Friday, July 17, 2026
मन के पार ही वह मिलता है
Sunday, July 13, 2025
स्वप्न सरिस यह जगत है सारा
संत व शास्त्र कहते हैं, आत्मा जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में रहती हुई इस जगत के सुख-दुख का अनुभव करती है।ध्यान में उसे तुरीय या चौथी अवस्था का बोध होता है, जिसमें रहकर वह अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करती है, जो सत्य है। सत्य शाश्वत है और सदा एक सा है। जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, और दसों इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में संलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर ज्ञानेन्द्रियाँ, मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है। स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में वैसा है नहीं. जगत के असत्य होने का प्रमाण अनित्यतता के सिद्धांत से मिलता है। वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है.
Tuesday, July 25, 2023
‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’
आदिगुरु शंकराचार्य उसी तरह कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या हैं। सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हम कह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है.
Sunday, June 25, 2023
जब स्वीकार जगे अंतर में
यह जगत ईश्वर का ही साकार स्वरूप है। जड़-चेतन सबका आधार एक ब्रह्म है। एक ही ऊर्जा भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जीव और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है, सारे भेद ऊपर के हैं। अंत:करण में चैतन्य का आभास होने से बुद्धि स्वयं को चेतन मानने लगती है, और मिथ्या अहंकार का जन्म होता है।अहंकार हरेक को पृथकत्व का बोध कराता है, यह अलगाव ही जगत में दुख का कारण है। जो व्यर्थ तुलना और स्पृहा के कारण व्यथित हो जाये, जो नाशवान वस्तुओं के कारण स्वयं को गर्वित अनुभव करे, उस अहंकार का भोजन दुख ही है। मन, बुद्धि आदि जड़ होने के कारण स्वतंत्र नहीं है, प्रकृति के गुणों के अधीन हैं।जैसे कोई खिलौना स्वयं को गतिशील देखकर चेतन मान ले ऐसे ही चिदाभास या प्रतिबिंबित चेतना स्वयं को कर्ता मान लेती है। मानव सदा एकरस, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य आत्मा है।वह पूर्ण है, प्रेमस्वरूप है, आनंद उसका स्वभाव है। प्रेम तथा आनंद को व्यक्त करना दैवीय गुण हैं। आत्मा में रहना सदा स्वीकार भाव में होने का नाम है।
Monday, March 13, 2023
सर्वम कृष्णाअर्पणम अस्तु
हम इस जगत को अपना मानकर रहेंगे तो इससे सुख-दुःख लेने-देने का व्यापार ख़त्म हो जाएगा; वरना यह लेन-देन अनंत काल तक चल सकता है। हर बार चाहे हमें कोई दुःख दे या हम किसी को कुछ कहें, पीड़ा एक ही चेतना को होती है। जैसे सारी पूजाएँ एक को ही समर्पित हो जाती हैं, वैसे ही सारी निंदाएँ भी अंतत:एक को ही पीड़ित करती हैं। वह एक हम स्वयं हैं। जगत जैसा है उसके लिए हम ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वह हमारा ही विस्तार है , उसमें सुधार लाना, उसे सही करना उतना ही सहज होना चाहिए जैसे कोई अपने शरीर का कोई रोग दूर करने का प्रयास करता है या घर की मरम्मत करवाता है। यह जग हमारा बड़ा घर है और यहाँ के प्राणी हमारा बड़ा शरीर, जिसमें पशु-पक्षी, पौधे सभी आते हैं। यह सारा जगत हमारे भीतर ही है, आँखों व मन द्वारा हम सब कुछ अपने भीतर ही देखते हैं। कृष्ण के विश्वरूप का संभवतः यही अर्थ है।
Thursday, November 24, 2022
श्वास श्वास जब खिल जाएगी
अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं।
Monday, August 8, 2022
उसकी चाह जगे जब मन में
Thursday, May 26, 2022
नित्य-अनित्य का भेद जो जाने
यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है, जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता।
Saturday, May 21, 2022
कैसे हाथ बंटाए जग में
यह जगत तब तक ही जगत जैसा दिखायी देता है, जब तक स्वयं को जगत से पृथक मानते हैं. जब हम भीतर एक को जान लेते हैं तब इस जगत से पृथकता का अनुभव नहीं करते. एक ही चेतना हर जगह व्याप्त है, जो भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रही है; तब न किसी को पाने की इच्छा, न खोने का भय, जीवन से स्वार्थ सिद्धि लुप्त हो जाती है. स्व में सारा जगत समा जाता है. तब किसी के दोष देखने की प्रवृत्ति का भी नाश हो जाता है, क्योंकि आत्मरूप से सब एक में ही स्थित हैं और जगत रूप से सभी कुछ परिवर्तित हो रहा है. जैसे स्वयं के मन, बुद्धि आदि विकारों का शिकार होते हैं, वैसे सभी के साथ होता है. जगत परमात्मा का क्रीड़ा स्थल है, यहाँ उसके इस आयोजन में अपना हाथ बंटाना भर है, अपना नया खेल आरंभ नहीं करना है !
