अस्तित्त्व हमें शुद्ध देखना चाहता है। व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति विशेष के प्रति मोह ही मन की अशुद्धि है।शुद्ध अंतर्मन में ही परमात्मा का वास होता है, वह स्वयं उसमें विराजना चाहते हैं। पूर्ण परमात्मा हरेक जीवात्मा को पूर्णता की ओर ले जाना चाहता है। इसी कारण जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता है जिनसे हम कुछ सीख सकें। जगत के प्रति हमारी आसक्ति छूट सके इसी कारण रिश्तों में अस्थिरता और नश्वरता का बार-बार अनुभव कराया जाता है। मोह के कारण ही अनेक दुःख आते हैं, इसलिए मोहभंग करने के उपाय भी परमात्मा करता है। भोजन के प्रति गहन आसक्ति को तोड़ने के लिए ही रोग आते हैं ताकि हम सचेत होकर देखें कि जीवन देह के पार भी है. जब जो घटे उसे स्वीकार करना वैराग्य है और हर हाल में मन की समता बनाए रखना शरणागति। मन जहाँ-जहाँ बँधा हुआ है, वहाँ-वहाँ से उसे मुक्त करना है तथा एकमात्र परमात्मा के चरणों में लगाना है।
Showing posts with label वैराग्य. Show all posts
Showing posts with label वैराग्य. Show all posts
Monday, January 17, 2022
Tuesday, January 22, 2019
दो के पार वही बसता है
२२ जनवरी २०१९
परमात्मा हमें दोनों हाथों से दे रहा है, विवेक और वैराग्य ही उसके
दो हाथ हैं. विवेक के द्वारा हमें सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य, चिन्मय-मृण्मय में भेद
करना सिखाता है. वैराग्य के द्वारा वह हमें अपने घर में लौटा लेना चाहता है. अभी
हम असत्य में जी रहे हैं, अनित्य के प्रति हमारे मन में राग है, मृण्मय देह को ही हमने
अपना सर्वस्व मान लिया है. वैराग्य के अभाव में हम अपने घर से बहुत दूर निकल आये
हैं. जगत हमें लुभाता है पर उसके कारण कितने दुखों का सामना हमें करना पड़ता है.
चिन्मय के प्रति प्रेम ही वैराग्य का परिणाम है. वही सत्य और नित्य है. स्वयं
परमात्मा सारे द्वन्द्वों से परे है, पूर्ण विश्राम वहीं है.
Wednesday, April 11, 2018
जिस पल जानेगा मन खुद को
११ अप्रैल २०१८
देह और मन को जोड़कर रखने वाली शक्ति ही प्राण है. प्राणायाम के द्वारा इस बन्धन को ढीला किया जाता है. देह रूपी धरती के इर्दगिर्द घूमता हुआ चन्द्रमा रूपी मन तब स्वयं का अनुभव करता है. उसे पहली बार आत्मा रूपी सूर्य का बोध होता है और यह ज्ञान होता है, उसका सारा प्रकाश तो सूर्य से ही आता है, वह स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता. देह के प्रति आसक्ति को त्याग वह आत्मा की परिक्रमा करने लगता है. किन्तु मन का स्वभाव उसे बार-बार देह की तरफ ले जाता है, पूर्व के संस्कार इतनी जल्दी नहीं मिटते इसलिए प्रतिदिन का अभ्यास आवश्यक है. जगत के प्रति सारा आकर्षण देह से ही आरम्भ होता है, वैराग्य का अर्थ यही है कि मन स्वयं को आत्मा से जुड़ा हुआ माने, जिसे सुख के लिए किसी पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है. मृत्यु के समय पहली बार देहातीत अवस्था का अनुभव होता है. राजा जनक को विदेह इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने देहभाव से मुक्ति का अनुभव जीतेजी कर लिया था.
