हम एक बेशकीमती रत्न को अपने भीतर कहीं मन की गहराई में छिपाकर भूल गए हैं, जो अनमोल है और जिसे जितना भी खर्च किया जाये चुकेगा नहीं. नानक तभी कहते हैं वह बेअंत है. हजारों-हजारों संतों, ऋषियों ने उसी अनमोल धरोहर से संपदा पायी, पा रहे हैं और लुटा रहे हैं। यह जो संतों के यहाँ लाखों की भीड़ जुटती है वह उस हीरे की चौंध की झलक मात्र पाने हेतु ही तो, जबकि वह हीरा अपने भीतर भी है। संत इसी चमक का स्मरण कराते हैं। हम हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं। सांसारिक कामों को निपटाने की बड़ी जल्दी रहती है हमें। सब कुछ पा लेने की फिराक में, जल्दी से जल्दी गाड़ी, बंगला, रुतबा, शोहरत इन्हें पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, बिना सोचे कि ये सब हमें ले जाने वाले हैं एक दिन अग्नि की लपटों में। हमारी मंजिल यदि शमशान घाट ही है, चाहे वह आज हो या पचास वर्ष बाद, तो क्या हासिल किया। एक रहस्य जिसे दुनिया भगवान कहती है, हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करने हेतु सदा ही निकट है। वही जो प्रकृति के कण-कण से व्यक्त हो रहा है। वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।
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Tuesday, March 23, 2021
Monday, March 4, 2019
हीरा जनम अमोल था
५ मार्च २०१९
जीवन कितना छोटा है, यह बात उससे बेहतर कौन जान सकता है जिसके जीवन की शाम हो गयी
है और किसी भी पल घोर अंधकार घट सकता है. जीवन कितना बहुमूल्य है यह मृत्यु शैया
पर पड़े किसी व्यक्ति की आँखों में स्पष्ट झलकता है. हम अभी न तो इतने वृद्ध हुए
हैं और न ही इतने अस्वस्थ, इसलिए अपने जीवन के अनमोल क्षणों को यूँही व्यर्थ के
वादविवाद में उलझाये चले जा रहे हैं. हमारे शास्त्रों में सत्य की तुलना रत्नों और
हीरों से की गयी है, क्योंकि जगत की दृष्टि में वे अति कीमती हैं, किन्तु सत्य
शाश्वत होने के कारण उनसे भी कीमती है और उस सत्य का अनुभव किये बिना एक और जन्म
गंवा देना उन दुखों को पुनः निमन्त्रण देना है जिनका अनुभव इस जन्म में हम अनेक
बार कर चुके हैं. यदि कोई एक बार निश्चय करता है कि इस क्षण से आगे उसका हर पल अपने
भीतर के उस सत्य की खोज में सहायक होगा जिसकी आराधना ऋषि-मुनि करते आये हैं, तो
इसी क्षण से जीवन में एक अनोखी सी सुवास भरने लगती है. दिशाएं भी उसका भान कराने
में उत्सुक हैं और हवाएं भी, बादल और यह पावन भूमि भी. जगत जिस राह चलता आ रहा है
चलता रहेगा, पर एक साधक को तो इसी कोलाहल में उस अदृश्य की वीणा के स्वर सुनने
हैं.
Tuesday, July 18, 2017
राम रतन धन पायो
१८ जुलाई २०१७
संत कहते हैं, जिसकी हमें तलाश है वह मिला ही हुआ है. वे कहते हैं, यकीन कर लें
और अपनी जेबें जरा टटोलें, हीरा पड़ा है.. जो इस बात पर यकीन करके खोजेगा सचमुच
हीरा मिल जाएगा. मिलते ही जोर से हँसी आती है तब. खुद को ही खोजते-फिरते रहे थे, खुद
को ही मिल नहीं पाते. जिनकी नजरें सदा बाहर लगी हैं भीतर कभी झांक ही नहीं पाते. एक
दिन जब उसकी खबर हो जाएगी जो भीतर छिपा है तब एक ऐसा फूल खिलेगा, जो कभी नहीं
मुरझाता. ऐसा नहीं होता तो कोई दिल भक्ति के गीत नहीं गाता.
