने का साधन मात्र है. हमें लक्ष्मी को प्राप्त करना ही है यदि नारायण के पास पहुंचना है. नारायण पूर्ण है, तभी वह प्रेमस्वरूप है, उन्हें कुछ पाना नहीं है, कुछ होना नहीं है. जब हमारी चेतना पूर्ण होती है भीतर कृतज्ञता की भावना उठती है. चेतना की पूर्णता को अहंकार ही ढकता है. जब तक हम अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं होते, कुछ न कुछ पाने की चाह बनी ही रहती है. हृदय की संपदा को भुला कर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. विपरीत तभी तक हमें प्रभावित करते हैं जब तक यह ज्ञान नहीं होता.