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Friday, July 17, 2026

मन के पार ही वह मिलता है

जगत में सब कुछ दो पर टिका है, दिन-रात, सुख-दुख, आना-जाना, जन्म-मृत्यु!! मन भी इसी जगत का भाग है, वह दो के बिना रह ही नहीं सकता, जहाँ दो मिटते हैं, वहाँ मन, अमन हो जाता है। इसलिए जगत में इतनी अशांति है, क्योंकि मन को अमन बनाने की सहज कला ही मानव भूलता जा रहा है। प्रकृति के सान्निध्य में सहज ही मन थिर हो जाता है, इतना बड़ा आकाश और इतनी बड़ी धरती देखकर मन उतने समय के लिए एक में टिक जाता है। ईश्वर, गुरुजन अथवा बड़ों के आगे झुकते हुए भी मन एक हो जाता है, हाथ जोड़ते हुए भी उसी एकत्व का अनुभव होता है। शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है। संत अपने भीतर हर क्षण एकत्व का अनुभव करता है, सारा ब्रह्मांड उसे एक जीवित इकाई प्रतीत होता है। उसका मन आत्मा के रस में डूबकर आत्मा ही बन जाता है, जैसे रस में डूबा रसगुल्ला रस ही बन जाता है, या आग में पड़ा लोहा आग ही बन जाता है। 

Sunday, July 13, 2025

स्वप्न सरिस यह जगत है सारा

संत व शास्त्र कहते हैं, आत्मा जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में रहती हुई इस जगत के सुख-दुख का अनुभव करती है।ध्यान में उसे तुरीय या चौथी अवस्था का बोध होता है, जिसमें रहकर वह अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करती है, जो सत्य है। सत्य शाश्वत है और सदा एक सा है। जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, और दसों इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में संलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर ज्ञानेन्द्रियाँ, मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है। स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में वैसा है नहीं. जगत के असत्य होने का प्रमाण अनित्यतता के सिद्धांत से मिलता है। वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है. 


Tuesday, July 25, 2023

‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’

आदिगुरु शंकराचार्य  उसी तरह कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या हैं। सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हम कह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है. 


Sunday, June 25, 2023

जब स्वीकार जगे अंतर में

यह जगत ईश्वर का ही साकार स्वरूप है। जड़-चेतन सबका आधार एक ब्रह्म है। एक ही ऊर्जा भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जीव और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है, सारे भेद ऊपर के हैं। अंत:करण में चैतन्य का आभास होने से बुद्धि स्वयं को चेतन मानने लगती है, और मिथ्या अहंकार का जन्म होता है।अहंकार हरेक को पृथकत्व का बोध कराता है, यह अलगाव ही जगत में दुख का कारण है। जो व्यर्थ तुलना और स्पृहा के कारण व्यथित हो जाये, जो नाशवान वस्तुओं के कारण स्वयं को गर्वित अनुभव करे, उस अहंकार का भोजन दुख ही है। मन, बुद्धि आदि जड़ होने के कारण स्वतंत्र नहीं है, प्रकृति के गुणों के अधीन हैं।जैसे कोई खिलौना स्वयं को गतिशील देखकर चेतन मान ले ऐसे ही चिदाभास या प्रतिबिंबित चेतना स्वयं को कर्ता मान लेती है। मानव सदा एकरस, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य आत्मा है।वह पूर्ण है, प्रेमस्वरूप है, आनंद उसका स्वभाव है। प्रेम तथा आनंद को व्यक्त करना दैवीय गुण हैं। आत्मा में रहना सदा स्वीकार भाव में होने का नाम है। 


Monday, March 13, 2023

सर्वम कृष्णाअर्पणम अस्तु

हम इस जगत को अपना मानकर रहेंगे तो इससे सुख-दुःख लेने-देने का व्यापार ख़त्म हो जाएगा; वरना यह लेन-देन अनंत काल तक चल सकता है। हर बार चाहे हमें कोई दुःख दे या हम किसी को कुछ कहें, पीड़ा एक ही चेतना को होती है। जैसे सारी पूजाएँ एक को ही समर्पित हो जाती हैं, वैसे ही सारी निंदाएँ भी अंतत:एक को ही पीड़ित करती हैं। वह एक हम स्वयं हैं। जगत जैसा है उसके लिए हम ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वह हमारा ही विस्तार है , उसमें सुधार लाना, उसे सही करना उतना ही सहज होना चाहिए जैसे कोई अपने शरीर का कोई रोग दूर करने का प्रयास करता है या घर की मरम्मत करवाता है। यह जग हमारा बड़ा घर है और यहाँ के प्राणी हमारा बड़ा शरीर, जिसमें पशु-पक्षी, पौधे सभी आते हैं। यह सारा जगत हमारे भीतर ही है, आँखों व मन द्वारा हम सब कुछ अपने भीतर ही देखते हैं। कृष्ण के विश्वरूप का संभवतः यही अर्थ है। 


