दिखावा करना और दूसरों की नक़ल करने की आदत हमें जीवन में आगे बढ़ने से रोकती है। हम दिखावा करते हैं तो अहंकर को बढ़ावा देते हैं। दूसरों की नक़ल करते हैं तो असत्य को प्रश्रय देते हैं। संतुष्ट जीवन सत्य की राह से ही पाया जा सकता है, प्रामाणिकता वह पहली ईंट है जिस पर एक सुखद जीवन की इमारत खड़ी होती है। अहंकार चाहे कितना भी निर्दोष हो हमें अपने सच्चे स्वरूप से दूर ही रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है क्योंकि दिव्य चेतना हर एक के भीतर विद्यमान है। अपनी निजता को पहचान कर हमें उस एकता को पाना है जिसके बाद न ही दिखावा करने की ज़रूरत रह जाती है और न ही किसी की तरह बनने की आकांक्षा।जैसे बगीचे में खिला हर पुष्प अनोखा है वैसे हर मानव अपनी निजी पहचान लेकर दुनिया में आता है, जन्म-जन्मांतर की यात्रा करके वह स्वयं की दिव्यता को पहचान कर अस्तित्त्व के साथ मिलकर कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है।
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Thursday, November 10, 2022
Tuesday, August 16, 2022
कर्त्तव्यों का जिसे भान रहे
किसी भी राष्ट्र को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए केवल सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती, उसके नागरिकों का योगदान भी उसमें बहुत प्रमुख भूमिका निभाता है। एक बार यदि बहुमत से कोई सरकार चुन ली जाती है तो उसकी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर उतारने के लिए जनता की भागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है। संविधान में भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्यों की चर्चा की गयी है। हर नागरिक को उसका ज्ञान होना आवश्यक है. स्वच्छता अभियान पर सरकार चाहे करोड़ों रुपया खर्च करे, यदि देशवासी अपने आसपास गंदगी फैलाते रहेंगे, वन, झील, नदियों को दूषित करेंगे तो स्वच्छ भारत का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता। हर गाँव में सरकारी स्कूल खोले जाएँ पर लोग अपने बच्चों को पढ़ने न भेजें तो संविधान की अवहेलना होती है। हमारी प्राचीन धरोहरों का सम्मान न करके यदि कोई उन्हें हानि पहुँचाए तो हम अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रहे। जल का सरंक्षण हो या ऊर्जा का, जनता को इसमें आगे आकर सम्मिलित होना होगा। सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने में भी आम आदमी को आगे आना होगा। यदि भारत का हर नागरिक सजग होकर हर प्रकार के उत्कर्ष को ही अपना ध्येय बनाएगा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विकसित देशों के साथ खड़ा होगा।
Saturday, April 18, 2020
भारत पर जो नाज करेगा
हम भारत के लोग हमारे संविधान में यह पंक्ति सबसे पहले लिखी गयी है, और यही है भारत की असीम शक्ति का स्रोत ! मुझे इस बात का अनुभव् कई बार हुआ है और आज मैं आपके साथ अपना यह अनुभव साझा कर रही हूँ. मेरा जन्मस्थान उत्तरप्रदेश में है, जीवन के आरंभिक पचीस वर्ष वहाँ के भिन्न शहरों में बीते। सरकारी नौकरी के कारण पिताजी किसी भी स्थान पर तीन या चार वर्ष से अधिक नहीं रहते थे. हर बार नए शहर में, नये घर में जाने पर हमें अपने आस-पास एक ही जैसे लोग मिले. हर जगह राम और कृष्ण की कहानियाँ कहने-सुनने वाले लोग, आपस में मिलकर होली, दीवाली आदि त्योहार मनाने वाले लोग. विवाह के बाद वर्षों असम में रहना हुआ, जहाँ पूरे भारत से आये भिन्न भाषा-भाषी लोगों से मिलने का सौभाग्य मिला. उड़िया, बंगाली, तमिल, तेलगु, कन्नड़, पंजाबी, सिख, नागा, मिजो गढ़वाली सभी प्रदेशों के लोग वहाँ एक साथ रहते हैं. सभी को आपस में जुड़ने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता. सबको जोड़ती है भारत की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति ! भारत को एक सूत्र में बाँधा है यहां की नदियों के प्रति आस्था ने, पर्वतों पर बने देव स्थानों ने और परब्रह्म के प्रति अटूट श्रद्धा ने ! हर भारतीय सहज ही श्रद्धावान है, उसके जीवन में व्रत का स्थान है तभी वह अनुशासन का पालन कर सकता है. हम केवल भौतिक अस्तित्त्व को ही नहीं देखते उसके परे जो दैविक और आध्यात्मिक है उसे भी साथ लेकर चलते हैं. आपकी तरह मुझे भी भारत पर गर्व है और गर्व है हजारों वर्षों से चली आ रही इसकी अक्षुण्ण सांस्कृतिक धारा पर. आइये हम भारत के लोग मिलकर देश के इस आपद काल में अपना-अपना कर्त्तव्य निभाएं. घर में रहें और स्वस्थ रहें.
