अस्तित्त्व हमें शुद्ध देखना चाहता है। व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति विशेष के प्रति मोह ही मन की अशुद्धि है।शुद्ध अंतर्मन में ही परमात्मा का वास होता है, वह स्वयं उसमें विराजना चाहते हैं। पूर्ण परमात्मा हरेक जीवात्मा को पूर्णता की ओर ले जाना चाहता है। इसी कारण जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता है जिनसे हम कुछ सीख सकें। जगत के प्रति हमारी आसक्ति छूट सके इसी कारण रिश्तों में अस्थिरता और नश्वरता का बार-बार अनुभव कराया जाता है। मोह के कारण ही अनेक दुःख आते हैं, इसलिए मोहभंग करने के उपाय भी परमात्मा करता है। भोजन के प्रति गहन आसक्ति को तोड़ने के लिए ही रोग आते हैं ताकि हम सचेत होकर देखें कि जीवन देह के पार भी है. जब जो घटे उसे स्वीकार करना वैराग्य है और हर हाल में मन की समता बनाए रखना शरणागति। मन जहाँ-जहाँ बँधा हुआ है, वहाँ-वहाँ से उसे मुक्त करना है तथा एकमात्र परमात्मा के चरणों में लगाना है।
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Monday, January 17, 2022
Thursday, January 15, 2015
मुक्त हुआ सो मन निर्मल
अगस्त २००७
जब साधक को अपने भीतर एक
ऐसे तत्व का पता चल जाता है, ‘जो है’ पर दिखायी नहीं देता, जो सारे शब्दों से भी
परे है तो वह शेष नहीं रहता, जो रहता है वह इतना सूक्ष्म है कि उसकी तुलना में मन,
बुद्धि आदि इतने स्थूल मालूम पड़ते हैं कि शरण में जाने की बात भी बेमानी लगती है.
जो शरण में जायेगा वह स्थूल है और जिसकी शरण में जायेगा वह अति सूक्ष्म है. मन जब
तक सूक्ष्म नहीं हो जाता, निर्मल नहीं हो जाता, सारे आग्रहों से मुक्त नहीं हो
जाता. सारे द्वन्द्वों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक शरण नहीं हुआ. जब वह इतना सहज
हो जाये, इतना पारदर्शी की सबके आर-पार निकल जाये, कोई भी अवरोध उसके सामने अवरोध
न रहे, वह जैसे यहाँ रहकर भी यहाँ का न हो, उस सूक्ष्म में तभी प्रवेश हो सकता है.
यह निरंतर अभ्यास की बात है, लेकिन धीरे-धीरे यह स्वभाव ही बन जाये, तभी वास्तव
में शरणागति घटित होगी, अभी तो हम पल-पल शरण में और पल-पल अशरण में आ जाते हैं.
Sunday, November 9, 2014
शरण गये सो तृप्त भये
अप्रैल २००७
धर्म
को यदि धारण नहीं किया तो व्यर्थ है, नहीं तो हमारी हालत भी दुर्योधन की तरह हो
जाएगी, जो कहता है मैं धर्म जानता हूँ पर उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म
जानता हूँ पर उससे निवृत्ति नहीं होती. जितनी हम उठा सकें उतनी जिम्मेदारी हमें
उठानी ही चाहिए. जैसे-जैसे हम किसी काम को करने का बीड़ा उठाते हैं वैसे-वैसे हममें
और शक्ति भरती जाती है ! हम स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर
आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वास्तव में सारे गुण हमारे भीतर ही हैं, यह मानकर चलना
है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि हम शरण में जाते हैं तो ईश्वर की
पवित्रता हमारे सारे दोषों को दूर करने में सहायक होती है. वह पावन है और उसकी
निकटता में हम भी पावन हो जाते हैं. जो शक्ति उससे मिलती है वह सृष्टि के हित में
लगने लगती है, क्योंकि हम स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं, जो एक बार सच्चे हृदय से
शरण में गया वह तृप्त ही है !