Thursday, November 24, 2022

श्वास श्वास जब खिल जाएगी

अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की  जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं। 


Monday, August 8, 2022

उसकी चाह जगे जब मन में

 हमने इस जगत में अपने चारों ओर कुछ लोगों को वस्तुओं का गुलाम बनकर दुखी होते हुए तथा कुछ सजग व्यक्तियों को अकिंचन होकर भी प्रसन्न रहते हुए देखा है. वास्तविकता को भूले हुए कुछ लोग अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा करते रहते हैं, फिर उसकी साज-संभार में अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाते हैं. हमारी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को तथा स्वयं के इर्दगिर्द का वातावरण संवारने में होता रहे, तभी उसकी सार्थकता है. इसके लिए हमें समझना होगा कि आवश्यकता तथा इच्छा में अंतर है, इच्छाओं का कोई अंत नहीं पर आवश्कताएं सीमित हैं. आवश्यकता की पूर्ति होती है, उसकी निवृत्ति विचार द्वारा नहीं हो सकती पर इच्छा की निवृत्ति हो सकती है.अपनी इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में हम अपनी सहज आवश्यकता को भी भुला बैठते हैं.परमात्मा प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने वाली इच्छा है, पर संसार प्राप्ति की इच्छा कभी पूर्ण नहीं हो सकती. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा वास्तव में हमारी आवश्यकता है, हर जीव आनंद चाहता है, क्योंकि वह ईश्वर का अंश है, उसमें अपने अंशी से मिलने की जो स्वाभाविक चाह है, वह उसकी नितांत आवश्यकता है. जैसे भूख, प्यास आदि आवश्यकताओं की पूर्ति भोजन, जल आदि से हम करते हैं, वैसे ही हमारी आनन्द प्राप्ति की आवश्यकता की पूर्ति ईश्वर प्राप्ति के बाद ही होती है. 

Thursday, May 26, 2022

नित्य-अनित्य का भेद जो जाने

यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों  को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है,  जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता। 


Saturday, May 21, 2022

कैसे हाथ बंटाए जग में

 यह जगत तब तक ही जगत जैसा दिखायी देता है, जब तक स्वयं को जगत से पृथक मानते हैं. जब हम भीतर एक को जान लेते हैं तब इस जगत से पृथकता का अनुभव नहीं करते. एक ही चेतना हर जगह व्याप्त है, जो भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रही है; तब न किसी को पाने की इच्छा, न खोने का भय, जीवन से स्वार्थ सिद्धि लुप्त हो जाती है. स्व में सारा जगत समा जाता है. तब किसी के दोष देखने की प्रवृत्ति का भी नाश हो जाता है, क्योंकि आत्मरूप से सब एक में ही स्थित हैं और जगत रूप से सभी कुछ परिवर्तित हो रहा है. जैसे स्वयं के मन, बुद्धि आदि विकारों का शिकार होते हैं, वैसे सभी के साथ होता है. जगत परमात्मा का क्रीड़ा स्थल है, यहाँ उसके इस आयोजन में अपना हाथ बंटाना भर है, अपना नया खेल आरंभ नहीं करना है ! 


Wednesday, January 19, 2022

अपना मालिक आप बने जो

खुद से परिचय जितना गाढ़ा होता जाता है, पता चलता है हम मालिक हैं पर नौकरों की भूमिका निभाते रहते हैं. मन व बुद्धि हमारी सुविधा के लिए ही तो हैं पर हम वही बन जाते हैं. जल जैसे स्वच्छता करने के लिए है, पर जल यदि गंदा हो तो सफाई नहीं कर पाता है, वैसे ही मन तो जगत में प्रेम, शांति व आनन्द बिखेरने के लिए हैं पर जो मन क्रोध बिखेरता है वह तो वतावरण को दूषित कर देता है. परमात्मा की निकटता का यही तो अर्थ है कि हमारा मन परमात्मा के गुणों को ही प्रोजेक्ट करे न कि अहंकार के साथियों को जो दुःख, क्रोध, ईर्ष्या आदि हैं. 


