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Sunday, August 11, 2019

स्वयं का ही जो शासन माने



अपने सुख-दुःख के लिए जब हम स्वयं को जिम्मेदार समझने लगते हैं, तब अध्यात्म में प्रवेश होता है. जब तक हमारा सुख-दुःख व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर है, तब तक हम संसार में रचे-बसे हैं. संसारी होने का अर्थ है पराधीन होना, अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों की पराधीनता को स्वीकार करना ही अधार्मिकता है. 'दूसरे' में व्यक्ति, वस्तु और परिस्थति तीनों ही आ जाते हैं. तुलसीदास ने कहा है, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...इसलिए स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति जगत में अपनी राह खुद बनाता है, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बनता है. ऐसा व्यक्ति कर्मयोगी बन सकता है, ज्ञानी बन सकता है, भक्त बन सकता है, तीनों बन सकता है. निष्काम कर्मयोग के द्वारा परमात्मा को सब प्राणियों में देखा जा सकता है, ज्ञान के द्वारा परमात्मा को स्वयं में देखा जा सकता है और भक्ति के द्वारा कण-कण में देखा जा सकता है. सत्संग के द्वारा ही हम सभी अध्यात्म में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं.

Monday, May 29, 2017

जीवन जब उपहार बने

३० मई २०१७ 
जीवन की संपदा अपने आप में इतनी अनमोल है कि उस पर सब कुछ लुटाया जा सकता है, किन्तु मानव न जाने किस सुख की तलाश में जीवन को ही लुटा देने पर तुला रहता है. हम वस्तुओं को इकठ्ठा करते हैं, फिर वे एक बोझ बनकर अपनी सुरक्षा के लिए हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं. संबंध बनाते हैं पर दोनों तरफ की अपेक्षाएं उसे एक संघर्ष बना देती हैं. हम चाहते हैं सारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनी रहें पर जीवन का स्वभाव ऐसा नहीं है, यहाँ पल-पल संयोग बनते-बिगड़ते रहते हैं. इस आपाधापी में हम असली बात को भुला ही देते हैं, परमात्मा का साथ जो हमें सहज ही मिल सकता है, आत्मा का स्पर्श जो सदा ही हमारे साथ रहती है, हमारा मन जो स्वयं में डूबना चाहता है, कभी प्रकृति के सौन्दर्य में, कभी संगीत में, कभी बस चुपचाप प्रियजनों  के साथ  चांदनी रात में बैठकर, लेकिन आज के मानव के पास अपने निकट आने के लिए समय ही नहीं है. जीवन तब एक दुविधा बन जाता है. 

Sunday, December 11, 2016

पूज्य सदा हो कण-कण जग का

११दिसम्बर २०१६ 
 हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Monday, December 5, 2016

मन है छोटा सा

६ दिसम्बर २०१६ 
जैसे हम अपने घर में वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं, न केवल आवश्यक वस्तुओं का बल्कि कई बार तो ऐसी वस्तुओं का भी जिनकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ती अथवा तो पुरानी वस्तुएं जिनकी उपयोगिता भी नहीं रही ; उसी तरह हम मन में विचारों का भी संग्रह करते चले जाते हैं, मन जो एक उपवन बन सकता था उसे अस्त-व्यस्त जंगल बना देते हैं जहाँ  यादों के जाल  हैं और मान्यताओं और विश्वासों के कैक्टस भी. जहाँ  फूल खिलने के लिए सूर्य की रौशनी को पहुँचने  के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. आस-पास का वातावरण खुला-खुला हो, जरूरतें कम हों तो मन भी हल्का रहता है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि  इस दुनिया से रुखसत करते समय हमें अल्प पीड़ा होगी क्योंकि जो छूट रहा होगा वह थोड़ा सा ही होगा।

Wednesday, November 12, 2014

कोई नहीं वहाँ रहता अब

अप्रैल २००७ 
साधक का मन जब ख़ाली हो जाता है, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, जैसे यह है ही नहीं ! कुछ छूट भी  जाये तो भीतर एक कतरा भी न हिलता, कुछ हो तभी न हिलेगा, मन की गहराई में कुछ भी नहीं है वहाँ सब कुछ अचल है वहाँ कोई हलचल नहीं... वहां से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है. अपना प्रेम, करुणा, और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं. साधक उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकता है ! वह दे और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं, उस लेने वाले का आभार लेने के लिए बल्कि उसका आभारी हो कि वह वहाँ है ताकि उसके भीतर प्रेम जगे... न जाने कितने जन्मों से वह लेता आया है..अब और नहीं !