Monday, July 28, 2014
बहे ध्यान की धारा अविरल
दिसम्बर २००६
जब मन ध्यानस्थ होता है तो
सहज स्वाभाविक प्रसन्नता तथा उजास चेहरे पर स्वयमेव छाये रहते हैं, उनके लिए
प्रयास नहीं करना पड़ता. मन से सभी के लिए सद्-भावनाएँ उपजती हैं. यह दुनिया तब
पहेली नहीं लगती न ही कोई भय रहता है. ध्यान से उत्पन्न शांति सामर्थ्य जगाती है
और सारे कार्य थोड़े से ही प्रयास से होने लगते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो
तो अंतर्मन में एक अनिवर्चनीय अनुभूति होती है, ऐसा सुख जो निर्झर की तरह अंतर्मन
की धरती से अपने आप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है, जीवन एक सहज सी क्रिया बन
जाता है कहीं कोई संशय नहीं रह जाता.
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Tuesday, July 22, 2014
एक सरस मुस्कान है भीतर
अक्तूबर २००६
संतजन
कहते हैं, मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जागृत नहीं कर सका वह पूर्ण
जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज, मुक्त रूप से हमें हँसना नहीं सिखा
देता. सहजता आती है जब कोई अपने कर्त्तव्यों का ठीक से निर्वाह कर सके. हमारा
वास्तविक कर्त्तव्य क्या है, धर्म क्या है, यह गुरु ही हमें बताते हैं. शील, सत्य
और स्नेह के गुणों के आधार पर भीतर की शक्ति को जागृत करने से ही कर्त्तव्य निबाहे
जा सकते हैं. हमरा लक्ष्य स्पष्ट हो और ऐसा हो कि सत्य के निकट पहुंच सकें. सरल
हृदय में ही धर्म निवास करता है. किसी तरह के कृत्रिम आवरण में हमें स्वयं को ढकना
नहीं है, मृदुता को अपनाना है. विनम्रता को खोते ही हमारी चेतना विनाश की ओर चली
जाती है. हम स्वयं को अभिव्यक्त कर सकें, अपने भीतर छिपी असंख्य शक्तियों को उजागर
कर सकें. तभी हमारा इस जगत में आना सार्थक होगा और तभी भीतर की अमित मुस्कान पनपती
है.
Wednesday, March 19, 2014
शरणागति कीमिया है इक
अक्तूबर २००५
शरण में यदि हम आ जाते हैं
तो समय-समय पर हमें भीतर से प्रेरणा मिलती है, उत्साह बढ़ता है तथा हमें प्रतीत होता
है कि हम किसी की छत्रछाया में है, हमें इन्द्रियातीत आनन्द का बोध भी होता है.
सुख-दुःख में सम रहने की कला भी सीखते हैं. शरणागति विनम्र बनाती है. विनम्रता के
बिना हुआ बोध अहंकार को बढ़ाता है. अपने सच्चे कर्त्तव्य का ज्ञान होता है. कई सत्य
उद्घाटित होने लगते हैं. सुख-दुःख जो प्रारब्ध वश है वह तो अपने-आप मिलेगा ही. संसार
हमें जितना मिलना है वह मिलेगा ही आदि. पर ईश्वर प्राप्ति का संकल्प करते ही हमारे
भीतर एक अद्भुत शांति का उदय होता है. धीरे-धीरे यह सम्बन्ध इतना दृढ़ हो जाता है
कि उसमें देश, काल का भी कोई भेद नहीं रहता, वह हर काल में, हर स्थान पर साथ-साथ
रहता है.
Tuesday, November 26, 2013
बनी रहे वह स्मृति पल पल
अप्रैल २००५
हम सोचते हैं कि मन सध
गया, पर यह सूक्ष्मरूप से अहंकार को सम्भाले रहता है. देहात्म बुद्धि में रहने पर
मन हावी हो जाता है. आत्मा में जो स्थित हो गया उसे कोई बात विचलित नहीं कर सकती.