Sunday, August 1, 2021

शिव-शक्ति से भरा जगत यह


शिव और शक्ति जगत के माता-पिता हैं, शिव अर्थात शुद्ध चैतन्य और शक्ति,  उसमें निहित अनंत शक्तियाँ। सृष्टि में जो भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ हमें दिखाई पड़ते हैं, वे शिव की संकल्प शक्ति से ही जन्मे हैं। हमारे भीतर भी शिव तत्व है जिसका अनुभव ध्यान में किया जा सकता है, क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति जिसमें निहित हैं। जब ये तीनों शक्तियाँ एक होकर शांत हो जाती हैं तब केवल चैतन्य ही शेष रहता है। श्वास का लेना यदि शक्ति का कार्य है तो श्वास छोड़ने के बाद की विश्रांति शिव का अनुभव है। दिन में हम कार्य करते हैं जिसमें हर तरह की शक्ति की आवश्यकता होती है, पर रात्रि में विश्राम के लिए सब कुछ छोड़ देना होता है, इसलिए रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। ध्यान में भी कुछ करना नहीं है केवल विश्राम करना होता  है, तभी शुद्ध चेतना का अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह कर्ता भाव से मुक्त होकर ही हम स्वयं में विश्राम पा सकते हैं।

Sunday, March 21, 2021

उमा कहउँ मैं अनुभवअपना

 रामचरितमानस में एक जगह शिव उमा से कहते हैं, यह जगत एक सपना है और जो इसका आधार भूत  है, वह परम तत्व ही एकमात्र सत्य है। यह जानते हुए भी हम सभी को यह जगत न केवल सत्य प्रतीत होता है, बल्कि अपना भी प्रतीत होता है। पुराणों में कहा गया है शिव समाधिस्थ रहते हैं और आदिशक्ति से यह सारा जगत प्रकट हो रहा है। किन्तु शिव और शक्ति दो नहीं हैं. शिव की शक्ति ही प्रकृति के रूप में व्यक्त हो रही है। नाम और रूप से यह सारा जगत परिपूर्ण है, पर ये दोनों जहाँ से आये हैं, वह शिव की ही शक्ति है। ज्ञान शक्ति भी वहीं से प्रकटी है, जिसे मन यानि इच्छा शक्ति अपने पीछे चलाती है। अहंकार यानि क्रिया शक्ति भी उसी शिव की है पर व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र कर्ता मानकर सुखी-दुखी होता रहता है।ध्यान के जिस क्षण ये तीनों शक्तियां एक होकर अपने मूल स्रोत से  जुड़ जाती हैं तो जीवन में भक्ति और श्रद्धा के फूल सहज ही खिलते हैं। तभी साधक यह जान पाता है कि नित्य बदलने वाला जगत कभी मिलता नहीं और जो सदा एक सा है वह शिव स्वरूप आत्मा कभी नष्ट होता नहीं। 


Tuesday, March 16, 2021

हीरा जन्म अमोल है

 जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी  जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है। 


Tuesday, June 23, 2020

बहे ऊर्जा पल-पल उसकी

जीवन अपार संभावनाएं लिए हमारे सम्मुख खड़ा है. हम ही उससे आँखें चुराए अपने आपको एक बंधे-बंधाये क्रम में ढाल कर अपनी ऊर्जा को व्यक्त होने से रोकते हैं. परमात्मा की ऊर्जा भिन्न-भिन्न आकारों से पल-पल व्यक्त हो रही है. कोई कलाकार एक अनगढ़ पत्थर को सुंदर शिल्प में बदल देता है, कोई सात सुरों से ऐसी मोहक धुन निकालता है कि जड़-चेतन सभी उसे सुनकर ठिठक जाते हैं. कहीं वह परमात्मा वीरों के रूप में प्रकट हो रहा है तो कहीं संतों के रूप में. अनेकानेक फूलों, पंछियों और तितलियों के रूप में भी तो वही ऊर्जा व्यक्त हो रही है. इस ऊर्जा का स्वभाव है प्रेम और आनंद ! ध्यान की गहराई में इसका अनुभव होता है और सेवा के रूप में जगत में यह प्रकट होती है. उन कर्मों से यह प्रकट होती है जो जगत के प्रति प्रेम से प्रकटे हों या आनंद के अतिरेक में सहज ही होते हों. मन जब इतर कामनाओं से खाली हो, तब इस ऊर्जा का अनुभव कण-कण में उसे होता है. शास्त्र इसे ही भक्ति कहते हैं. भक्त का अंतर जब इस भक्ति का स्वाद ले लेता है तो जगत के अन्य स्वाद उसे नहीं भाते. जीवन में उसे कुछ पाने का नहीं सहज होकर जीने का मार्ग भाता है. भविष्य की कल्पनाएं और अतीत की उपाधियों से परे वह केवल वर्तमान में ही रहने लगता है. 