Saturday, June 21, 2014

मूल को जिसने जाना है

जुलाई २००६ 
हमारा ध्यान मूल पर नहीं जाता, पदार्थ पर जाता है, चेतना भीतर जल रही है, उस पर ध्यान जाने से ही सारी समस्याएँ समाप्त हो सकती हैं. चेतना की मलिनता और शुद्धि पर ध्यान नहीं जाने से ही हम परेशान रहते हैं, बाहर अनेक समस्याएं हैं पर सबसे बड़ी समस्या भीतर की है. हम प्रतिबिम्बों के पीछे भागते हैं, परछाईं पर हमारा ध्यान है जिसकी वह परछाई है वह सुधर जाये तभी परछाई सुधर सकती है. वस्तुएं हमें सुविधा तो दे सकती हैं सुख नहीं, सुख भीतर से आता है. हमारे भीतर जो उलझन है वह इसलिए कि हमें अपने मूल तक पहुंचना नहीं आता, हम छोटे से समाधान को समग्र मानकर भ्रान्ति में फंस जाते हैं. चेतना का विकास ही हमारे जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकता है. 

Tuesday, January 21, 2014

खुदी को कर बुलंद इतना

जून २००५ 
जो जिस भी वस्तु का हकदार होता है, उस वह मिल ही जाती है, किन्तु जो आत्मनिर्भर है वह जीवन में सफलता अवश्य पाता है. दुनिया जिसे सफलता कहती है वैसी सफलता न भी पाए पर जो खुद की तलाश में लगा है वही सही अर्थों में सफलता की राह पर है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसीलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है, जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जगत में साधारणतया माँ-पिता बच्चों से जो प्रेम करते हैं वह मोह ही कहा जायेगा, वे उन्हें किसी तकलीफ में नहीं देखना चाहते, इसलिए बचपन से ही आत्मनिर्भर होने का पाठ नहीं पढ़ाते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. 

Sunday, December 29, 2013

कण कण ऊर्जा हो सार्थक

जून २००५ 
इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में हम अपनी सहज आवश्यकता को भी भुला बैठते हैं. इस जगत में अपने चारों ओर लोगों को वस्तुओं का गुलाम बनकर दुखी होते हुए देखते हैं तथा कुछ सजग व्यक्तियों को अकिंचन होकर भी प्रसन्न देखते हैं. वास्तविकता को भूले हुए लोग अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा करते रहते हैं, फिर उसकी साज-सम्भार में अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाते हैं. हमारी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को तथा स्वयं के इर्दगिर्द का वातावरण संवारने में होता रहे तभी उसकी सार्थकता है. 

Sunday, September 22, 2013

सागर की पुकार सुनें जब

हम शुद्धात्मा हैं, मन पराधीन है, उस पर हमारा नियन्त्रण नहीं है, मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार छिपे हैं, कितने विचार उसमें उठते हैं, संकल्प-विकल्प की लहरें व बुदबुदे सभी उठते हैं पर वे सब सतह पर हैं, आत्मा सागर है, उसका स्वभाव है स्थिरता. सागर द्रष्टा है. ध्यान में हम सतही मन से नीचे गहरे सागर के साथ एक हो जाते हैं, तब मन को उसी तरह देखते हैं जैसी किसी और को देख रहे हों. धीरे-धीरे विचार भी खो जाते हैं और दृष्टा अपने आप में रह जाता है, अखंड मौन का अनुभव जब साधक को पहली बार होता है तो लगता है जैसे कोई निधि मिल गयी हो. ध्यान पूर्ण जागृति का नाम है, मन सापेक्ष सत्य है, आत्मा निरपेक्ष सत्य है. वहाँ से लौटकर हमें निरंतर यह अनुभूति रहती है कि जो कुछ जगत में है एक मात्र वही सत्य नहीं है, बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं पड़ता वह भी है. तब हम जगत में उलझते नहीं, मोह के शिकार नहीं होते. ऐसे आनन्द की अनुभति करते हैं जो बाहरी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आधारित नहीं है. 

Thursday, April 4, 2013

सहज हुए से सुख आता है



यदि कोई किसी भौतिक वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति से ही सुख प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो दुःख का भागी भी उसे होना ही पड़ेगा. सुख के पीछे भागो तो नियम के अनुसार दुःख पीछे-पीछे आता ही है, इसी तरह यदि सुख का केन्द्र ज्ञान है तो आनंद पीछे-पीछे आयेगा. इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले भोग अक्सर रोग के कारण बनते हैं और ज्ञान से प्राप्त होने वाला आनंद योग कराता है. ईश्वर ने हमें बुद्धि प्रदान की है जो ज्ञान की आकांक्षी है, जो भीतर के रस से ही तृप्त हो सकती है, उस रस से, जिसका स्रोत प्रेम है. जीवन में प्रेम नहीं है तो आनंद निज की वस्तु बनकर रह जायेगा, उसका व्यवहारिक रूप प्रेम है. भीतर के आनंद का बाहर प्राकट्य हमारे कर्मों से होगा, अन्यथा बादलों में बिजली की चमक की तरह उसका आना होगा. जो चिर स्थायी है, ऐसी तेल धारवत् शांति जब हृदय में छायी रहे वही आनंद है.

