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Tuesday, January 20, 2015

साहेब मेरा एक है

सितम्बर २००७ 
एक में होना ही स्वर्ग में होना है. दो बनाना ही नर्क में होना है. हम कहाँ रहें यह सवाल नहीं है, हम कैसे रहें यह सवाल है. देखने की कला आए तो संसार के भीतर ही परमात्मा मिलेगा. जब हम नहीं होते तभी परमात्मा होता है. हम तो न जाने कितने-कितने जन्मों में होते आये हैं, परमात्मा कभी-कभी सद्गुरु की कृपा से ही प्रकट होता है. हमारा मिटना भी उसी की कृपा से सम्भव है. हम स्वयं मिटना चाहें तब भी खुद को किसी न किसी रूप में बचा लेते हैं. जीवन को पूरी तरह जानना हो तो उससे ऊपर उठना होगा, उससे पृथक होना होगा. हम मिटे क्षण भर को और वह प्रकट हुआ. पार्थक्य ही तीर की तरह भीतर एक निशान छोड़ जाता है. अपनी सुगंध छोड़ जाता है, प्रेम छोड़ जाता है. एक होने की इच्छा भी एक परम शांति का अनुभव कराती है, एक होने की प्रक्रिया भी आनंद देती है.


Tuesday, April 29, 2014

मोती सी अनमोल हैं सांसें

जनवरी २००६ 
अब न सम्भले तो रोना पड़ेगा...नर्क में गर्क होना पड़ेगा. जन्म हीरा गंवाने के काबिल नहीं है, साँस का अनमोल मोती लुटाने के काबिल नहीं है...न जाने कितनी बार ये वचन हम सुनते, पढ़ते हैं, पर इनका वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है जब पहली बार गुरू कृपा से भीतर उस परमात्मा की झलक मिलती है, और तब साधक की यात्रा आरम्भ होती है. उस झलक को पुनः पाने के लिए वह अपने भीतर जाता है, साधना करता है. उसे सदा यह लगता है जो प्रेम उसे अपने भीतर अनुभव हो रहा है, वह वास्तविक तो है. क्या विकार नष्ट हो रहे हैं, अहंकार घट रहा है, क्रोध, लोभ, मोह मान से ऊपर उठ रहा है या नहीं, वाणी का अपराध तो नहीं होता, प्रेम का पौधा जो अपने अंतर में पनप रहा है उस पर कांटे तो नहीं हैं, अभिमान के कांटे. पल-पल भीतर की खबर रखता हुआ वह फंक-फूंक कर कदम रखता है, अभी परमात्मा को जन्मने में समय है, समय नाजुक है, उसे उस माँ की तरह सजग होना है जो गर्भ में पल रहे अपने शिशु की रक्षा करती है.