Wednesday, January 19, 2022
अपना मालिक आप बने जो
खुद से परिचय जितना गाढ़ा होता जाता है, पता चलता है हम मालिक हैं पर नौकरों की भूमिका निभाते रहते हैं. मन व बुद्धि हमारी सुविधा के लिए ही तो हैं पर हम वही बन जाते हैं. जल जैसे स्वच्छता करने के लिए है, पर जल यदि गंदा हो तो सफाई नहीं कर पाता है, वैसे ही मन तो जगत में प्रेम, शांति व आनन्द बिखेरने के लिए हैं पर जो मन क्रोध बिखेरता है वह तो वतावरण को दूषित कर देता है. परमात्मा की निकटता का यही तो अर्थ है कि हमारा मन परमात्मा के गुणों को ही प्रोजेक्ट करे न कि अहंकार के साथियों को जो दुःख, क्रोध, ईर्ष्या आदि हैं.
Sunday, August 1, 2021
शिव-शक्ति से भरा जगत यह
शिव और शक्ति जगत के माता-पिता हैं, शिव अर्थात शुद्ध चैतन्य और शक्ति, उसमें निहित अनंत शक्तियाँ। सृष्टि में जो भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ हमें दिखाई पड़ते हैं, वे शिव की संकल्प शक्ति से ही जन्मे हैं। हमारे भीतर भी शिव तत्व है जिसका अनुभव ध्यान में किया जा सकता है, क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति जिसमें निहित हैं। जब ये तीनों शक्तियाँ एक होकर शांत हो जाती हैं तब केवल चैतन्य ही शेष रहता है। श्वास का लेना यदि शक्ति का कार्य है तो श्वास छोड़ने के बाद की विश्रांति शिव का अनुभव है। दिन में हम कार्य करते हैं जिसमें हर तरह की शक्ति की आवश्यकता होती है, पर रात्रि में विश्राम के लिए सब कुछ छोड़ देना होता है, इसलिए रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। ध्यान में भी कुछ करना नहीं है केवल विश्राम करना होता है, तभी शुद्ध चेतना का अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह कर्ता भाव से मुक्त होकर ही हम स्वयं में विश्राम पा सकते हैं।
Sunday, March 21, 2021
उमा कहउँ मैं अनुभवअपना
रामचरितमानस में एक जगह शिव उमा से कहते हैं, यह जगत एक सपना है और जो इसका आधार भूत है, वह परम तत्व ही एकमात्र सत्य है। यह जानते हुए भी हम सभी को यह जगत न केवल सत्य प्रतीत होता है, बल्कि अपना भी प्रतीत होता है। पुराणों में कहा गया है शिव समाधिस्थ रहते हैं और आदिशक्ति से यह सारा जगत प्रकट हो रहा है। किन्तु शिव और शक्ति दो नहीं हैं. शिव की शक्ति ही प्रकृति के रूप में व्यक्त हो रही है। नाम और रूप से यह सारा जगत परिपूर्ण है, पर ये दोनों जहाँ से आये हैं, वह शिव की ही शक्ति है। ज्ञान शक्ति भी वहीं से प्रकटी है, जिसे मन यानि इच्छा शक्ति अपने पीछे चलाती है। अहंकार यानि क्रिया शक्ति भी उसी शिव की है पर व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र कर्ता मानकर सुखी-दुखी होता रहता है।ध्यान के जिस क्षण ये तीनों शक्तियां एक होकर अपने मूल स्रोत से जुड़ जाती हैं तो जीवन में भक्ति और श्रद्धा के फूल सहज ही खिलते हैं। तभी साधक यह जान पाता है कि नित्य बदलने वाला जगत कभी मिलता नहीं और जो सदा एक सा है वह शिव स्वरूप आत्मा कभी नष्ट होता नहीं।
Tuesday, March 16, 2021
हीरा जन्म अमोल है
जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है।