Thursday, February 7, 2013

मन वैरागी हो जाये तो


वैराग्य का अर्थ जगत से भागना नहीं है, बल्कि वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों में स्वयं को न उलझाना, जैसे हम गुलाब की झाड़ी के पास अथवा जंगल में स्वयं को बचाकर चलते हैं, वैसे ही जगत में न किसी के अहंकार को ठेस पहुंचा कर न स्वयं को दूसरों के द्वारा पीड़ित होकर चलने का अभ्यास ही वैराग्य है. ऐसा व्यक्ति ही सच्चा प्रेम कर सकता है, क्योंकि उसकी ऊर्जा उसके भीतर ही है, वह किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता. सहज भाव से वह अपने कर्मों को किये चले जाता है. सुख पाने की लालसा, प्रेम पाने की आकांक्षा उसे कहीं बाँधती नहीं है. वह उस मधुमक्खी की तरह है जो अपने पंखों को बचा कर मधुपान करती है न कि उस मक्खी की तरह जो अपने पंखों सहित शहद में जा फंसती है. जिसे न मान की इच्छा है न अपमान का भय वही सही मायनों में मुक्त है. मोह हमें बांधता है, वह सदा नीचे की ओर ले जाता है, प्रेम सदा ऊपर की और ले जाता है, वह हल्का है. हमें साधना के पथ पर स्वयं को खाली और हल्का करते जाना है. तभी ईश्वर बाँसुरी की फूंक हमारे भीतर भर सकता है, हमारी आत्मा का संगीत तभी हमें सुनाई देता है.

Tuesday, October 16, 2012

एक राज है जीवन सारा


सितम्बर २००३ 
मुक्ति को पाना कितना सहज है. मन खाली हो तो मुक्त है. कोई चाह नहीं, कोई संकल्प-विकल्प नहीं उठते तो मन रहता ही नहीं. मन जो व्यर्थ ही हम पर शासन करता है. हम गुलाम बन के रह जाते हैं, और झूठा जीवन जीते हैं जबकि सच्चाई हर वक्त हमारे साथ होती है. वह परम सत्य, परमेश्वर हमारी आत्मा का नित्य संगी है. पर मन हमारे व उसके बीच एक पर्दा डाले रहता है. हम व्यर्थ ही स्वयं को खपाते, रुलाते और सताते, तपाते हैं. हम जीवन के मर्म को जाने बिना ही जीवन जीते हैं. तत्व को जाने बिना मुक्ति नहीं, विकारों से मुक्ति, कुविचारों से मुक्ति, सुविचारों से भी अन्ततः मुक्ति, कोई द्वंद्व नहीं, केवल सहज भाव से अपने होने का अनुभव, कितना विचित्र है यह अनुभव, कितना प्रेम भरा, नित्यता की खोज हमें प्रेम तक पहुंचाती है. हमारी साधना का लक्ष्य प्रेम ही तो है, ईश्वरीय प्रेम, जो हमें उसकी हर वस्तु से प्रेम करना सिखाता है. पुलक फिर रग-रग में भर जाती है और जीवन का रहस्य हथेली पर रखे आंवले सा समझ में आने लगता है.