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Monday, May 26, 2014
तेरी शरण में आये हैं हम
मार्च 2006
प्रार्थना
में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता
रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा
सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो
तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह
हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा
अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं,
कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ
है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही
कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास
होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की
परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.
Wednesday, March 19, 2014
शरणागति कीमिया है इक
अक्तूबर २००५
शरण में यदि हम आ जाते हैं
तो समय-समय पर हमें भीतर से प्रेरणा मिलती है, उत्साह बढ़ता है तथा हमें प्रतीत होता
है कि हम किसी की छत्रछाया में है, हमें इन्द्रियातीत आनन्द का बोध भी होता है.
सुख-दुःख में सम रहने की कला भी सीखते हैं. शरणागति विनम्र बनाती है. विनम्रता के
बिना हुआ बोध अहंकार को बढ़ाता है. अपने सच्चे कर्त्तव्य का ज्ञान होता है. कई सत्य
उद्घाटित होने लगते हैं. सुख-दुःख जो प्रारब्ध वश है वह तो अपने-आप मिलेगा ही. संसार
हमें जितना मिलना है वह मिलेगा ही आदि. पर ईश्वर प्राप्ति का संकल्प करते ही हमारे
भीतर एक अद्भुत शांति का उदय होता है. धीरे-धीरे यह सम्बन्ध इतना दृढ़ हो जाता है
कि उसमें देश, काल का भी कोई भेद नहीं रहता, वह हर काल में, हर स्थान पर साथ-साथ
रहता है.
Wednesday, January 15, 2014
शरण में आये हैं हम तुम्हारी
जून २००५
निजी सुख
की कामना का त्याग ही हमें ईश्वर के राज्य में ले जाता है. अपने स्वार्थ की सिद्धि
चाहना ही दुःख का कारण है. दुःख हमें ईश्वर से दूर ले जाता है. दुखी होकर हम अपने
को ही हानि ही पहुंचाते हैं, दुखी होना अज्ञानता का लक्षण है. ज्ञान का आश्रय लेते
ही हम सुखी होने का गुर सीख लेते हैं. सभी दुखों से छूट जाना ही मुक्ति है, मोक्ष
है, यही भगवद प्राप्ति है. इसे पाने के लिए हमारी योग्यता का कुछ भी महत्व नहीं
है, अर्थात हम अपनी योग्यता के बल पर भगवद प्राप्ति नहीं कर सकते. हमें अहंकार का
त्याग करके शरण में जाना होगा, अपने कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी अस्तित्त्व पर छोड़
देनी होगी. कृष्ण ने स्वयं ही अपनी प्राप्ति का मार्ग बताया है-
सर्व धर्मान परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज
अहम् त्वां सर्व
पापेभ्य मोक्ष्यामि माशुचः
शरण में जाने का मार्ग
सद्गुरु बताते हैं, जहाँ से वृत्ति उठती है, उसमें विश्रांति पाने का नाम ही
शरणागति है. ध्यान, प्रार्थना अथवा जप में हम उस स्थान पर पहुंच जाते हैं जहाँ से
सारे विचार उठते हैं, जो मन, बुद्धि का उद्गम है, जो समस्त कारणों का कारण है,
वहीं जाकर आनन्द का अनुभव होता है.
Monday, September 9, 2013
तोरा मन दर्पण कहलाये
फरवरी २००५
जगत के साथ जो हमारा व्यवहार है, वह
प्रतिबिम्ब है हमारे भीतर के जगत का, लोगों के साथ हमारा सबंध दर्पण के समान है.
