हम सब यह जानते हैं कि संकल्पों से सृष्टि का निर्माण होता है। हर किसी के ज्ञान के अनुसार संकल्प उसके मन में उठते हैं।कभी-कभी हम विपरीत संकल्प भी उठा लेते हैं, कई बार अपने ही संकल्प को काट देते हैं। अहंकार वश अपने लिए हानिकारक संकल्प भी उठा लेते हैं क्यों कि मन पर हमारा वश नहीं है। सागर में निरंतर उठती लहरों की तरह वे उठते ही रहते हैं। अनजाने में हम अस्तित्त्व से विपरीत धारा में बहने लगते हैं और वहीं संघर्ष है, द्वंद्व है।सत्य क्या है हम नहीं जानते, कल्पनाओं से अपने-अपने भगवान भी लोगों ने गढ़ लिए हैं और उसी के नाम पर एक-दूसरे से लड़ते हैं। समर्पण, उत्साह व आनंद किसी भी भाव में हम रहें, सबमें सजगता आवश्यक है। सजग होकर ही हम सही संकल्प का चुनाव अपने लिए कर सकते हैं। होश में जीना ही आत्मा में होना है, वही स्थितप्रज्ञता है। होश में होना ही अपने आप में होना है, बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने भीतर संकल्प को उठते हुए देखना यदि आ जाए तो जीवन बहुत सरल और निर्दोष बन जाता है।
Friday, July 29, 2022
Tuesday, November 23, 2021
शुभता का जो वरण करे
Wednesday, September 2, 2020
सजग हुआ जो भीतर देखे
संकल्प से ही सृष्टि का निर्माण होता है. सृष्टि परमात्मा की सुंदर कल्पना है. प्रकृति का सौंदर्य जहाँ-जहाँ अक्षुण्ण है, वहां देवों का वास है. मानव ने जिसे कुरूप कर दिया है वहाँ दानव बसते हैं. मन जब सुकल्पना के प्रांगण में विचरता है, मोर की तरह नृत्य करता प्रतीत होता है, उसके सौंदर्य की झलक भी मन में मिलती है. मोर जिनकी सवारी है वह देव क्या स्वतः ही वहां प्रकट नहीं हो जाते होंगे. जहाँ मन चिंताओं और कटुता से भर जाता है, भूत-प्रेत वहाँ अड्डा जमा लेते हैं. सुंदर कल्पनाएं और भाव आत्मा की ही शक्ति है. भाषा का जन्म आत्मा की गहराई में होता है फिर शब्दों का चुनाव मन पर निर्भर करता है. वहां क्रोध भी है और करुणा भी, वहां असजगता भी है और जागरूकता भी. साधक को भीतर जाकर देखना होगा और चुनना होगा करुणा को अपने लिए , छोड़ देना होगा क्रोध. अनेक जन्मों में उसे ही तो चुना था और अपने लिए कर्मों का जाल बुना था.
