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Wednesday, October 22, 2014

जाग गया जब कोई भीतर

मार्च २००७ 
उपवास का अर्थ है निकट बैठना, उसके निकट जो भीतर है, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है. यानि हमारी आत्मा ! उसके पार ही तो परमात्मा है. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वह स्वयं को जाने, जिसे जानने के बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. साधक सभी कुछ करता है पर भीतर से बिलकुल अछूता रहते हुए. सब नाटक सा लगता है, कुछ भी असर नहीं करता. वह इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाता है. जीना तब सहज होता है, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना भी नहीं. कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं. खेल करना है बस. जगना, सोना, खाना, पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था अपने सबसे करीब हो जाता है. वही अब खुद की याद दिलाता है. जो जन्मों से सोया हुआ था वह जाग जाता है. शास्त्र घटित होते हुए लगते हैं, उनकी बातें अक्षरशः सही लगती हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

Wednesday, December 26, 2012

राधे, राधे ! श्याम मिला दे



कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.

Sunday, November 25, 2012

तमाम दुनिया है खेल उसका


वह एक ही है जो सृष्टि के कण-कण में समाया है, तमाम दुनिया है खेल उसका, वह खेल सबको खिला रहा है. जो ऐसा जानता है वह सभी जगह उसी का दर्शन करता है. वह स्वयं जिस तरह स्वप्न में सृष्टि रचता है, उसी तरह इस जगत को स्वप्नवत ही जानता है, तभी वह उसमें फंसता नहीं है, अलिप्त रहता है. सम्पूर्ण सृष्टि रसमय है, पंचभूत भी रसमय हैं तो हम मानव ही क्यों रसविहीन जीवन व्यतीत करें, जबकि हम उन्हीं का अंश हैं. कृष्ण ने हमें वचन दिया है कि वह हमारे कुशल-क्षेम की रक्षा करेंगे. जो उसके निकट आता है वह उसे शक्ति से पूरित करता है. वह जीवनदाता है और जीवन को चलाने वाला भी है. वह हमारे पल-पल की खबर रखता है, वह लीला रचता है एक से अनेक होता है. संतों के रूप में आकर वही मानवों की सुप्त चेतना को जगाता है. वह प्रेम करता है और प्रेम चाहता है. जो आत्मस्थित है वही असली खिलाड़ी है. भक्ति और श्रद्धा के पंख लगाकर हम आत्मा के आकाश में विचरण कर सकते हैं. किनारे पर बैठकर लहरें गिनने की बजाय आत्मा के सागर में गहरे उतरना होगा तभी मोती मिलेंगे. जो किनारे पर रहते हैं उन्हें बार-बार आना पड़ता है, वे किये हुए को पुनः पुन करते हैं सीखे हुए को पुनः सीखते हैं. 



प्रिय मित्रों,  मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा क्रिसमस के लिए अग्रिम शुभकामनायें...

Friday, November 9, 2012

उत्तिष्ठतः जाग्रतः प्राप्त वरान्निबोधताः


अक्तूबर २००३ 
कोलकाता स्थित दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में काली की भव्य मूर्ति है. मंदिर का प्रांगण भी विशाल है, सामने ही नदी भी है. परमहंस रामकृष्ण इसी मंदिर में माँ काली से वार्तालाप करते थे. बेलूर मठ में उनकी मूर्ति ऐसी जीवंत है, लगता है वह वही हैं, श्रद्दालुओंको आज भी उनकी उपस्थिति का अहसास होता है. स्वामी विवेकानंद की समाधि भी अनुपम है, उनके कमरे को फूलों से सजाया गया है. पूरे आश्रम में एक अनोखी शांति फैली हुई है. माँ शारदा के कई सुंदर चित्र वहाँ हैं. जीता-जागता ईश्वर इस आश्रम में निवास करता था, उसकी उपस्थिति न जाने कितने सौ वर्षों तक हमें प्रेरित करती रहेंगे. ईश्वर इस सृष्टि के कण-कण में है, वही जीवन है, वही मृत्यु भी है. वही द्वंद्वों को बनाता है पर स्वयं उससे पर है, हमने वह अपनी ओर बुलाता है, वह जैसे कोई खेल खेल रहा है. यह जगत जैसे काली माँ की क्रीड़ास्थली है, हम यदि इस खेल को जीतना चाहते हैं तो उसके पास लौटना होगा, और उसका रास्ता सांप-सीढ़ी के खेल की तरह कई उतार-चढ़ाव से भरा है, जब हमें प्रतीत होता है कि मंजिल सामने है तो कोई सांप हमें डस लेता है और हम नीचे उतार दिए जाते हैं, पर भीतर से कोई कहता है उठो, जागो और मुझे प्राप्त करो.