दूसरों में जो कमियां हमें दिखाई देती है, वास्तव में वे हमारे भीतर होती है, और
हम उन्हें निकालना चाहते हैं, पर यदि हम बाहर को ही देखते रहे और यह न देखा कि
हमारे व्यवहार का संचालन कौन कर रहा है तो हम स्वयं को नहीं बदल पाएंगे. हमारा
आचरण भले ही उसके विपरीत हो पर भीतर का भाव वही रहेगा. ध्यान के समय हम उस गहराई
तक पहुंच सकते हैं, और स्वयं को सुझाव देकर परिवर्तन ला सकते हैं. हम अपने पूर्व
जीवन को यदि मुडकर देखें तो पाते हैं, मन के अधीन रहकर सदा दुःख ही जाना है, मन की
गहराई में समाधान मिलता है, इसी समाधान का अनुभव ही सच्ची आध्यत्मिकता है. प्रभु
की शरण में जाकर हम इसे पा सकते हैं.
Wednesday, March 6, 2013
जो तुझ भावे सो भली
मई २००४
विद्या माया से अविद्या माया तो नष्ट
हो जाती है, पर सत्वगुण विद्या माया में ही छिपा है, उसे नष्ट करने के लिए ज्ञान
पर्याप्त नहीं है, वह केवल ईश्वर की शरण में जाकर ही नष्ट हो सकती है, उसकी कृपा
हम पर हर क्षण बरस रही है. हमारे मन में न जाने कितने-कितने संस्कार दबे हैं, जो
वक्त आने पर प्रकट होते हैं यदि हम शरणागत हैं तो प्रारब्ध को हँसते-हँसते स्वीकार
करते हैं. स्वीकार करते ही उसका अहैतुक, निस्वार्थ प्रेम हमें छू जाता है. धर्म के
अनुभव का एक ही अर्थ है कि परमात्मा है और हमसे बहुत प्रेम करता है, यह अस्तित्त्व
हमारा अपना है, सदा हमें प्रसन्न देखना चाहता है. प्रतिपल जीवन उत्सव तभी बन सकता
है, जब यह सारा जगत अपना लगता है.
Wednesday, December 26, 2012
राधे, राधे ! श्याम मिला दे
कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर
स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर
मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को
प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष
के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब
वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते
हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद
को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.
Wednesday, October 3, 2012
प्रेम ही साधना है
सितम्बर २००३
यीशु के उपदेश दिल को छू लेते हैं, प्रेम से छलकता उसका हृदय हमारे हृदयों को
स्पंदित कर जाता है. वह गड़रिया है और हम उसकी शरण में हैं, हम उसकी अंगूर की बारी हैं
वह हमें रोपता है फिर हमारा ध्यान रखता है. हम उसके आश्रित हों तो वह हमें धरती का
नमक भी बना सकता है. वह चुन-चुन कर हमारे दोषों को दिखाता है फिर उन्हें दूर करने को
कहता है. वह प्रेम को सर्वोपरि मानता है,
हम सभी मूलतः प्रेम की उपज हैं. यह जगत प्रेम के आश्रित है. यीशु भी भक्त को
कान्हा की तरह प्रिय हैं, वैसे ही जैसे कबीर, नानक, तुलसी, और अन्य संत, माँ
शारदा, रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानंद. प्रीति ही हमें जगत में स्थिरता प्रदान
करती है. प्रीति यदि सच्ची हो तो हृदय को पवित्र बनाती है और उसमें दृढ़ता भी भरती
है, तब संसार भयभीत नहीं करता, अज्ञान ही भय का कारण है, और अहंकार ही अज्ञान का
कारण है. अहंकारी अंतर प्रेम नहीं कर सकता और न ही उस प्रेम का अनुभव कर सकता है
जो दिव्य है, जो किसी बाह्य वस्तु पर आश्रित नहीं है. वह रस अमृत के समान है जिसे
एकबार पा लेने के बाद संसारी सुख उसी तरह फीके पड़ जाते हैं जैसे सूर्य निकलने पर
चन्द्रमा. ईश्वर की कृपा के बिना यह रस हमें नहीं मिलता. ध्यान के लिए योग्यता और
सामर्थ्य हमें प्राप्त नहीं होता. सद्गुरु के कितने उपकार हैं कि उनका ज्ञान एक पथ
दिखाता है जिस पर चलकर हम लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, लक्ष्य है-अंतहीन प्रेम..अनंत
प्रेम.
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