Friday, September 20, 2019

तू ही जाननहार जगत में



जगत में दो ही तो हैं एक नाम-रूप का अनंत विस्तार और दूसरा उसे जानने वाला, एक दृश्य दूसरा दृष्टा. हम यदि दृश्य के साथ एक होकर स्वयं को देखते हैं तो सदा विचलित रहते हैं, क्योंकि दृश्य सदा ही बदल रहा है. साथ ही जानने वाले से हम विलग ही रह जाते हैं. यदि द्रष्टा के साथ एक होकर रहते हैं तो दृश्य हम पर प्रभाव नहीं डालता, पर दृश्य की असलियत को हम जान लेते हैं. जो सदा बदलने वाला है उसकी मैत्री हमें कठिनाई में डाल दे इसमें कैसा आश्चर्य?. जिसका स्वभाव ही अचल है उसका सान्निध्य पाना ही योग में स्थित रहना है.

Sunday, August 25, 2019

जो रहे कमलवत सदा जगत में



जगत में विविधता है, रूप, रंग, गंध, ध्वनि और स्वाद के न जाने कितने विषय हमारे चारों ओर बिखरे हैं. आँख को एक दृश्य दिखाएँ या हजार, उसे कोई भार नहीं लगता. नासिका ने हजारों गंध का ज्ञान ग्रहण किया है पर एक और गंध लेने के लिए उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता. इसी प्रकार मन जो इन्द्रियों के द्वारा दिखाए गये ज्ञान को ग्रहण करता है, न जाने कितने जन्मों से यह कार्य कर रहा है, उसे कभी असुविधा नहीं होती, हर दिन नये-नये विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की उसकी आकांक्षा को कोई बाधा नहीं पड़ती. यहाँ तक की बात जो समझ लेता है वह मन के हजार चिन्तन करने पर भी स्वयं को सहज अवस्था में रख पाने में समर्थ हो जाता है. मन में एक विचार आये या हजार विचार आयें, यदि हम स्वयं को मन से परे एक सत्ता के रूप में अनुभव कर सकते हैं, उसी तरह जैसे रूप से परे आँख है और आँख से परे मन है, तो हम सदा अपने निर्विकार रूप में बने ही रहते हैं. जीवन में रहकर भी कमल की तरह अलिप्त.  

Tuesday, July 16, 2019

गुरू मेरी पूजा गुरू भगवंता



आज गुरू पूर्णिमा है, अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन. शिशु का जब जन्म होता है, माता उसकी पहली गुरू होती है. उसके बाद पिता उसे आचार्य के पास ले जाता है, शिक्षा प्राप्त करने तक सभी शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं. जीविका अर्जन करने के लिए यह शिक्षा आवश्यक है लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल कोई सद्गुरू ही दे सकता है. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है, इसका ज्ञान भी गुरू ही देता है. जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी यदि कहीं मिल सकता है तो वह गुरू का सत्संग ही है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही हमें वह पात्रता प्रदान करती है कि हम उसके ज्ञान के अधिकारी बनें.