Friday, May 18, 2012

एक यात्रा पर जाना है


मार्च २००३ 
कोई भी घटना, व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति हमें आत्मसुख से वंचित करे उसमें इतना बल नहीं है, सुखी अथवा दुखी होना हमारे ही हाथ में है. हम मौन में रहकर जिस आत्मशक्ति का संचय करते हैं, उसे मिथ्या अहंकार वश पल भर में गंवा देते हैं. सुबह साधना करते हैं, शाम को निंदा करते हैं, तो हिसाब-किताब बराबर, और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं. कोई छोटी से छोटी बात हमें हिला जाती है. तूफ़ान में एक पत्ते की तरह हम कांपते हैं. अपने मन को आत्मनिष्ठ बनाना हमारे अपने हाथ में ही है. स्वयं को दुखी होने से बचाना हमारे खुद के हाथ में है. अस्वस्थ हुआ तो शरीर हुआ, कोई दुःख हुआ तो मन को हुआ पर हम न तो शरीर हैं न मन. स्वयं को इन दोनों से पृथक जानना ही होगा. ध्यान यही कला है. जीवन को एक योद्धा की तरह जीना है, सदा सन्नद्ध व सजग, ताकि कोई भीरुता न भीतर घर कर जाये, जीवन एक यात्रा ही तो है, जैसे एक यात्रा में कुछ सामान साथ लेकर  चलना पड़ता है, सजग रहना होता है और मंजिल की ओर ही ले जाये ऐसे कदम बढ़ाने होते हैं वैसे ही जीवन रूपी यात्रा में हमें साहस व श्रद्धा का सामान लेकर आनंद रूपी मंजिल तक जाना है. हम यदि सजग यात्री हैं तो मंजिल स्वयं आयेगी. हमारे संकल्प शुभ होते हैं तो प्रकृति भी हमारा सहयोग करती है. ईश्वर तो अकारण हमारा मित्र है, वह हमसे जितना प्रेम करता है हम शतांश भी नहीं कर सकते.


Wednesday, April 11, 2012

प्रेम गली अति सांकरी


फरवरी २००३ 
प्रेम हमें मानव से महामानव बना सकने की सामर्थ्य रखता है, प्रेम जो देना जानता है मात्र लेना नहीं. ईश्वर से अनन्य प्रेम हो तो हृदय में कृपणता नहीं रहती, रोग, शोक, मोह तो ऐसे छूट जाते हैं जैसे वस्त्रों को झाड़ देने पर धूल छूट जाती है. प्रेम पूर्वक यदि उसे बुलाएँ तो वह प्रकट भी होता है और नित्य नवीन रस का अनुभव कराता है. उस प्रेम के आगे संसार की अमूल्य से अमूल्य वस्तु भी कमतर है. उसका स्मरण ऐसी ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ कुछ शेष नहीं रह जाता. जहाँ केवल वही रह जाता है. अपना आपा तो रहता ही नहीं, जो मिथ्या है, उसे तो नष्ट होना ही है, जो है उसी की सत्ता रह जाती है. उसी के नाते तो हमें इस सृष्टि से प्रेम है. उसे हमारा प्रेम भरा दिल ही चाहिए और कुछ नहीं, उस पल में उसके और हमारे मध्य और कुछ नहीं रहता. न संसार, न कोई इच्छा...बस दो ही सम्मुख होते हैं. वह प्रिय है, सम्पूर्ण है, अनंत है कि उसमें सब समाया है, फिर उसके बिना यहाँ कुछ और है ही नहीं, वह एक क्षण के लिये भी हमसे दूर नहीं है.   

Monday, June 6, 2011

अध्यात्म


अप्रैल २०००
पने सुख के लिये किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति पर जो आश्रित नहीं है, वह स्वाधीन है. जिसे कर्म का बंधन नहीं है, अपने आप में जो पूर्ण है, वह स्वाधीन है. जिसकी आवश्यकताएं कम हैं, जो दीन नहीं है, ऐसा एक ही तो है, वह है परमेश्वर ! हमें उसी के आदर्शों पर चलना है. जीवन एक यात्रा है और ईश्वर उसकी मंजिल. रास्ता कहीं दिखाई नहीं देता, रास्ता भी हमें खुद ही बनाना है. नैतिक मूल्यों की स्थापना करके अपने जीवन में शुचिता और पवित्रता को अपनाकर, अपने आसपास फैले दुर्गुणों से स्वयं को बचाकर, सिर्फ स्वयं को ही नहीं, परिवार को, समाज को, फिर राष्ट्र को सबल बनाना है. यही हमारी धार्मिकता है, यही आध्यात्मिकता है. अध्यात्म मात्र मुक्ति की कामना नहीं है, स्वयं को सबल, शुद्ध व आदर्श बनाते-बनाते कहीं स्वार्थी न हो जाएँ इसका भी ध्यान रखना होगा. लेकिन पहली सीढ़ी तो यही है, हृदय जब शुद्ध होगा, विचार उच्च होंगे, प्रेम की भावना उदात्त होगी मन संकुचित नहीं होगा, सभी प्राणियों में एक उसी की सत्ता का अनुभव होगा, सबको अपनी नजरों से देखेंगे तो सारा जहाँ अपना हो जायेगा, जो ईश्वर का स्थूल रूप है. मन में उहापोह नहीं रहेगी, भावनाएँ एक ओर केंद्रित होंगी तो ध्यान भी सधेगा और तब ईश्वर के सूक्ष्म रूप यानि आत्मा का साक्षात्कार भी होगा.