Tuesday, November 14, 2017
मिला सदा है सुख अंतर का
१४ नवम्बर २०१७
शास्त्रों
में कहा गया है, वैराग्य में कौन सा सुख नहीं है. हमें वस्तुओं के ग्रहण में जितना
सुख मिलता है, उतना ही दुःख एक न एक दिन उनका त्याग करने अथवा होने पर मिलेगा. यदि
त्याग भाव से उन्हें ग्रहण किया जाये अर्थात उनकी कामना न करके सहज भाव से जो जीवन
के लिए आवश्यक है उतना ही ग्रहण किया जाये तो भविष्य में मिलने वाले दुःख से बचा
जा सकता है. आत्मा सहज ही सुखस्वरूप है, मन में कामना का जन्म हुआ उसके पूर्व तक
मन शांत था. कामना की पूर्ति के लिए श्रम किया, भविष्य में इसके द्वारा जो फल मिलेगा
उसकी स्मृति नहीं रही, और अल्पकाल का सुख पाने के बाद मन फिर शांत हो गया, अर्थात
पूर्ववत स्थिति प्राप्त हो गयी. किन्तु जो संस्कार मन पर पड़ गया वह भविष्य में फिर
कामना उत्पन्न करेगा और एक चक्र में ही जीवन घूमता रहेगा.
Wednesday, June 17, 2015
मस्त हुआ जो वही पा गया
जनवरी २०१०
अभ्यास और
वैराग्य ये दो पंख हैं, जिनके सहारे साधक अध्यात्म के आकाश में उड़ता है. अभ्यास
समय सापेक्ष है पर वैराग्य समय सापेक्ष नहीं है. परम को प्रेम करें तो संसार से
वैराग्य हो जाता है. मन ही तो संसार है, जब मन स्थिर हो जाता है तो वह ज्योति
स्तम्भ बन जाता है, तब शरीर हल्का हो जाता है. मस्ती में परम वैराग्य है. वैराग्य
से समाधि का अनुभव होता है, समाधि से प्रज्ञा पुष्ट होती है. पूर्णता का अनुभव
होता है.
Thursday, February 20, 2014
एक चेतना दिप दिप जलती
अगस्त २००५
मानव वास्तव
में मन से परे एक दिव्य चेतना है. अबदल, अचिंतनीय चेतना जो परमात्मा का अंश है.
जहाँ कोई द्वंद्व नहीं है, संकल्प-विकल्प नहीं है, कोई दुःख, कोई नकारात्मकता नहीं
है. वह एक ही तत्व है जो सारे संसार में व्याप्त है. ऐसी चेतना के सान्निध्य में
जब बुद्धि काम करती है तो जगत के साथ सम्बन्ध आत्मीय हो जाते हैं और उतना ही तीव्र
वैराग्य भी भीतर जगता है. आत्मा का जिसे बोध हुआ है वह एकांत में भी प्रसन्न है और
भीड़ में भी. वह कालातीत, भावातीत और शुभ-अशुभ से परे है. उसे जगत से कोई स्वार्थ
नहीं साधना है. वह एक फूल की तरह हो जाता है, जो बस खिलना चाहता है, खिलना जानता
है और अपनी सुगंध बिखेर कर चुपचाप झर जाता है. वह कुछ होना नहीं चाहता वह ‘हो’ गया
है.
Wednesday, July 31, 2013
वैराग्य जगाता सच्चा प्रेम
दिसम्बर २०१३
हमारा मन ही हमारा शत्रु है और हमारा मन ही हमारा मित्र
है, मन स्थूल है भाव सूक्ष्म है. जब तक भाव शुद्धि नहीं होती मन कभी मित्र कभी
शत्रु बना रहता है. भाव शुद्धि के लिए ध्यान में गहरे उतरना होगा, हमारी चेतना
पवित्र है पर उस पवित्रता का अनुभव हमें ध्यान में ही होता है, जाग्रत अवस्था में
प्रतिक्षण संसार के प्रभाव इन्द्रियों के माध्यम से मन पर पड़ते रहते हैं, हम
उन्हीं में खोये रहते हैं, ऊपर-ऊपर ही जीते हैं. भाव यदि शुद्ध नहीं है तो विपरीत
परिस्थितियां हमें दबोच लेती हैं, मन प्रतिक्रिया करता है, पर जो गहरे एक बार भी
उतरा है उसे जगत की क्षण भंगुरता का भान हो चुका है. वह फंसता नहीं, वह जानता है
कि होकर भी वह इस जगत का नहीं है और नहीं होकर भी यहाँ से गया ही नहीं, वह सदा
मुक्त है. वह भीतर प्रेम से भी परिपूर्ण है और वैराग्य से भी. वह निरंतर उस अखंड
के साथ है वह अपने भीतर के प्रकाश को, सत्य को, अमरता को भी देख चुका है तथा
अंधकार, असत्य तथा मृत्यु के अभाव का भी उसे अनुभव हो चुका है. साधक को इसलिए अपने
मन की भाव दशा के प्रति सजग रहना होता है, मनसा, वाचा, कर्मणा वह तभी सत्य का पालन
कर सकता है जब भाव शक्ति शुद्ध रहे, तब वह सदा जगत का कल्याण ही चाहेगा, वह तब जगत
में उस फूल की तरह रहेगा जो सहज ही अपनी सुवास बिखराता है.