Tuesday, June 11, 2019

सृष्टि स्वयं से निर्मित होती



हम सबने सुना है, 'जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि' इसका एक अर्थ तो यह है कि जगत को हम जिस नजरिये से देखते हैं, जगत हमें वैसा ही नजर आता है. यदि एक डाक्टर की नजर से देखें तो लोग  रोगी या निरोगी दिखेंगे. अध्यापक की नजर से बुद्धू या होशियार. संत की नजर से देखें तो उसे सभी परमात्मा स्वरूप ही दिखेंगे. धन की दृष्टि से देखें तो अमीर या गरीब. कवि या गायक की दृष्टि से देखें तो उसे हर कहीं श्रोता ही नजर आयेंगे. लेकिन इस बात का एक और अर्थ भी है, हम स्वयं को और जगत को जैसा देखना चाहते हैं, अपने इर्द-गिर्द का वातावरण जैसा देखना चाहते हैं, वैसा ही दृष्टिकोण हमें अपनाना होगा. अपने विचारों और भावों का सृजन उसके अनुकूल ही करना होगा. यह सूक्ति हमें पूर्णरूप से आत्मनिर्भर होना सिखाती है. इसके अनुसार हर कोई जहाँ विचरता है, उस सृष्टि का निर्माण स्वयं ही करता है. एक ही बगीचे में भिन्न-भिन्न लोग भिन्न उद्देश्यों के लिए आते हैं. वहाँ के सौन्दर्य का दर्शन भी वे अपनी क्षमता के अनुसार ही करते हैं. परमात्मा की कैसी अद्भुत महिमा है, वह किसी के लिए बाल-गोपाल बन जाता है, तो किसी का पिता, माता भी वही है और मित्र भी. एक तरह से यह जगत उस परमात्मा की निरंतर चलती हुई कथा ही तो है. इसीलिए तो कवि कहते हैं, हरि अनंत, हरि कथा अनंता..  

Friday, June 7, 2019

पाना था सो मिला हुआ है



जगत में हम जब तक कुछ पाने की इच्छा से विचरते हैं, हम सत्य से चूक जाते हैं. कुछ लाभ की आशा में हमारा मन तनाव से भरा रहता है, क्यों कि जो भी मिलेगा वह भविष्य में ही मिलेगा. इसी उहापोह में हम वर्तमान के पल से चूक जाते हैं. सृष्टि में प्रतिपल उत्सव चल रहा है, इसमें भागीदार होना है न कि निज के सुख की आशा कुछ न कुछ संग्रह किये जाना है. पंछी गा ही रहे हैं, आकाश की नीलिमा हजारों मील तक फैली है, हवा में फूलों की गंध बिन बुलाये ही चली आती है. परमात्मा हर ढंग से हमें आनन्दित करने को आतुर है. हम न जाने क्या चाहते हैं जो भविष्य की आशा में प्रकृति के इस विशाल आयोजन को अनदेखा कर देते हैं. किसी तितली के पीछे भागते नन्हे बच्चे को उस क्षण में क्या मिल जाता है जब एक पल को तितली किसी फूल पर ठहर जाती है. उसका मन खो जाता है और उसका पूरा अस्तित्त्व ही उस तितली से एकाकार हो जाता है, उसी में वह आनन्दित हो जाता है. हमारा मन जब वर्तमान के पल में सहज होकर जीना सीख लेता है, अतीत का भूत उसका पीछा नहीं करता, भविष्य की कल्पना के जाल में नहीं उलझता, तब प्रकृति अपना द्वार खोल देती है.

Monday, March 4, 2019

हीरा जनम अमोल था


५ मार्च २०१९ 
जीवन कितना छोटा है, यह बात उससे बेहतर कौन जान सकता है जिसके जीवन की शाम हो गयी है और किसी भी पल घोर अंधकार घट सकता है. जीवन कितना बहुमूल्य है यह मृत्यु शैया पर पड़े किसी व्यक्ति की आँखों में स्पष्ट झलकता है. हम अभी न तो इतने वृद्ध हुए हैं और न ही इतने अस्वस्थ, इसलिए अपने जीवन के अनमोल क्षणों को यूँही व्यर्थ के वादविवाद में उलझाये चले जा रहे हैं. हमारे शास्त्रों में सत्य की तुलना रत्नों और हीरों से की गयी है, क्योंकि जगत की दृष्टि में वे अति कीमती हैं, किन्तु सत्य शाश्वत होने के कारण उनसे भी कीमती है और उस सत्य का अनुभव किये बिना एक और जन्म गंवा देना उन दुखों को पुनः निमन्त्रण देना है जिनका अनुभव इस जन्म में हम अनेक बार कर चुके हैं. यदि कोई एक बार निश्चय करता है कि इस क्षण से आगे उसका हर पल अपने भीतर के उस सत्य की खोज में सहायक होगा जिसकी आराधना ऋषि-मुनि करते आये हैं, तो इसी क्षण से जीवन में एक अनोखी सी सुवास भरने लगती है. दिशाएं भी उसका भान कराने में उत्सुक हैं और हवाएं भी, बादल और यह पावन भूमि भी. जगत जिस राह चलता आ रहा है चलता रहेगा, पर एक साधक को तो इसी कोलाहल में उस अदृश्य की वीणा के स्वर सुनने हैं.