Thursday, September 25, 2014
खोकर उसको ही पाना है
परमात्मा को पाकर हमें आनंद मिलता है, यह नया आनन्द है पर इस पर
रुकना नहीं है. हमें आगे जाना है जहाँ आनन्द का सागर है. परमात्मा हीरा है, उसे
केवल आनन्द का स्रोत समझा तो हम वहीं रुक जायेंगे. इस आनन्द को अपना आधार बनाकर
आगे बढना है. इसे असीम तक ले जाना है. वही तो हमारा स्वभाव है. जैसे ही हमारी दुःख
की पकड़ छूटी, भीतर सुख का झरना बहने लगता है. ध्यान से दुःख की चट्टान हट जाती है
और हम अपने स्वाभाविक रूप को पा लेते हैं, आनन्द हमारा स्वभाव है तो परमात्मा
हमारा स्वभाव है ! उसकी झलक तो कई बार
अनायास ही मिलती है क्योंकि वह भी तो हमें ढूँढ़ रहा है. कभी-कभी वह हमें पकड़ लेता
है, आविष्ट कर लेता है. पर हमारे मन में कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ वह टिक सके, हम
उसे आया हुआ नहीं देख पाते. हम कई बात ठिठके हैं, पर उसकी व्याख्या करके बात को टाल
देते हैं, जब हम जागेंगे तभी जानेंगे कि परमात्मा तो सदा हमें मिलता रहा है जब
पूर्ण हो जायेंगे तो पुरानी स्मृतियाँ भी ताजी हो जाएँगी कि उसको पाने से पहले कई
बार पाकर खो चुके हैं.
Tuesday, April 29, 2014
मोती सी अनमोल हैं सांसें
जनवरी २००६
अब न सम्भले तो रोना
पड़ेगा...नर्क में गर्क होना पड़ेगा. जन्म हीरा गंवाने के काबिल नहीं है, साँस का
अनमोल मोती लुटाने के काबिल नहीं है...न जाने कितनी बार ये वचन हम सुनते, पढ़ते हैं,
पर इनका वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है जब पहली बार गुरू कृपा से भीतर उस
परमात्मा की झलक मिलती है, और तब साधक की यात्रा आरम्भ होती है. उस झलक को पुनः
पाने के लिए वह अपने भीतर जाता है, साधना करता है. उसे सदा यह लगता है जो प्रेम उसे
अपने भीतर अनुभव हो रहा है, वह वास्तविक तो है. क्या विकार नष्ट हो रहे हैं,
अहंकार घट रहा है, क्रोध, लोभ, मोह मान से ऊपर उठ रहा है या नहीं, वाणी का अपराध
तो नहीं होता, प्रेम का पौधा जो अपने अंतर में पनप रहा है उस पर कांटे तो नहीं हैं,
अभिमान के कांटे. पल-पल भीतर की खबर रखता हुआ वह फंक-फूंक कर कदम रखता है, अभी
परमात्मा को जन्मने में समय है, समय नाजुक है, उसे उस माँ की तरह सजग होना है जो गर्भ
में पल रहे अपने शिशु की रक्षा करती है.
Friday, May 18, 2012
वर्तमान ही सत्य है
मार्च २००३
मानव होने के नाते हमारा ईश्वर से मन का सम्बन्ध है. मन, बुद्धि को उससे जोड़ कर
रखने से मानव जिस ऊँचाई तक पहुँच सकता है, वह उसके बिना नहीं होता. ऐसा व्यक्ति
सुख व मान बाँटता रहता है उसका हृदय इनसे छलकता रहता है, इनकी मांग करने वाले का
हृदय सदा अभाव का अनुभव करता है. हमारा आध्यात्मिक स्वास्थ्य बना रहे इसके लिये
हमें साधना करनी होगी. मन की बिखरी हुई ऊर्जा को एक जगह केंद्रित करना है. इस जगत
में कांच के टुकड़ों के अलावा कुछ भी मिलने वाला नहीं है. हीरे के समान आत्मा जब
स्वयं हमारे पास है. सागर यदि सम्मुख हो तो बाल्टी से स्नान कौन करेगा. आत्मरूप
में स्वयं को जानने पर वह परमात्मा हमसे अलग हो भी नहीं सकता. मृत्यु के भय से हम
मुक्त हो जाते हैं. काल हमारे लिये वर्तमान में बदल जाता है. वर्तमान ही सदा सत्य
है और वर्तमान का यह पल अटल है.
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