Wednesday, September 12, 2012

सत्यं-शिवं-सुन्दरं


अगस्त २००३ 
सुख-दुःख से परे, मान-अपमान से ऊपर, इच्छा-अनिच्छा के द्वंद्व से मुक्त मन कितना सुंदर है. सत्यं-शिवं-सुन्दरं का जब जीवन में प्रवेश हो संभवतः तभी वास्तविक जीवन शुरू होता है. सत्य ही शिव है, और जो कल्याणकारी है, वही सुंदर है, यह जगत हमारे मन का प्रतिबिम्ब ही दिखाता है. जब मन शांत हो, सौम्यता को धारण कर चका हो, जगत में रची गयी सैकड़ों लीलाएं चाहे वे सुखद हो अथवा दुखद, अब एक सी प्रतीत होती हैं. घड़ी-घड़ी मन भीतर आ जाता है, उसी केन्द्र की ओर जो उसका मूल है, बाहर के कार्यों को करने के लए उसे सप्रयास बाहर लाना पड़ता है. इसे ही अमनी भाव कहते हैं. मौन से कैसी प्रीति हो जाती है. वाणी के मौन के साथ-साथ भीतर का मौन.. क्योंकि अब कोई चाह शेष नहीं रहती, जब इस जगत से विशेष कुछ मिलने वाला नहीं है जो पहले से ही हमारे पास नहीं है तो बाहर क्यों जाएँ. भीतर कोई मिल गया है जिसे जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ पाना शेष नहीं रह गया है. सब कुछ इतना सहज हो जाता है मानों जन्मो-जन्मों से इसी पथ के राही हों. तब जीवन एक खेल लगता है.

Wednesday, August 22, 2012

क्षण क्षण जीना सीखा जिसने


जुलाई २००३ 
हम अपना कितना समय व्यर्थ ही गंवा देते हैं, किन्तु जब तक कार्य कारण सिद्धांत के अंतर्गत रहते है, तो हर कार्य के पीछे एक कारण होता है, उस कारण के पीछे एक और कारण. हमारा इस जगत में होना भी तो एक कारण छिपाए है, लेकिन यह तो माया का जाल है, जो इस जाल से मुक्त हो गया हो, उसे अपने कार्यों, विचारों और शब्दों के पीछे अज्ञात कारणों को खोजने की आवश्यकता नहीं है. वह जो कुछ भी करता है सहज रूप से करता है, उसके पीछे कोई प्रयोजन नहीं होता, उसके कार्य किसी कारण अथवा परिणाम से बंधे नहीं होते. वह क्षण-क्षण जीता है. उसका पिछला जीवन एक तरह से समाप्त हो चुका होता है. अगले क्षण क्या होने वाला है उस ज्ञात नहीं और जो क्षण बीत गया वह उसके लिये रहा नहीं, वह हर क्षण मुक्त है, वह अपनी मौज में है. वह जीवन की असलियत को जान चुका होता है, यह सारा माया का खेल उसके सामने स्पष्ट हो चुका होता है, अब उसे इसमें कोई रस नहीं होता. बस उसका होना ही एक मात्र सत्य बनकर उसे दिखता है. तो क्या वह जड़ वस्तु सम है? नहीं, वह अनुभव करता है, वह समरस है, वह अपने भीतर की दुनिया में संतुष्ट रहता है. वह जिस भाव में रहता है उसे व्यक्त करने के लिये शब्दों में सामर्थ्य नहीं है. वह सभी के भीतर उसी अनंत को देखता है, वह अनंत को पा चुका अब सीमित से कैसे संतुष्ट हो सकता है पर इससे कोई अभिमान उसे नहीं होता, वह अनंत के आगे स्वयं को अणु ही मानता है पर ऐसा अणु जो नित्य है ,शाश्वत है, पूर्ण है.

Sunday, July 1, 2012

भीतर बरसे जाता है वह


मई २००३ 
इस संसार से जो भी हम प्राप्त करते हैं उसके पीछे दुःख छिपा हुआ है. एक बार जब बुद्धि इस सत्य को जान लेती है तो भीतर गए बिना कोई रस्ता नहीं बचता और वहाँ आनंद बरस ही रहा है. उसके बाद जगत का दुःख सहन नहीं होता. तब सहज वैराग्य का जन्म होता है. और जब यह क्षण जीवन में आता है जीवन संगीतमय हो जाता है. अधरों से मुस्कुराहट कभी जाती नहीं. आँखों में एक रहस्य छिपा रहता है. तब जीवन में उपरति हो जाती है. हर कार्य एक खेल लगता है. तब जीना कितना सहज और सरल हो जाता है.

Tuesday, March 13, 2012

नन्हा सा ? यह मन बेचारा


जनवरी २००३   
सत्य के साधक को आपने मन पर नजर रखनी होती है, हमारे मन में एक पल में न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं, जिनके बारे में हम कभी ध्यान ही नहीं देते. ध्यान करते-करते मन जब दर्पण जैसा बन जाये तो भीतर का सारा खेल उसमें झलकने लगता है, तब सूक्ष्म से सूक्ष्म बात भी छिप नहीं सकती. मन ही हमारा शत्रु है और मन ही हमारा मित्र है, सारी साधना इसी मन को केन्द्र में रखकर होती है. हर पल का हमारा साथी है मन, पर इसकी गहराइयों में क्या छिपा है हम नहीं जानते. विचित्र हैं इसकी गतिविधियां. आत्मा की शक्ति ही है मन, हमें आत्मा का संचय करना है अर्थात मन का संचय करना है. व्यर्थ के चिंतन में न लगाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित करना है. ध्यान से ऊर्जा का संचय होता है जो हममें कर्म करने का सामर्थ्य बढ़ाती है. मन की सीमा नहीं और इसीलिए इसको असीम प्रेम, ज्ञान व शांति से ही संतुष्ट किया जा सकता है ससीम वस्तुओं से नहीं.