जगत में रहकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए वह अलिप्त रह सकता है. वह अपनी
मस्ती में रहता है, परम की स्मृति उसे प्रफ्फुलित किये रहती है. आनन्द का एक स्रोत
उसके भीतर निरंतर बहता रहता है, एक पल के लिए भी यदि उसमें अवरोध हो तो उसे
स्वीकार नहीं होता. एक क्षण के लिए भी मन में छाया विकार उसे व्यथित कर देता है. जगत
उसके लिए परमात्मा को पाने का साधन मात्र बन जाता है. वह खुद को जगत के लिए उपयोगी
बनाने का प्रयत्न करता है. वह प्रेम ही हो जाता है.
Thursday, August 15, 2013
कर्त्तव्य निभाना है
जनवरी २००५
कर्म हमें बंधन में डालते हैं, पर कर्म हम करते ही क्यों
हैं ? साधक तो इस बात के लिए सजग रहता है कि उसके नये कर्म न बनें, वह तो ध्यान के
द्वारा पुराने कर्मों को काट रहा है. मोह, स्वार्थ, स्वभाव तथा कर्त्तव्य चार
कारणों से हम कर्म करते हैं. प्रथम तीन हमें बांधते हैं, पर चौथा सहज भाव से किया
गया कर्म हमें बांधता नहीं, मोह अथवा स्वार्थ में पड़कर हम अकर्म कर डालते हैं. स्वभाव
वश कर्म करने से हानिकारक कर्म भी हो जाते हैं. कर्त्तव्य कर्म करने नहीं होते सहज
ही होते हैं, उनका होना ही उनकी शक्ति है, जब हमें कर्त्तव्य कर्मों का ज्ञान होगा
तब सप्रयत्न कुछ नहीं करना होगा, हमारा होना ही पर्याप्त होगा जैसे इस दुनिया के
सभी कार्य सहज रूप से अपने आप ही हो रहे हैं.
Wednesday, August 29, 2012
कर्म किये जा फल की चिंता मत कर ऐ इंसान
हम जैसा कर्म करते हैं
प्रकृति उसका तदनुसार फल देती है. उसके नियम अटल हैं. निष्काम कर्म भी करें तो भी फल तो मिलने ही वाला है. कामना होने
से हमारा सारा ध्यान कर्म की ओर न रहकर फल की ओर भी चला जाता है सो हमारी चेष्टा
पूर्ण नहीं होती सो फल भी अधूरा ही मिलता है. चिंतन, मनन ध्यान भी कर्म हैं और
निर्धरित कर्त्तव्यों का पालन भी. यदि पहली श्रेणी के कर्म हेतु के लिये किये गए
हों, और कर्त्तव्य, मात्र कर्त्तव्य हेतु तो पहले कर्म बांधने वाले होंगे. मन को
सात्विक बनाना भी यदि कुछ पाने की इच्छा से हुआ तो मुक्ति दूर ही रहेगी. कर्ता भाव
जब तक नहीं छूटता तब तक फल की इच्छा बनी ही रहेगी, यदि कर्म हमारे द्वारा हो रहे
हैं, हम नहीं कर रहे हैं तभी हम फल की आशा से बंधेंगे नहीं.
Tuesday, June 28, 2011
सहज सुख
जुलाई २०००
धर्म जब जीवन में बढ़ता है तो इच्छाओं पर लगाम लगती है, वे मर्यादित होती हैं. कोई सीख दे तो फौरन प्रतिकार करने की इच्छा होती है, इसी तरह कोई गलती करे तो टोकने की इच्छा होती है, जो अनावश्यक है. चुप रह जाने की इच्छा बोलने की इच्छा से ज्यादा श्रेष्ठ है. अंतःकरण को शुद्ध व शांत रखने के लिये अनावश्यक इच्छाओं का पोषण नहीं करना चाहिए. मन जब शांत रहेगा तो सामर्थ्य बढ़ता है, हम सारे कार्य थोड़े से प्रयास से ही कर पाते हैं, कार्य बोझ नहीं लगता, थके बिना सहज ही हम अपने कर्तव्य को निभाते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिर्वचनीय अनुभूति होती है, सुख की अनुभूति... वह सुख इच्छा पूर्तिवाला क्षणिक सुख नहीं है, वह निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपनेआप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है... फिर न कोई अपना रह जाता है न पराया, न द्वेष न राग, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है, कहीं कोई संशय बाकी नहीं रहता.
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