Thursday, February 7, 2013
मन वैरागी हो जाये तो
वैराग्य का अर्थ जगत से भागना नहीं है,
बल्कि वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों में स्वयं को न उलझाना, जैसे हम गुलाब
की झाड़ी के पास अथवा जंगल में स्वयं को बचाकर चलते हैं, वैसे ही जगत में न किसी के
अहंकार को ठेस पहुंचा कर न स्वयं को दूसरों के द्वारा पीड़ित होकर चलने का अभ्यास
ही वैराग्य है. ऐसा व्यक्ति ही सच्चा प्रेम कर सकता है, क्योंकि उसकी ऊर्जा उसके
भीतर ही है, वह किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता. सहज भाव से वह अपने कर्मों को किये
चले जाता है. सुख पाने की लालसा, प्रेम पाने की आकांक्षा उसे कहीं बाँधती नहीं है.
वह उस मधुमक्खी की तरह है जो अपने पंखों को बचा कर मधुपान करती है न कि उस मक्खी
की तरह जो अपने पंखों सहित शहद में जा फंसती है. जिसे न मान की इच्छा है न अपमान
का भय वही सही मायनों में मुक्त है. मोह हमें बांधता है, वह सदा नीचे की ओर ले
जाता है, प्रेम सदा ऊपर की और ले जाता है, वह हल्का है. हमें साधना के पथ पर स्वयं
को खाली और हल्का करते जाना है. तभी ईश्वर बाँसुरी की फूंक हमारे भीतर भर सकता है,
हमारी आत्मा का संगीत तभी हमें सुनाई देता है.
Sunday, July 1, 2012
भीतर बरसे जाता है वह
मई २००३
इस संसार से जो भी हम प्राप्त करते हैं उसके पीछे दुःख छिपा हुआ है. एक बार जब
बुद्धि इस सत्य को जान लेती है तो भीतर गए बिना कोई रस्ता नहीं बचता और वहाँ आनंद
बरस ही रहा है. उसके बाद जगत का दुःख सहन नहीं होता. तब सहज वैराग्य का जन्म होता
है. और जब यह क्षण जीवन में आता है जीवन संगीतमय हो जाता है. अधरों से मुस्कुराहट
कभी जाती नहीं. आँखों में एक रहस्य छिपा रहता है. तब जीवन में उपरति हो जाती है.
हर कार्य एक खेल लगता है. तब जीना कितना सहज और सरल हो जाता है.
Friday, October 7, 2011
वह पूर्ण है
ज्ञान वहीं टिकता है जहाँ वैराग्य है. मैं कुछ हूँ तो मेरा भी कुछ होगा, यदि मैं कुछ नहीं तो मेरा भी कुछ नहीं, फिर कैसा बंधन और कैसी मुक्ति? सदगुरु कामना शून्य है, अहंकार शून्य है जो स्वयं भी वैसा हो जाता है वही ईश्वर को पा सकता है. जैसे हवा है और धूप है वैसे ही ईश्वर हमारे चारों ओर मौजूद है पर कुछ होने का भाव ही उससे दूरी बना देता है. उसे एकछत्र अधिकार चाहिए. मन यदि पूरा उसे नहीं सौंपा तो वह कुबूल नहीं करता. गुरु नानक ने कहा है पूरा प्रभु आराधिए, पूरा जाका नाम, पूरा पूरे से मिले, पूरे के गुन गाम !
Wednesday, July 6, 2011
मन से परे
यदि कोई सुख और शांति चाहता है तो उसे आध्यात्मिकता को अपनाना ही होगा. अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, शोधन व आत्म विश्लेषण. ऊपरी मन बहुरुपिया है, कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी. मात्र इसके सहारे रहे तो हम कभी शाश्वत सुख नहीं पा सकते. इससे परे एक ऐसा मन भी हमारे पास है जो निर्विकार है. जहाँ उतर-चढ़ाव नहीं हैं, जो परम आनंद का स्रोत है. अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है.
Subscribe to:
Posts (Atom)